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प्रवासी मज़दूरों को रोकने की हर जुगत में लगी है गुजरात सरकार

अहमदाबाद। तीसरे लॉकडाउन की घोषणा से पहले जब केंद्र सरकार द्वारा अलग राज्यों में फंसे मजदूर, छात्र तथा अन्य प्रवासियों को उनके गृह राज्य सशर्त जाने की अनुमति देने की घोषणा की तो एक आशा बंधी थी कि कम से कम ये लोग अपने गाव पहुँच जाएंगे। अब ऐसा लग रहा है कि प्रधानमंत्री की घोषणा केवल मजदूरों के विद्रोह को रोकने का एक लोलीपॉप भर था। सरकार को लग रहा था जिस तरह से दिल्ली, मुंबई, सूरत, अहमदाबाद समेत तमाम शहरों के मजदूर सड़कों पर उतर आए थे उससे कहीं विद्रोह की स्थिति न खड़ी हो जाए। इसी भय का नतीजा था कि मोदी सरकार ने श्रमिक ट्रेनों को चलाने का निर्णय लिया। लेकिन अब गुजरात सरकार का जो रवैया है उससे लगता है कि वह प्रवासी मजदूरों को बंधक बनाए रखना चाहती है। 

गुजरात सरकार प्रवासी मज़दूरों को अपने घरों को जाने के लिए ऑनलाइन अर्ज़ी के माध्यम से अनुमति दे रही है। लेकिन इस प्रक्रिया में किसी भी तरह की पारदर्शिता नहीं है। अधिकतर अर्जियां रिजेक्ट हो जाती हैं क्योंकि ऑनलाइन अर्ज़ी प्रक्रिया बहुत ही जटिल है। दूसरी प्रक्रिया के तहत कोई भी टोल फ्री नंबर पर फोन, व्हाट्स अप, गूगल डॉक पर फॉर्म भर सकता है। यह प्रक्रिया थोड़ा सरल है। और ये सभी नंबर सरकार द्वारा जारी किये गए हैं। अहमदाबाद के ज़िला कलेक्टर ने अपने ट्वीट से भी इन नम्बरों की पुष्टि की थी। लाखों प्रवासी विशेषकर मजदूर तबके ने अपना नाम जाने के लिए पंजीकृत किया था। 

इन पंक्तियों का लेखक भी 57 मजदूरों को पंजीकृत कराया था। एक सप्ताह बाद जब ज़िला कलेक्टर कार्यालय से जानकारी हासिल की गयी तो पता चला इन नम्बरों तथा गूगल फॉर्म का कोई अर्थ ही नहीं है। संबंधित ज़ोन के मामलतदार को मेल अथवा व्हाट्स करके फोन पर बात करने के बाद ही कुछ होगा। नम्बरों की जांच करने पर पता चला कि ये सभी नंबर अहमदाबाद स्थित अक्षर ट्रेवल्स के हैं। अक्षर ट्रेवल्स के डाइरेक्टर सुहाग मोदी ने बताया, “हम केवल काल सेंटर की तरह काम कर रहे हैं। डाटा एकत्र कर सरकार को दे देते हैं। हमारे द्वारा एकत्र डाटा से कितने लोग प्रवास कर पाए इसकी जानकारी हमें नहीं है।” जिला कलेक्टर के सूत्रों से पता चला है। अक्षर ट्रेवल्स को टूर प्रबंधन का ठेका दिया गया है। 

बांध काम मजदूर संगठन के डाइरेक्टर विपुल पांड्या कहते हैं, “सरकार चाहती ही नहीं कि प्रवासी मजदूर अपने गावों को लौटें। इसलिए सरकार केवल समय निकाल रही है। मेरी जानकारी के अनुसार गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स का सरकार पर दबाव है कि सरकार मजदूरों को गांव लौटने न दे। क्योंकि उन्हें लगता है यदि मजदूर चले गए तो लॉक डाउन के बाद कारखानों को शुरू करने में मुश्किल होगी।”

