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Monday, September 20, 2021

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CPC ने दी बीजेपी नेताओं को ट्रेनिंग, देखिए असर- चीन नहीं कांग्रेस है दुश्मन नंबर वन

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एक अभूतपूर्व स्थिति का सामना कर रहा है हिन्दुस्तान। सीमा पर जांबाज सैनिक ‘निहत्थे’ शहादत दे रहे हैं, दुश्मन से लड़ रहे हैं, सीमा की रक्षा कर रहे हैं। मगर, देश का शासक दुश्मन सेना को क्लीन चिट दे रहा है। न कोई हमारे देश की सीमा में घुसा, न कोई घुसा हुआ है और न किसी पोस्ट पर किसी का कब्जा है। इस पर प्रतिक्रिया देने में चीन ने देर नहीं की। उसने पूरी गलवान घाटी को अपना बता डाला। इसका खंडन करने में भी भारत को 24 घंटे लग गये। अब तो चीन ने अपना दावा नये सिरे से दोहरा दिया है, मगर इसका जवाब देने में भी विदेश मंत्रालय को वक्त लग रहा है।  

चीन पर चुप्पी, कांग्रेस के खिलाफ दुष्प्रचार 

चीन ने देप्सांग घाटी पर नया मोर्चा खोल दिया है। सीमा पर बख्तरबंद गाड़ियां, तोप आदि भी तैनात कर दिए हैं। पीपी 14 के पास दोबारा बिल्ड अप किया है और टेंट गाड़े हैं जो 22 जून के सैटेलाइट इमेज से साफ है। अब पूर्वी लद्दाख सेक्टर में 10 हजार सैनिक तैनात किए जाने की सूचना है। इस चिंताजनक स्थिति पर नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं है। न विदेश विभाग, न रक्षा विभाग और न पीएमओ ने नयी परिस्थिति पर कुछ कहा है।

भारत-चीन वार्ता, फाइल फोटो।

चीन को जवाब देने के बजाए सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस पर हर दिन नये हमले कर रही है। चीन को नंबर वन दुश्मन बताने के बजाए वह ऐसा व्यवहार कर रही है मानो कांग्रेस ही नंबर वन दुश्मन हो। 

क्या किसी एनजीओ के लिए फॉरेन फंडिंग बैन है?

25 जून को मीडिया में एक खबर उछाली गयी कि राजीव गांधी पीस फाउंडेशन को चीन की ओर से 2006 में 10 लाख रुपये मिले। कई जगह यह रकम 90 लाख भी बतायी गयी है। कांग्रेस ने अपनी निष्ठा चीन को बेच दी है। ताज्जुब की बात है कि महज 10 लाख या 90 लाख रुपये में कांग्रेस ने अपनी निष्ठा चीन को बेच दी! 14 साल बाद यह खुलासा हो रहा है!  

मोदी सरकार में 14,500 एनजीओ के लाइसेंस रद्द किए गए। सवाल यह है कि पीस फाउंडेशन कैसे बच गया? पीस फाउंडेशन का ऑडिट होता है। सारे लेन-देन बताए जाते हैं। क्या यह बताए गये लेन-देन से अलग नया खुलासा है? निश्चित रूप से पीस फाउंडेशन को पाकिस्तान और दूसरे देशों से भी फंड मिले होंगे। सबका ब्योरा भी सरकार के पास होगा। फिर तो हर दिन खुलासे होने चाहिए। 

मगर, नहीं। अभी कोई ऐसा खुलासा नहीं होगा कि कांग्रेस के संबंध आतंकवादियों से हैं या फिर पाकिस्तान से हैं। ऐसी आवाज़ की जरूरत अभी नहीं है बीजेपी को। बीजेपी को अभी ऐसी आवाज चाहिए जिसमें कांग्रेस और चीन के बीच दोस्ती साबित की जा सके। कांग्रेस को चीन के साथ मिलकर देश के खिलाफ साजिश करने वाला बताया जा सके। 

