Sunday, October 24, 2021

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हूच हमाम में नंगे आका

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पंजाब ज़हरीली शराब (हूच) कांड में 100 से अधिक मौत की ख़बर है। ऐसे कांड में मरने वाले, सस्ती शराब के आदी, समाज के निचले आर्थिक तबके के लोग होते हैं। बेशक त्रासदी बड़ी हो जाये तो मीडिया की सुर्ख़ियाँ सम्बंधित नेताओं, बिचौलियों और अधिकारियों को वक्ती तौर पर नंगा करने वाली ज़रूर बन जाती हैं। 

पंजाब इस मामले में अकेला राज्य नहीं है। इसके पीछे रेवेन्यू केंद्रित आबकारी नीति से राज्य की आय बढ़ाते जाने और उसकी आड़ में अपनी जेब के लिए अधिक से अधिक पैसा बनाने की होड़ होती है। अगर पूर्ण शराब बंदी हो तो और भी पौ बारह। सीधा समीकरण है- जितना ज़्यादा नियंत्रण उतनी ज़्यादा उगाही। मोदी के गुजरात में नेता-बिचौलिया-अफ़सर गठजोड़ के लिए यह तीस हज़ार करोड़ और नीतीश के बिहार में यह दस हज़ार करोड़ सालाना का जेबी कारोबार बन चुका है। 

गुजरात और बिहार में पूर्ण शराब बंदी के चलते पंजाब और हरियाणा से व्यापक शराब तस्करी इन दोनों राज्यों में होती आयी है। पंजाब में हाल में आबकारी नीति को अपने-अपने संरक्षित शराब कार्टेल के हिसाब से तय कराने के चक्कर में प्रभावशाली मंत्रियों ने अमरिंदर सिंह के वफ़ादार मुख्य सचिव की छुट्टी करा दी। कुछ माह पहले हरियाणा में भी पकड़ी गयी शराब को खुर्द-बुर्द कर गुजरात भेजने वाला गिरोह उजागर हुआ लेकिन इनेलो मंत्रियों की हिस्सेदारी ने जाँच को जकड़ रखा है। 

दरअसल, नियमित होने वाली छिट-पुट हूच मौतें तो ख़बर बनती ही नहीं जबकि पंजाब जैसी बड़ी त्रासदी पर कनिष्ठ अधिकारियों के निलम्बन-जाँच की चादर उढ़ा दी जाती है। फ़िलहाल पंजाब में भी यही चलन देखने को मिल रहा है- एक दर्जन से ऊपर इंस्पेक्टर स्तर के आबकारी और पुलिसकर्मी निलंबन की लिस्ट में हैं और मंडल कमिश्नर जाँचकर्ता के रूप में। 

पिछले दस वर्ष में देश में हुई अन्य प्रमुख हूच त्रासदियों पर एक नज़र डालिये जिनमें सौ से अधिक मौतें हुईं, जाँच का नाटक चला और समाज के लिए आत्मघाती आबकारी नीति नेता-बिचौलिया-अधिकारी गठजोड़ के साये में बदस्तूर जारी रही। कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा, सरकार किसी पार्टी की हो- मोदी मॉडल या राम राज्य का दावा ही क्यों न हो।  

2009 गुजरात 

2011 बंगाल 

2012 ओड़िशा

2013 उत्तर प्रदेश 

2015 बंगाल 

2015 मुंबई 

2016 बिहार 

2018 उत्तर प्रदेश 

2019 आसाम

क्या समझना मुश्किल है कि स्कूलों और अस्पतालों जैसी सामाजिक ज़रूरतों तक को निजी हाथों में सौंपने वाली सरकारें, शराब के कारोबार पर कुंडली मारे क्यों बैठी हैं?

(रिटायर्ड आईपीएस विकास नारायण राय हरियाणा के डीजीपी रहे हैं और आजकल करनाल में रहते हैं।)

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