सोला, एसजी हाईवे की एक कांस्ट्रॅक्शन साइट पर बिहार के अठारह मजदूरों को उनके घर लौटने का अनुमति पत्र सोला घाटलोडिया मामलतदार को दिया गया तो मामलतदार आरजे रबारी ने कलेक्टर कार्यालय से संपर्क करने को कहा। उन्होंने साफ कहा कि अब उनके पास सत्ता नहीं है। जिला कार्यालय में ट्रेवल्स परमिट की एक यूनिट बनायी गयी है। परमिट वहीं से मिलेगा। जबकि सरकार द्वारा जारी नोटिस में ट्रेवल्स परमिट को मामलतदार के अधिकार क्षेत्र में रखा गया था। 

इसी प्रकार से मणिनगर मामलतदार अर्ज़ी देकर चार बिहार के और तीन उत्तर प्रदेश के प्रवासी श्रमिकों के लिए ट्रेवल्स परमिट मांगी गई तो मामलतदार वसंत पिपालिया ने अक्षर ट्रेवल्स पर कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन बताया, ” हम लोग सभी के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। कल बिहार की एक ट्रेन थी जो किसी कारण रद्द हो गई। आज उत्तर प्रदेश की है। संयम रखें सभी का नंबर आयेगा।” राज्य सरकार बहुत कुछ छिपा रही है। ऐसे समय में ज़िला मजिस्ट्रेट भी छुट्टी पर चले जाते हैं। या भेज दिये जाते हैं। सवाल खड़ा होता है। पर उसका उत्तर देने को कोई तैयार नहीं। 

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यही कारण है कि रेलवे की श्रमिक ट्रेनों में नंबर आने को लेकर मज़दूर अब बहुत आशावान नहीं हैं। इसीलिए रोज़ान बड़ी संख्या में मजदूर पैदल गुजरात से अपने गाँवों को निकल रहे हैं। ऐसे समय में पुलिस विभाग एक तरफ सामाजिक संगठनों की मदद से प्रवासी मजदूरों के लिए खाने पीने की व्यवस्था कर रहा है। ताकि मजदूर गांव न जाएं। दूसरी तरफ आपदा के समय कुछ पुलिसकर्मी इस मौक़े का पूरा फ़ायदा उठा रहे हैं। बताया जा रहा है कि ट्रकों, मोटर साइकिल तथा अन्य वाहनों से जा रहे मजदूरों से रिश्वत लेकर उन्हें जाने की छूट दे देते हैं। रिश्वत न मिलने पर वाहन को लौटा दिया जाता है। ट्रक ड्राइवर सलीमुद्दीन अहमदाबाद से उत्तर प्रदेश प्रवासी मजदूरों को ट्रक से छोड़कर लौटे हैं। उन्होंने बताया कि ” गुजरात बॉर्डर तक दिक्कत है। इसलिए हम लोग ट्रक को टाट से पैक कर देते हैं ताकि लगे गाड़ी में समान लदा है। जगह-जगह चेकपोस्ट बनी है। 

सब जगह चेक नहीं होता है। कहीं चेक हुआ तो पुलिस वालों को रिश्वत देकर निकल जाते हैं। मध्य प्रदेश बॉर्डर पर यात्रियों को चार किलो मीटर पैदल चलकर गुजरात से मध्य प्रदेश पार करना पड़ता है। मध्य प्रदेश में पुलिस खुद सहयोग करती है वहाँ पुलिस टाट खुलवा देती है। MP पुलिस कहीं कहीं खाने पीने की भी व्यवस्था कर रखी है। मध्य प्रदेश से उत्तर प्रदेश बॉर्डर में दाखिल होने पर पहले ट्रकों को खाली कराकर UP रोडवेज की बसों में यात्रियों को उनके जिला ले जाया करते थे। लेकिन संख्या बहुत अधिक बढ़ जाने के कारण अब ट्रकों को ही भेज देते हैं।”

लाकडाउन खोले जाने की गुजरात की परिस्थिति नहीं है। बावजूद इसके मुख्यमंत्री विजय रूपानी आर्थिक नुकसान और प्रवासी मजदूरों के पलायन को देखते हुए प्रधान मंत्री से लॉक डाउन खोलने की मांग कर चुके हैं। सरकार को लगता है मजदूर चले गए तो अगले छह-सात महीने तक लौटेंगे नहीं। और उसका ख़ामियाज़ा उद्योगों समेत पूरे सूबे को भुगतना पड़ेगा।

(अहमदाबाद से जनचौक संवाददाता कलीम सिद्दीक़ी की रिपोर्ट।)

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