Wednesday, February 1, 2023

माकपा की कन्नूर कांग्रेस में आर्थिकी : पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी के विरुद्ध  जनआंदोलन के शास्त्रीय और जमीनी मायने 

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भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी (सीपीआईएम) यानि माकपा की 23वीं कांग्रेस ने देश में पेट्रोल-डीजल-रसोई गैस की कीमतों में लगातार बढ़ोत्तरी के खिलाफ तेल कंपनियों और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को घेरने का प्रस्ताव सर्व सम्मति से पारित कर एक नए जनआंदोलन का सूत्रपात कर दिया है। यह इस कांग्रेस का बड़ा आर्थिक निर्णय है, जो मध्य वर्ग को घरों में हड़बड़ गड़बड़ गोदी मीडिया के टीवी चैनलों की अनावश्यक बहस की गिरफ्त से बाहर सड़कों पर किसान , मजदूर आदि निम्न वर्ग के साथ कदमताल करने को बाध्य शायद ही कर सके। लेकिन ये सोचना मूर्खता होगी कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार बढ़ोत्तरी का मुद्दा मध्य वर्ग तक ही सीमित है। ये प्रस्ताव अन्य ‘ संकल्प ‘ इस कांग्रेस के दूसरे दिन, 7 अप्रैल 2022 को पारित किये गए। पार्टी का मानना है कि पेट्रोलियम की कीमतों में बढ़ोत्तरी, मुद्रास्फीति बढ़ा रही है। 

मेहनतकश लोगों से पैसे वसूल कर शासक वर्गों और उसकी सरकार को हस्तांतरित करने के विरुद्ध प्रतिरोध दर्ज करना ही होगा। तेल क्षेत्र से केंद्र सरकार का राजस्व संग्रह 2014-15 में 0.74 लाख करोड़ रुपये था, जो 2021-22 में बढ़कर साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये हो गया। 2014 के लोक सभा चुनाव के बाद केंद्र में मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए ) सरकार का वह पहला  साल था। उस साल केंद्र सरकार के राजस्व में पेट्रोलियम करों की हिस्सेदारी 5.4 फीसद थी जो दोगुना बढ़कर आज 12.2 प्रतिशत हो गई है। उत्तर प्रदेश (यूपी), उत्तराखंड , पंजाब ,गोवा और मणिपुर के पाँच राज्यों में चुनाव खत्म होते ही 22 मार्च 2022 से पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में लगभग रोजाना बढ़ोत्तरी की जा रही है। 22 मार्च को माकपा की इस कांग्रेस के उद्घाटन के दिन तक कीमतों में औसत कुल वृद्धि पेट्रोल पर 10.83 रुपये और डीजल पर 10.47 रुपये रही है।

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पेट्रोलियम की कीमतों को नियंत्रण मुक्त करने और तेल पूल खाता प्रणाली को कमजोर करने से, तेल कंपनियों को खुदरा मूल्य निर्धारित करने के लिए खुला हाथ मिल गया है। डीरेग्यूलेशन के पीछे असली मकसद गैर सरकारी रिलायंस पेट्रोलियम आदि कंपनियों को खुदरा क्षेत्र में मुनाफा पहुंचाना है जिन्हें तेल पूल खाते से सब्सिडी नहीं दी जा सकती थी। डीरेग्यूलेशन से बाजार के द्वारा कीमतें निर्धारित करना आसान है। भाजपा की एनडीए सरकार कच्चे तेल की बाजार कीमतों में गिरावट से लोगों को होने वाले किसी भी लाभ से वंचित करने के लिए पेट्रोलियम उत्पादों पर केंद्रीय करों में हेरफेर कर रही है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय करों में क्रमशः 3.5 और 9 गुना वृद्धि की गई।

