Saturday, October 16, 2021

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दोषपूर्ण लॉकडाउन ने वायरस को और ज्यादा फैला दिया

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भारत में कोविड-19 मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इसके फैलाव की तेजी में अभी कोई कमी होती हुई नहीं दिख रही। भारत ने पिछले हफ्ते रूस को पीछे छोड़ते हुए अमरीका और ब्राजील के बाद तीसरे स्थान पर कब्जा कर लिया है। हम हालात को नियंत्रित करने में विफल क्यों हो गए? क्या हमारे पास कोई योजना ही नहीं थी? क्या हमने सब कुछ हड़बड़ी में किया? इन्हीं मुद्दों की पड़ताल करते हुए कौशिक बसु ने 8 जुलाई के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में एक लेख लिखा है। इसी पर आधारित एक रिपोर्ट प्रस्तुत है।

अगर हम कोविड-19 के संक्रमणों की गिनती पर न जाएं, क्योंकि इसमें त्रुटियां ज्यादा हो रही हैं और सीधे इससे होने वाली मौतों को देखें और इसे जनसंख्या की तुलना में देखें तो पाते हैं कि भारत सहित एशिया और अफ्रीका के सभी देशों में स्थिति काफी बेहतर है। लेकिन इन देशों के बीच भारत का प्रदर्शन काफी खराब है। प्रति 10 लाख की जनसंख्या पर कोविड से होने वाली मौतों, यानि अशोधित मृत्यु दर के मामले में भारत की हालत अफ्रीका के अधिकांश देशों सहित चीन, इंडोनेशिया, श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, मलयेशिया आदि से बदतर है।

आखिर यह हुआ कैसे? भारत तो उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से पहला देश था, जिसने लॉकडाउन की घोषणा की! संपूर्ण लॉकडाउन ने कई पर्यवेक्षकों को अर्थव्यवस्था के बारे में चिंतित कर दिया है। विद्वानों ने यह महसूस किया है कि, चूंकि अफ्रीका और एशिया में कोविड-19 से मृत्यु दर बहुत कम प्रतीत होती है (हो सकता है कि हमारी युवा आबादी के कारण या कुछ प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता के कारण), हमें लॉकडाउन की कड़ाई के मामले में संपन्न यूरोपीय और उत्तरी अमेरिकी देशों की नकल करने या उनसे आगे निकलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी। लॉकडाउन की जरूरत तो थी लेकिन इसे जांच-परख कर और सावधानी पूर्वक अपने क्षेत्र की जरूरतों के अनुरूप लागू किया जाना चाहिए था।

अब तो एक खुला प्रश्न है कि महामारी को धीमा करने के लिए एक राष्ट्र को कितना आर्थिक नुकसान उठाना चाहिए। भारत में एक ठीक-ठाक शुरुआत भी बाद में एक दोहरे झटके में बदल गई। भारत की अर्थव्यवस्था दिन-प्रतिदिन नीचे जा रही है और महामारी दिन-प्रतिदिन उफान पर जा रही है। 24 मार्च को घोषित लॉकडाउन ने  महामारी के प्रसार को नियंत्रित करने की बजाय इसे और बदतर बनाने का काम किया है। लॉकडाउन की शुरुआत के दो सप्ताह बाद, संक्रमण दर ने तेजी पकड़ लिया और तब से यह खतरनाक रूप से बढ़ती जा रही है।

ऐसा क्यों हुआ? भारत के लॉकडाउन को दुनिया में सबसे कड़ाई से लागू किया गया लॉकडाउन माना गया है। चार घंटे के नोटिस के साथ लॉकडाउन की घोषणा के समय एक स्वाभाविक उम्मीद थी कि सरकार के पास निश्चित रूप से ऐसी योजनाएं होंगी कि सारे काम-धंधे और लोगों के आवागमन के अचानक ठप हो जाने और सामानों की आपूर्ति में रुकावट आ जाने को कैसे संभालना है। लेकिन इनमें से किसी भी बंदोबस्त का कोई सबूत नहीं दिखा। क्या योजनाएँ थीं, पता नहीं। लेकिन परीक्षणों को तेज करने, चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार करने और फंसे हुए लाखों गरीब श्रमिकों की मदद करने की किसी कार्यवाही का अभाव चकित करने वाला था।

ऐसा लग रहा था जैसे कि सरकार के ही कुछ नौकरशाह और राजनेता हाथ पर हाथ धरे बैठकर और कुछ भी नहीं करके प्रधानमंत्री के लॉकडाउन को विफल करने का फैसला कर चुके हों। हम जानते हैं कि दक्षिण अफ्रीका ने भी कठोर लॉकडाउन लागू किया था, लेकिन घोषणा के तुरंत बाद वहां अस्पताल सुविधाओं और परीक्षण केंद्रों के निर्माण में बड़े पैमाने पर कदम उठा लिए गए। भारत में ऐसा नहीं हुआ। ज्यादातर देशों में, लॉकडाउन की घोषणा के बाद, परिवहन को एक न्यूनतम स्तर पर खुला रखा गया, जिससे लोगों को अपने घर जाने में आसानी हुई। भारत में, अपने घरों से दूर प्रवासी मजदूरों के भूखे-प्यासे भारी हुजूम की समस्याओं को हल करने के किसी भी प्रयास का हफ़्तों तक कोई संकेत नहीं था।

