Friday, December 2, 2022

बैंकिंग सेक्टर के लिए घातक है बढ़ता फ्रॉड और ऋण डिफॉल्ट

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एक हैरान करने वाली खबर आई है कि, पिछले सात वर्षों में बैंकिंग धोखाधड़ी या घोटालों में भारत को हर दिन, कम से कम 100 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। हालांकि आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, इसमें शामिल कुल राशि में साल-दर-साल कमी भी आती गई है। लेकिन हर दिन औसतन, 100 करोड़ रुपये का फ्रॉड बैंकों का होता रहा है। 

यह तब है, जब बैंकों का यह दावा है कि, उन्होंने फ्रॉड न हो, इसके लिए सारे जरूरी उपाय कर रखे हैं। यह साइबर ठगी उन लोगों के लिए, बेहद बुरी खबर है जो कंप्यूटर, सिस्टम, डिजिटल बैंकिंग, नेट बैंकिंग आदि शब्दों और तकनीक से उतने परिचित नहीं हैं, जितने की उन्हें होना चाहिए। फ्रॉड की यह संख्या, एक सामान्य बैंकिंग उपभोक्ता को अक्सर भय और आशंका से ग्रस्त रखती है। 

फ्रॉड के सबसे अधिक मामले, देश की वित्तीय राजधानी, कहे जाने वाले शहर मुंबई, महाराष्ट्र से हैं, जहां कुल फ्रॉड का 50 फीसदी धन, इन घपलों में बैंकों को गया है। इसके बाद दिल्ली, तेलंगाना, गुजरात और तमिलनाडु राज्य आते हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि, इन पांच राज्यों में कुल मिलाकर 2 लाख करोड़ रुपये यानी, 83 फीसदी से अधिक की वित्तीय धोखाधड़ी, से नुकसान पहुंचा है। साल 1 अप्रैल 2015 से लेकर गत वर्ष, 31 दिसंबर 2021 के बीच, राज्यों में 2. 5 लाख करोड़ रुपये की बैंकिंग धोखाधड़ी का पता चला है। हालांकि, वित्त मंत्रालय ने यह भी कहा है कि, त्वरित रिपोर्टिंग और रोकथाम के लिए किए गए उपायों से, साल दर साल क्रमशः, धोखाधड़ी की घटनाओं में कमी भी आई है। 

आरबीआई, बैंकिंग धोखाधड़ी को आठ श्रेणियों में वर्गीकृत करता है। वे हैं, 

1. दुर्विनियोजन और आपराधिक विश्वासघात;

2. जाली चेक/दस्तावेजों के माध्यम से धोखाधड़ी से नकदीकरण, 

3. खाते की पुस्तकों में हेरफेर या काल्पनिक खातों के माध्यम से और संपत्ति का रूपांतरण करके,

4. ईनाम या अवैध परितोषण के लिए प्रदान की गई अनधिकृत ऋण सुविधाएं;

5. लापरवाही और नकदी की कमी;

6. धोखाधड़ी और जाल साजी; 

7. विदेशी मुद्रा लेन देन में अनियमितताएं और 

8. किसी अन्य प्रकार की धोखाधड़ी जो ऊपर दिए गए विशिष्ट शीर्षों के अंतर्गत नहीं आती है।

अब इन श्रेणियों में अलग अलग कितना फ्रॉड हुआ है, इसका कोई ब्रेकअप आरबीआई ने उपलब्ध नहीं कराया है।

