Tue. Oct 22nd, 2019

हादसे तो क्या रुकेंगे, भ्रष्टाचार को बढ़ावा जरूर देगा नया मोटर व्हीकल एक्ट

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प्रतीका्त्मक फोटो।

सरकार का नया मोटर व्हीकल एक्ट विवादों में है। जहां अनेक विपक्षी दल और बुद्धिजीवी यह आरोप लगा रहे हैं कि इसके अनेक प्रावधान हमारे संघीय ढांचे की आत्मा पर आघात हैं वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि अठारह राज्यों के परिवहन मंत्रियों से चर्चा और विमर्श के बाद ही यह बिल तैयार किया गया है और अब इसकी आलोचना करने का नैतिक अधिकार विपक्ष को नहीं है क्योंकि इनमें से कई राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं और बिल में इन राज्यों के सुझाव भी सम्मिलित हैं। राज्यसभा में भी बिल में अंतिम समय में संशोधन किया गया और परिवहन से संबंधित किसी भी योजना की घोषणा से पहले इसके प्रावधानों पर राज्यों की सहमति को आवश्यक बना दिया गया जबकि पहले इसके लिए राज्यों से चर्चा का ही प्रावधान था, आवश्यक नहीं था कि केंद्र उनके विचारों से सहमत होता।

केंद्रीय परिवहन मंत्री का कहना है कि यह बिल उन ढांचागत सुधारों की ओर एक मजबूत कदम है जिनकी आवश्यकता परिवहन क्षेत्र लंबे समय से महसूस कर रहा था लेकिन भ्रष्ट रीजनल ट्रांसपोर्ट सिस्टम द्वारा खड़ी की गई बाधाओं और पिछली सरकारों में इच्छा शक्ति के अभाव के कारण यह मामला लंबित पड़ा हुआ था। नया बिल नेशनल ट्रांसपोर्ट पॉलिसी और नेशनल रोड सेफ्टी बोर्ड के गठन का मार्ग प्रशस्त करेगा। रूरल ट्रांसपोर्ट जो अब तक राज्य सरकारों द्वारा उपेक्षित था वह प्राथमिकताओं के केंद्र में आ जाएगा। सब्सिडी प्राप्त इलेक्ट्रिक बसों के प्रचलन से कम खर्च में वातानुकूलित सड़क यात्रा सर्वसुलभ होगी। इससे लोगों में निजी वाहन नहीं रखने की प्रवृत्ति बढ़ेगी और पर्यावरण प्रदूषण कम होगा तथा यह नए निवेश का जरिया भी बनेगा।

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नए मोटर व्हीकल एक्ट में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर भारी भरकम जुर्माने का प्रावधान किया गया है। केंद्र सरकार का यह मानना है कि भारी भरकम जुर्माने के डर से लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करने लगेंगे और जानलेवा दुर्घटनाओं में कमी आएगी। सरकार का यह तर्क आश्चर्यजनक है क्योंकि वैश्विक स्तर पर अनेक सरकारों के अनुभव अब तक यह रहे हैं कि भले ही जुर्माने की राशि कम हो किंतु यदि इसे बिना भेदभाव के और बिना कोई रियायत दिए ईमानदारी से वसूला जाए तो नियमों के उल्लंघन की प्रवृत्ति घटती है, चाहे वह ट्रैफिक के नियम हों या किसी अन्य क्षेत्र के। इसके विपरीत यदि जुर्माना असाधारण रूप से अधिक होता है तो या तो इसे वसूला ही नहीं जाता या इसके कारण भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है और वसूली कर्त्ता अधिकारी इसका उपयोग अपनी जेब भरने के लिए करते हैं। गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्य नए मोटर व्हीकल एक्ट में प्रस्तावित जुर्मानों को घटाने की ओर अग्रसर हैं जबकि उत्तरप्रदेश ने पूर्व की दरों को यथावत रखा है यद्यपि वह केंद्र से सहमति का आकांक्षी है।

