Categories: बीच बहस

कोरोना से जंग की तैयारी छोड़ साल भर चुनाव मोड में रहे सरकार बहादुर!

आज महामारी की स्थितियां विपरीत हो चुकी हैं। प्रतिदिन दो लाख से अधिक मामले सामने आ रहे हैं। देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं। हम एक ऐसी स्थिति में आ पहुंचे हैं कि सरकारों के मन से जनता का भय समाप्त हो गया है और जब सत्ता में आना और सरकार बनाये रखना, देश की मूल भूत समस्या और आम जन के मुद्दे से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है तो, जो आज हम अपने आसपास देख रहे हैं, वैसा ही होने लगता है। ताली थाली, दीया बाती, टीकोत्सव के तमाशे के बाद, अब खुदी कब्रें और जलती चिताएं दिख रही हैं। लखनऊ में गोमती नदी के तट पर जलती चिता हो या मध्य प्रदेश के शवदाह गृह के बाहर शवों की लंबी कतारें, देश की वर्तमान स्थिति की रोती हुई तस्वीर बयां कर रही हैं।

अब आप यह क्रोनोलॉजी पढ़ें
● 2020 में कोरोना की पहली लहर आयी थी, तब निम्न, समस्याएं सामने आयी थीं,
1. अस्पतालों में, बेड की कमी।
2. मेडिकल स्टाफ के लिये पीपीई किट की कमी।
3. वेंटिलेटर की कमी।
4. इंजेक्शन रेमडेसिविर की कमी।

यह लहर धीरे-धीरे जुलाई तक कम होने लगी और जहां थी वहां उस पर प्रभाव कम घातक था।

● 2021 में कोरोना की दूसरी लहर आयी और इसमें जो समस्याएं इस समय सामने आ रही हैं, वे हैं,
1. अस्पतालों में बेड की कमी।
2. टीके, वैक्सीन की कमी।
3. वेंटिलेटर की कमी।
4. दवा रेमडेसिविर की कमी।
5. ऑक्सीजन की कमी।

यह लहर कहीं अधिक घातक है और देश के हर प्रदेश और शहर में इसका व्यापक असर पड़ रहा है।

अब एक सवाल उठता है कि एक साल में सरकार ने कोरोना से निपटने के लिए स्वास्थ्य ढांचा ठीक करने के लिए क्या-क्या किया। पहली लहर के बाद, सरकार ने बड़े ही ढोल-मंजीरे के साथ, 12 मई 2020 को 20 लाख करोड़ रुपये का पैकेज जारी किया। कहा गया कि इससे न केवल इस आपदा से निपटने में सहायता मिलेगी बल्कि यह एक प्रकार से आर्थिक बूस्टर का भी काम करेगा। सरकार ने इस राहत पैकेज के पहले 28 मार्च 2020 को पीएम केयर्स फ़ंड का गठन किया, जिसमें लोगों ने स्वेच्छा से भी दान दिया और सरकार ने विभिन्न सरकारी विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों से दान वसूला भी। कंपनियों ने अपने सीएसआर फ़ंड भी पीएम केयर्स में दिया। अनुमान है कि इस फ़ंड में  चार हजार करोड़ से अधिक की धनराशि है। इस प्रकार जहां तक सरकार के पास फ़ंड का सवाल है, कोरोना से लड़ने, अस्पतालों के इंफ्रास्ट्रक्चर ठीक करने, टीकाकरण की व्यवस्था करने, दवाइयों का स्टॉक बरकरार रखने के लिये धन कम नहीं है, लेकिन सरकार की प्राथमिकता में स्वास्थ्य, शिक्षा और गवर्नेंस, है ही नहीं।

1947 में आज़ाद होने के बाद जो संविधान बना उसमें नीति निर्देशक तत्व रखे गए जो वास्तव में लोककल्याणकारी राज्य की पीठिका के रूप में हैं। राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को संविधान के भाग-4 में अनुच्छेद 36 से 51 तक में शामिल किया गया है। नीति निर्देशक तत्व बाध्यकारी नहीं हैं अर्थात यदि राज्य इन्हें लागू करने में असफल रहता है तो कोई भी इसके विरुद्ध न्यायालय नहीं जा सकता है। नीति निर्देशक तत्वों की स्वीकृति ठोस संवैधानिक और नैतिक दायित्वों पर आधारित है। इन्हीं लोककल्याणकारी राज्य का एक महत्वपूर्ण अंग है देश की स्वास्थ्य व्यवस्था और उसका ढांचा।

