Monday, October 25, 2021

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बाराबंकी मस्जिद विध्वंस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, प्रशासन को जारी किया कारण बताओ नोटिस

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राम सनेही घाट के एसएचओ को कारण बताओ नोटिस जारी किया और यह स्पष्ट करने के लिए कहा कि उनके खिलाफ उच्च न्यायालय के निर्देशों का उल्लंघन करते हुए गरीब नवाज मस्जिद को ध्वस्त करने का आदेश पारित करने के खिलाफ अवमानना कार्यवाही क्यों नहीं शुरू की जानी चाहिए। यह आदेश जस्टिस रवि नाथ तिलहरी की एकल पीठ ने पारित किया। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि कोविड-19 महामारी के मद्देनजर विध्वंस से संबंधित कोई भी आदेश 31 मई तक स्थगित रखा जाएगा। इस बीच गरीब नवाज मस्जिद कमेटी के सचिव मोहम्मद अनीस और बाराबंकी के एक स्थानीय निवासी मो. नईम ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर मस्जिद के विध्वंस के संबंध में समाचार पोर्टल द वायर द्वारा की गई एक वीडियो रिपोर्ट के संबंध में उत्तर प्रदेश (यूपी) पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दर्ज की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) को रद्द करने की मांग की है।

जस्टिस तिलहरी की एकल पीठ ने इस प्रकार कहा कि अवमानना याचिका में दिए गए बयानों के साथ-साथ प्रस्तुत प्रस्तुतियों को देखकर प्रथम दृष्ट्या ऐसा प्रतीत होता है कि 17 मई, 2021 को प्रतिवादी नंबर 2-स्टेशन हाउस ऑफिसर, राम स्नेही घाट, तहसील और जिला बाराबंकी द्वारा विवादित मस्जिद को ध्वस्त करने का आदेश जनहित याचिका संख्या 564 में पारित आदेश दिनांक 22अप्रैल 2021 के निर्देश संख्या 4 और 5 का उल्लंघन है। विवाद उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में 17 मई को हुई गरीब नवाज मस्जिद के विध्वंस से संबंधित है, जिसे जिला प्रशासन ने अवैध संरचना होने का दावा किया था।

याचिकाकर्ता आवेदकों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि इस मामले में उच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्देशों की जानबूझकर अवज्ञा की गई है, जिसमें हाईकोर्ट ने तेजी से बढ़ते कोविड-19 मामलों के मद्देनजर अंतरिम आदेशों, जमानत आदेशों और अदालत द्वारा पारित अन्य बेदखली या विध्वंस आदेशों के विस्तार के संबंध में कई निर्देश पारित किए थे। हाईकोर्ट के आदेश के निर्देश 4 में कहा गया था कि उच्च न्यायालय, जिला न्यायालय या दीवानी न्यायालय द्वारा पहले ही पारित बेदखली या विध्वंस के कोई भी आदेश, यदि इस आदेश के पारित होने की तारीख तक निष्पादित नहीं किए जाते हैं तो 31 मई, 2021 तक की अवधि के लिए स्थगित रहेंगे।” इस निर्देश के अनुसार, राम सनेही घाट के एसडीएम के 3 अप्रैल के आदेश के निष्पादन में एसएचओ द्वारा निष्पादित करने के लिए जिला प्रशासन ने 17 मई को मस्जिद को ध्वस्त कर दिया जो कि दिशानिर्देश का उल्लंघन है।

एकल पीठ ने मामले में एसडीएम और एसएचओ द्वारा दायर हलफनामों पर विचार करते हुए कहा कि अवमानना याचिका के समर्थन में दायर हलफनामे का पैराग्राफ-4, प्रथम दृष्ट्या प्रतिवादी नंबर 1 के संबंध में बाराबंकी तहसील, राम सनेही घाट के सब डिविजन मजिस्ट्रेट द्वारा पारित 03 अप्रैल, 2021 का आदेश सही नहीं प्रतीत होता है, जबकि जनहित याचिका संख्या 564 में निर्देश जारी करने का आदेश दिनांक 24 अप्रैल, 2021 है। अवमानना याचिका के रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह दर्शाता हो कि सब डिविजन मजिस्ट्रेट, राम स्नेही घाट, तहसील बाराबंकी ने न्यायालय द्वारा दिनांक 24 अप्रैल, 2021 को पारित आदेश की पेंडेंसी के दौरान विध्वंस या बेदखली के लिए कोई आदेश पारित किया था। जनहित याचिका जैसे अवमानना याचिका के आधार पर प्रथम दृष्ट्या प्रतिवादी संख्या 1 के खिलाफ नोटिस जारी करने का कोई मामला नहीं बनता है।