ऐसा नहीं है कि परिवहन मंत्री आरटीओ महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार से अपरिचित हैं। एक दैनिक समाचार पत्र के कार्यक्रम में उन्होंने 10 दिसंबर 2015 में कहा था- आरटीओ देश का सबसे भ्रष्ट महकमा है। इनके द्वारा की जा रही लूट खसोट चंबल के डाकुओं को भी पीछे छोड़ देती है। उन्होंने कहा-  मैं स्वयं को अपराधबोध से ग्रस्त अनुभव करता हूँ। भारत जैसी सरलता से ड्राइविंग लाइसेंस पूरी दुनिया में नहीं मिलते। इनमें से तीस प्रतिशत बोगस होते हैं। —— देश में हर साल 5 लाख दुर्घटनाएं होती हैं जिसमें डेढ़ लाख लोग मारे जाते हैं और तीन लाख लोग अपाहिज हो जाते हैं। इनमें से अधिकांश युवा होते हैं। इनके परिवार उजड़ जाते हैं। स्वयं एक दुर्घटना में मेरा पैर चार स्थानों पर टूट गया था।

मेरे सचिव ने अपना बच्चा खोया। इन दुर्घटनाओं के लिए मैं जिम्मेदार हूँ। हमारी रोड इंजीनियरिंग इसके लिए जिम्मेदार है। श्री गडकरी ने पहले भी एक अवसर पर महाराष्ट्र में रिश्वतखोरी के लिए बोलचाल की भाषा में प्रचलित शब्द लक्ष्मी दर्शन का उल्लेख करते हुए आरटीओ महकमे के भ्रष्टाचार पर अपना गुस्सा व्यक्त किया था। पुनः 2 अगस्त 2018 को एक अंग्रेजी दैनिक को दिए गए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि भ्रष्ट आरटीओ एसोसिएशन लॉबी ही नए मोटर वाहन अधिनियम के मार्ग में बाधा है और वह राज्यों को इस बिल का विरोध करने के लिए उकसाती रहती है जबकि सच्चाई यह है कि इस बिल में न तो राज्यों के अधिकारों और शक्तियों पर अतिक्रमण किया गया है न ही उनमें कोई कटौती की गई है।

इस बिल के माध्यम से परिवहन सेक्टर को पारदर्शी, भ्रष्टाचार रहित, मैनुअल प्रक्रियाओं से मुक्त और ई लाइसेंसिंग तथा ई रजिस्ट्रेशन जैसी सुविधाओं से युक्त बनाने का दावा करने वाले गडकरी ने इस बिल में जब इस सेक्टर की अनियमितता पर निशाना साधा तो भ्रष्टाचारियों से अधिक भ्रष्टाचार पीड़ित आम जनता को दोषी मानते हुए उससे मनमाना जुर्माना वसूलने में लग गए।

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा 18 महीनों तक कराए गए भ्रष्टाचार विषयक एक सर्वेक्षण के नतीजे जब मई 2017 में सामने आए थे तब 69 प्रतिशत ब्राइबरी रेट के साथ भारत का नाम एशिया के सबसे भ्रष्ट देश के रूप में उजागर हुआ था। सर्वे के अनुसार हमारे 62 प्रतिशत लॉ एनफोर्समेंट ऑफिसर्स रिश्वत लेते हैं। एक भारतीय के द्वारा वर्ष भर में औसत रूप से जितनी रिश्वत दी जाती है उसका एक चौथाई यातायात नियमों का पालन कराने वाले अधिकारियों की जेब में जाता है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के सर्वेक्षण के अनुसार भारत के ट्रक मालिक वर्ष में 222 करोड़ रुपए की रिश्वत देने के लिए बाध्य किए जाते हैं।

इस रिश्वत का 43 प्रतिशत आरटीओ अधिकारियों को और 45 प्रतिशत पुलिस कर्मियों को दिया जाता है। यातायात, वन सुरक्षा और एक्साइज से जुड़े अधिकारी इनकी ट्रकों को रोकते हैं और 60 प्रतिशत बार  रोकने की इस कार्रवाई का उद्देश्य पैसा वसूलना होता है। हार्वर्ड कॉलेज तथा मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में 2007 में प्रकाशित एक सर्वे के अनुसार हमारे देश में ड्राइविंग लाइसेंस धारी 60 प्रतिशत लोगों ने ड्राइविंग टेस्ट दिया ही नहीं और ड्राइविंग लाइसेंस रखने वाले 54 प्रतिशत लोग स्वतंत्र ड्राइविंग परीक्षण में असफल रहे।

