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लो जी, ‘विकास’ भी ‘अवसर’ में बदल गया

गैंगस्टर विकास दुबे के एनकाउंटर पर सवाल उठाना क्या अपराध और अपराधियों का समर्थन करना है? अगर ऐसा है तो क्या किसी मीडिया में ऐसे सवाल नहीं उठाए गये हैं? कई राजनीतिक दलों ने भी सवाल उठाए हैं, सेलिब्रेटीज से लेकर पूर्व पुलिस अधिकारियों ने भी। क्या इन सबको अपराध समर्थक माना जाए?

सोशल मीडिया अब आम प्रतिक्रियाओं को समझने के लिहाज से आईना बन चुका है। हालांकि सोशल मीडिया में नियंत्रित और प्रायोजित किस्म की प्रतिक्रियाएं ज्यादा होती हैं इसलिए इस आईने में अक्सर वो दिखाई नहीं देता जो सच होता है। मगर, इसमें संदेह नहीं कि आम लोग भी इससे प्रभावित होते हैं।

कई प्रतिक्रियाएं ऐसी देखने को मिलीं जिनमें एनकाउंटर पर सवाल उठाने को ही गलत करार दिया गया। यह प्रतिक्रिया कुछ इस रूप में थी- “मरा तो अपराधी ही है। एक अपराधी मरा है तो आपको क्या दिक्कत है?“

खुशियां भी मनाई गयीं। एक अपराधी जब मरता है तो उसके खौफ से भी बहुत सारे लोग आजाद होते हैं। उनमें खुशी का भाव होना स्वाभाविक है। मगर, एनकाउंटर पर सवाल उठाना न इस खुशी से विरोध है और न ही अपराधी का समर्थन। फिर भी इस सवाल को इसी रूप में देखा और समझा जा रहा है, यह भी बड़ी सच्चाई है।

आम जनता में व्यवस्था के प्रति जो नाराज़गी है, न्यायपालिका में बढ़ता अविश्वास है और अपराधियों के खिलाफ जो गुस्सा है उसका यह प्रकटीकरण है। इस गुस्से को शांत करने का तरीका क्या होना चाहिए? निश्चित रूप से व्यवस्था में मौजूदा खामियों को व्यवस्थागत तरीके से खत्म करना ही सही रास्ता है। मगर, इसमें वक्त लगता है। इस दौरान शासन को सुनना पड़ता है। लिहाजा अब शासन ने भी जनता के गुस्से के साथ चलने का रास्ता अख्तियार कर लिया है। गुस्से को अपने लिए अवसर में बदलने के रास्ते पर चल पड़ी है सरकार। विकास दुबे के मामले में भी ऐसा ही हुआ है।

राजनीति ने अपना स्वभाव बदला है। संकट को पैदा करो और फिर संकट को अवसर में बदलो। हिन्दुस्तान जैसे देश में शासन के लिए संकट पैदा करने की जरूरत भी नहीं होती। अक्सर यह बिन बुलाए मेहमान की तरह आ जाता है। याद कीजिए नोटबंदी। नोटबंदी के कारण जनता परेशान हो गयी थी। सैकड़ों लोग बैंक के सामने अपनी ही रकम निकालने के लिए लाइनों में लगने की वजह से ईश्वर को प्यारे हो गये थे। गुस्सा शासन पर आना चाहिए था।

मगर, शासन ने नोटबंदी के बजाए कालाधन की ओर गुस्से को धकेल दिया। नोटबंदी से कालाधन खत्म हो जाएगा और भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा- यह बात समझायी गयी। जिस किसी ने भी नोटबंदी का विरोध किया, उन्हें भ्रष्टाचार और कालाधन का समर्थक करार दिया गया। जाहिर है कि विरोध ही कमजोर पड़ गया। वहीं, शासन और अधिक लोकप्रिय होता गया। उस दौरान जितने भी चुनाव देशभर में हुए, सत्ताधारी बीजेपी को भारी बहुमत मिला। 

