Sunday, June 26, 2022

लोगों की पहुंच से बाहर क्यों हो गए आम?

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प्रयागराज। मई बीत गया है। कल एक रिश्तेदार आये। मिठाई की जगह एक किलो आम ले आये। तो उनकी बदौलत इस सीजन में पहली बार आम खाने को मिला। ये कथन है निम्न-मध्यमवर्गीय समाज से ताल्लुक़ रखने वाले एक परिवार का। तो क्या वाकई आम इतना खास हो गया है कि वो आम-जन की पहुंच से दूर हो गया है। आखिर कहां खो गया चौसा और दशहरी। देशी आम, सीकर, लंगड़ा, सफेदा, मलीहाबादी और फ़ज़ली कहां चले गये। ये पता करने के लिये हम आम लोगों के बीच गये।

आम बात, आम लोग, आमफ़हमी, दरबार-ए आम जैसे शब्द युग्म आम से जुड़कर बना है। जो आम हिंदी अवधी, उर्दू फ़ारसी समाज में ‘कॉमन’ को प्रकट करने के लिये आधार बना वही कैसे ख़ास हो गया। एक आम मत है कि लोग पके आम खाकर गुठली कहीं भी फेंक देते और बारिश में वो उगता और कुछ वर्षों में पेड़ बन फल देने लगता। इस तरह एक तो वो बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के हमारे भौगोलिक स्थिति में उग जाता और फलने-फूलने लगता। दूसरा वो सर्वसुलभ था। जिसके पास आम के पेड़ आम की बगिया न भी हो, पैसे न भी होते वो भी कच्चे आमों के नुन्चा, खटाई, चटनी, मुरब्बा, बना लेता और हर तरह के पके आम के स्वादों से मरहूम न रहता।

कुंजलाल भारतीया आमों के जरिये सार्वजनिक वितरण और नैतिकता का संबंध स्थापित करते हुये कहते हैं कि “आम इतना आम था कि आमों के चोर नहीं होते थे। राजकीय राजमार्ग के दोनों ओर आम और महुआ के ही पेड़ थे। जो सक्षम लोग थे, जिनके पास खुद के आम के पेड़ बगीचे थे वो सड़क किनारे के सार्वजनिक पेड़ों से आम नहीं तोड़ते थे। जिनके पास अपनी जगह ज़मीन पेड़ रुख नहीं थे वो लोग सड़क किनारे लगे आम के पेड़ों से आम तोड़कर ले जाते थे और सालभर गृहस्थी की चीजें बनाकर संजोते थे। उन आमों का पाल डालते थे। और पूरा परिवार पक्का आम खाते थे। यहां तक कि कुछ आम जो बहुत ऊंचाई पर होते थे उन्हें सीकर खाने के लिये छोड़ देते थे”।

नरई गांव के लद्धन बताते हैं कि इलाहाबाद से जौनपुर होते हुये गोरखपुर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों ओर आमों के बहुत मोटे-मोटे पेड़ थे। लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार ने राजमार्ग को चौड़ा करने के लिये सड़क के दोनों किनारे स्थित पचासों साल पुराने आम के लाखों पेड़ों को कटवा दिया। जिसके चलते आम साधारण जनों की पहुंच से दूर होता चला गया।     

कभी बड़े लोगों की आम की बग़िया की निग़हबानी करने वाली राजवंती आंखों में बग़ीचों के ओझल अतीत लिये कहती हैं- मेरे इलाके में सुकुल की बगिया, बनरहिया बाग, मशहूर थी आमों के लिये। कई-कई एकड़ में थी ये बागें। लेकिन सब अलोप हो गईं। इलाके में सारी आम की बगिया एक साथ सूख गईं। जो छिट-पुट पेड़ थे आमों के वह भी सूख गये। पता नहीं क्या हवा चली, सब सपन हो गये।

राजगीरी (निर्माण मिस्त्री) का काम करने वाले राम लखन अपने पोते का चेहरा आंखों में लिये कहते हैं- आम के लिये बहुत मचलता है। डेढ़ सौ रुपये में एक किलो एक दिन ले आया था। कोई स्वाद नहीं था उन आमों में। अब वो फिर कह रहा है बाबा आम बेसै (ख़रीद) दो। पोते से ये भी नहीं कह पाता कि आम ख़रीदना तेरे बबा की औकात से बाहर हो गया है। कृषि और निर्माण कार्य क्षेत्र में फावड़ा चलाने का काम करने वाले राजेश पटेल बताते हैं कि मई की शुरुआत में एक किलो आम ले आया था 150 रुपये में। कुल पांच आम चढ़े थे। एक समूचा आम इकलौते बेटे के खाने के लिये छोड़कर। बाक़ी चार आमों की छोटी छोटी फांकियां काटकर प्रसाद की तरह पूरे परिवार में बांट दिया था। तब से मेरे परिवार में आम नहीं आया है, बस शौक पूरा कर लिया। अम्मा कह रही थी इस सीजन एक भी दिन पना-पूड़ी नहीं खाई। सीजन बीतने से पहले एक बार और आम ले आना है। सोच रहा हूं गंगा दशहरा के दिन एक किलो आम ले लूं तो सब लोग पना-पूड़ी खाकर अगले सीजन के लिये आम को विदा दे दें।