लोगों को इस वृद्धि का कारण यह बताया गया कि कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी से गिरावट आ रही है और इसलिए उच्च करों के परिणामस्वरूप उच्च खुदरा कीमतें नहीं होंगी। उसी तर्क से भारत सरकार को एक बार अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि शुरू होने के बाद करों को वापस लेना चाहिए था, जैसे अभी के हालात हैं। इसका परिणाम यह है कि खुदरा कीमतें तय करने का सिलसिला फिर शुरू कर दिया है, जिन्हें हाल के उपरोक्त चुनावों की अवधि के दौरान जानबूझकर नियंत्रित किया गया था। ये कीमतें कोविड महामारी काल के बाद की अवधि में बढ़ी हैं और उनमें यूक्रेन संकट के दौरान और इजाफा हुआ है।

भाजपा की दलील है कि राज्य सरकारों को अपने करों को कम करके लोगों पर बोझ कम करना चाहिए। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आने पर राज्य सरकारों ने नहीं बल्कि केंद्र सरकार ने करों में वृद्धि की। जनता के दबाव में केंद्र सरकार को नवंबर 2021 में कर वृद्धि आंशिक रूप से वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। अब भी, सरकार अतिरिक्त कर को पूरी तरह वापस लेने से इनकार कर रही है। राज्य सरकारों के साथ जुटाए गए अतिरिक्त राजस्व को साझा करने से बचने के लिए, केंद्र सरकार उन करों पर निर्भर रही है जो विभाज्य पूल के दायरे से बाहर हैं। 2018-19 के बजट में, जबकि पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क में 9 रुपये प्रति लीटर की कमी की गई थी। सड़क उपकर को केंद्र द्वारा राज्यों के साथ बांटा नहीं जाता है। उसे एक समान राशि से बढ़ाया गया था। नवंबर 2021 में जब करों को कम करने का दबाव पड़ा तो  मोदी सरकार ने उत्पाद शुल्क कम कर दिये, जिसे राज्यों के साथ बांटना पड़ता। किसी भी तरह से राज्य सरकारों के कदम, पेट्रोलियम कीमतों में बढ़ोत्तरी के कारण नहीं है। 

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वृंदा करात रेड वाल्यूंटियर्स के साथ

पारित प्रस्ताव में एनडीए शासन के दौरान लगाए गए अतिरिक्त करों को तत्काल वापस लेने की मांग की गई और कहा गया है कि सरकार अमीरों पर कर बढ़ाए, पेट्रोल उत्पादों की खुदरा कीमतों पर नियंत्रण लगाए और उसे कम करे। वह पेट्रोलियम क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजीकरण रोके। प्रस्ताव में लोगों की रोजी-रोटी पर लगातार बढ़ रहे हमले के खिलाफ जनता से देश भर में बड़े पैमाने पर विरोध करने का आह्वान किया गया है। 

बादल सरोज और  मुकेश असीम की बहस 

इस बीच, साम्यवादी विचारक-लेखक मुकेश असीम ने माकपा नेता बादल सरोज के ‘सीधे कन्नूर से ‘ शीर्षक से फेसबुक पोस्ट की लंबी शृंखला पर सवाल किया : ‘ मूलतः आप हार्ड हिंदुत्व से सॉफ्ट हिंदुत्व (कांग्रेस व विपक्षी दलों की धर्मनिरपेक्षता) और फासीवाद से सॉफ्ट पूंजीवाद (बुर्जुआ संवैधानिक जनतंत्र) को बचाने की नीति को जारी रखेंगे। पर ये दोनों तो पूंजीवाद की तार्किक परिणतियां हैं। आप पूंजीवाद को खुद अपनी तार्किक परिणति पर पहुंचने से कैसे रोकेंगे? 

एकजुट वाम से उन्हें कितना डर लगता है , शीर्षक से इस लंबे पोस्ट के पहले भाग में लिखा था वामपंथ भारतीय राजनीति की महत्वपूर्ण धारा है। नीतिगत सवालों पर इसकी राय, ज्यादातर प्रमुख जन समस्याओं के निदान और समाधान को लेकर इसकी समझदारी दूसरी राजनीतिक धाराओं से गुणात्मक रूप से भिन्न है । उनके मुताबिक सीपीएम का मानना है कि भाजपा सरकार के लगभग आठ वर्षों ने सांप्रदायिक कॉर्पोरेट गठजोड़ मजबूत होते और तानाशाहीपूर्ण हमलों को बढ़ते हुए देखा है। 2019 में सरकार में वापस आने के बाद से भाजपा फासीवादी आरएसएस के हिंदू राष्ट्र एजेंडे को आक्रामक रूप से आगे बढ़ा रही है। इसके साथ नव-उदारवादी नीतियों को आक्रामक रूप से लागू करने और शासन की तानाशाही में बढ़त जारी है।