जितने घपले होते हैं, उनमें भी अधिकांश वे ही घपले हैं, जो बैंकों के आपसी और अंदरूनी प्रशासन से संबंधित हैं। नेत्रिका कंसल्टिंग, जो बैंकिंग मामलों में एक कंसलटेंसी एजेंसी है, के प्रबंध निदेशक संजय कौशिक, जिनके ग्राहकों में, बैंक भी शामिल हैं, ने बैंकिंग फ्रॉड के स्वरूप पर टिप्पणी करते हुए कहा है, ‘बैंक धोखाधड़ी रोकने के लिए जितना उपभोक्ताओं और खाता धारकों को सचेत करते हैं, उतनी सतर्कता वे अपने अंदरूनी प्रशासनिक तंत्र पर नजर रखने में नहीं ध्यान देते हैं। जबकि बड़े घपले, कर्ज, देने के की गई औपचारिकताओं, और लापरवाही के कारण होते हैं। खासकर बड़े अग्रिम और ऋण से निपटने के दौरान बैंक, अक्सर उतने सतर्क नहीं रहते हैं, जितने वे छोटे और वेतनभोगी लोगों को कर्ज देने में रहते हैं। आंकड़े बताते हैं कि, बड़े कर्ज, डूबते भी हैं और उनके द्वारा हुए घपलों की राशि भी बड़ी होती है।  

संजय कौशिक यह भी कहते हैं, “बैंकों में, एक ऐसी प्रक्रिया होनी चाहिए जो जिम्मेदारी तय करे और ऐसे ऋणों को मंजूरी देने वालों को जवाबदेह बनाने की जरूरत है, क्योंकि इनमें धोखाधड़ी की बहुत संभावनाएं रहती हैं क्योंकि बड़े अग्रिम या ऋण, बिना जमानत के भी केवल नाम और ब्रांड पर भी प्रदान किए गए हैं।” बिजनेस इनसाइडर की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक बहुराष्ट्रीय बैंक के वरिष्ठ प्रबंधक, विकास गंगा धरन ने कहा है कि, “जिन मामलों में बैंकों के पास कोलैटरल रखे गए थे, वहां भी उनका कोई उचित जोखिम मूल्यांकन नहीं किया गया था।”

कोलैटरल वह संपत्ति होती है, जिसे कर्ज देते समय बैंक, गारंटी के रूप में रखता है और कर्ज की अदायगी न होने पर वह उस संपत्ति को बेच कर अपना कर्ज पूरा करता है। विकास गंगाधरन, इसी बिंदु को स्पष्ट कर रहे हैं कि ‘अक्सर बैंक, ऐसे कोलैटरल का उचित जोखिम मूल्यांकन नहीं करते हैं और जब उस कोलैटरल का जोखिम मूल्य, दिए गए कर्ज से कम होता है तो, कर्ज डूबने या डिफॉल्ट होने पर, सारा नुकसान बैंक को झेलना पड़ता है।’ इस घपले का कारण बैंक का अंदरूनी प्रशासन है न कि कोई साइबर ठग। आरबीआई के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है कि वह यह बता सके कि कोलैटरल घपले में कितने बैंकों ने अपने अधिकारियों के खिलाफ ऐसे मामलों में दंडात्मक कार्यवाही की, जिन्होंने ऋण देने में कोलैटरल संपत्तियों के जोखिम मूल्यांकन में जान बूझकर घपला किया है।

बिजनेस इनसाइडर के अनुसार, विकास गंगाधरन, ने अमेरिकी बैंकिंग सिस्टम में कर्ज देने वाली प्रक्रिया के बारे में बताया कि, ‘अमेरिकी बैंकों में, उदाहरण के लिए, ऋण या अग्रिम का जोखिम मूल्यांकन नियमित रूप से, कुछ मामलों में हर दिन किया जाता है। भारतीय बैंकों में ऐसा नहीं होता है और मुझे लगता है कि इसके लिए, नियमित रूप से, एक सेल गठित कर के,  कुछ महत्वपूर्ण कर्ज या कर्जदारों को चिह्नित करके, ऐसे तंत्र विकसित किए जाने चाहिए।’ 

यदि अमेरिकी बैंकिंग सिस्टम की तर्ज पर, नियमित जोखिम मूल्यांकन का कोई तंत्र भारतीय बैंकों में विकसित हो जाय तो इससे, यदि जो कुछ भी, गारंटी के रूप में कोलैटरल रख कर कर्ज लिया गया है और फिर जानबूझकर उसे चुकाने में आनाकानी यदि की गई है, तो बैंक के एनपीए भी कम होंगे और फिर उस कोलैटरल को बेच कर बैंक अपना ऋण वसूल भी सकता है। 

ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कन्फेडरेशन के पूर्व अध्यक्ष वाई सुदर्शन ने, बढ़ते फ्रॉड पर यह भी कहा है कि, ‘हालांकि, धोखाधड़ी की दर में गिरावट आ रही है, क्योंकि वित्तीय कदाचार में लिप्त लोगों को दंडित तो किया ही जा रहा है, साथ ही, इसे रोकने के लिए भी बहुत सारे उपाय किए जा रहे हैं।’ वित्त मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, “एनपीए के पुराने स्टॉक सहित बेहतर पहचान और रिपोर्टिंग, धोखाधड़ी की जांच के लिए उठाए गए व्यापक कदमों के परिणामस्वरूप घटनाओं में तेज गिरावट आई है।” साल, 2015-16 में 67,760 करोड़ रुपये से, धोखाधड़ी में खोए गए धन की मात्रा 2016-17 में घटकर 59,966.4 करोड़ रुपये हो गई। इसके बाद के दो साल 45,000 करोड़ रुपये से कम रहे।  2019-20 में, यह संख्या और गिरकर 27,698.4 करोड़ रुपये और फिर 2020-21 में 10,699.9 करोड़ रुपये हो गई। चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में यह राशि 647.9 करोड़ रुपये है।

भारतीय स्टेट बैंक, (एसबीआई) ने एक बार फिर उन कर्जदारों के नाम, सार्वजनिक, करने से इनकार कर दिया, जिन पर 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक का कर्ज है, यहां तक कि अपने शेयरधारक के साथ भी, उसने यह सूचना साझा करने से मना कर दिया। पिछले नौ वर्षों, वित्तीय वर्ष, 2013-14 से 2021-22 तक, SBI ने बड़े डिफॉल्टरों के 145,248 करोड़ रुपये से अधिक के खराब ऋणों को बट्टे खाते में डाल दिया है, जबकि उनसे केवल 13% से अधिक की वसूली ही हो पाई  है। एसबीआई, इस गोपनीयता पर, एक  सामाजिक कार्यकर्ता और शेयरधारक विवेक वेलंकर से, डिफॉल्टर्स के नाम सार्वजनिक करने पर कहा कि,  “ग्राहक डेटा की गोपनीयता बनाए रखने के लिए बैंक वैधानिक और नियामक दायित्वों के अधीन है, इसलिए मांगी गई जानकारी का खुलासा नहीं किया जा सकता है।”

एसबीआई और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) द्वारा जानकारी साझा करने से इनकार करना आश्चर्यजनक है क्योंकि जब छोटे उधारकर्ताओं की बात आती है तो उन्हें गोपनीयता की कोई समस्या नहीं होती है। सभी ऋणदाता नियमित रूप से समाचार पत्रों में व्यक्तिगत विवरण और चूक करने वाले छोटे उधारकर्ताओं की तस्वीरों के साथ वसूली विज्ञापन प्रकाशित करते हैं। बड़े कर्जदारों या बड़े डिफॉल्टरों को तरह-तरह के बहाने से सुरक्षा दिया जाना चौंकाने वाला है।

विवेक वेलंकर सहित अन्य कई लोगों ने बड़े डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत कई आवेदन दायर किए हैं। लेकिन, अब तक बैंकों ने ‘ग्राहक डेटा की गोपनीयता’ का हवाला देते हुए बड़े डिफॉल्टरों के नाम साझा करने से इनकार कर दिया है। हो सकता है कि गोपनीयता का प्रावधान, केवल बड़े डिफॉल्टरों के लिए लागू हो, न कि छोटे उधारकर्ताओं के लिए, जिनके विवरण और तस्वीरें वसूली नोटिस के साथ समाचार पत्रों में दिखाई देती रहती हैं।