स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच और इनकी गुणवत्ता (एचएक्यू) मामले में भारत 145वें स्थान पर है। लैंसेट के अध्ययन के अनुसार, भारत 195 देशों की सूची में अपने पड़ोसी देश चीन, बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान से भी पीछे है। ‘ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज’ अध्ययन में हालांकि कहा गया है कि स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच और गुणवत्ता मामले में वर्ष 1990 के बाद से भारत की स्थिति में सुधार देखे गए हैं। वर्ष 2016 में स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच और गुणवत्ता के मामले में भारत को 41.2 अंक मिले हैं, तो वहीं, वर्ष 1990 में 24.7 अंक मिले थे। इसके अनुसार वर्ष 2016 में गोवा और केरल के सबसे अधिक अंक रहे। प्रत्येक को 60 से अधिक अंक मिले, जबकि असम और उत्तर प्रदेश को सबसे कम अंक मिले। दोनों के अंक 40 से कम रहे।

भारत सूची में चीन (48), श्रीलंका (71), बांग्लादेश (133) और भूटान (134) से भी नीचे है, जबकि स्वास्थ्य सूची (हेल्थ इंडेक्स) में भारत का स्थान नेपाल (149), पाकिस्तान (154) और अफगानिस्तान (191) से बेहतर है। 2016 में एचएक्यू के मामले में जिन पांच देशों का प्रदर्शन सबसे उम्दा रहा वे आइसलैंड (97.1), नॉर्वे (96.6), नीदरलैंड (96.1), लक्ज़मबर्ग (96.0) और फिनलैंड व ऑस्ट्रेलिया हैं (प्रत्येक 95.9)। सबसे बुरा प्रदर्शन करने वाले देशों में केंद्रीय अफ्रीकन गणराज्य (18.6), सोमालिया (19.0), गिनी-बिसाउ (23.4), चाड (25.4) और अफ़ग़ानिस्तान (25.9) रहे। अध्ययन के अनुसार, तपेदिक (टीबी), दिल की बीमारी, पक्षाघात, टेस्टिक्युलर कैंसर, कोलोन कैंसर और किडनी की बीमारी से निपटने के मामलों में भारत का बेहद खराब प्रदर्शन रहा है।

