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कांग्रेसः विचारहीनता और नेतृत्वहीनता का संकट

कर्नाटक और मध्य प्रदेश में ‘ऑपरेशन कमल’ की कामयाबी के बाद भारतीय जनता पार्टी को इस बार राजस्थान से उम्मीद है। यहां भी वह मध्य प्रदेश वाले फार्मूले को आजमाने की कोशिश कर रही है। ऐन मौके पर आईटी-ईडी छापे भी मारे गये। सवाल है, क्या राजस्थान में सचिन पायलट उस भूमिका पर खरा उतरेंगे, जो मध्य प्रदेश में भाजपा के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने निभाई थी? दोनों में काफी समानता है। दोनों कांग्रेस के पूर्व और भावी अध्यक्ष बताये जा रहे राहुल गांधी के निकटस्थ नेता रहे हैं। दोनों अपने-अपने पिता क्रमशः माधव राव सिंधिया और राजेश पायलट के असमय निधन के बाद कांग्रेस राजनीति में दाखिल हुए।

दुर्भाग्यवश, दोनों के पिता दुर्घटना में मारे गये। दोनों अपने समय के बेहद महत्वाकांक्षी और कांग्रेस आलाकमान के करीबी नेता थे। राजनीति में दाखिल होने से पहले न तो ज्योतिरादित्य के पास किसी तरह का राजनीतिक अनुभव था और न सचिन के पास। दोनों पंच-सितारा संस्कृति में रचे-बसे युवा प्रोफेशनल थे। लेकिन एक अंतर भी था। ज्योतिरादित्य के मुकाबले सचिन ज्यादा संजीदा, संयत और विनम्र रहे हैं। कहा जा रहा है कि राजस्थान के मौजूदा राजनीतिक संकट में भाजपा की तरफ से ज्योतिरादित्य ही सचिन के मुख्य संपर्क सूत्र बने हुए हैं। क्या ज्योतिरादित्य और उनकी नयी-नयी पार्टी को इस राजनीतिक परियोजना में कामयाबी मिलेगी? आईटी-ईडी आदि के छापों से तो साफ संकेत मिलता है कि सत्ताधारी दल के केंद्रीय नेताओं ने ‘ऑपरेशन कमल’ के लिए पूरी ताकत झोंक दी है।

अचरज की बात नहीं कि कांग्रेस नेतृत्व राजस्थान के घटनाक्रम को लेकर तब जागा जब सचिन पायलट की बगावत सार्वजनिक हो गई। क्या पार्टी है, जिसका प्रदेश अध्यक्ष और सूबे का उपमुख्यमंत्री ही बगावत पर उतारू हो गया और बीते पांच-छह महीने तक केंद्रीय नेतृत्व राजस्थान को लेकर गहरी नींद सोया रहा! मुख्यमंत्री गहलोत और सचिन के बीच संवादहीनता और गहरी अनबन की खबरें छह महीने से लगातार आ रही थीं।

शायद यही सब देखकर बहुत सारे बड़े कांग्रेसी और कांग्रेस-समर्थक भी इन दिनों कहने लगे हैं: ‘पार्टी गहरे संकट में है। पता नहीं कांग्रेस का क्या होगा!’ कपिल सिब्बल जैसों को भी इस आशय का ट्वीट करना पड़ रहा है। संभव है, ऐसे वक्त, कांग्रेसियों को प्रधानमंत्री मोदी का वह भाषण याद आ जाता हो जिसमें उन्होंने ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ के जुमले का प्रयोग किया था। बहरहाल, भारत जैसे देश में कांग्रेस एक ऐसा शब्द है, जो किसी दल या सरकार के प्रयास के बावजूद समाज की स्मृतियों से इतनी आसानी से गायब नहीं होने वाला है। स्वयं कांग्रेस के मौजूदा नेता भी चाहें तो भी कांग्रेस शब्द और उसका इतिहास इतनी आसानी से विलुप्त नहीं होने वाला!