इलाहाबाद शहर में फुटपाथ पर आम सजाये बैठा एक विक्रेता पूछने पर बताता है कि आम 150 रुपये किलो है। इतना महंगा क्यों है आम, पूछने पर वो कहता है ये मैं कैसे बता सकता हूं कि महंगा क्यों है। क्या आंधी-बारिश से आम की पैदावार प्रभावित हुई है। रामबरन यादव कहते हैं आंधी पानी। आंधी दो दिन आई वो भी अब बारिश तो पिछले छः महीने से हुई ही नहीं। पहले बहुत आंधी, दउंगरा आते थे अब तो आंधी आती ही नहीं। तब बहुत आम झर जाते थे बावजूद इसके आमों कि कभी किल्लत नहीं होती थी, न ही आम कभी इतने महंगे होते थे। तो ये बहाना नहीं बनाया जा सकता कि आम के बौर -टिकोरे आंधी में झर गये इस वजह से आम इतना महंगा है।

इस बात में कोई शक़ नहीं है कि आमों के जो अव्यवसायिक पेड़ और बाग बगीचे थे वो या तो खत्म हो गये या फिर संस्थाओं द्वारा जानबूझकर खत्म कर दिये गये। राधे श्याम मिश्रा बताते हैं कि घर के सामने पांच बिस्सा बगिया है। उसमें कई बार आम की विभिन्न प्रजातियों के पौधे लाकर लगाये। उनकी फेंसिंग और खाद-पानी की व्यवस्था की। लेकिन कुछ दिनों बाद वो अपने आप सूख गये। दोबारा गड्ढे खोदकर उनमें दूसरी जगह से मिट्टी लाकर डालकर आम का पौधा लगाया बावजूद इसके वो नहीं तैयार हो पाया। जबकि पिछले 15 सालों में सबसे ज़्यादा आम के पौधे ही सूखे हैं।

ये शादी विवाह, तिलक व दूसरे धार्मिक अनुष्ठानों का मौसम है। पुरोहित लोग तमाम अनुष्ठानों व पूजा आदि में फल चढ़वाते हैं। शादियों में भी फल चढ़ाव में ले जाया जाता है। लगभग रोज ही कोई न कोई अनुष्ठान या शादी विवाह, तिलक आदि संपन्न करवाने वाले पंडित सुरेश मिश्रा बताते हैं कि आजकल चढ़ाव में जो फल चढ़ाये जा रहे हैं वहां आम लगभग नदारद है। बहुत कम लोग आम चढ़ा रहे हैं। जो चढ़ा भी रहे हैं वो बस एक या दो आम।

लखनऊ, वाराणसी, प्रतापगढ़ के कुंडा, कालाकांकर, फ़ैजाबाद, सहारनपुर, उन्नाव, सीतापुर, हरदोई, बाराबंकी, अमरोहा, बुलंदशहर उत्तर प्रदेश के प्रमुख आम उत्पादक जिले हैं। जहां आमों का व्यवसायिक उत्पादन होता है। तो यहां पैदा होने वाले आम कहां गये वो बाज़ार में क्यों नहीं आ रहे। क्या माज़ा, फ्रूटी और स्लाइस बनाने वाली कंपनियों ने ब़ाजार से ग़ायब कर दिये हैं आम। गौरतलब है कि कोकाकोला कंपनी अपने ‘माजा’, पारले कंपनी ‘फ्रूटी’ और पेप्सी कंपनी ‘स्लाइस’ के लिये आमों की ख़रीद करती हैं। फिलहाल देश के 40 प्रतिशत बाज़ार पर माजा का, और 25-25 प्रतिशत बाज़ार पर फ्रूटी और स्लाइस का क़ब्ज़ा है। 

मौजूदा परिवेश में आमों के लिये आम लोगों की मनोदशा को दो शेरों से बयां किया जा सकता है। अक़बर इलाहाबादी के शब्दों में कहें तो, “मंगाए थे- नामा न कोई यार का पैगाम भेजिए, इस फस्ल में जो भेजिए तो बस आम भेजिए।”

वहीं जिन लोगों के लिये आम के बाग़ बगीचे स्वप्न हो गये उनकी पीड़ा को जोश मलीहाबादी के शब्दों में यूं कहा जा सकता है, “आम के बाग़ों में जब बरसात होगी, पुरख़रोश मेरी फुरकत में लहू रोएगी।”

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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