भारत की पहली राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 1983 में बनी थी, जिसका मुख्य लक्ष्य साल, 2000 तक सभी को प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराना था। इसके बाद, भारत की दूसरी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2002 में लॉन्च की गई और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 15 मार्च, 2017 को भारत की तीसरी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की घोषणा की थी। तीन राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के बने, इतने साल गुजर गए हैं, और देश में बहुत सी चीजें (जैसे जनसँख्या, लोगों की प्रति व्यक्ति आय, बीमारियों की सघनता, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, तकनीकी इत्यादि) बदल गयी हैं, इसलिए नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति को भी बदलते समय की जरूरत के हिसाब से बदलना होगा और इसी के अनुसार लक्ष्य निर्धारित करने होंगे। इसे ही दृष्टिगत रखते हुए, नयी नीति का लक्ष्य: निर्धारित किया गया, सभी उम्र के लोगों को निवारक और प्रोत्‍साहक स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल और, स्वास्थ्य और कल्याण के उच्चतम संभव स्तर को उपलब्ध कराना और इसमें किसी भी प्रकार की वित्तीय कठिनाई को दूर करना रखा गया।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 का प्राथमिक उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में आम आदमी के विश्वास को मजबूत करना, बताया गया है। नयी स्वास्थ्य नीति में ऐसी प्रणाली विकसित करने पर जोर दिये जाने की बात की गयी है, जो कि रोगी केंद्रित, कुशल, प्रभावी और किफायती हो, जिसमें सेवाओं और उत्पादों की इतनी व्यापकता हो कि लोगों की सभी त्वरित जरूरतों को पूरा किया जा सके और इन्हें इधर-उधर अस्पतालों के चक्कर ना काटने पड़ें।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 के मुख्य लक्ष्य इस प्रकार हैं;
● स्वास्थ्य व्यय को वर्तमान सकल घरेलू उत्पाद के 1.15% से बढाकर 2025 तक 2.5% करने के लक्ष्य।
● जन्म के समय जीवन प्रत्याशा को 67.5 वर्ष से बढ़ाकर वर्ष 2025 तक 70 वर्ष करने का लक्ष्य।
● कुल प्रजनन दर को 2025 तक राष्ट्रीय और उप-राष्ट्रीय स्तर पर 2.1 के स्तर पर लाने का लक्ष्य है. वित्त वर्ष 2016 में, भारत में प्रति महिला 2.3 थी।
● वर्ष 2025 तक पांच वर्ष से कम की उम्र के बच्चों की मृत्यु दर को 23 प्रति हजार पर लाना जबकि मातृ मृत्यु दर को वर्तमान के 167 से घटाकर 100 पर लाने का लक्ष्य रखा गया है। ज्ञातव्य है कि भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 2015 में 29 प्रति हजार थी।
● वर्ष 2025 तक पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में बौनेपन या बृद्धि रोक की समस्या को 40% तक कम करना है।
● शिशु मृत्यु दर को 2019 तक 28 तक घटाना रखा गया है। भारत में वर्ष 2016 में 34 प्रति 1000 थी।
● 2025 तक नवजात मृत्यु दर को 16 और जन्म दर को ‘एकल अंक’ में लाने का लक्ष्य है। वर्ष 2013 में भारत में नवजात मृत्यु दर 28 प्रति 1000 थी।
● वर्ष 2025 तक दृष्टिहीनता के प्रसार को घटाकर 0.25/1000 करना तथा रोगियों की संख्या को वर्तमान स्तर से घटाकर 1/3 करना।
● वर्ष 2018 तक कुष्ठ रोग, वर्ष 2017 तक कालाजार तथा वर्ष 2017 तक लिम्फेटिक फाइलेरियासिस का उन्मूलन करना तथा इस स्थिति को बनाए रखना रखा गया है।
● वर्ष 2025 तक हृदय रोगों, मधुमेह या पुराने श्वसन रोगों और कैंसर जैसी बीमारियों से होने वाली समयपूर्व मृत्यु दर को 25% तक कम करने का लक्ष्य रखा गया है।
● क्षयरोग (टीबी) के नए मामलों में 85% तक कमी लाना और इस कमी दर को बनाये रखकर 2025 तक क्षयरोग का उन्मूलन करना।
● 2025 तक मौजूदा स्तर से सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का उपयोग 50% बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित।
● वर्ष 2025 तक एक वर्ष की उम्र के 90% बच्चों का पूरी तरह से टीकाकरण करना।
● वर्ष 2025 तक 90% बच्चों का जन्म प्रशिक्षित दाइयों/नर्सों के द्वारा या उनकी निगरानी में कराये जाने का लक्ष्य।
● तम्बाकू के इस्तेमाल के वर्तमान प्रसार को 2020 तक 15% और 2025 तक 30% तक कम करना।
● वर्ष 2020 तक व्यावसायिक चोट की घटनाओं में 50% कमी लाना। वर्तमान में यह दर कृषि क्षेत्र में 334/लाख श्रमिक है।
● वर्ष 2020 तक राज्यों को अपने बजट का 8% स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करना होगा।

उपरोक्त बिंदुओं को पढ़ने के बाद यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 का मुख्य ध्यान देश में स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के समग्र विकास को बढ़ावा देना है। सरकार देश के स्वास्थ्य संस्थानों में कुशल डॉक्टरों, पर्याप्त दवाओं और आम लोगों के विकास को बढ़ाना चाहती है। 

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के लागू हो जाने के बाद सरकार ने जो कदम इन नीतियों को लागू करने के लिये उठाये उनकी भी चर्चा ज़रूरी है। 2018,  19, 20 और अब 2021 के बजट आ चुके हैं और इन नीतियों के लक्ष्यों को पूरा करने के लिये किसी भी बजट में पूरे प्राविधान नही किये गए हैं। यह बिल्कुल अर्थव्यवस्था के लक्ष्य की तरह कि, सरकार 5 ट्रिलियन इकोनॉमी बनाना चाहती है और 2022 तक किसानों की आय दुगुना करना चाहती है, पर यह सब होगा कैसे, इस पर सरकार और नीति आयोग दोनो ही खमोश हैं। लक्ष्य और नीति निर्धारण करना, पढ़ने का ढोंग करने वाले उस विद्यार्थी की तरह है जो अपने पढ़ने का टाइमटेबल तो दुरुस्त बनाता है, पर उस पर जब अमल का वक़्त आता है तो वह कुछ नहीं करता है।