कपिल सिब्बल जैसे कांग्रेसी इन दिनों पार्टी के जिस संकट से दुखी हैं, वह उन्हें भले नया लग रहा हो पर मुझे तो यह कांग्रेस के पुराने संकट का ही अगला चरण नजर आता है। दरअसल, इस संकट का असल कारण है-मौजूदा कांग्रेस पार्टी की विचारहीनता और नेतृत्वहीनता! जिस पार्टी के शीर्ष नेता अपने विवेक, मेधा और अनुभव की जगह सिर्फ अपने कुछ चुनिंदा या नियुक्त सलाहकारों के जरिये पार्टी चलायेंगे, उस पार्टी का राजनीतिक संकट कभी खत्म होने वाला नहीं है। बीते ढाई दशकों से कांग्रेस में तो यही दिख रहा है। जब वह सत्ता में रही तो सत्ता-संस्कृति के चलते इस तरह का संकट कुछ कम था। पर दूसरे तरह के संकट तब भी थे। सत्ता से बाहर होने के बाद पार्टी चौतरफा संकट में घिर गई।

हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि मौजूदा कांग्रेस पार्टी और इसकी कार्य संस्कृति का स्वाधीनता आंदोलन वाली कांग्रेस से कोई लेना-देना नहीं, सिवाय इसके कि वह उस विरासत से अपने को जोड़ती आ रही है। आज वाली कांग्रेस के अधिकतर नेताओं के लिए वैचारिकता के कोई मायने नहीं। भरोसा न हो तो राष्ट्रीय महत्व के चार-पांच बड़े मुद्दों पर कोई भी कांग्रेस के अलग-अलग सामाजिक/क्षेत्रीय पृष्ठभूमि के पांच नेताओं से बातचीत करके देख ले। मंदिर-मस्जिद मसला, शिक्षा नीति, आर्थिक सुधार के तहत निजीकरण/विनिवेशीकरण, आरक्षण सम्बन्धी संवैधानिक प्रावधान और सीएए/एनपीआर आदि जैसे मुद्दों पर कांग्रेसियों की राय उनकी सामाजिक-क्षेत्रीय पृष्ठभूमि के हिसाब से अलग-अलग दिखेगी।

यही वह वजह है कि उसके बड़े-बड़े नेता भी किसी सुबह अचानक भाजपाई हो जाते हैं। मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जैसे बड़े पदों पर रहे कांग्रेस नेताओं को भी भाजपा में शामिल होते देखा गया है। एक हैं विजय बहुगुणा। देश के चोटी के नेता दिवंगत हेमवती नंदन बहुगुणा के सुपुत्र! कांग्रेस ने उन्हें उत्तराखंड का मुख्यमंत्री तक बनाया। पर वह एक दिन अचानक भाजपाई हो गये। उनकी बहन रीता बहुगुणा जोशी उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में कांग्रेस की अध्यक्ष थीं। अब यूपी की भाजपा सरकार में मंत्री हैं। असम, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और बंगाल समेत देश के ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस से पलटकर भाजपाई बने ऐसे दर्जनों नेता मिल जायेंगे।

गोवा, मणिपुर और अरुणाचल में तो और भी नाटकीय पाला-पलट होता रहा है। इसलिए ज्योतिरादित्य इस खेल के कोई नये खिलाड़ी नहीं हैं। कांग्रेस ऐसे खिलाड़ियों से भरी रही है। क्या वामपंथी खेमे के किसी बड़े नेता को कभी ऐसा नाटकीय दल-बदल करते देखा गया है? गुजरात के बड़े भाजपाई नेता रहे शंकर सिंह वाघेला जैसे एकाध अपवाद को छोड़ दें तो भाजपा से कांग्रेस में भी इस तरह के दल-बदल कितने हुए? कोई माने-न माने, भाजपा-संघ के पास उनकी अपनी वैचारिकी है। उनके पास एक मकसद है-भारत को ‘हिन्दुत्व-आधारित राष्ट्र-राज्य’ बनाने का। आज की तारीख में कांग्रेस के पास क्या मकसद है? क्या वैचारिकी है?