2020 में बड़े डिफॉल्टरों के नामों की सूची प्राप्त करने में विफल रहने के बाद, वेलंकर ने एसबीआई की वार्षिक आम बैठक, से ठीक पहले इसकी जानकारी मांगी। उस समय, एसबीआई ने कुछ बड़े डिफॉल्टरों, आलोक इंडस्ट्रीज लिमिटेड, भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड, आईआरवीसीएल लिमिटेड और वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज लिमिटेड के नाम साझा किए थे। हालाँकि, 2021 में, भी एसबीआई, ने बड़े डिफॉल्टरों के नाम अपने स्वयं के शेयरधारक के साथ साझा करने से इनकार कर दिया। एक जवाब में, सहायक महाप्रबंधक और एसबीआई के कंपनी सचिव, शाम के ने, वेलंकर को बताया,

“चूंकि बैंक ग्राहक डेटा की गोपनीयता बनाए रखने के लिए वैधानिक और नियामक दायित्वों के तहत है, बैंक खाते को साझा करने की स्थिति में नहीं है या ग्राहक-विशिष्ट जानकारी।”  

यह, एसबीआई के वही अधिकारी हैं जिन्होंने इस साल भी बड़े डिफॉल्टरों की सूची साझा करने से इनकार कर दिया है।  इसके अलावा, शाम के ने 2013 से बैंक द्वारा 1 करोड़ रुपये और उससे कम के ऋण और वसूली के बारे में जानकारी देने से भी इनकार कर दिया। उन्होंने एक लिखित उत्तर में वेलंकर को बताया, “बैंक द्वारा जानकारी को केंद्रीय रूप से एकत्रित और रखरखाव नहीं किया जाता है।”

इस प्रकार उपरोक्त आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि, असल समस्या बैंकिंग नीति और अंदरूनी प्रशासन में है और घपले भी, कर्ज स्वीकृति, कोलैटरल मूल्यांकन, एनपीए या फिर डिफॉल्ट कर्जों में अधिक हुए हैं, और यह सब भी बड़े कर्जदारों के साथ अधिक हुआ है न कि, अपनी निजी जरूरतों, आवास, कार, शिक्षा आदि के लिए कर्ज लेने वाले, सामान्य नागरिक द्वारा लिए जाने वाले कर्जों में। 

अब एक नजर इस बिंदु पर डालते हैं कि बैंक कैसे अपने बड़े डिफाल्टरों का बचाव करते हैं। मीडिया की एक खबर के अनुसार, भारतीय स्टेट बैंक, एसबीआई ने एक बार फिर से, उन कर्जदारों के नाम, सार्वजनिक, करने से इनकार कर दिया, जिन पर 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक का कर्ज है, यहां तक कि अपने शेयरधारक के साथ भी, उसने यह सूचना साझा करने से मना कर दिया।  

पिछले नौ वर्षों, वित्तीय वर्ष, 2013-14 से 2021-22 तक, SBI ने बड़े डिफॉल्टरों के 145,248 करोड़ रुपये से अधिक के खराब ऋणों को बट्टे खाते में डाल दिया है, जबकि उनसे केवल 13% से अधिक की वसूली ही हो पाई  है। एक  सामाजिक कार्यकर्ता और शेयरधारक विवेक वेलंकर ने जब एसबीआई से, बड़े डिफॉल्टर्स के नाम सार्वजनिक करने के लिए कहा तो, एसबीआई ने इस अजीबोगरीब गोपनीयता पर यह उत्तर दिया कि, “ग्राहक डेटा की गोपनीयता बनाए रखने के लिए बैंक वैधानिक और नियामक दायित्वों के अधीन हैं, इसलिए मांगी गई जानकारी का खुलासा नहीं किया जा सकता है।” यानी बैंक ग्राहकों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए संकल्पित हैं और उसे इस संकल्प से कोई डिगा नहीं सकता है। कमाल है। 