देश मे प्राइमरी हेल्थ सेंटर से लेकर जिला अस्पताल और फिर सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों का एक ढांचा है। यह ढांचा सरकारी क्षेत्र में है और निजी तथा चैरिटेबल अस्पताल इससे अलग हैं। 1991 के उदारीकरण ने जहां निजी क्षेत्रों, जैसे, निजी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, नर्सिंग होम आदि के नए क्षेत्र खोले वहीं सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं कमज़ोर भी पड़ीं। सरकार को निजी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण अंचल तक फैली पीएचसी और जिला अस्पतालों को भी सक्षम बनाना चाहिए था, पर ऐसा नही हो सका। सुदूर क्षेत्रों में, पीएचसी में डॉक्टर नहीं, दवाएं नहीं, जिला अस्पताल समय के साथ-साथ आधुनिक नहीं किये गए, और जब प्रतियोगिता की बात आयी तो सुख सुविधा, दवा, सुश्रुषा आदि के पैरामीटर पर, सरकारी अस्पताल निजी क्षेत्र का मुकाबला नहीं कर पाए। योग्य और अनुभवी डॉक्टरों के होने के बावजूद, संसाधनों के अभाव में सरकारी अस्पताल जनता को जो लाभ पहुंचाना चाहिये थे वे नही पहुंचा सके। संसाधनों की जिम्मेदारी सरकार के स्वास्थ्य महकमे पर है।

नीति आयोग की संस्तुति यदि किसी भी लोककल्याण के सेक्टर से जुड़ी आप पाएंगे तो नीति आयोग हर सेक्टर में सुधार की दवा के रूप में सिर्फ निजीकरण का ही प्रिस्क्रिप्शन लिखता है। वह सरकारी धन से अस्पतालों के आधुनिकीकरण करने और नए अस्पताल बनाने की बात दकियानूसी समझता है और यह कहता है कि सरकारी अस्पताल भी पीपीपी मॉडल (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) के आधार पर दे दिए जाएं। सब कुछ बेच दो के वायरस से संक्रमित सरकार ने, जिला अस्पताल को, पीपीपी मोड पर मेडिकल कॉलेजों से जोड़ने के नीति आयोग के प्रस्ताव पर अपनी सहमति दे दी है। जबकि पीपीपी मॉडल, निजीकरण का ही एक शिष्ट रूप है।

कभी-कभी मुझे लगता है कि देश की सबसे बड़ी समस्या देश का नीति आयोग है जो हर योजना में पीपीपी का मॉडल घुसेड़ देता है, जो सीधे-सीधे निजीकरण या सब कुछ कॉरपोरेट को सौंप देने की एक साजिश पर लंबे समय से मुब्तिला है। सरकार को चाहिए कि, वह इस प्रस्ताव को खारिज कर दे सरकारी क्षेत्र में स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करे।

हालांकि, मध्य प्रदेश (जब कमलनाथ सरकार थी तब) और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने यह पहले ही साफ कर दिया है कि वे इस पीपीपी स्कीम को लागू नहीं करेंगे। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि, नीति आयोग ने इस मॉडल पर जब खुद ही, एक विशद अध्ययन किया तो, वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ‘कर्नाटक और गुजरात जैसे राज्यों ने कई टुकड़ों में पीपीपी मॉडल को लागू किया है, लेकिन उसके कोई बेहतर परिणाम नहीं निकले हैं। ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे आप यह अंदाजा लगा सकें कि इन राज्यों का यह प्रयास सफल रहा है, क्योंकि इन राज्यों के बाद कहीं और इस स्कीम को लागू नहीं किया गया। साथ ही अगर निजी मेडिकल कॉलेजों को जिला अस्पतालों से जोड़कर डॉक्टरों की कमी पर ध्यान लाने की कोशिश की जा रही है, तो यह संभव नहीं है।’

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने इस कदम का विरोध किया है और इसे, ‘घर का सोना बेचने’ जैसा बताया है।

आज की यह त्रासदी निश्चय ही एक घातक वायरस का परिणाम है और कोरोना एक संक्रामक रोग है, इससे किसी को इनकार नहीं है। पर इस त्रासदी से आज जो हर जगह से मरने और टीवी पर जार-जार रोने की खबरें आ रही हैं उसे क्या एक साल में सरकारें अस्पताल, दवा, संसाधन की व्यवस्था कर के महामारी के इस बिगड़े स्वरूप को रोक या कम नहीं कर सकती थीं? एक साल का समय कम नहीं होता है और जब सरकार ने खुद ही 20 लाख करोड़ रुपये की भारी भरकम धनराशि कोरोना के लिये तय कर रखी हो, और उसके पास पीएम केयर्स फ़ंड में लगातार धन आ रहा है, तो फिर दिक्कत कहां थी और क्या थी?

