बीच बहस

अगर फ्रांस कर रहा है तो भारत में क्यों नहीं होनी चाहिए पेगासस गेट की जांच?

विदेशी अखबार ‘द गार्डियन’ और ‘वाशिंगटन पोस्ट’ सहित भारतीय वेबसाइट, ‘द वायर’ और 16 अन्य मीडिया संगठनों द्वारा एक ‘स्नूप लिस्ट’ जारी की गयी, जिसमें बताया गया कि कई मानवाधिकार कार्यकर्ता, राजनेता, पत्रकार, न्यायाधीश और कई अन्य लोग इजरायली फर्म एनएसओ ग्रुप के पेगासस सॉफ्टवेयर के माध्यम से साइबर-निगरानी के टारगेट थे। पिछले कुछ दिनों में, ‘द वायर’ ने इस जासूसी के संबंध में लगातार कई रिपोर्टें प्रकाशित की हैं जो बताती हैं कि, पेगासस सॉफ्टवेयर, केवल सरकारों को बेचा जाता है, और इसका मकसद आतंकी संगठनों के संजाल को तोड़ने और उनकी निगरानी के लिए किया जाता है।

पेगासस स्पाइवेयर को एक हथियार का दर्जा प्राप्त है और वह सरकारों को, उनकी सुरक्षा के लिये जरूरी जासूसी हेतु ही बेचा जाता है। पर अब जो खुलासे हो रहे हैं, उनसे यह निष्कर्ष निकल रहा है कि, सरकारों ने, इसका इस्तेमाल राजनीतिक रूप से असंतुष्टों  और पत्रकारों पर नजर रखने के लिए भी किया है। इसमें भी, विशेष रूप से, वे पत्रकार जो सरकार के खिलाफ खोजी पत्रकारिता करते हैं और जिनसे सरकार को अक्सर असहज होना पड़ता है।

दुनिया भर के देशों ने पेगासस जासूसी के खुलासे पर अपनी प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी है, पर भारत इसे विपक्ष की साज़िश बता कर इस जासूसी के खिलाफ अभी कुछ नहीं कर रहा है। क्या इस जासूसी की जांच की आंच सरकार को झुलसा सकती है या सरकार एक बार फिर, शुतुरमुर्गी दांव आजमा रही है। अब कुछ देशों की खबरें देखें।

● फ़्रांस ने न्यूज़ वेबसाइट मीडियापार्ट की शिकायत के बाद पेगासस जासूसी की जाँच शुरू कर दिया है। यह जासूसी मोरक्को की सरकार ने कराई है।

● अमेरिका में बाइडेन प्रशासन ने पेगासस जासूसी की निंदा की है हालांकि उन्होंने अभी किसी जांच की घोषणा नहीं की है।

● व्हाट्सएप प्रमुख ने सरकारों व कंपनियों से आपराधिक कृत्य के लिए पेगासस निर्माता एनएसओ पर कार्रवाई की मांग की।

● आमेज़न ने एनएसओ से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और अकाउंट बंद किया।

● मैक्सिको ने कहा है कि, एनएसओ से किये गए पिछली सरकार के कॉन्ट्रैक्ट रद्द होंगे।

● भारत में इस पर सरकार अभी भ्रम में है और आईटी मंत्री किसी भी प्रकार की जासूसी से इनकार कर रहे हैं और इसे विपक्ष की साज़िश बता रहे हैं ! हैरानी की बात यह भी है कि नए आईटी मंत्री, अश्विनी वैष्णव का नाम खुद ही जासूसी के टारगेट में है।

फ्रांसीसी अखबार ला मोंड ने, भारत को इस स्पाइवेयर के इजराइल से प्राप्त होने के बारे में, लिखा है कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब जुलाई 2017 में इजरायल गये थे, तब वहां के तत्कालीन राष्ट्रपति बेंजामिन नेतान्याहू से उनकी लंबी मुलाकात हुई थी। नेतन्याहू से हमारे प्रधानमंत्री जी के सम्बंध बहुत अच्छे रहे हैं। हालांकि अब नेतन्याहू पद पर नहीं हैं। 2017 की प्रधानमंत्री की यात्रा के बाद ही, पेगासस स्पाईवेयर का भारत में इस्तेमाल शुरू हुआ, जो आतंकवाद और अपराध से लड़ने के लिए 70 लाख डॉलर में खरीदा गया था। हालांकि ला मोंड की इस खबर की पुष्टि हमारी सरकार ने नहीं की है। और यही सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है भी, कि हमने उक्त स्पाइवेयर खरीदा भी है या नहीं। हालांकि इस विवाद पर, पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने यह कहा है कि दुनिया के 45 से ज़्यादा देशों में इसका इस्तेमाल होता है, फिर भारत पर ही निशाना क्यों? पर खरीदने और न खरीदने के सवाल पर उन्होंने भी कुछ नहीं कहा।