एकल पीठ ने इसे देखते हुए निर्देश दिया कि प्रतिवादी संख्या 2 को जवाब दाखिल करने और कारण बताने के लिए नोटिस जारी करें कि उसके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों नहीं शुरू की जाए। पेशी वकील के माध्यम से हो। अब इस मामले पर 22 जुलाई को विचार किया जाएगा।

हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड द्वारा दायर एक रिट याचिका पर नोटिस जारी किया है। इस याचिका में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले (राम सनेही घाट क्षेत्र) में गरीब नवाज मस्जिद के विध्वंस को चुनौती दी गई थी। जस्टिस सौरभ लावानिया और जस्टिस राजन रॉय की बेंच ने कहा कि याचिकाएं प्रथम दृष्ट्या सार्वजनिक उपयोगिता भूमि पर एक मस्जिद के अस्तित्व के बारे में महत्वपूर्ण सवाल उठाती हैं।

हाईकोर्ट ने कहा था कि याचिका सीआरपीसी की धारा 133 के तहत राज्य के अधिकारियों द्वारा शक्ति के प्रयोग के संबंध में भी सवाल उठाती है। साथ ही अन्य संबंधित प्रावधान, इसका मस्जिद को जिस तरह से गिराया गया है, उस पर याचिका के दायरे को विशेष रूप से सत्ता के दुर्भावनापूर्ण प्रयोग के आरोप तक बढ़ाया गया है।

याचिकाकर्ताओं द्वारा यह कहा गया था कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 133 (1) के तहत स्थानीय अधिकारियों द्वारा मस्जिद विध्वंस की कार्यवाही पूरी तरह से शत्रुता और दुर्भावना से और बेहद जल्दबाजी से की गई थी। याचिकाओं में कहा गया कि उत्तर प्रदेश सरकार कुछ नई संरचना बनाकर ध्वस्त मस्जिद की जगह की प्रकृति को बदलने की कोशिश कर रही है और यदि याचिकाकर्ताओं को तत्काल नहीं सुना जाता है, तो उन्हें एक अपूरणीय क्षति होगी।

इस बीच गरीब नवाज मस्जिद कमेटी के सचिव मोहम्मद अनीस और बाराबंकी के एक स्थानीय निवासी मो. नईम ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर मस्जिद के विध्वंस के संबंध में समाचार पोर्टल द वायर द्वारा की गई एक वीडियो रिपोर्ट के संबंध में उत्तर प्रदेश (यूपी) पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दर्ज की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) को रद्द करने की मांग की है। दो याचिकाकर्ताओं के अलावा, प्राथमिकी में द वायर और वीडियो बनाने वाले उसके दो पत्रकारों को भी आरोपी बनाया गया है।

यूपी पुलिस ने महेंद्र सिंह द्वारा दायर एक शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज की थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि समाचार पोर्टल की रिपोर्ट निराधार और असत्य तथ्यों पर आधारित थी। आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 153 (दंगा भड़काने), 153 ए (धार्मिक समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 120-बी (साजिश) और 501 (मुद्रण मानहानिकारक सामग्री) के तहत अपराध दर्ज किए गए थे। याचिका में कहा गया है कि प्राथमिकी में आरोप निराधार हैं और याचिकाकर्ताओं की जान को खतरा है क्योंकि पुलिस उन्हें कभी भी गिरफ्तार कर सकती है।

इस संबंध में, रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा किया गया था, जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विचारों के प्रसार की स्वतंत्रता शामिल है और यह स्वतंत्रता संचलन की स्वतंत्रता से सुनिश्चित होती है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि महेन्द्र सिंह, उप निरीक्षक पीएस, राम सनेही घाट द्वारा याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द की जाये।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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