तब से लेकर अब तक स्थिति बदली नहीं है। ऐसा नहीं है कि लोग ड्राइविंग सीखना नहीं चाहते लेकिन हमारी भ्रष्ट व्यवस्था ऐसी है कि ड्राइविंग लाइसेंस पाने के लिए ड्राइविंग जानने से अधिक रिश्वत देने को जरूरी बना देती है। बिना रिश्वत के योग्य ड्राइवर भी लाइसेंस नहीं बना सकता। देश के लगभग 1000 आरटीओ कार्यालय भ्रष्टाचार के केंद्र बने हुए हैं। भारत सड़क दुर्घटनाओं को कम करने पर केंद्रित ब्राजीलिया डिक्लेरेशन पर नवंबर 2015 में हस्ताक्षर कर चुका है और 2020 तक सड़क दुर्घटनाओं को कम करने हेतु अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर चुका है।

यातायात और परिवहन विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाए बिना सड़क दुर्घटनाओं का कम होना कठिन है। 2016 में मुम्बई पुलिस के हेड कांस्टेबल सुनील बलवंत राव टोके ने मुंबई हाई कोर्ट में मुम्बई ट्रैफिक पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार के संबंध में एक जनहित याचिका दायर की थी। उसने यह आरोप लगाया था कि मुम्बई पुलिस 10000 रुपये से 50000 रुपए की अवैध वसूली कर शराबी ड्राइवर्स को छोड़ देती है तथा अवैध ऑटो और टैक्सी मालिक मुम्बई पुलिस को नियमित रूप से 1000 से 2000  रुपए की रिश्वत देते हैं। उसने कुछ ऐसे मामलों के कथित वीडियो सबूत भी प्रस्तुत किए थे। बाद में अगस्त 2017 में मुम्बई पुलिस ने हाई कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर उन उपायों की जानकारी दी थी जो भ्रष्टाचार कम करने के लिए उसने लागू किए थे।

इनमें हजारों की संख्या में सीसीटीवी कैमरों का संस्थापन भी एक उपाय था जिनका संबंध पुलिस और ट्रैफिक के कंट्रोल रूम से था। इनके माध्यम से ट्रैफिक पुलिस कर्मियों की गतिविधि पर निगरानी रखी जा रही थी। इन सीसीटीवी कैमरों द्वारा यातायात नियमों के उल्लंघन कर्ताओं को चिह्नित किया जा रहा था। इन्हें मोबाइल पर चालान का विवरण, प्रमाण के तौर पर फोटोग्राफ और पेमेंट हेतु लिंक भेजा जाता था। इस तरह इस पूरी प्रक्रिया में मानवीय हस्तक्षेप को कम करने की कोशिश की गई थी। ट्रैफिक पुलिस कर्मियों को ई चालान हेतु हैंडसेट भी मुहैया कराए गए थे ताकि कैश का लेन देन न करना पड़े। पुलिस वालों के शरीर पर कैमरे फिट करने का भी प्रस्ताव था जो उनकी सारी बातचीत और गतिविधियों को रिकॉर्ड करता। जनता को शिकायत दर्ज करने के लिए ईमेल आईडी भी उपलब्ध कराने का जिक्र इस हलफनामे में था। मुम्बई हाई कोर्ट इस हलफनामे से संतुष्ट हुआ और उसने इन उपायों को अन्य स्थानों पर लागू करने का सुझाव भी दिया।

आरटीओ विभाग का भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अनियमितता तक सीमित नहीं है अपितु यह जानलेवा सिद्ध होता है। 27 जून 2019 को मुग़ल रोड पर हुई एक दुर्घटना में 11 बच्चों की जान गई। बाद में यह पता चला कि दुर्घटना ग्रस्त गाड़ी पुंछ की थी किंतु सारे नियम कायदों को ताक में रखकर इसे जम्मू आरटीओ द्वारा फिटनेस प्रमाण पत्र दिया गया था। गाड़ी के पास रुट परमिट भी नहीं था। इस घटना की जांच में जम्मू आरटीओ में व्याप्त भयानक भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ था। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी तीन चक्का वाहनों को फिटनेस सर्टिफिकेट देने में अनियमितता और भ्रष्टाचार के बाद जुलाई 2018 में दिल्ली की तत्कालीन ट्रांसपोर्ट कमिश्नर को आड़े हाथों लिया था। आंध्र प्रदेश के एन्टी करप्शन ब्यूरो द्वारा नवंबर 2018 में यह जानकारी दी गई कि प्रदेश के सबसे भ्रष्ट अधिकारियों की सूची में पहले 10 स्थानों पर आरटीओ विभाग के अधिकारी ही काबिज हैं। देश के कुछ शहरों में सेकंड हैंड गाड़ियों की बिक्री के नाम पर चोरी की गाड़ियों की बिक्री करने वाले गिरोहों का पर्दाफाश हुआ था।

