Thu. Feb 20th, 2020

निरंकुश मोदी सत्ता को चुनौती देते आंचलों के परचम

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शाहीन बाग कल की तस्वीर। साभार-रानी राजेश

शाहीन बाग अब किसी जगह का नाम नहीं बल्कि वह स्थान बन गया है जहां लोग अपने शीष नवाने जा रहे हैं। एक जिंदा जीता जागता तीर्थ स्थल। जहां कोई भगवान नहीं है। न ही किसी की मूर्ति लगी है। लेकिन वह किसी मंदिर और इबादतगाह से भी ज्यादा पवित्र हो गया है। जेहन में उसका खयाल आते ही लोग मन ही मन में सजदा करने लगते हैं। यह जगह इस लिए पवित्र हो जाती है क्योंकि इसे समाज के उस तबके ने बनाया है जिसे अभी तक बिल्कुल हासिए पर रखा गया था। दलितों में भी वह दलित था। हिंदू व्यवस्था ने अपने वर्णाश्रम में इसे पांचवें स्थान पर रखा। चार वर्णों में भी जगह नहीं मिली। यानी दलितों से भी एक पायदान नीचे। मुस्लिम समाज ने तो उसे नख से लेकर शिख तक छुपे काले लिबास से कभी बाहर आने ही नहीं दिया। और घरों में भी उसकी हैसियत महज परिवार की सेवा और पुरुषों की टहल बजाने तक सीमित रही। और वजूद के स्तर पर वह एक संपत्ति से आगे नहीं बढ़ सकी। और अब जब आगे आयी है तो इन सारे बंधनों को उसने एक झकटे में तोड़ दिया।

शाहीन बाग से लेकर लखनऊ और जामिया से लेकर इलाहाबाद तक जगह-जगह खड़े हो रहे महिलाओं के इन प्रतिरोध स्थलों को सामान्य नजरिये से देखना इस फिनामिना को समझने के लिए नाकाफी है। यह अब महज सरकार के प्रति प्रतिरोध नहीं है। न ही केवल आंदोलन है। बल्कि अपने भीतर किसी बड़े बदलाव की आग समेटे हुए है जिसकी गर्मी देश ही नहीं अब पूरा समाज महसूस कर रहा है। ऐसा कैसे हुआ और इसके पीछे क्या कारण हैं यह समाजविज्ञानियों के लिए एक शोध का  विषय है। निश्चित रूप से समाज में आने वाले इस गहरे और बड़े बदलाव का अध्ययन वक्त की मांग हो गयी है।

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इन महिलाओं ने अपने वक्त की सारी जंजीरों को तोड़ दिया है। ये सत्ता से टकराने का जज्बा रखती हैं। और जरूरत पड़ने पर आंख में आंख डालकर बात करने के लिए भी तैयार हैं। लखनऊ के घंटाघर में जब पुलिसकर्मियों ने उनसे उनके कंबल छीन लिए। फिर भी जब वे पीछे नहीं हटीं तो उनके खड़े होने और बैठने की जगहों पर खाकीधारियों ने पानी फेंक दिया। बावजूद इसके उनके इस्पाती इरादे नहीं टूटे और उन्होंने हाड़ कंपा देने वाली इस ठंड में भी न केवल धरना जारी रखा बल्कि योगी पुलिस की हर बर्बरता के आगे सीना तानकर चट्टान की तरह खड़ी रहीं। आखिरकार पुलिस को पीछे हटना पड़ा। सच ये है कि योगी की पुलिस संघी जमात के साथ मिलकर रोजाना कोई न कोई साजिश रच रही है और महिलाएं हर साजिश को ध्वस्त कर रही हैं।

महिलाओं ने अपने इस आंदोलन से मोदी सरकार के चेहरे पर लगे उस नकाब को भी नोंच कर फेंक दिया है। जिसमें वह तीन तलाक के जरिये मुस्लिम बहनों को इंसाफ देने की बात करती थकती नहीं थी। तीन तलाक बिल के दौर में मोदी जिस तरह से मुस्लिम बहनों को इंसाफ देने का रट लगाए रहते थे उसकी असलियत अब खुल गयी है। सर्दी और गलन भरी इस रात में जब महिलाएं अपने मासूम दुधमुंहे बच्चों को लेकर खुले आसमान के नीचे रातें गुजार रही हैं तब अपनी नाक के नीचे चंद मिनटों की दूरी पर बैठी महिलाओं से एक बार भी उन्होंने मिलने की जरूरत नहीं समझी। यह बताता है कि मुस्लिम महिलाओं के प्रति मोदी का प्रेम महज नाटक भर था। दरअसल तीन तलाक का मुद्दा भी उनके लिए अपने सांप्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का एक हथियार था। इससे ज्यादा उसकी कोई भूमिका नहीं थी।

इन पंक्तियों का लेखक कल शाहीन बाग में मौजूद था। बुर्का नसीं महिलाएं जिस तरह से शाहीन बाग की सड़कों पर पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर चल रही थीं। वह अद्भुत था। वे महिलाएं जिन्हें गैर पुरुष की मौजूदगी में घर के ड्राइंग रूमों में आने की इजाजत नहीं थी वे चौराहे पर खड़ा होकर उनको डिक्टेट कर रही हैं। यह किसी के लिए भी अचरज से कम नहीं है। गालों पर चस्पा तिरंगे की पेंटिंग और माथे पर उसकी पट्टी किसी सरफरोशी जज्बे की याद ताजा कर देती है। वहां ढेर सारी ऐसी उच्च वर्गीय महिलाएं भी दिखीं जो बसंत कुंज से लेकर दक्षिणी दिल्ली के पॉश इलाकों से आयी थीं। और उनके चेहरों पर कौतूहल बिल्कुल साफ देखी जा सकती थी। अभी तक जो महिलाएं वर्गीय तौर पर समाज के सबसे अगले पायदान पर खड़ीं थीं उन महिलाओं के लिए भी यह तबका उम्मीद की किरण बनकर उभरा है।