आप याद कीजिए पुलवामा में हमले की घटना। इस घटना के बाद देश में कितना गुस्सा था। इसी गुस्से को एनकैश करने में मोदी सरकार कामयाब रही। उसने बालाकोट की घटना को अंजाम दिया। इसे जबरदस्त बदले की कार्रवाई के तौर पर दिखाया। ऐसा ही तब हुआ था जब सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया गया। ये दोनों घटनाएं जन आक्रोश को तुष्ट कर रही थीं। 

पठानकोट में भी इसी मोदी सरकार के रहते आतंकवादी हमला हुआ था। मगर, तब जवाबी कार्रवाई की जरूरत नहीं समझी गयी थी। वजह यह थी कि जनता के गुस्से को शांत होने देने का वक्त शासन के पास था। सच ये है कि मोदी सरकार ने तब पठानकोट हमले में पाकिस्तान को क्लीन चिट दी थी। कहा था कि पाकिस्तान के नॉन स्टेट एक्टर्स का इस हमले में हाथ है। हालांकि क्लीन चिट तुरंत नहीं दी गयी थी। कुछेक महीने का समय लिया गया था। 

चाहे डोकलाम हो या फिर गलवान घाटी की घटना। इन घटनाओं में चीन सीमा विस्तार के मुद्दे पर आक्रामक रहा। मगर, भारत ने प्रतिरोध दिखाते हुए जनता के गुस्से को बहुत अच्छे तरीके से भुनाया। जिस किसी ने भी सवाल उठाने की कोशिश की, मोदी सरकार ने पूर्ववर्ती सरकार की खामियां गिनायी और पहले से बेहतर जवाब दिया गया है, ऐसा भरोसा दिलाया। 

लिहाजा चीन भले ही एलएसी में भारतीय प्रभाव वाले इलाके में आ घुसा हो, मगर इस ओर ध्यान दिलाने को चीन का साथ देना करार दिया गया। सवाल उठाने वाले देश विरोधी और शासन  का साथ देने वाले  देशभक्त के तौर पर देश में दो कैटेगरी बन गयी। इस काम में मीडिया ने पूरी तरह से शासन का साथ दिया।

विकास दुबे के एनकाउंटर पर सवाल उठाने को भी अपराधियों के खिलाफ शासन को कमजोर करने के प्रयास के तौर पर दिखाया जा रहा है। आम लोगों की भाषा या भावना यही है कि एक अपराधी मरा है, अच्छा हुआ है। इस पर सवाल कैसा? हैदराबाद में गैंगरेप के बाद हुई मुठभेड़ में कथित बलात्कारियों को ढेर कर दिया गया था। तब जनता ने पुलिस पर फूल बरसाए थे। बगैर इस बात की पुष्टि किए कि जो मुठभेड़ में मरे हैं वही वास्तव में अपराधी हैं या नहीं, इस जश्न को सराहा भी गया।

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आम जनता मोटे तौर पर सही और गलत को देखती है। उसकी आंख कान होते हैं समाज का बुद्धिजीवी वर्ग, समाजसेवी, राजनेता, धार्मिक गुरु, शिक्षक और ऐसे ही बौद्धिक वर्ग से जुड़े हुए लोग। आज यह बौद्धिक वर्ग भी बंट चुका है। तर्क-वितर्क तो इस वर्ग की खासियत है मगर तर्क-वितर्क से परे हटते हुए यह वर्ग बंट गया है। ऐसे में बौद्धिक वर्ग अपनी धार लगातार खो रहा है, खोता जा रहा है। आम लोगों की सोच और बौद्धिक वर्ग की सोच में जो फासला दिख रहा है उसकी बड़ी वजह यही है।

राजनीति मौकापरस्त होती है। वह विकास दुबे का ज़िन्दा इस्तेमाल भी करती है और मुर्दा भी। जीवित रहने और मौत के बीच भी अगर संभावना बन जाए, तो उसके इस्तेमाल से भी संकोच नहीं करती। विकास दुबे का सरेंडर वाला दौर इसका उदाहरण है। विकास दुबे के लिए आम लोगों में जो नफरत थी, उस नफरत को ही मिटाने की कोशिश है ‘एनकाउंटर’। इसका राजनीतिक लाभ भी स्वाभाविक रूप से योगी-मोदी सरकार को मिल रहा है। 

