Tuesday, October 19, 2021

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सबके कोरोना टेस्ट की मांग राजनीतिक है: सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाली गई थी कि सरकार हम सब लोगों के घर आकर कोरोना का टेस्ट करे। यह याचिका तीन वकीलों और एक स्टूडेंट ने डाली थी, जिनके नाम हैं एडवोकेट शाश्वत आनंद, एडवोकेट अंकुर आज़ाद और एडवोकेट फ़ैज़ अहमद। स्टूडेंट का नाम है सागर और सागर इलाहाबाद में कानून की पढ़ाई करते हैं। इस याचिका पर सोमवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे यह कहकर खारिज कर दिया कि इस याचिका में राजनीतिक रंग है।

मुश्किल से एक मिनट की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच में से एक जज जस्टिस रमना ने याचिकाकर्ताओं को यह भी कहा कि या तो आप इसे वापस ले लें, या फिर हम आप पर जुर्माना लगा देंगे। आपको एक बार फिर से बता दें कि इन चारों लोगों ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि सरकार घर-घर जाकर लोगों का कोरोना टेस्ट करे और ऐसा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट सरकार को कहे। 

सोमवार 27 अप्रैल को इस याचिका पर जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस बीआर गवई की बेंच ने सुनवाई की। बेंच के सामने याचिका दाखिल करने वाले एडवोकेट शाश्वत आनंद पेश हुए और बेंच को अपनी याचिका के बारे में बताया। आपको इस याचिका की एक और खास बात बता दें कि इसी याचिका में नरेंद्र मोदी ने जो पीएम केयर फंड खोला है, उसकी वैधता को भी चुनौती दी गई थी। इस याचिका पर तीन जजों की बेंच ने बड़ी नाराजगी दिखाई और एडवोकेट से इस याचिका को वापस न लेने पर याचिकाकर्ताओं पर जुर्माना लगाने की भी धमकी दे दी। जस्टिस रमना ने वॉर्निंग देते हुए कहा कि इस याचिका में राजनीतिक रंग है। या तो आप इसे वापस ले लें या फिर हम जुर्माना लगा देंगे। यह सब काम बमुश्किल मिनट भर में हो गया क्योंकि पूरी सुनवाई ही मुश्किल से एक मिनट चली। 

अब चलते हैं इस याचिका की ओर यह जानने के लिए कि इसमें ऐसा क्या कह दिया गया था, जिससे सुप्रीम कोर्ट इतना नाराज हो गया कि हम सबके कोरोना टेस्ट की मांग करने की याचिका में उसे राजनीतिक रंग दिखने लगा और जज आग बबूला हो उठे। सुप्रीम कोर्ट में दायर इस जनहित याचिका में केंद्र सरकार से COVID -19 के लिए बड़े पैमाने पर घर-घर परीक्षण शुरू करने के लिए दिशा-निर्देश मांगे गए थे।

इस याचिका में मांग की गई थी कि ये कोरोना टेस्ट उन क्षेत्रों से शुरू हों जो वायरस से सबसे अधिक उजागर और प्रभावित ‘ हॉटस्पॉट’ हैं। याचिका में कहा गया था कि इस तरह की प्रैक्टिस  से कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों को पहचानने, अलग करने और उनका इलाज करने में मदद मिलेगी और जिसके परिणामस्वरूप इन्फेक्शन की चेन टूट जाएगी। याचिका में आगे कहा गया था कि कोरोना वायरस के इस “घातक प्रसार” को रोकने के लिए ” हर नुक्कड़ और हर कोने से ऐसा टेस्ट प्रियॉरिटी बेस पर शुरू होना चाहिए और ऐसा हर उस राज्य और शहर में हो, जो कोरोना से सबसे गंभीर रूप से प्रभावित हैं, यानी ‘कोरोना वायरस के हॉटस्पॉट’ हैं।