अगर इतिहास देखें तो कांग्रेस में हमेशा ही ‘एक जनसंघ’ या ‘एक भाजपा’ मौजूद रही है। इसके बावजूद लंबे समय तक कांग्रेस का संगठन और नेतृत्व कुछ निश्चित मूल्यों और विचारों पर चलता रहा। पर सन् 80-90 दशक के बाद कांग्रेस बहुत तेजी से बदली और सन् 90 के बाद, खासतौर पर उदारीकरण और कथित आर्थिक सुधारों के बाद तो इस कदर बदली कि वह अपने इतिहास और अपनी विरासत के सकारात्मक पहलुओं को भी खो बैठी। आज के दौर में कांग्रेस के पास न कोई ठोस विचार है और न सुसंगत आचार है। विचार के बस कुछ निशान भर हैं। मसलन, पार्टी अपने घोषणापत्रों में सेक्युलरिज्म और डेमोक्रेसी के लिए प्रतिबद्धता घोषित करती रहती है। आचार की भी बस कुछ प्रतीकात्मकता ही बची है। मसलन, 15 अगस्त, 26 जनवरी, 2 अक्तूबर, 30 जनवरी और 14 नवम्बर जैसी कुछ ऐतिहासिक महत्व की तारीखों पर कुछ बुजुर्ग और अधेड़ कांग्रेस नेता सफ़ेद खादी टोपी पहनकर अपने पार्टी समारोहों में आते रहे हैं।

क्या कोई पार्टी किसी ठोस वैचारिकी और गतिशील नेतृत्व के अभाव में लंबे समय तक जीवंत बनी रह सकती है? नाम के लिए वह भले ही जीवित रहे पर जीवंत और गतिशील कैसे रह सकती है? कांग्रेस का असल संकट यही है। वह जीवित तो है पर जीवंत और गतिशील नहीं है। बीते कई दशकों से वह आंदोलन का मंच या पार्टी की जगह सत्ता-राजनीति में सक्रिय लोगों के समूह में तब्दील होती रही और फिर और पतनोन्मुख होकर महज सत्तालोलुप लोगों के झुंड में तब्दील होती गई। इस झुंड में कुछ अच्छे लोग भी हैं, जो मर जाना पसंद करेंगे पर सांप्रदायिक शक्तियों का दामन नहीं थामेंगे। ऐसे कुछ लोग पुराने जमाने की कांग्रेस के आदर्शों से अब भी अनुप्राणित हैं।

कांग्रेस में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं, जिन्हें जीवन के लंबे दौर में कांग्रेस की पूर्व सरकारों के दौरान खूब ‘मेवा’ मिला इसलिए अब भी वे कांग्रेस की ‘सेवा’ में बने हुए हैं। एक तरह का कृतज्ञता-ज्ञापन! आज के जमाने में यह भी कुछ कम नहीं। तीसरी श्रेणी के वे लोग हैं, जहां कांग्रेस अब भी समूह है, भीड़ में तब्दील होने से बची हुई है। ये श्रेणी उन राज्यों में पाई जाती है, जहां कांग्रेस अपने क्षेत्रीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बल पर जिंदा है। ऐसे राज्यों में आमतौर पर पार्टी का सीधा मुकाबला भाजपा या उक्त राज्य की किसी अन्य बड़ी राजनीतिक शक्ति से होता है। उदाहरण के लिए कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, असम और केरल! यही वे राज्य हैं, जिनके बल पर कांग्रेस अब भी राष्ट्रीय स्तर पर दूसरे नंबर की ताकत बनी हुई है।

एक चौथी श्रेणी भी है, जो कांग्रेस को समय-समय पर विचार का खाद-पानी देकर जीवित रखने की पुरजोर कोशिश करती है। इस श्रेणी में शुमार हैं-कांग्रेस को कांग्रेसी नेताओं से भी ज्यादा समझने वाले कांग्रेसी-बुद्धिजीवी। आमतौर पर इस श्रेणी में द्विज, सवर्ण या कुलीन मुस्लिम समुदायों के लेखकों-कलाकारों-सेवानिवृत्त अफसरों और अकादमिक लोगों की बहुतायत है। कांग्रेस और उसके आलाकमान को इनसे समय-समय पर नेक और बुरी, हर तरह की मांगे-बिन मांगे सलाह मिलती रहती है। इन बौद्धिकों को लंबे समय तक कांग्रेस-शासनों के दौरान खूब फायदा मिला। वे चाहते हैं कि उनका वो स्वर्ण-युग एक बार फिर वापस आये! ऐसे लोगों ने कांग्रेस को फायदा पहुंचाया है तो उसे गंभीर क्षति भी पहुंचाई है। इनकी एक बड़ी विशेषता है कि किसी भी कीमत पर ये दलित-ओबीसी या उत्पीड़ित समुदायों के पढ़े-लिखे लोगों को कांग्रेस नेतृत्व के नजदीक नहीं फटकने देते!

