साबरमती आश्रम को कॉरपोरेट के हवाले कर गोडसे को स्थापित करना चाहते हैं मोदी

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जब से नरेंद्र मोदी सत्ता में आए हैं तब से वे एक के बाद एक सभी संस्थाओं, विभागों, समूहों और व्यक्तियों को एक तरफ से निकम्मा साबित करने में लगे हुए हैं। दूसरी तरफ सब कुछ अडानी-अंबानी को सौंपने पर आमादा हैं। हाल ही में देश भर के वरिष्ठ गांधी जनों और समाजसेवी मुखियाओं द्वारा साबरमती सत्याग्रह आश्रम के कारपोरेटीकरण – सरकारीकरण के खिलाफ आश्रम को बचाने के लिए यात्रा निकाली गई। जिससे कुछ हलचल जरूर हुई। लेकिन इतनी नहीं कि योजना रुक जाए।

गांधी जी के प्रपौत्र तुषार गांधी ने जनहित याचिका भी दायर की है। न्यायपालिका का क्या रुख रहेगा कहा नहीं जा सकता। परन्तु यह तय है कि न्यायालय के भरोसे नहीं रहा जा सकता।

साबरमती आश्रम को अब तक संचालित करने वाले गांधी जनों को निकम्मा बतला कर गुजरात सरकार अपने ट्रस्ट बनाकर अपने लोगों को बैठाकर 13 सौ करोड़ रूपये खर्च करने की योजना पर आगे बढ़ रही है। आश्चर्य और दुख की बात यह है कि साबरमती आश्रम से जुड़े गांधी जनों ने जिस दिन से उन्हें गुजरात सरकार की मंशा की जानकारी मिली होगी, उसी दिन से गांधी जी द्वारा दुनिया को दिए गए सत्याग्रह के हथियार का इस्तेमाल नहीं किया।

गुजरात सरकार द्वारा आश्रम के रहवासियों को बड़ी राशि देने का प्रस्ताव किया गया, जिसे तमाम गांधी जनों ने गुजरात के दमनकारी माहौल ,असुरक्षित जीवन और कोई विकल्प न होने की सोच के कारण स्वीकार भी कर लिया। उसकी अगुवाई कुछ वे लोग कर रहे थे जिन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर पर हमले की कार्यवाही में परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सहयोग किया था। यानि वे पहले से ही गांधी विचार के खिलाफ थे ।

लेकिन गांधी केवल गांधी जनों के ही नहीं पूरे देश के हैं। गांधीजी के नाम का उपयोग कर दसियों वर्ष तक सत्ता में रहे कांग्रेसियों ने किया है। उन्होंने भी गुजरात सरकार के प्रयास को विफल करने की ओर ध्यान नहीं दिया। जिस दिन गुजरात सरकार की योजना सार्वजनिक हुई थी उसी दिन से यदि साबरमती आश्रम पर सत्याग्रह शुरू हो जाता तो गुजरात सरकार को आगे बढ़ने का मौका ही नहीं मिलता। गांधीवादियों और गोडसेवादियों का मुकाबला हो जाता।

सरकार केवल गांधीजनों को निकम्मा साबित नहीं कर रही ,यह सर्व विदित है कि मोदी सरकार ने किसानों को निकम्मा, अक्षम और नकारा साबित करते हुए 3 किसान विरोधी अध्यादेश लाकर और अलोकतांत्रिक तरीके से उन्हें कानून बनाकर किसानों पर थोपने का काम किया है। लेकिन देश के किसान संगठनों ने जिस दिन अध्यादेश जारी हुए उसी दिन से विरोध करना शुरू कर दिया था। जो आज 337 दिन पूरे होने के बाद भी देश में संयुक्त किसान मोर्चा के तौर पर दिखलाई पड़ता है। मोदी सरकार तो यह कह कर खेती को कारपोरेट को सौंपना चाहती है कि किसान खेती करना नहीं जानता इसलिए वह घाटा उठाता है और आत्महत्या करता है। कंपनियां खेती करना जानती हैं, वे मुनाफा खुद भी कमाएंगी और किसानों को भी मालदार बनाएंगी।

मोदी सरकार ने यही काम भारतीय रेलवे के साथ किया है। भारतीय रेल को दुनिया का सबसे दक्ष और सबसे बड़ा, सबसे अधिक लोगों का यातायात करने वाला विभाग माना जाता है। उसको भी निकम्मा, नकारा बताकर 600 स्टेशन और 150 रेलवे लाइनें बेच दी गई हैं।

अर्थात मोदी सरकार की नजर में रेलवे कर्मचारी निकम्मा है, क्योंकि वे मुनाफे के लिए नहीं सामाजिक प्रतिबद्धताओं के साथ कार्य कर रहे हैं। इसी तरह बीमा सेक्टर और बैंकिंग सेक्टर के साथ भी किया जा रहा है। डिफेंस फैक्ट्रियों के कर्मचारियों के प्रति भी सरकार का यही रुख है। भारत इलेक्ट्रिक लिमिटेड जैसे संस्थान को भी नकारा साबित कर दिया है। जो देश की रक्षा जरूरतों को पूरा करता रहा है। ऐसे सभी क्षेत्रों के कर्मचारियों या उनके साथ जुड़े लोगों को यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि आजादी के बाद से 2014 तक साबरमती से लेकर रेलवे तक को वे ठीक-ठाक तरीके से चला रहे थे वे 2014 के बाद से ही कैसे निकम्मे हो गए ?

यह बहस बीच-बीच में जब सरकार कार्यवाहियां करती है उस समय देश और समाज में चलती है लेकिन निजीकरण के खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन देश में खड़ा नहीं हो सका है। जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, यातायात के निजीकरण का सवाल देश के हर नागरिक के साथ जुड़ा हुआ है तथा 137 करोड़ की आबादी को प्रभावित करता है।

गांधी जनों को गांधीजी के सादगी, स्वावलंबन के विचार को आगे बढ़ाते हुए साबरमती आश्रम की बहस को देश के सभी क्षेत्रों के कारपोरेटीकरण के खिलाफ संघर्ष में तब्दील करने की अगुवाई करना चाहिए। देश में गांधीवादी ही हैं जिनके पास नैतिक शक्ति है, पाक साफ सार्वजनिक जीवन जीने का इतिहास है।

सादगी पूर्ण जीवन जीने और आचार विचार के चलते उन्हें समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। पर सवाल यह है कि करो या मरो की भावना के साथ देश को बचाने के लिए चल रहे संघर्ष में अगुवाई करने के लिए वे आगे आएंगे ?

किसान और मज़दूर तो मैदान में पहले से ही हैं। वे गांधीवादी तरीके से दिल्ली के मोर्चों पर देश भर में 700 किसानों की शहादत देने के बाद भी मोदी सरकार से मुकाबला कर रहे हैं।
(डॉ. सुनीलम पूर्व विधायक हैं और किसान मोर्चे के नेता हैं।)

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