याचिका में चारों याचिकाकर्ताओं जिसमें से तीन वकील शाश्वत आनंद, अंकुर आज़ाद और फ़ैज़ अहमद, और इलाहाबाद के कानून के छात्र सागर ने इस बात पर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त की है कि भारत किस तरह महामारी से लड़ने का प्रयास कर रहा है, खास तौर से कोरोना टेस्ट की कम दर के संबंध में। अपने इस तर्क को बजा ठहराने के लिए याचिकाकर्ताओं ने इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) की लेटेस्ट स्टेटस रिपोर्ट भी रखी जो आईसीएमआर ने 7 अप्रैल, 2020 को जारी की थी। इस रिपोर्ट में आईसीएमआर ने बाकायदा लिखकर बयान दिया था कि सरकार देश भर में दस लाख लोगों पर केवल 82 टेस्ट कर रही है।

याचिका में यह साफ कहा गया कि “सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि जिन COVID-19 केसेस का कन्फर्मेशन किया गया है, निश्चित रूप से वो कम हो सकता है क्योंकि भारत का टेस्टिंग रेट पूरी दुनिया भर में सबसे कम है। याचिका में कहा गया कि कुछ दिनों के भीतर ही कोरोना पॉजिटिव केसेस की जो चौंकाने वाली जानकारियां और जो बातें सामने आई हैं, उनसे पता चलता है कि अभी तक मिले नंबर्स पहाड़ का केवल एक सिरा हो सकता है और हम हालात की रीयल सीरियसनेस से अनजान हैं। “

कोरोना आपदा पर भारत के रिस्पॉन्स को नाकाफी होने का हवाला देते हुए, याचिकाकर्ताओं का दावा था कि सरकार COVID -19 के खिलाफ पिन प्वाइंट लड़ाई करने के लिए सही डेटा पर ध्यान नहीं दे रही है। याचिका में यह सुझाव दिया गया कि कम्युनिटी सर्कुलेशन पर अंकुश लगाने के बजाय, वायरस के मैनेजमेंट और उपचार पर जोर दिया जाना चाहिए, जिसके लिए पहला कदम ग्रुप टेस्ट होंगे। याचिका में कहा गया कि “इस महामारी से लड़ने के लिए भारत की बैसेल रिस्पांस ही दिया है। इस रिस्पांस में बस सबको अलग अलग ही रखा जा रहा है न कि मेनली ग्रुप टेस्ट करके वायरस से होने वाले इन्फेक्शन का मैनेजमेंट किया जाए, उनकी पहचान की जाए और इन्फेक्टेड लोगों का इलाज किया जाए। भारत का यह बैसेल रिस्पांस कोरोना से लड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है और भारत अपनी घनी आबादी के अनुपात में घर घर टेस्ट न होने की कमी से प्रभावित है।”

याचिका में लॉकडाउन की सारी कवायद पर जो पानी फिर सकता है, उस पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गई। याचिका में कहा गया कि सोशल-फिजिकल डिस्टेंसिंग और देशव्यापी लॉकडाउन जैसे उपाय बड़े पैमाने पर सर्कुलेशन पर अंकुश लगाने का एक प्रयास है। याचिकाकर्ताओं ने चेतावनी भी दी कि अगर ग्रुप टेस्ट्स नहीं किए जाते हैं तो लॉकडाउन जैसी प्रैक्टिस बेकार साबित होगी और COVID-19 का मुकाबला आग से जलने से घायल हुए मरीज से लड़ने जैसा होगा। याचिका में यह भी कहा गया कि अगर हम सभी के पर्याप्त टेस्ट नहीं होते हैं तो इसकी कमी सभी भारतीयों के जीवन को खतरे में डालती है। यह संविधान का उल्लंघन है जो सीधे जीवन के अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य के अधिकार के साथ भिड़ रहा है। 

अब आते हैं इस याचिका के दूसरे और सबसे रोचक प्वाइंट पर, जिसमें पीएम केयर्स फंड को घेरा गया। जिस याचिका को सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने बमुश्किल मिनट भर की सुनवाई में धमकी देते हुए खारिज कर दिया, उसमें कहा गया था ऐसे फंड जो ग़ैर संवैधानिक हैं, उनमें जितना भी पैसा इकट्ठा किया गया है, वह सारा पैसा नेशनल डिजास्टर रिलीफ फंड और स्टेट डिजास्टर रिलीफ फंड में ट्रांसफर किया जाए क्योंकि यही दोनों फंड डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट, 2005 के तहत बनाए गए हैं।