इनकी हरसंभव कोशिश होती है कि कांग्रेस आलाकमान की बौद्धिक मंडली में सिर्फ द्विज या कुछ अन्य सवर्ण समुदायों के लोग या अधिक से अधिक कुलीन मुस्लिम बौद्धिक रहें! इन्होंने बौद्धिक जगत में अपने उत्तराधिकारी भी पैदा कर लिये हैं और कांग्रेस के अंतःपुर में उन्हें दाखिला भी दिला दिया है। लेकिन कांग्रेस की यह बौद्धिक मंडली पार्टी के लिए कुछ मामलों में फायदेमंद साबित हुई है तो अनेक मामलों में विध्वंसक भी! हिन्दी पट्टी के राज्यों, खासकर यूपी-बिहार-झारखंड में कांग्रेस के घटते जनाधार में पार्टी का द्विजवादी राजनीतिक बोध भी अहम कारक रहा है। इस ‘पार्टी-बोध’ के निर्माण में इन्हीं मंडलियों की अहम् भूमिका रही। ऐसी ही किसी मंडली के सुझाव पर कांग्रेस शासन के दौरान केंद्रीय मंत्री रहे एक बड़े पार्टी नेता इन दिनों यूपी में ‘ब्राह्मण चेतना परिषद’ के बैनर तले ब्राह्मण-गोलबंदी शुरू करने वाले हैं। पार्टी आलाकमान उनके इस प्रस्तावित अभियान को लेकर अभी तक खामोश है।

कुल मिलाकर आज की कांग्रेस भांति-भांति के चेहरों, चरित्रों और घटनाक्रमों का एक जीवित अजायबघर है, जहां एक से बढ़कर एक विद्वान राज नेताओं की तस्वीरों से सज्जित दीवारें हैं, रोशनदानों और खिड़कियों से झलकती ऐतिहासिक घटनाएं हैं और भित्तियों-मेहराबों पर स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों की यादें हैं। पर इस अजायबघर में वर्तमान के नाम पर सिर्फ उसके निरंतर घटते दर्शक हैं।

क्या कांग्रेस अपने स्वनिर्मित अजायबघर से बाहर लोगों के बीच, कस्बों, गांवों, कल-काऱखानों और खेतों-खलिहानों की तरफ निकलेगी? ट्विटर और इस्टाग्राम से जुमलेबाजी और शाब्दिक-जमावड़ेबाजी हो सकती है, बड़ी राजनीति नहीं! पूर्व राजमहलों, पूर्व मंत्री-पुत्रों, अमीरों और अरबपतियों के बीच से नेता बनाने के बजाय जब कांग्रेस जमीनी स्तर से कार्यकर्ता और नेता बनाना सीखेगी तो वह सिर्फ जीवित नहीं, जीवंत संगठन भी बन सकेगी और बार-बार उसके सामने मध्य प्रदेश या राजस्थान जैसे राजनीतिक संकट भी नहीं पैदा होंगे। क्या अपनी पसंद के लोगों के पसंदीदा विचारों के अलावा आज की कांग्रेस ऐसे अप्रीतिकर विचारों को भी सुनती है? मुझे नहीं लगता, गांधी-नेहरू के जमाने की कांग्रेस की तरह आज का कांग्रेस नेतृत्व हर तरह के विचारों को सुनने में यकीन करता है!

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं और आप राज्यसभा टीवी के संस्थापक कार्यकारी संपादक रह चुके हैं।)

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This post was last modified on July 13, 2020 9:09 pm

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