एसबीआई और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा, ऐसी जानकारी साझा करने से इनकार करना आश्चर्यजनक है, क्योंकि जब छोटे उधारकर्ताओं या डिफाल्टर्स की बात आती है तो, यही बैंक गोपनीयता का संकल्प भूल जाते हैं, यही गोपनीयता, उनके लिए, कोई समस्या नहीं होती है। सभी बैंक छोटे धनराशि के डिफाल्टर्स की, नियमित रूप से समाचार पत्रों में व्यक्तिगत विवरण और तस्वीरों के साथ वसूली विज्ञापन प्रकाशित करते हैं जबकि, बड़े कर्जदारों या बड़े डिफॉल्टरों को तरह-तरह के बहाने से सुरक्षा दी जाती है। 

विवेक वेलंकर सहित अन्य कई लोगों ने बड़े डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत कई आवेदन दायर किए हैं।  लेकिन, अब तक बैंकों ने ‘ग्राहक डेटा की गोपनीयता’ का हवाला देते हुए बड़े डिफॉल्टरों के नाम साझा करने से इनकार कर दिया है। हो सकता है कि गोपनीयता का प्रावधान, केवल बड़े डिफॉल्टरों के लिए लागू हो, न कि छोटे उधारकर्ताओं के लिए, जिनके विवरण और तस्वीरें वसूली नोटिस के साथ समाचार पत्रों में दिखाई देती रहती हैं।

2020 में बड़े डिफॉल्टरों के नामों की सूची प्राप्त करने में विफल रहने के बाद, श्री वेलंकर ने एसबीआई की वार्षिक आम बैठक, से ठीक पहले इसकी जानकारी मांगी। उस समय, एसबीआई ने कुछ बड़े डिफॉल्टरों, आलोक इंडस्ट्रीज लिमिटेड, भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड, आईआरवीसीएल लिमिटेड और वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज लिमिटेड के नाम साझा किए थे। हालाँकि, 2021 में, भी एसबीआई, ने बड़े डिफॉल्टरों के नाम अपने स्वयं के शेयरधारक के साथ साझा करने से इनकार कर दिया। एक जवाब में, सहायक महाप्रबंधक और एसबीआई के कंपनी सचिव, शाम के ने, वेलंकर को बताया,

“चूंकि बैंक ग्राहक डेटा की गोपनीयता बनाए रखने के लिए वैधानिक और नियामक दायित्वों के तहत है, बैंक खाते को साझा करने की स्थिति में नहीं है या ग्राहक-विशिष्ट जानकारी।”  

यह, एसबीआई के वही अधिकारी हैं जिन्होंने इस साल भी बड़े डिफॉल्टरों की सूची साझा करने से इनकार कर दिया है। इसके अलावा, शाम के ने 2013 से बैंक द्वारा 1 करोड़ रुपये और उससे कम के ऋण और वसूली के बारे में जानकारी देने से भी इनकार कर दिया। उन्होंने एक लिखित उत्तर में वेलंकर को बताया, “बैंक द्वारा जानकारी को केंद्रीय रूप से एकत्रित और रखरखाव नहीं किया जाता है।”

बैंकिंग सेक्टर के सामने यह दो बड़ी चुनौतियां हैं, जिनसे पार नहीं पाया गया तो, बैंकिंग सेक्टर को तबाह होने से रोकना मुश्किल है। केंद्रीय बैंक और समस्त बैंकों का नियामक होने के नाते रिजर्व बैंक की यह जिम्मेदारी है कि वह बैंकिंग सेक्टर में व्याप्त इन दो बड़ी समस्याओं का समाधान करे। बैंकों को यदि लाभ भी बड़े कर्जदार और खाता धारक पहुंचाते हैं तो, उनका सबसे अधिक नुकसान भी यही उनके कर्ज डकार कर वे कर देते हैं। वित्तीय प्रबंधन किसी भी सरकार का मूल है, पर जिस तरह से वित्त के लगभग सभी क्षेत्रों में सरकार दिन प्रतिदिन विफल हो रही है, उससे तो अशनि संकेत ही दिख रहा है।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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