Fri. Apr 10th, 2020

देश में कहीं वसंत का वज्रनाद न फूट पड़े

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शाहीन बाग में महिलाओं का प्रदर्शन।

जब शाहीन बाग़ में पहले दिन धरना शुरू हुआ था, तभी मुझे अंदर से अहसास हो गया था कि हो न हो यह एक मिसाल बनने जा रहा है। बाद में Nikhil Walia ने जब कहा कि भारत बंद के दिन तो हर जगह पानी बरस रहा है, चलिए शाहीन बाग़ होकर आते हैं, तो मैं तैयार हो गया। वहीँ पर निखिल के 4 प्रवासी दोस्तों से भी मिलने का मौका मिला। सभी 30-32 की उम्र के थे। मुझसे अधिक जीवन में सफल और हेलेंसिकी और फ़िनलैंड में सेटल। लेकिन अपनी सालाना क्रिसमस की छुट्टियों को वे जामिया और शाहीन बाग़ में चल रहे आँदोलनों के बीच क्यों बिता रहे थे? यह नहीं पूछ सका। लेकिन लगा कि वे लोग इसके जरिये खुद को revisit कर रहे थे। निखिल के लिए तो शायद यह रूटीन हो चुका है।

शादी के लिए पूछा तो बोहेमियन हँसी के साथ टाल दिया। यह यायावरी बड़ी मुश्किल से मिलती है। बहरहाल मुद्दे पर आता हूँ। क्यों शाहीन बाग़ आज देश में हर जगह दिखाई पड़ रहा है? उसके क्या मायने हैं? सरकार इससे आज क्यों बुरी तरह भयभीत है? लाखों के जुलूस अब नहीं दिखाई पड़ रहे हैं, लेकिन हर जिले में एक शाहीन बाग़ दिखने लगे हैं। जहाँ बुर्कानशीं महिलाओं के साथ साथ बूढ़ी महिलाओं, बेपर्दा महिलाओं और बच्चियों के साथ एक नए भारत की इबारत लिखी जा रही है। आज के दिन तो दिल्ली के शाहीन बाग़ से अधिक रौनक लखनऊ में दिखाई पड़ रही है। और मुख्य चिंता सरकार की भी यही है, कि लड़ें तो किससे लड़ें? पुलिस वालों को यूपी में तैनात भी किया डराने धमकाने के लिए। लेकिन जब रोज रोज खाकी वर्दी का सामना किसी चारदीवारी में बंद महिला से होने लगता है, नारे लगाने और समाज से खुलकर बहस मुबाहिसा होना शुरू होने लगता है, तो एक अंदर की धड़क भी खुलती जा रही है।

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पुलिस भी बेचैन और उनके हुक्मरान को तो मानों नींद ही गायब हो चुकी है। जब इन सर्द रातों में यह हाल है, जब सीएए जिसमें सिर्फ तीन देशों से नागरिक बनाने में यह हाल है तो जब मौसम खुशगवार हो जाएगा, साथ में एनपीआर घर-घर कराने की मुहिम शुरू होगी, तो कहीं वसंत का वज्रनाद ही न फूट पड़े। सबसे अधिक दिक्कत तो इस बात की है कि हिन्दुओं के जत्थे भी इसमें पहले कौतूहल वश जा रहे हैं, फिर इनके साथ ही हो जा रहे हैं। साथ ही ईसाई और सिख समाज में जिस तरह से इसको लेकर बैचेनी बढ़ी है, वह कहीं पूरे सिस्टम की ही धज्जियाँ न उड़ा दे। आज तो स्थापित नेताओं और दलों के भी नारे और भाषण देकर गले सूख चुके हैं। ओवैशी तक की आवाज को देश के उस समुदाय की सबसे पीछे रहने वाली महिलाओं ने पीछे कर दिया है, जिनके बारे में मान लिया गया था कि उनका काम शौहर को खुश रखना और बच्चे पैदा करना मात्र था। यह क्रांति समाज के भीतर हो रही है, तो बाकी समाज का भी उसके साथ मेल-जोल बढ़ रहा है।

वे हैरत में हैं, कि मुस्लिम महिलाएं भी वैसी ही हैं, उनके जज्बात भी उनकी ही तरह लोकतांत्रिक हैं, बच्चियों को तो राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान रटे हैं, और उन्हें भारत माता की जय तक कहने में कोई गुरेज नहीं। फिर ये whatsapp और मीडिया में अफवाह और घृणा फैलाने का कारोबार कैसे चलेगा? 500 रूपये में शाहीन बाग़ में महिलाओं के धरने पर बैठने की हवा भी झट वहाँ की महिलाओं ने निकाल दी, और पता चला कि बीजेपी के बड़े साइबर सेल नेता ही बाद में मुंह दिखाने लायक नहीं रहे। फिर भी उन्होंने इस अफवाह को अपने मुंडी कटे लोगों तक पहुँचा ही दिया, लेकिन लगातार डटी महिलाओं की दृढ़ता ने मामले की तह में जाने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को मजबूर किया है। जिसके कारण कई लोगों की मान्यताएं टूट रही हैं। और यह स्थापित सरकार के लिए बेचैनी और निराशा का सबब है। इसके व्यापक प्रभाव बाद में समाज पर पड़ने निश्चित हैं। जितना खतरा वर्तमान सरकार को है, उससे कई गुना अधिक मौलवी और फतवेबाजों को पड़ने वाला है।

उनके तो अस्तित्व को ही खतरा होने जा रहा है, इस बात को बुखारी जैसे नेता अच्छी तरह से समझ रहे हैं। शायद गांधी ने आजादी के समय असहयोग आन्दोलन का जो बीड़ा उठाया था, उसके बाद पहली बार भारत में भारत के सबसे कमजोर तबके, महिलाओं ने यह बीड़ा अपने सिर लिया है। वे आज आजादी सरकार से माँग रही हैं, लेकिन यह आजादी का नारा गहराई से समाज के अंदर फैली पितृसत्ता से, खापों से, बुद्धि के गिरवी रखे जाने से होने जा रहा है, जिसके बारे में सोच-सोच कर व्यवस्था, मनुवाद सबकी खाट खड़ी है। शायद इसीलिए वह अपने उसी मर्दवादी नारे के साथ पुरुषों को रजाई में छिपे होने की चुनौती दे रहा है, उसकी खिल्ली उड़ा रहा है। क्योंकि वह खुद बेहद डर गया है। उसका वश चले तो वह इन लाखों महिलाओं को भी पुरुषों की तरह ही यातनाएं दे दे। लेकिन ऐसा करते ही चारों ओर से उसके असली चेहरे की शिनाख्त हो जाने वाली है, यत्र नारी पूज्यन्ते के उसके खुद के उद्घोष के चादर के फटते ही, उसे गद्दी से कूड़ेदान में फेंकने के लिए 130 करोड़ लोग खड़े हो सकते हैं।
(रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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