याचिका में कहा गया कि प्रधान मंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF), PM-CARES फंड ‘, और अलग अलग राज्यों के मुख्यमंत्री राहत कोष और इन लीगल फंड्स के लिए ऐसे दूसरे फंडों को भी ट्रांसफर करेगा, जो संकट की ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए बनाए गए थे। याचिका में यह कहा गया कि  COVID-19 की जो महामारी आई है, यह 2005 के आपदा अधिनियम के तहत एक ‘आपदा’ है, जैसा कि सरकार ने भी इसे नोटीफाई किया है। याचिका में यह भी कहा गया कि केंद्र या राज्य सरकारों के पास सार्वजनिक धन या ट्रस्ट बनाने के लिए कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है  यानी कि उन्हें प्रधानमंत्री नेशनल रिलीफ फंड, पीएम केयर्स फंड और मुख्यमंत्री राहत कोष बनाने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार इसलिए नहीं है क्योंकि नेशनल डिजास्टर रिलीफ फंड और स्टेट डिजास्टर रिलीफ फंड ऐसी चीजों के लिए पहले से ही मौजूद हैं। 

याचिका में आगे यह भी कहा गया कि पब्लिक ट्रस्टों के जरिए से लिया गया पैसा 2005 के अधिनियम या उस अधिनियम के तहत बनाई गई योजनाओं के इरादे को हरा नहीं सकते हैं, और इसलिए इन फंडों में जो पैसा इकट्ठा हुआ है, उसको नेशनल डिजास्टर रिलीफ फंड और स्टेट डिजास्टर रिलीफ फंड के लिए इकट्ठा करने का पूरा खाका समझा जा सकता है। 

याचिकाकर्ताओं ने आगे कहा कि इस आपदा के इफेक्टिव मैनेजमेंट के लिए प्रॉपर इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइड करने और कई तरह के इक्यूपमेंट्स की खरीद के लिए सरकार को तुरंत पैसे की जरूरत है। आपदा का यह इफेक्टिव मैनेजमेंट 2005 अधिनियम के मुताबिक नेशनल डिजास्टर रिलीफ फंड और स्टेट डिजास्टर रिलीफ फंड के जरिए से ही किया जाना चाहिए। याचिका में कहा गया कि 2005 वाला अधिनियम सभी उपयोगों, सभी इरादों और सभी उद्देश्यों के लिए एक ही पर लागू हो सकता है। इसके अलावा जो पैसा मिल रहा है, उसका उपयोग कोरोना वायरस से निपटने और टेस्ट किट, पर्सनल प्रोटेक्शन इक्यूपमेंट्स यानी  (पीपीई) की खरीद, आइसोलेशन केंद्रों को बनाने और उनके रखरखाव आदि के लिए किया जा सकता है। जहां तक COVID-19 की महामारी का संबंध है, ये भारत के नागरिकों की बड़ी भलाई में है कि उन्हें तत्काल मदद और इमरजेंसी मेडिकल फैसिलिटी मुहैया कराई जाए।”

याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में ग़ैर संवैधानिक ट्रस्टों जैसे कि प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष, पीएम केयर्स फंड की औकात को भी उजागर किया। याचिका में दावा किया गया कि याचिकाकर्ताओं ने नेशनल डिजास्टर रिलीफ फंड के लिए पैसे के सोर्स पर कड़ी मेहनत की है। इन सब तथ्यों को दिखाते हुए याचिकाकर्ताओं ने यह भी मांग की कि इन ग़ैर संवैधानिक फंडों या ट्रस्टों को “आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत पैसा लेने के लिए कलेक्शन एजेंसियों के रूप में घोषित किया जाए।” इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट एक मिनट से भी कम का समय दिया और यह कहते हुए इसे वापस लेने की धमकी दी कि यह राजनीतिक याचिका है और अगर इसे वापस न लिया तो याचिकाकर्ताओं पर जुर्माना ठोंका जाएगा।

(राइजिंग राहुल की रिपोर्ट।)

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