मोदी जी! अगर जल संरक्षण पर इतने संजीदा हैं तो कोल्डड्रिंक कम्पनियों के जल दोहन पर एक्शन क्यों नहीं?

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भारतीय लोकतंत्र में जनता जिसे अपना जनप्रतिनिधि चुनती है उसे अपनी समस्या सुनाती है, और वह जनप्रतिनिधि जनता की समस्याओं को सुनने के साथ ही उसके समाधान के प्रयास में जुट जाता है।

मगर पिछले कुछ सालों से एक नई परम्परा का उदय हुआ है, इसमें जनप्रतिनिधि जन के मन की बात सुनने की बजाय खुद के मन की सुनाता है। वाराणसी के सांसद और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ऐसे जनसेवक हैं जो जनता की बात सुनने की बजाय खुद के मन की बात जनता को सुनाते हैं, वह भी रेडियो पर जहां जनता उन्हें सुन तो सकती है, मगर उन्हें सुना नहीं सकती।

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लोकतंत्र में सुनने और सुनाने की परंपरा है, ऐसा इसलिए भी है क्योंकि दूसरों की सुनने की बजाय सिर्फ अपनी बात सुनाना राजतंत्र का अहसास देता है, राजतंत्र में शासक अपनी बात और निर्णय जनता को सुनाकर चला जाता है। चूंकि हम लोकतांत्रिक देश में रहते हैं इसलिए ‘लेखपाल से लेकर राज्यपाल तक’ थाने से लेकर न्यायालय तक’ हमारी बात सुनी जाती है। इसके बाद वो अपनी बात सुनाते हैं। मगर हमारे सांसद (वाराणसी) और देश के प्रधानमंत्री पिछले कार्यकाल से अब तक पचासों बार से अधिक बार रेडियो पर मन की बात जनता को सुना चुके हैं। अपने दूसरे कार्यकाल के पहले मन की बात कार्यक्रम में भूगर्भ जल संरक्षण पर बोल रहे थे। घटते भूगर्भ जलस्तर और भविष्य में होने वाले विकराल जलसंकट जैसे विषय पर मोदी जी का लोगों को आगाह करना और बोलना लाजिमी है, मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी अगर घटते भूजल स्तर पर आप वाकई संजीदा हैं तो जल दोहन करने वाली बहुराष्ट्रीय शीतलपेय कम्पनियों पर लगाम क्यों नहीं लगाते? आपके संसदीय क्षेत्र वाराणसी सहित देशभर में जल सकंट के तमाम कारणों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा धरती के पानी का अकूत दोहन भी है, वाराणसी स्थित कोकाकोला फैक्ट्री के खिलाफ यहां के ग्रामीण आवाज भी उठाते रहे हैं, मगर उनकी आवाज नक्कार खाने में तूती की आवाज बन कर रह गयी है। जबकि तमाम सर्वेक्षणों से भी स्पष्ट हो गया है, बोतलबंद पानी का व्यापार करने वाली और कोल्ड ड्रिंक्स का निर्माण करने वाली फैक्ट्रियां प्रतिदिन करोड़ों गैलन पानी जमीन से दोहन कर रहीं हैं, लेकिन सरकार इस विषय पर चुप है।

भविष्य में जल-संकट से निपटने के लिए सरकार माने आपको कड़े नियम कानून बनाने होंगे,साथ ही बोतल बन्द पानी और कोल्ड ड्रिंक कंपनियों के जल दोहन पर लगाम लगाने  की जरूरत है, वरना जलसंकट पर आपके मन की यह बात हवा हवाई बनकर ही रह जायेगी।

वैसे आपको यह भी याद दिलाने की जरूरत है कि आपने पिछले साल ‘मन की बात’ में महिला सशक्तीकरण पर बोला था, मगर देश में महिलाओं के साथ हिंसा और कार्यस्थल पर उत्पीड़न में कोई खास कमी नहीं आयी है। इस पर भी सख्त कानून बनाने की जरूरत है। और जो पहले से बने हैं उन्हें सख्ती से लागू करने की जरूरत है। मोदी जी आप हमेशा ‘मन की बात’ सुनाते ही हैं, एक बार चमकी बुखार से मरे बच्चों के परिवार के लोगों के मन की बात सुन लीजिए। एक बार अपने संसदीय इलाके के विश्वनाथ कॉरिडोर के विस्थापितों के मन की बात सुन लीजिए, एक बार सांसदों द्वारा गोद लिए गांवों के लोगों की भी बात आप सुन लीजिए, उन व्यक्तियों के मन की भी बात सुन लीजिए जिन्हें आप नवरत्न बनाये थे। खैर सब छोड़िये उस मां गंगा के मन की बात ही सुन लीजिए जिन्होंने आपको काशी बुलाया था।

खैर, मोदी जी सब विषय छोड़ता हूं, बस यह जानना चाहूंगा कि अगर आप से प्रेरित होकर आपका अनुसरण करते हुए सांसद, विधायक, प्रधान, पार्षद क्षेत्र की जनता से मिले बगैर बिना उनकी सुने आपकी तरह स्थानीय एफएम रेडियो चैनलों, स्थानीय केबल चैनलों पर अपने मन की बात जनता को सुनाकर अपने दायित्वों की इतिश्री कर दें तो कैसा लगेगा ? मोदी जी चूंकि आप हमारे सांसद हैं मगर इसे दुर्योग ही कहूंगा कि हम आपसे मिलकर अपनी समस्या या व्यथा नहीं कह सकते, इसलिए यही कह देता हूं कि बहुमत एक भीड़ होती है जो किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति सामूहिक रूप से आकर्षित होती है, उस व्यक्ति या वस्तु से के इर्द-गिर्द एक पहुंच रखने वाले ही उस व्यक्ति वस्तु की भीड़ को करीब से जान पाते हैं, या उसका लाभ पाते हैं। वहीं भीड़ एक समय के बाद निराश होकर छटने लगती है।  उम्मीद है उस बहुमत का मान रखते हुए पिछली बार की तरह आप निराश नहीं करेंगे और मैं वादा करता हूं कि आपसे कालेधन, बेरोजगारी महंगाई, बढ़ती मॉब लिंचिंग, अच्छे दिन सहित तमाम मुद्दे पर गांधारी बन जाऊंगा, नहीं तो जैसे आप रेडियो पर मन की बात सुनाते हैं उसी तरह हम यानी आमजनता अपने मन की बात इसी प्लेटफार्म पर खरी-खरी सुनाते रहेंगे।

(अमित मौर्या वाराणसी से प्रकाशित होने वाले दैनिक “गूंज उठी रणभेरी” के संपादक हैं।)

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