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Categories: बीच बहस

नेहरूः एक समन्वयवादी युगान्तकारी

पंडित जवाहर लाल नेहरू की पुण्य तिथि पर उनका स्मरण जोर शोर से किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि आज पूरी मानवता एक महामारी की चपेट में है और उससे निपटने का तरीका वैज्ञानिक अनुसंधान और दृष्टि ही है। इस लिहाज से नेहरू की युगान्तकारी दृष्टि भारत और पूरी मानवता के लिए बहुत उपयोगी है। लेकिन इसी के साथ भारत के भीतर और दुनिया के दूसरे हिस्सों में धर्म और जाति के नाम पर जो विभाजन है उससे भी निपटने के लिए समन्वयवादी नजरिया नेहरू के पास है। इसलिए उस लिहाज से भी नेहरू का स्मरण बहुत जरूरी है। नेहरू के आलोचक उनके अपने देश में बहुत बढ़ गए हैं। इसलिए उनकी पुण्यतिथि पर किसी अखबार में उनका वैसा स्मरण नहीं दिखाई पड़ता जैसा होना चाहिए।

नेहरू का मूल्यांकन करते हुए सन 1928 में महान क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह ने किरती अखबार में सुभाष बाबू और पंडित जवाहर लाल नेहरू की तुलना करते हुए लिखा था, “नेहरू के विचार युगान्तकारी के विचार हैं और सुभाष बाबू के एक राज परिवर्तनकारी के विचार हैं। एक भावुक हैं और दूसरे युगान्तकारी विद्रोही।’’ इसलिए उन्होंने पंजाब के युवाओं के अपील की थी कि राष्ट्रीय फलक पर जो दो युवा नेता उभर रहे हैं उनमें से उन्हें जवाहर लाल का अनुकरण करना चाहिए। इसकी वजह उन्होंने दोनों के विचारों में तुलना करते हुए बताई थी। भगत सिंह ने नए नेताओँ के अलग अलग विचार शींर्षक से लिखे लेख में बंबई के एक कार्यक्रम का जिक्र किया था जिसके मुख्य वक्ता सुभाष चंद्र बोस थे और जिसकी अध्यक्षता जवाहर लाल नेहरू ने की थी।

भगत सिंह लिखते हैं कि असहयोग आंदोलन की विफलता के बाद राष्ट्रीय फलक पर जो नेता उभरे हैं वे हैः-सुभाष चंद्र बोस और पंडित जवाहर लाल नेहरू। दोनों आजादी के कट्टर समर्थक हैं दोनों समझदार और सच्चे देशभक्त हैं। लेकिन उनके विचारों में जमीन आसमान का अंतर है। एक प्राचीन संस्कृति का उपासक है। दूसरे को पश्चिम का पक्का शिष्य बताया जाता है। एक कोमल हृदय वाला भावुक है तो दूसरा पक्का युगान्तकारी। सुभाष बाबू एक भावुक बंगाली हैं जो मानते हैं कि भारत का दुनिया के लिए विशेष संदेश है। वह दुनिया को आध्यात्मिक शिक्षा देगा। जबकि इसके ठीक उलट नेहरू कहते हैं –जिस देश में जाओ वही समझता है कि उसका दुनिया के लिए एक विशेष संदेश है। इंग्लैंड दुनिया को संस्कृति सिखाने का ठेकेदार बनता है। मैं तो कोई विशेष बात अपने देश के साथ नहीं देखता। इससे आगे नेहरू जी युवाओं से विद्रोह करने का आह्वान करते हुए कहते हैः-हर युवा को विद्रोह करना चाहिए। सिर्फ राजनीतिक क्षेत्र में नहीं बल्कि सामाजिक आर्थिक और धार्मिक क्षेत्र में भी। मेरे लिए उस व्यक्ति का ज्यादा महत्व नहीं है जो आता है और कहता है कि फलां फलां बात कुरान में कही गई है। हर चीज जो गैर वाजिब है उसे ठुकरा देना चाहिए चाहे वह कुरान में कही गई हो या वेद में।

निश्चित तौर पर जो नेहरू युवा अवस्था में थे वैसे वे 74 साल की अवस्था में नहीं थे। तब वे आजादी के योद्धा थे और जीवन के अंतिम दिनों में वे एक विशाल राष्ट्र को आधुनिक बनाने के साथ सशक्त बना रहे थे। वे साम्राज्यवाद से लड़कर जीते थे और सांप्रदायिकता और अविकास से लड़ रहे थे। फिर भी अपने विरोधियों और समर्थकों के बीच समन्वय कायम कर रहे थे। कई बार वे अपनी पार्टी के बाहर के लोगों को साथ लाने का प्रयास करते थे तो कभी अपनी ही पार्टी के लोगों से झुंझला कर उनसे भिड़ जाते थे। सन 1950 में पुरुषोत्तम दास टंडन की अध्यक्षता में नासिक में हुए कांग्रेस के सम्मेलन में सांप्रदायिक विचारों को संबोधित करते हुए कहा था, “पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर जुल्म हो रहे हैं तो भारत में भी हम वही करें? यदि इसे ही जनतंत्र कहते हैं तो भाड़ में जाए जनतंत्र। आप मुझे प्रधानमंत्री के रूप में चाहते हैं तो बिना शर्त मेरे पीछे चलना होगा। नहीं चाहते तो साफ साफ कह दें मैं पद छोड़ दूंगा और कांग्रेस के आदर्शों के लिए स्वतंत्र रूप से लड़ूंगा।’’