यह आंदोलन किसी एक तबके और समाज का ही नहीं बल्की पूरे देश में नये बदवाल का सूत्रधार बनेगा। सबसे पहले यह खुद मुस्लिम समाज के जनवादीकरण का रास्ता साफ करेगा। जिसमें हासिए पर रहने वाली महिलाएं न केवल अपने वजूद और अधिकार को सुनिश्चित करेंगी बल्कि समाज और देश के स्तर पर दूसरी महिलाओं के लिए भी उसकी गारंटी करवाएंगी। इसके साथ ही पूरे समाज के बदवाल की अगुआ कतार में खड़ी होकर नये समाज के निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त करेंगी। यह बात हर किसी को जान लेनी चाहिए कि नागरिकता संशोधन के पहले का समाज और उसके बाद का भारतीय समाज एक जैसा नहीं होगा। उसमें बड़े स्तर पर बदलाव होने जा रहा है जिसमें महिलाओं के इस आंदोलन की छवि बिल्कुल साफ दिखेगी।

आजादी के पहले या फिर उसके बाद से यह पहला राजनीतिक आंदोलन है जिसमें मुस्लिम तबके की इतने बड़े पैमाने पर भागीदारी हो रही है। अभी तक मुस्लिम समाज एक बंद समाज के तौर पर देखा और जाना जाता रहा है। कोई आंदोलन भी होता था तो उसके अपने धर्म और समाज से जुड़े मुद्दों तक सीमित रहता था। लेकिन यह पहला मौका है जब इस अल्पसंख्यक तबके ने एक सेकुलर राजनीतिक आंदोलन में न केवल शिरकत की है बल्कि उसकी अपने तरीके से अगुआई भी कर रहा है और उसमें भी महिलाएं उसके अग्रिम मोर्चे पर हैं।

ये महिलाएं अब किसी सत्ता के रहमोकरम पर जीने वाली नहीं है। ये उससे अपना हक छीन के रहेंगी क्योंकि उनके हाथों में संविधान है। उन्होंने साबित्री बाई फुले से ऊर्जा लेना शुरू कर दिया है। फातिमा बीबी को अपना गुरु मान लिया है। और सड़क पर लड़ाई के मामले में वह किसी झलकारी और लक्ष्मी बाई को भी मात देने के लिए तैयार हैं। और इस नजरिये से कहें तो अब शाहीन बाग ही नहीं देश की सड़कों पर खड़ी हर महिला न केवल सावित्रीबाई और फातिमा बीबी है बल्कि उसकी रगो में झलकारी बाई और रानी लक्ष्मी बाई का खून दौड़ रहा है। और जब इस तरह की हजारों हजार ही नहीं बल्कि लाखों की तादाद में महिलाएं खड़ी हो गयी हैं तो फिर सत्ता की ऐसी कौन बंदूक और तोप है जो उन्हें अपना मकसद हासिल करने से रोक सकेगी।

न ही ये महिलाएं कोई शाहबानो हैं जिसके अधिकारों को किसी राजीव गांधी का प्रचंड बहुमत अपने पैरों के नीचे कुचल सके। इसने हुंकार भर ली है। अब वह किसी के दया की पात्र नहीं। अब वह अपनी लड़ाई ही नहीं बल्कि उससे आगे बढ़ कर देश और समाज की लड़ाई के लिए उठ खड़ी हुई हैं। जिसके जरिये वह न केवल तमाम शाहबानाओं बल्कि पूरे समाज को मुक्त करेगी। हिंदू समाज की महिलाओं को घर में रहने की सलाह देने वाले मोहन भागवत को समय के इस खतरे की घंटी को जरूर सुनना चाहिए। वरना जो आइना महिलाओं का यह आंदोलन उन्हें दिखा रहा है अगर उससे भी नहीं सीखते हैं तो इतिहास का कूड़ेदान उनका इंतजार कर रहा है। जिसमें वह और उनकी पूरी जमात अपनी फासिस्ट जनविरोधी और दकियानूसी सोच के साथ दफन होने के लिए अभिशप्त है।

इससे पहले भी महिलाओं की स्थिति और उनकी स्वतंत्रता और मुक्ति के लिए तमाम लोग न केवल चिंतित रहे हैं बल्कि समय-समय पर उसके लिए अपने तरीके से प्रयास भी करते रहे हैं। लेकिन कहा जाता है कि कोई किसी दूसरे को मुक्त नहीं करता है। जब तक कि वह खुद अपने लिए न खड़ा हो। महिलाओं के लिए आज वही समय आ गया है वह न केवल खुद खड़ी हो गयी है बल्कि उसने समाज और देश के लोगों को भी खड़ा करने का परचम उठा लिया है। और मशहूर शायर मज़ाज ने इस बात को शायद बहुत बेहतर तरीके से समझा था जब उन्होंने कहा था कि “तेरे चेहरे पर ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन, तूं इस आंचल का इक परचम बना लेती तो अच्छा था”। लिहाजा महिलाओं ने अब न केवल परचम बना लिया है बल्कि उन्होंने हुकू-के-राह में अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सड़क पर झंडा भी गाड़ दिया है। 

(लेखक महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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