यह दुःखद स्थिति कुछ प्रान्तों की ही नहीं है, आरटीओ में व्याप्त भ्रष्टाचार देशव्यापी है। जब गलत ढंग से फिटनेस सर्टिफिकेट और रोड परमिट हासिल करने वाली ओवर लोडेड गाड़ी द्वारा कोई एक्सीडेंट होता है तो इसके लिए केवल ड्राइवर उत्तरदायी नहीं होता इसके पीछे एक पूरी भ्रष्ट व्यवस्था उत्तरदायी होती है। लेकिन अपनी रोजी रोटी कमाने के लिए तरह तरह के समझौते करने को बाध्य ड्राइवर को दंडित करना भ्रष्ट व्यवस्था के संचालकों के लिए सबसे आसान होता है और आवश्यक भी क्योंकि इस तरह वे अपने गुनाहों पर पर्दा डाल सकते हैं। ओवर लोडिंग हमारे रोड ट्रांसपोर्ट सिस्टम में एक आम परिघटना है और दुर्घटनाओं का कारण भी। छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड और मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल इलाकों में जहाँ कोल ब्लॉक अवस्थित हैं और स्टील तथा पावर उद्योगों की भरमार है वहां अवैध तरीके से कोयले एवं अन्य खनिजों का परिवहन करते दैत्याकार वाहनों द्वारा आम लोगों को कुचल देना एक आम बात है।

ओवर लोडेड वाहनों के कारण भ्रष्टाचार की वजह से पहले से ही कमजोर बनी सड़कें गड्ढों में तब्दील हो जाती हैं। पैदल और दोपहिया वाहन चालक इन सड़कों पर रोज अपनी जान हथेली पर लेकर यात्रा करने को बाध्य होते हैं। देश में स्टील और पावर उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी स्थान रखने वाले छत्तीसगढ़ के उद्योग बहुल रायगढ़ जिले में केवल 100 किलोमीटर की परिधि में ही 2015 से 2018 की अवधि में लगभग 1000 लोग ऐसी औद्योगिक वाहन कारित दुर्घटनाओं में अपने प्राण गंवा चुके हैं। इंडियन फाउंडेशन ऑफ ट्रांसपोर्ट रिसर्च एंड ट्रेनिंग ने एक अध्ययन में यह बताया था कि देश में हर तीन ट्रकों में एक ओवर लोडेड होता है और 50 प्रतिशत दुर्घटनाओं की जिम्मेदार यही ओवर लोडिंग होती है। जब कोई ट्रक 10 प्रतिशत ओवर लोडेड होता है तो उसके स्टीयरिंग पर 50 प्रतिशत और ब्रेक पर 40 प्रतिशत नियंत्रण कम हो जाता है। यह ओवर लोडिंग सड़क की आयु को 80 प्रतिशत कम कर देती है जबकि ट्रक की आयु 30 प्रतिशत कम हो जाती है। बिचौलिये और अस्थायी अल्पकालिक स्वामित्व वाले छोटे ट्रक ऑपरेटर ओवर लोडिंग को अनिवार्य बुराई की तरह देखते हैं, यही स्थिति खाद, सीमेंट और स्टील उत्पादकों की है जो माल भाड़े में कमी लाने के लिए ओवर लोडिंग करते हैं। ऐसी गाड़ियों द्वारा जो प्रदूषण फैलाया जाता है उसका तो ठीक से आकलन भी नहीं किया गया है।

छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड और मध्यप्रदेश के सघन वनाच्छादित क्षेत्रों में कोयले और अन्य बहुमूल्य खनिजों के प्राचुर्य के कारण यहां उद्योगों का एक जाल बिछ चुका है। कस्बे नगरों का और नगर महानगरों का रूप ले रहे हैं। नगर निवेश के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए अराजक और अनियोजित रूप से इन नगरों में संपन्नता के साधनों के ढेर लगाए जा रहे हैं। वर्तमान महानगरों के कटु अनुभवों से सबक सीखने के स्थान पर इनकी बेतरतीबी को आदर्श और अनुकरणीय समझा जा रहा है। इस प्रकार इन नगरों को यातायात की दृष्टि से अबूझ पहेली में बदल दिया गया है- जहां न पार्किंग की सुविधाएं हैं, न नालियां हैं, न सड़कें हैं और जहां ट्रैफिक जाम और दुर्घटनाओं की लोगों को आदत सी पड़ गई है। यह स्थिति कमोबेश देश के हर उस इलाके की है जहाँ औद्योगीकरण और नगरीकरण ने पैर पसारे हैं।

किंतु बहुचर्चित और बहुप्रतीक्षित मोटर व्हीकल एक्ट में इस अराजक और भ्रष्ट तंत्र की बड़ी मछलियों पर कार्रवाई करने की हिम्मत और नीयत दोनों का अभाव दिखता है। भ्रष्टाचार के गड्ढों से भरी सड़कों पर बिना परमिट के झूठे फिटनेस सर्टिफिकेट के आधार पर तूफानी रफ्तार से चल रहे ओवर लोडेड दैत्याकार वाहनों से खुद को किसी तरह बचाते -मानो अपने आखिरी सफर पर निकले -निरीह दुपहिया वाहन चालक की गाड़ी का रजिस्ट्रेशन, प्रदूषण सर्टिफिकेट और ड्राइविंग लाइसेंस देखना या बिना हेलमेट के पाए जाने पर उससे अवैध वसूली करना भ्रष्ट व्यवस्था की निर्लज्जता की पराकाष्ठा है। नया मोटर व्हीकल एक्ट लोगों को पेपर सर्टिफिकेट इकट्ठा करने के लिए प्रेरित करने वाला है। भ्रष्ट व्यवस्था में चंद रुपये देकर हासिल किए गए प्रमाण पत्रों से न तो कोई दक्ष चालक बन जाएगा न खटारा गाड़ियां प्रदूषणमुक्त गाड़ियों में तबदील हो जाएंगी।

नए मोटर व्हीकल एक्ट के लागू होने के बाद से मीडिया में दो तरह के दृश्य देखने में आ रहे हैं- या तो रसूखदार और सत्तासीन लोग ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन कर ट्रैफिक पुलिस के अधिकारियों को आंख दिखा रहे हैं या ट्रैफिक पुलिस कर्मी आम नागरिकों के साथ बर्बरता से पेश आ रहे हैं। यह दृश्य नए नहीं हैं किंतु इसलिए चर्चा में हैं कि ये जादुई मोटर व्हीकल एक्ट के लागू होने पर यातायात व्यवस्था में चमत्कारिक सुधार होने के सरकारी दावों की हकीकत बयान करते हैं। शोहरत, सत्ता और शराब के नशे में मदहोश नामचीन फिल्मी सितारों, नेता पुत्रों और रईसजादों द्वारा मासूम लोगों को कुचल डालने और कानून की गिरफ्त से बच निकलने के अनेक मामले सबके जेहन में हैं।जब कानूनों को लागू करने वाले लोगों को भ्रष्टाचार की लत लगी हुई हो तब कठोर कानून इन भ्रष्टाचारियों के लिए भ्रष्टाचार के नए आयाम खोलते हैं। पूर्वानुभव यह सिद्ध करते हैं कि कठोर कानूनों से अपराध नहीं रुकते बल्कि इनसे लोगों में अपराधों पर पर्दा डालने की प्रवृत्ति बढ़ती है। सरकार को समझना होगा कि भ्रष्टाचार आम आदमी की आदत नहीं मजबूरी है तभी वह आम आदमी के विषय में अधिक मानवीय ढंग से सोच पाएगी। 

(डॉ. राजू पाण्डेय स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल रायगढ़ में रहते हैं।)

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