व्यवस्था को जब खुद व्यवस्था ही नजरअंदाज करने लग जाए, तो व्यवस्था टूट जाती है। शासन में जब विश्वास खत्म हो जाएगा तो यही जनता त्राहिमाम करेगी। अतीत को याद करेगी कि शासन जैसी चीज भी हुआ करती थी जहां देर से ही सही मगर न्याय का भरोसा हुआ करता था। 

सच को सुनना, सच को समझना और सच को मानना एक लंबी प्रक्रिया है। इसमें समाज के हर वर्ग के लोगों की भूमिका होती है। शासन की भूमिका केंद्रीय होती है। इस प्रक्रिया को जिन्दा रखने की जरूरत है। 

जरा सोचिए कि कल को कोई अपराधी क्या सरेंडर करना चाहेगा? क्या उसे अपनी जान की सुरक्षा का भरोसा होगा? क्या शासन ऐसा भरोसा उसे दिला पाएगा? कम से कम विकास दुबे की घटना के बाद तो ऐसा नहीं लगता। मगर, हिन्दुस्तान जैसे विशाल देश में यह एक महज घटना है। इसे इसी रूप में नहीं माना जा सकता है कि यही हिन्दुस्तान का स्वभाव हो गया है।

मगर, याद कीजिए मॉबलिंचिंग की घटनाएं। ऐसी घटनाओं के समर्थक कितने ज्यादा हो गये हैं इस देश में। जातीय आधार पर, धार्मिक आधार पर, सामाजिक आधार पर और न जाने किस-किस आधार पर मॉबलिंचिंग की घटनाएं होती रही हैं। पहले भी होती थीं, मगर कभी इसे जायज नहीं ठहराया जाता था। अब तो केंद्रीय मंत्री भी मॉबलिंचिंग के अभियुक्तों को मंच पर बुलाकर माला पहनाते हैं। क्या समाज के इस बदलते स्वभाव से चिंता नहीं होनी चाहिए? जिसकी मॉबलिंचिंग हुई उसका गुनाह जो कुछ भी हो, मगर वह कानून का गुनहगार है न कि चंद लोगों का? अगर कानून अपने-अपने तरीके से लोग परिभाषित करने लग जाएं, तो शासन की जरूरत ही क्या रह जाती है?

विकास दुबे के एनकाउंटर पर सवाल उठाना इसलिए नहीं छोड़ देना चाहिए कि वह अपराधी था। वह अपराधी था। उसकी मौत से किसी को गम नहीं हुआ है। मगर, वो लोग बड़े अपराधी हैं जिन्होंने विकास दुबे को गलत तरीके से रास्ते से हटाया है। अगर यह बात साबित होती है कि एनकाउंटर गलत था। इसी बात की तो जांच की जानी चाहिए।

तीन सदस्यों की एसआईटी बन चुकी है। विकास दुबे एनकाउंटर समेत तमाम घटनाओं की जांच के लिए। इस बीच खबर यह भी आयी है कि जिन्दा रहते वक्त विकास दुबे ने पुलिस को जो कुछ बताया है उनमें यह बात शामिल है कि उसके दर्जन भर विधायकों, 2 मंत्रियों और 50 से ज्यादा पुलिस अफसरों और कर्मचारियों के साथ गहरे ताल्लुकात थे और इन्होंने उनकी हर संभव मदद की। अपराधी तो ये लोग भी हैं। अकेले विकास दुबे से छुटकारा पाकर अपराध से समाज नहीं बच सकता। जब तक विकास दुबे को संरक्षण देने वाले लोग हैं तब विकास दुबे पैदा होता रहेगा। यही वजह है कि केवल एक अपराधी की मौत पर जश्न अधूरा जश्न है।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आपको विभिन्न चैनलों के पैनल में बहस करते देखा जा सकता है।)

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