जैसा खुलासा रोज-रोज हो रहा है, उससे तो यही लगता है कि पेगासस स्पाइवेयर  का इस्तेमाल सिर्फ अपने ही लोगों की निगरानी पर नहीं, बल्कि चीन, नेपाल, पाकिस्तान, ब्रिटेन के उच्चायोगों और अमेरिका की सीडीसी के दो कर्मचारियों की जासूसी तक में किया गया है। द हिन्दू अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने कई राजनयिकों और विदेश के एनजीओ के कर्मचारियों की भी जासूसी की है। पर सरकार का अभी इस  खुलासे पर, कोई अधिकृत बयान नहीं आया है अतः जो कुछ भी कहा जा रहा है, वह अखबारों और वेबसाइट की खबरों के ही रूप में है।

इस बीच, भाजपा सांसद, डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने एक ट्वीट कर के सरकार से पूछा है कि, पेगासस एक व्यावसायिक कम्पनी है जो पेगासस स्पाइवेयर बना कर उसे सरकारों को बेचती है। इसकी कुछ शर्तें होती हैं और कुछ प्रतिबंध भी। जासूसी करने की यह तकनीक इतनी महंगी है कि इसे सरकारें ही खरीद सकती हैं। सरकार ने यदि यह स्पाइवेयर खरीदा है तो उसे इसका इस्तेमाल आतंकी संगठनों की गतिविधियों की निगरानी के लिये करना चाहिए था। पर इस खुलासे में निगरानी में रखे गए नाम, जो विपक्षी नेताओं, सुप्रीम कोर्ट के जजों, पत्रकारों, और अन्य लोगों के हैं उसे सरकार को स्पष्ट करना चाहिए। उन्होंने सरकार से सीधे सवाल किया है कि, क्या उसने यह स्पाइवेयर एनएसओ से खरीदा है या नहीं ?

अब अगर सरकार ने यह स्पाइवेयर नहीं खरीदा है और न ही उसने निगरानी की है तो, फिर इन लोगों की निगरानी किसने की है और किन उद्देश्य से की है, यह सवाल और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर किसी विदेशी एजेंसी ने यह निगरानी की है तो, यह मामला बेहद संवेदनशील और चिंतित करने वाला है। सरकार को यह स्पष्ट करना ही होगा कि,

● उसने पेगासस स्पाइवेयर खरीदा या नहीं खरीदा।

● यदि खरीदा है तो क्या इस स्पाइवेयर से विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, सुप्रीम कोर्ट के जजों और कर्मचारियों की निगरानी की गयी है ?

● यदि यह निगरानी की गयी है तो क्या सरकार के आईटी सर्विलांस नियमों के अंतर्गत की गयी है ?

● यदि निगरानी की गयी है तो क्या सरकार के पास उनके निगरानी के पर्याप्त काऱण थे ?

● यदि सरकार ने उनकी निगरानी नहीं की है तो फिर उनकी निगरानी किसने की है ?

● यदि यह खुलासे किसी षड्यंत्र के अंतर्गत सरकार को अस्थिर करने के लिये, जैसा कि सरकार बार बार कह रही है, किये जा रहे हैं, तो सरकार को इसका मजबूती से प्रतिवाद करना चाहिए। सरकार की चुप्पी उसे और सन्देह के घेरे में लाएगी।

यह एक सार्वजनिक तथ्य है कि, पेगासस स्पाइवेयर का लाइसेंस अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत मिलता है और इसका  इस्तेमाल आतंकवाद से लड़ने के लिये आतंकी संगठन की खुफिया जानकारियों पर नज़र रख कर उनका संजाल तोड़ने के लिये किया जाता है। पर जासूसी में जो नाम आये हैं, उससे तो यही लगता है कि, सरकार ने नियमों के विरुद्ध जाकर, पत्रकारों, विपक्ष के नेताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ अपने निहित राजनीतिक उद्देश्यों के लिये उनकी जासूसी और निगरानी की है।

यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के जजों की भी निगरानी की बात सामने आ रही है। नियम और शर्तों के उल्लंघन पर पेगासस की कंपनी एनएसओ भारत सरकार से स्पाईवेयर का लाइसेंस रद्द भी कर सकती है। क्योंकि, राजनयिकों और उच्चायोगों की जासूसी अंतरराष्ट्रीय परम्पराओं का उल्लंघन है और एक अपराध भी है। अब वैश्विक बिरादरी, इस खुलासे पर सरकारों के खिलाफ क्या कार्यवाही करती है, यह तो समय आने पर ही पता चलेगा।