सरकार के पास पिछले एक साल के समय के साथ-साथ, धन भी था, फिर भी सरकार अस्पतालों को न्यूनतम सुविधा क्यों नहीं दे पायी है? मेरा मानना है कि गवर्नेंस के प्रति सरकार की न तो कोई नीति है औऱ न ही नीयत और सच कहिये तो उसकी प्राथमिकता भी नहीं है कि वह लोककल्याण के बारे में सोच सके। जहां तक मानवीय संवेदनाओं की बात है, यह सरकार और सरकार के मुखिया सहित अन्य कुछ लोग भी मानवीय संवेदना के सूचकांक में शून्य के ही आसपास हैं। यह जमात ही संवेदना से हीन है और जीवित शव सम चौदह प्राणी के समान हो चली है।

चाहे, नोटबन्दी के समय, लाइनों में खड़े-खड़े, मरते लोगों से जुड़ी खबरें हो, या जीएसटी के कुप्रबंधन से परेशान और बर्बाद होते, मध्यम वर्ग के व्यापारी हों, या 2020 के लॉकडाउन के बाद सैकड़ों किलोमीटर सड़कों पर घिसटते हुए कामगारों के रेले हों, या दिल्ली सीमा पर धरनों में बैठे किसान हों, या आज हमारे आसपास अस्पतालों की बदइंतजामी और प्राणवायु के इंतज़ार में मरते हुए लोग हो, एक भी अवसर पर न तो प्रधानमंत्री ने और न ही सरकार ने इस पीड़ित जनता के लिये कोई संवेदना  जताई और न ही उनके मन मे, किसी अफसोस का लेशमात्र भी भाव जगा।

अब कुछ उदाहरण देखिये,
● नोटबन्दी का वह वाक्य याद कीजिए, ताली बजा कर यह कहना कि ‘घर में शादी है’, और फिर अंगूठा नचा कर कह देना कि ‘पास मे पैसे नहीं है,’ यह देहभाषा और यह संवाद मेरे मस्तिष्क से नहीं निकल पाता है।

● यही हाल 2020 के कामगारों के विस्थापन पर था और प्रधानमंत्री ने एक शब्द तक नहीं कहा, न तो संवेदना के और न ही उस बदइंतजामी पर।

● 4 महीने से किसान अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे हैं और 300 से अधिक किसान वहां मर चुके हैं, पर एक शब्द भी इस आदमी के मुंह से नहीं निकला पर शिखर धवन के चोटिल अंगूठे ने उन्हें सोने तक नहीं दिया था उस रात!

● आज रोज लोग इस महामारी से या तो मर रहे हैं या मरणासन्न हैं, पर प्रधानमंत्री, ‘मोगैम्बो खुश हुआ’ की तर्ज पर अपनी जनसभा में भीड़ को देख कर आह्लादित हैं। आह्लाद के उन पलों में एक जिम्मेदार शासक के रूप में, उनके मन में क्या यह बात भी आयी कि यह भारी भीड़ कोरोना संक्रमण को खतरनाक तरह से फैला सकती है?  आज भी मौतें जारी हैं और साथ मे उनकी रैलियां और रोड शो भी।

सरकार के समर्थक कहते हैं कि सकारात्मक सोचना चाहिए और आपदा पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। सकारात्मक सोच के इस भाषण पर मुझे धूमिल की एक कविता याद आती है,
जनता,
अपने देश की जनता
,
एक भेड़ है
,
जो दूसरों की ठंड के लिये
,
अपनी पीठ पर
,
ऊन की फसल ढोती है!