आरएसएस द्वारा संचालित हिंदुत्व राष्ट्र एजेंडा संवैधानिक ढांचे का घातक रूप से क्षरण कर रहा है और भारतीय गणराज्य के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक चरित्र को नष्ट कर रहा है। इस बारे में मजदूर, किसान, महिला, सामाजिक उत्पीड़ित, मध्यमवर्ग, देशी छोटे और मंझोले उद्योग धंधों की दुर्दशा की ढेर सारे आंकड़ों और तथ्यों के साथ समीक्षा करने के बाद सीपीएम का राष्ट्रीय महाधिवेशन देश को इससे उबारने के तौर तरीकों पर चर्चा शुरू कर रहा है। 

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सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने उद्घाटन भाषण में हालात का ब्यौरा और आगामी दिनों में इनसे बाहर आने के लिए अपनाई जाने वाली कार्यनीति का सार सामने रखा।  देश भर की पार्टी इकाइयों से चुनकर आये प्रतिनिधि इस पर चर्चा करेंगे और रास्ता तय करेंगे। हिंदुत्व की साम्प्रदायिकता को सबसे बड़ी चुनौती बताते हुए सीताराम येचुरी ने कहा कि इसका मुकाबला धर्मनिरपेक्षता की हिफाजत के लिए समझौताहीन रुख अपना कर ही किया जा सकता है। उन्होंने सभी पार्टियों से इस देशभक्तिपूर्ण जिम्मेदारी को निबाहने के लिए खड़े होने का आह्वान किया। कांग्रेस सहित बाकी दलों से भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य के स्वरुप की हिफाजत में स्पष्ट और बेलाग रुख लेने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि वे अपने खुद के अनुभव से ही समझ लें कि ऐसा न करने और अवसरवादी रवैया अपनाने से वे अपने यहां से जारी भगदड़ को भी रोक नहीं पाये। 

आने वाले दिनों में किये जाने वाले कामों पर चर्चा करते हुए पार्टी कांग्रेस ने जिन मुद्दों को चर्चा में लिया है उनमें मुख्य कार्य भाजपा को अलग थलग करना और उसे हराना है। इसके लिए सीपीआई (एम) और वामदलों की स्वतंत्र शक्ति के विकास की आवश्यकता है ताकि वर्ग और जन संघर्षों में लोगों को ताकतवर जुझारू तरीके से लामबंद किया जा सके। हिंदुत्व के एजेंडे और सांप्रदायिक ताकतों की गतिविधियों के खिलाफ संघर्ष का नेतृत्व करने के लिए भी पार्टी और वाम दलों को मजबूत करने की आवश्यकता है।

बहरहाल , बादल सरोज के कथनों पर मुकेश असीम के प्रश्नों के संदर्भ में सोचना होगा कि लेनिन की लिखी किताब ‘ एक कदम आगे, दो कदम पीछे ‘ के अर्थ मौजूदा भारतीय संदर्भों में क्या है। क्या माकपा के भी सोवियत क्रांति के दौरान बोल्शेविक और मेनशेविक धाराओं के बीच बहस में सत्ताधारी वर्ग की अंतिम रक्षा पंक्ति बन जाने का खतरा तो नहीं है। 

(सीपी नाम से चर्चित पत्रकार,यूनाईटेड न्यूज ऑफ इंडिया के मुम्बई ब्यूरो के विशेष संवाददाता पद से दिसंबर 2017 में रिटायर होने के बाद बिहार के अपने गांव में खेतीबाड़ी करने और स्कूल चलाने के अलावा स्वतंत्र पत्रकारिता करते हैं।)

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