अगर भूले नहीं होंगे तो गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरोप लगाया था कि उन्होंने पाकिस्तान के साथ मिलकर बीजेपी को हराने की साजिश रची और इसके लिए हुई बैठक में पाकिस्तानी राजदूत, कश्मीरी अलगाववादी समेत पूर्व सेनाध्यक्ष भी शामिल थे। इस आरोप को कांग्रेस ने गंभीरता से लिया था और पीएम से माफी मांगने की मांग की थी। जब पीएम मोदी की ओर से अरुण जेटली (अब स्वर्गीय) ने राज्य सभा में माफी मांगी, तब यह मामला शांत हुआ। तब तक बीजेपी का मकसद पूरा हो चुका था। गुजरात विधानसभा चुनाव में जनता को वह बरगला चुकी थी। 

कार्रवाई क्यों नहीं, सिर्फ बदनाम क्यों करती है बीजेपी सरकार?

देश में 92 हजार एनजीओ हैं जिन्हें विदेशी फंडिंग मिलती है। अगर राजीव गांधी पीस फाउंडेशन में कुछ गलत हुआ तो कांग्रेस को बदनाम करना प्राथमिकता होगी या फिर कार्रवाई करना? क्या कोई प्राथमिकी दर्ज करायी गयी? क्या कोई केस हुआ? ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। विदेश से फंड लेना हिन्दुस्तान में अपराध नहीं है। बीते दिनों मोदी सरकार ने कोशिश की थी कि जो एनजीओ विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल राजनीतिक मकसद से धरना-प्रदर्शन आदि में कर रहे हैं, उन पर अंकुश लगाई जाए। मोदी के शासनकाल में 14500 एनजीओ के लाइसेंस रद्द किए गये। मगर, 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया था कि पसंद-नापसंद के आधार पर एनजीओ की विदेशी फंडिंग जारी रहने देने या रोक देने को नहीं माना जाएगा। किसी एनजीओ को राजनीतिक ठहराकर उसके इस अधिकार को रोका नहीं जा सकता।

जाहिर है राजीव गांधी पीस फाउंडेशन को चीन से मिले 10 लाख रुपये की फंडिंग कोई ऐसा मामला नहीं है कि कांग्रेस की निष्ठा पर शक जताया जाए। मगर, मीडिया की मदद से यही बात बार-बार कही जाएगी तो शक-शुबहा पैदा होंगे। यही बीजेपी का मकसद है। 

कांग्रेस-सीपीसी में एमओयू ‘ब्रेकिंग खबर’ कैसे?

कुछ दिन पहले भी कांग्रेस पार्टी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच 2008 में एमओयू होने की बात को सनसनी के तौर पर पेश किया गया था। तब गांधी परिवार को बीजिंग ओलंपियाड में आमंत्रित किया गया था।  2011 में स्वयं सोनिया गांधी ने चीनी न्यूज एजेंसी शिन्हुआ को दिए इंटरव्यू में इस एमओयू का खुलासा किया था और बताया था कि दोनों पार्टियां युवा नेतृत्व को एक-दूसरे से सीखने के लिए अवसर पैदा करेंगी। यह खबर हिन्दुस्तान, टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित हुई थी। ऐसे में कोई भी पत्रकार यह बताए कि कांग्रेस-सीपीसी के बीच एमओयू की खबर 2020 में ब्रेकिंग कैसे हो गयी?

बीजेपी और संघ नेताओं ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से ली ट्रेनिंग?

कांग्रेस ने ‘समाजवाद’ शब्द को संविधान में शामिल कराया। कम्युनिस्टों के समर्थन से सरकारें चलाईं। मगर, बीजेपी का कम्युनिस्टों से कौन सा नाता रहा है? वह कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) से राजनीति सीखने कैसे चीन पहुंच गयी? आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि बीजेपी आज दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है तो इसके पीछे भूमिका चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की है। 

बात 15 नवंबर 2014 की है जब भगत सिंह कोश्यारी के नेतृत्व में 13 सदस्यीय बीजेपी का प्रतिनिधिमंडल चीन गया। इसी दौरे में बीजेपी सांसदों और विधायकों ने यह सीखा कि बीजेपी को किस तरह दुनिया की सबसे बड़े पार्टी बनाया जाए, किस तरह जमीनी स्तर पर पार्टी काम करे और इस मकसद को पूरा करे। 