नेहरू के सपने बड़े थे तो उनकी विफलताएं भी बड़ी थीं। लेकिन कई मोर्चों पर उन्होंने समझौता नहीं किया। वे भारत को एक नहीं रख सके। लेकिन उन्होंने द्विराष्ट्र के सिद्धांत को नहीं माना। वे समाजवाद का सपना देखते थे लेकिन भारत में वैज्ञानिक समाजवाद नहीं ला सके। उसकी जगह उन्होंने राज्य समाजवाद लागू किया। वे समाजवादियों को साथ रखना चाहते थे लेकिन नहीं रख सके और 1948 में उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया। वे सोवियत माडल से प्रभावित थे और कम्युनिस्टों को साथ रखना चाहते थे लेकिन उन्हें 1945 में ही कांग्रेस से बाहर करना पड़ा। दरअसल 1942 के आंदोलन में कम्युनिस्टों की भूमिका देखकर वे उनकी आलोचना करने लगे थे। जब आजाद भारत में तेलंगाना विद्रोह हुआ तो नेहरू ने वहां के कम्युनिस्टों का बाकायदा दमन किया और कहा कि समाजवाद हिंसा के रास्ते से भारत में नहीं आएगा। उनके नेतृत्व में 1958 में केरल में भारत में पहली बार चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार गिराई गई। फिर भी नेहरू ने भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था लागू की और सोवियत माडल पर योजना आयोग बनाया और पंचवर्षीय योजनाएं चलाईं।

वे 1962 में चीन से हारे और शायद उसी गम के कारण उन्हें 1964 में हृदयाघात लगा और वे बच नहीं सके। इन विफलताओं और कमियों के बावजूद उन्होंने अपने अंतिम समय में लाल बहादुर शास्त्री को भेजकर जयप्रकाश नारायण को बुलाया था, ताकि उन्हें अपना उत्तराधिकार बनाया जा सके। उनके कटु आलोचक डा राम मनोहर लोहिया ने एक बार कहा था कि अगर वे बीमार होंगे तो उनकी सबसे अच्छी तीमारदारी नेहरू के तीनमूर्ति भवन में होगी। क्योंकि वे उन्हें बहुत प्यार करते हैं और वे भी नेहरू की आलोचना राजनीतिक रूप से लोकतंत्र को शक्तिशाली बनाने के लिए करते हैं।

ऐसे नेहरू के बारे में अटल बिहारी वाजपेयी ने सही श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, “महर्षि वाल्मीकि ने भगवान राम के संबंध में कहा है कि वे असंभवों के समन्वय थे। पंडित जी के जीवन में महाकवि के उस कथन की एक झलक दिखाई पड़ती है। वह शांति के पुजारी किंतु क्रांति के अग्रदूत थे।वे अहिंसा के उपासक थे किंतु स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा के लिए हर हथियार से लड़ने के हिमायती थे। वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के समर्थक थे किंतु आर्थिक समानता लाने के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने समझौता करने में किसी से भय नहीं खाया लेकिन किसी से भयभीत होकर समझौता नहीं किया।’’

आज नेहरू की धर्मनिरपेक्षता की नीति और गुट निरपेक्षता की नीति की विफलता का जिक्र करने वाले बहुत हैं। लेकिन अगर हम आंखें खोलकर देखें तो भारत का भविष्य विभाजनकारी नीतियों में नहीं बल्कि समन्वयकारी नीतियों में है। दिनकर की संस्कृति के चार अध्याय की भूमिका लिखते हुए नेहरू ने कहा था, “भारत के समस्त इतिहास में दो परस्पर विरोधी और प्रतिद्वंद्वी शक्तियां रही हैं। एक बाहरी उपकरणों को पचाकर समन्वय औऱ सामंजस्य पैदा करती है तो दूसरी विभाजन को प्रोत्साहन करती है।’’ नेहरू के पंचशील सिद्धांतों की बड़ी आलोचना की जाती है। उसे विफल बताया जाता है। लेकिन आश्चर्यजनक बात यह है कि आज चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग चीन को उसी रास्ते पर ले जा रहे हैं। वे उसी आधार पर दक्षिणपूर्व एशिया में अपना विस्तार कर रहे हैं और चीन को नया रूप दे रहे हैं।

नेहरू हमारे इतिहास के निर्माता हैं और स्वप्नदृष्टा भी। उनकी आलोचना होनी चाहिए, समीक्षा होनी चाहिए लेकिन उनसे घृणा नहीं करनी चाहिए। वे विश्व मानवता के आदरणीय व्यक्तित्व हैं। मानवता के लिए उनका योगदान तब तक याद किया जाएगा जब तक यह संसार रहेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on May 27, 2021 2:43 pm

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