सर्विलांस, निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाना, यह सरकार के शासकीय नियमों के अंतर्गत आता है। सरकारें फोन टेप करती हैं, उन्हें सुनती हैं, सर्विलांस पर भी रखती हैं, फिजिकली भी जासूसी कराती हैं, और यह सब सरकार के काम के अंग हैं जो उसकी जानकारी में होते हैं और इनके नियम भी बने हैं। इसीलिए, ऐसी ही खुफिया सूचनाओं और काउंटर इंटेलिजेंस के लिये, इंटेलिजेंस ब्यूरो, रॉ, अभिसूचना विभाग जैसे खुफिया संगठन बनाये गए हैं और इनको इन सब कामों के लिये, अच्छा खासा बजट भी सीक्रेट मनी के नाम पर मिलता है। पर यह जासूसी, या अभिसूचना संकलन, किसी देश विरोधी या आपराधिक गतिविधियों की सूचना पर होती है और यह सरकार के ही बनाये नियमों के अंतर्गत होती है। राज्य हित के लिये की गयी निगरानी और सत्ता में बने रहने के लिये, किये गए निगरानी में अंतर है। इस अंतर के ही परिपेक्ष्य में सरकार को अपनी बात देश के सामने स्पष्टता से रखनी होगी।

जितनी गम्भीरता से आज, जजों, पत्रकारों, विपक्षी नेताओं, की निगरानी की खबरें आ रही हैं, उतनी ही गम्भीरता से यदि पठानकोट एयरबेस, पुलवामा, हाल ही में हुए ड्रोन मामले और जम्मूकश्मीर में सक्रिय पाक समर्थित आतंकी गतिविधियों की खबर रखी गयी होती तो हर घटना के बाद खुफिया विफलता का आरोप नहीं लगता और यह भी हो सकता था कि उन घटनाओं को समय रहते रोक लिया गया होता। अजीब तमाशा है, जहां की खबर रखनी चाहिए, वहां की खबर ही नहीं रखी गयी और रंजन गोगोई पर आरोप लगाने वाली महिला की निगरानी के लिए  पेगासस स्पाइवेयर की ज़रूरत पड़ रही है। यह तो, सामान्य व्यक्ति भी जानता है कि,  पूर्व सीजेआई द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकार, महिला की जासूसी करके आतंकवाद या चीनी घुसपैठ के बारे में कोई जानकारी प्राप्त नहीं की जा सकती है। 

पेगासस जासूसी यदि सरकार ने अपनी जानकारी में देशविरोधी गतिविधियों और आपराधिक कृत्यों के खुलासे के उद्देश्य से किया है तो, उसे यह बात सरकार को संसद में स्वीकार कर लेनी चाहिए। लेकिन, यदि यह जासूसी, खुद को सत्ता बनाये रखने, पत्रकारों, विपक्षी नेताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की ब्लैकमेलिंग और उन्हें डराने के उद्देश्य से की गयी है तो यह एक अपराध है। सरकार को संयुक्त संसदीय समिति गठित कर के इस प्रकरण की जांच करा लेनी चाहिए। जांच से भागने पर कदाचार का सन्देह और अधिक मजबूत ही होगा।

सबसे हैरानी की बात है सुप्रीम कोर्ट के जजों की निगरानी। इसका क्या उद्देश्य है , इसे राफेल और जज लोया से जुड़े मुकदमों के दौरान अदालत के फैसले के अध्ययन से समझा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के जज और सीजेआई पर महिला उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली सुप्रीम  की क्लर्क और उससे जुड़े कुछ लोगों की जासूसी पर सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेकर एक न्यायिक जांच अथवा सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में,  सीबीआई जांच करानी चाहिए।

व्यापक निगरानी” के आरोप, यदि सही हैं, तो यह, निशाने पर आये सभी लोगों की गरिमा, निजता, वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार पर अस्वीकार्य अतिक्रमण है। अगर भारत सरकार ने ऐसा कृत्य किया है, तो यह नागरिकों के साथ  विश्वासघात है।  अगर किसी अन्य विदेशी सरकार ने ऐसा किया है, तो यह भारत और उसके नागरिकों पर साइबर हमला है।  किसी भी तरह, सच्चाई तक पहुंचने और मौलिक अधिकारों के इस उल्लंघन के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराने के लिए एक स्वतंत्र न्यायिक जांच होनी चाहिए। यह प्रवृत्ति, लोकतंत्र के लिए घातक है  कि, राज्य की एजेंसियां ​​​​नागरिकों के जीवन और उनके मौलिक अधिकारों को रौंद सकती हैं। यह लोकतंत्र की मूल अवधारणा के ही विपरीत है। अब बात निकली है तो दूर तक जाएगी।  

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on July 22, 2021 3:21 pm

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