बीच बहस

हिंदू-मुस्लिमों के बीच बनाई खाई का पुल बनता किसान आंदोलन

किसान नेता राकेश टिकैत की भावुक अपील का वृहत्तर पैमाने पर और विशेष रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जबरदस्त असर हुआ। पश्चिमी यूपी के जाट समुदाय ने उनकी अपील को जाट समुदाय के स्वाभिमान से जोड़ते हुए टिकैत के समर्थन में रातों रात एकजुटता का प्रदर्शन किया। उससे केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के होश उड़ गए। भाजपा के नेताओं और नीतिकारों को कतई इस परिणाम का अंदेशा नहीं रहा होगा कि उनके एक विधायक का सत्ता मद में चूर भोंडा और भद्दा व्यवहार पूरी पार्टी और सरकार के लिए इतना भारी पड़ जाएगा।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंदू ही नहीं मुस्लिम किसानों की भी एक बहुत बड़ी आबादी है। इस बात पर गौर करना ज़रूरी है कि 2013 के मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद, मेरठ, मुज़फ़्फ़रनगर और कुछ अन्य पश्चिमी जिलों के किसानों का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हो गया था, जिसके चलते हिंदू किसान कट्टर हिंदुत्ववादी भारतीय जनता पार्टी के प्रबल समर्थक बन गए थे। इन दंगों के बाद पूरे समाज में सांप्रदायिक विभाजन की एक गहरी खाई निर्मित हो गई थी, जिसका प्रभाव किसानों पर भी पड़ा था और किसान लंबे समय से एकजुट नहीं हो पा रहे थे। केंद्र की विनाशकारी नीतियों के चलते जो नुकसान गरीबों और किसानों का हो रहा है, उससे मद्धम गति से ही सही मगर सबको धीरे-धीरे अपने नुकसान का एहसास हो रहा है।

सवाल ये है कि किसान आंदोलन समाज में सांप्रदायिक विभाजन की गहरी खाई को पाटने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है? हाल की घटनाओं पर नजर डालें तो यह कहा जा सकता है कि यह आंदोलन समाज में फैलाई जा रही सांप्रदायिक वैमनस्यता के खिलाफ स्वस्फूर्त एकजुट होता साफ नजर आ रहा है, जो निश्चित रूप से सत्तारूढ़ भाजपा के लिए ख़तरे की घंटी है।

किसान आंदोलन के दौरान हो रही पंचायतों में तमाम धर्म, जाति समुदाय और वर्ग से लोग बड़ी तादात में उमड़ रहे हैं। इन पंचायतों में हिंदुओं और मुसलमानों को एहसास हो रहा है कि किसान, चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान, को अपनी कृषि उपज के लिए पर्याप्त पारिश्रमिक नहीं मिल पाना और सामाजिक आर्थिक पिछड़ापन ही सबसे प्रमुख और साझा समस्या है। इसी के चलते पूरे यूपी के हिंदुओं और मुसलमानों को एहसास हो रहा है कि उन्हें साजिशन एक-दूसरे के विरुद्ध दुश्मन की तरह खड़ा कर दिया गया था।

हमारे देश में अंग्रेजों के समय से ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति सफलतापूर्वक आजमाई जाती रही है। शासक हमेशा अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए व्यापक स्तर पर हिंदू–मुसलिम और अन्य समुदायों के बीच नफरत कायम रखने के उद्देश्य से झूठ और अफवाह का सहारा लेता रहता है। सरकार की फूट डालो और राज करो की नीति के चलते सभी वर्ग और समुदाय के किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह नीति तात्कालिक सत्तासुख तो प्रदान कर सकती है, मगर लंबे समय तक आमजन इसके प्रभाव में नहीं रह पाता, मगर यह सब जानते हैं कि काठ की हांडी ज्यादा दिन नहीं चल सकती।

किसान, चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान, को अपनी कृषि उपज के लिए पर्याप्त पारिश्रमिक नहीं मिलने की समस्या है और एकजुट होकर संघर्ष करने से ही उनकी मांग पूरी हो सकती है। अब किसान समझ रहा है कि अपनी समस्याओं और जमीनी चुनौतियों  से निपटने के लिए एकजुट होकर संघर्ष ही एकमात्र रास्ता रह गया है। संभवतः इसी के कारण अब ये हिंदू और मुस्लिम का झगड़ा भुला कर आपसी मतभेद भुला कर सभी किसान नेता राकेश टिकैत के साथ किसान आंदोलन में एकजुट होकर केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ दृढ़ता से खड़े हो गए हैं।

भाजपा के लिए किसानों और विशेष रूप से जाटों का खिलाफ हो जाना चिंता का सबब है। भाजपा की सत्तापरक राजनीति का प्रमुख जरिया फूट, झूठ और नफरत की राजनीति ही रहा है। इस विघटनकारी नीति की राह में किसान आंदोलन एक बड़ा रोड़ा साबित हो रहा है। निश्चित रूप से भाजपा के लिए यह चिंता की बात है।

गौरतलब है कि अगले साल उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं। जिस तरह किसानों को लेकर टिकैत टिक गए हैं, उससे समस्त उत्तर प्रदेश की राजनीति में जबरदस्त उलटफेर की संभावना प्रबल होती जा रही है जो निश्चित रूप से भाजपा और विशेष रूप से वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए चिंता का कारण है। एक संभावना यह भी जाहिर की जा रही है कि राम मंदिर निर्माण और अपने उग्र तेवर के चलते योगी भाजपा में अपनी पैठ मजबूत करते जा रहे हैं जो केंद्र में बैठे हालिया कद्दावर कहे जाने वाले नेताओं को रास नहीं आ रहा है। यह आशंका कमजोर हो सकती है, मगर निर्मूल तो नहीं ही कही जा सकती।

तार, बाड़ और लताड़ की तमाम कोशिशों के बावजूद किसान आंदोलन लगातार व्यापक और मजबूत होता जा रहा है। इस आंदोलन को भाजपा की ट्रोल आर्मी के विषेले दुष्प्रचार के बावजूद आम जन का समर्थन बढ़ता ही जा रहा है। हालिया बजट में किसानों के साथ ही भाजपा की रीढ़ माने जाने वाले मध्य वर्ग की उपेक्षा से एक बड़ा वर्ग नाराज हो गया है, जिसके चलते सोशल मीडिया पर अब इन ट्रोल की संख्या में लगातार कमी महसूस की जा रही है। यह भी भाजपा के लिए खतरे की घंटी है।

हालांकि प्रतिबद्ध और कट्टर ट्रोल आर्मी के तेवर और जहरीली भाषा में कोई कमी नहीं आई है, मगर केंद्र सरकार की घोर अलोकतांत्रिक और दमनकारी नीतियों के खिलाफ अब किसानों के प्रति सभी वर्गों की सहानुभूति और समर्थन लगातार बढ़ता जा रहा है। केंद्र सरकार के लिए बेहतर यही है कि वो अपने अड़ियल और जिद्दी रवैये पर पुनर्विचार करे, तभी वह अपनी पार्टी और सरकार की गिरती साख को कुछ हद तक संभाल सकती है।

(जीवेश चौबे कानपुर से प्रकाशित वैचारिक पत्रिका अकार में उप संपादक हैं। कवि, कथाकार एवं समसामयिक मुद्दों पर लगातार लिखते रहते हैं।)

This post was last modified on February 4, 2021 3:39 pm

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