हम सबको यह निज़ाम, अपनी ठंड के लिये, आपनी पीठ पर, ऊन की फसल ढोने वाली भेड़ से अधिक नहीं समझता है, और हम में से अधिकतर, विशेषकर, सरकार के समर्थक मित्र ऐसी भेड़ बन भी चुके हैं। वे भी इस बदइंतजामी से दुःखी हैं। मौत, बदइंतजामी और महामारी ने उनके घर भी जाने से परहेज नहीं किया है, पर वे उस बैगपाइपर को कैसे कोसें, कैसे तन कर खड़े हों, उसके सामने, जिसे उन्होंने अवतार मान रखा है। कैसे पूछें उससे यह सवाल कि हमें ले किधर जा रहे हो! वे यह यकीन तक नहीं कर पा रहे हैं कि बैगपाइपर की मुग्ध ध्वनि मोहनिद्रा में मदहोश कर उन्हें दरिया में झोंक देने के लिये अभिशप्त है। ऐसे माहौल में जब हवा में वायरस नहीं, मौत बह रही हो, और सरकार, खामोश बनी सिवाय चुनावी रैलियों के कहीं दिख नहीं रही हो तो, आज सकारात्मक बातें कहने का अर्थं है एक ऐसी भेड़ बन जाना जो सिर पर एक बाल्टी रख कर घूम रही है और कह रही है कि वह सकारात्मक सोच रही है।

कोरोना संकट के बीच पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पीएम नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी है। इस चिट्ठी के जरिए उन्होंने सरकार को कई सुझाव दिए है। मनमोहन सिंह ने कहा कि-
● वैक्सीनेशन में तेजी लानी होगी, क्योंकि ये कोरोना से जंग में अहम है। कितने लोगों को वैक्सीन लगी है, यह आंकड़ा न देखकर इस पर फोकस किया जाए कि आबादी के कितने फीसदी लोगों का वैक्सीनेशन हुआ है।

● सरकार को यह बताना चाहिए कि अलग-अलग वैक्सीन को लेकर क्या आदेश हैं और अगले छह महीनों में डिलीवरी होने का क्या स्टेटस है।

● सरकार को यह संकेत देना चाहिए कि पारदर्शी फार्मूले के आधार पर राज्यों में उनकी अपेक्षित आपूर्ति को कैसे वितरित किया जाएगा?

● राज्यों को फ्रंटलाइन वर्कर्स की श्रेणियों को परिभाषित करने के लिए कुछ छूट दी जानी चाहिए. जिससे 45 वर्ष से कम आयु के लोगों को भी टीका लगाया जा सके।

● भारत सरकार को वैक्सीन निर्माताओं को और रियायतें देनी चाहिए। इजरायल की तरह अनिवार्य लाइसेंसिंग प्रावधान लागू किया जाए।

● किसी भी वैक्सीन को जिसे यूरोपीय मेडिकल एजेंसी या यूएसएफडीए जैसे विश्वसनीय एजेंसियों द्वारा उपयोग के लिए मंजूरी दे दी गई है, उसे घरेलू आयात करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

आज अगर अखबार और अन्य मीडिया स्रोत देखें तो बीमारी से लोग कम,  तीमारदारी की कमी, अस्पताल में बेड, दवा, और ऑक्सीजन की किल्लत से लोग अधिक मर रहे हैं। बीमारी की दूसरी लहर, जब कि पहली लहर आ कर जा चुकी है और इतना तो नहीं, पर कुछ न कुछ कहर तो बरपा ही चुकी थी, तो उसके एक साल बाद भी अस्पतालों में इस बीमारी से निपटने के लिए न्यूनतम चिकिसकीय सुविधा का इंतज़ाम एक साल की अवधि में, सरकार नहीं कर पायी। सरकार की इस नाकामी को आप मेरी नकारात्मक सोच कह कर खारिज कर सकते हैं, पर जो मौतें हमारे आस पास हो रही हैं वे तो खारिज नहीं हो सकती हैं? कुछ मित्र यह भी कहते हैं कि ऐसे समय में सरकार की आलोचना नहीं बल्कि सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की ज़रूरत है। पर जब मौत, बदहाली, और श्मशान जैसी बेबसी की नकारात्मकता हर वक़्त इर्दगिर्द हो, ऐसे माहौल में सकारात्मक बने रहना मुश्किल होता है, और सकारात्मकता की बात करना, जिम्मेदारी से जी चुराना है और यह एक शुतुरमुर्गी आचरण है।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और कानपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on April 19, 2021 9:25 pm

Share
%%footer%%