सिर्फ बीजेपी के सांसद और विधायक ही नहीं, अध्यक्ष भी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की क्लास अटेंड कर चुके हैं। 2011 में बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के निमंत्रण पर चीन गया था। बीजेपी अध्यक्ष के तौर पर 2009 में राजनाथ सिंह भी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का निमंत्रण स्वीकार करते हुए चीन जा चुके हैं। बीजेपी तो बीजेपी, 2009 में आरएसएस की ओर से भी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के निमंत्रण पर एक दल राम माधव के नेतृत्व में चीन जा चुका है।

बीजेपी के बुलावे पर आए सीपीसी के एक नेता अमित शाह से मिलते हुए।

मौजूदा नरेंद्र मोदी की सरकार में भी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से ट्रेनिंग लेने का सिलसिला थमा नहीं है। 27 अगस्त 2019 को अरुण कुमार के नेतृत्व में बीजेपी का 11 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल सीपीसी से मिलने गया था। वहीं, बीजेपी की राज्य सभा सांसद सरोज पांडे के नेतृत्व में 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल 2019 में चीन जा चुका है।

जब कर्ण सिंह ने लौटा था ‘चीन-भारत मैत्री सम्मान’

एक ऐसे समय में जबकि बीजेपी आरोप लगा रही है कांग्रेस पर कि उसके चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से नाजायज रिश्ते रहे हैं, वहीं कांग्रेस भी याद दिला रही है कि बीजेपी और सीपीसी के बीच भी रिश्ते रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कर्ण सिंह की कुर्बानी को याद करना महत्वपूर्ण हो जाता है। बात 16 दिसंबर 2010 की है जब चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने नयी दिल्ली में 9 लोगों को चीन-भारत मैत्री सम्मान से सम्मानित किया था। तब कांग्रेस सांसद कर्ण सिंह ने इस सम्मान को ठुकरा दिया था। उन्होंने कहा था कि एक सांसद होकर यह सम्मान प्राप्त करने से उन पर खास देश का पक्ष लेने का आरोप लग सकता है। दिल्ली में हुए समारोह में चीनी प्रधानमंत्री ने जिन नेताओं को सम्मानित किया था उनमें शामिल हैं सीताराम येचुरी, प्रोफेसर थान छुंग, जी विश्वनाथन, जी बनर्जी, एम मोहंती, एस चक्रवर्ती, भास्करन, शेरदिल और पल्लवी अय्यर। कर्ण सिंह ने जिस आशंका की वजह से 2010 में सम्मान ठुकराया था, आज 10 साल बाद वह आशंका बिल्कुल सही साबित हुई है।  

बीजेपी महासचिव अरुण सिंह और अन्य चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बुलावे पर चीन के दौर पर।

अंत में यह दोहराने की जरूरत है कि जब देश की सीमा पर दुश्मन डटे हों तो ऐसे सवाल उठाकर बीजेपी वास्तव में दुश्मन की ही मदद कर रही है। जिस कांग्रेस को देश की जनता ने सबसे अधिक बार पसंद किया, उस कांग्रेस पर उंगली उठाने का जो वक्त बीजेपी ने चुना है वह बिल्कुल गलत है। यह वक्त विपक्ष को विश्वास में लेने का था, मगर ऐसा लगता है कि बीजेपी के लिए सरहद की सुरक्षा से अधिक महत्वपूर्ण कांग्रेस से सुरक्षा सुनिश्चित करना हो गया है। प्राथमिकता पर कांग्रेस पर हमला हो गया है जबकि प्राथमिकता चीन के मंसूबे को नाकाम करना होना चाहिए था। ऐसा हो भी क्यों नहीं, आखिर दगाबाज चीन और वहां की कम्युनिस्ट पार्टी से ही तो बीजेपी ने ट्रेनिंग ली है!

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल विभिन्न चैनलों पर बहस करते आपको देखा जा सकता है।)

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