हमारा मानना है कि चार घंटे के नोटिस के साथ इतनी बड़ी घोषणा के लिए, वरिष्ठ नौकरशाहों की एक टीम रही होगी, जिन्हें सब कुछ पहले से पता रहा होगा और उनके पास हालात को संभालने की मुकम्मल योजना होनी चाहिए थी। और यह सच है कि भारत की नौकरशाही काफी प्रतिभाशाली है। निश्चित रूप से, उन्हें योजना को लागू करने के लिए काम करना चाहिए था। दुनिया भर में ये खबरें देखी जा रही थीं जिनमें करोड़ों की संख्या में बेचारे भारतीय लोग अपने घर जाने की कोशिश में सैकड़ों मील पैदल चल रहे थे, यह अत्यंत दुखद था। इसके अलावा, इसने भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाया। आजादी के बाद से अब तक  अंतरराष्ट्रीय खबरों में भारत की इतनी बुरी छवि नहीं दिखी थी। ‘द इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका (13 जून) का अनुमान है कि लॉकडाउन के पहले दो महीनों के दौरान भारत ने “4000 से अधिक भिन्न-भिन्न नियम” जारी किए, जिनमें से बहुत सारे नियम उन्हीं में से बहुत सारे नियमों के संशोधन थे।

यह नीतिगत आपदा कैसे घटित हुई, इसे उजागर होने में तो समय लगेगा। लेकिन एक बात अब स्पष्ट हो चुकी है। जिस तरह से लॉकडाउन लागू किया गया था, लॉकडाउन ही वायरस के प्रसार का स्रोत बन गया। लोगों को मजबूर किया जाना कि वे एक जगह हुजूम लगाएं एक दूसरे को संक्रमित करें, और फिर उन्हीं लोगों को सैकड़ों मील की यात्रा करने के लिए छोड़ देना, इसने महामारी को जरूरत से ज्यादा खतरनाक बना दिया।

यह दोहरा झटका सभी आंकड़ों में दिखाई दे रहा है। भारत की विकास दर, जो महामारी से दो साल पहले से ही लगातार नीचे गिर रही थी, अब और नीचे गिर गई है। आईएमएफ ने भविष्यवाणी की है कि भारत की विकास दर में 2020 में 4.5 प्रतिशत तक की कमी आ जाएगी, जो कि 1979 के बाद अब तक की सबसे कम वृद्धि दर होगी। एक उम्मीद थी कि महामारी के कारण चीन से पूंजी बाहर चली जाएगी, और उसके लाभार्थियों में से भारत भी एक होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है।

वियतनाम और कुछ अन्य राष्ट्र बड़े लाभार्थी प्रतीत हो रहे हैं, और अप्रत्याशित रूप से खुद चीन अपने विदेशी निवेश के एक बड़े हिस्से को वापस खींच लेने में कामयाब दिख रहा है। मई में भारत में बेरोजगारी की दर आश्चर्यजनक रूप से 23.5 प्रतिशत पर पहुंच गई, जबकि ब्राजील में 12.6 प्रतिशत, अमरीका में 13.3 प्रतिशत और चीन में 6 प्रतिशत तक ही सीमित थी। हालांकि बेरोजगारी पर चीन के आधिकारिक आंकड़ों को सावधानी के साथ लेने की जरूरत है। फिर भी इससे इस तथ्य पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि भारत का आर्थिक प्रदर्शन बेहद खराब है और यह भी तथ्य है कि यह कीमत हमने बेमतलब चुकाई है।

क्या इतने बड़े देश में इस हद तक योजनाहीनता होनी चाहिए? क्या राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही में कोई तालमेल ही नहीं है? या, क्या लोकतंत्र के सभी पायों में कोई तालमेल ही नहीं है? या, क्या इन सभी पायों में कहीं इतना तालमेल तो नहीं हो चुका है कि वे लोगों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए एक-दूसरे को नियंत्रित और संतुलित करने की जगह एक ही पाए के अनुचर बन चुके हैं और उसकी सनक को लागू करने के पुर्जे बनकर रह गए हैं?

आज देश एक ऐसी विपदा का सामना कर रहा है जो शीर्ष स्तर पर कुप्रबंधन का दुष्परिणाम है। फिर भी इसके लिए जिम्मेदार लोगों की ओर से अभी तक किसी तरह का अफसोस तक नहीं व्यक्त किया गया है। बल्कि इसके उलट रह-रह कर डींगें मारी जा रही हैं कि अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो वैसा हुआ होता। निश्चित रूप से इसकी जवाबदेही चिह्नित की जानी चाहिए और इसके गुनहगारों को इसकी सजा भी मिलनी चाहिए। अन्यथा लोकतंत्र ‘जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए शासन’ की जगह केवल ‘जनता पर शासन’ बन कर रह जाएगा।

(प्रस्तुति शैलेश।)

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