पंजाब ने तोड़ा कृषि अध्यादेशों का मोदी-त्रिशूल

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कोरोनाकालीन राजनीति में सब कुछ बुरा हो रहा है, ऐसा नहीं है। गाहे-बगाहे ‘अंजाम ख़ुदा जाने’ की चेपी लगाए कुछ अच्छा घटित होने की खबर भी ढूँढने से मिल ही जाती है। ऐसी ही एक खबर पिछले दिनों हाथ लगी तो पता चला कि कृषि वस्तुओं के मंडीकरण की व्यवस्था को निजी क्षेत्र के हवाले करने के मकसद से केंद्र सरकार द्वारा जारी किए तीनों कृषि अध्यादेशों को रद्द करने का प्रस्ताव पंजाब विधान सभा ने बहुमत से पारित कर दिया है।

इस प्रस्ताव में यह मांग की गयी है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर अनाज और हरेक कृषि उत्पाद की खरीद सुनिश्चित की जाए और भारतीय खाद्य निगम (एफ़सीआई) द्वारा खरीद जारी रखने के लिए केंद्र सरकार नया अध्यादेश जारी करे जो किसानों का कानूनी अधिकार है। 

किसानों का दुख कवियों की दृष्टि-परिधि में सदा से रही है और वह उनकी व्यथा कागज़ की ज़मीन पर हमेशा से बोते रहते हैं लेकिन प्रेस-क्लब वाले पत्रकारों की पेग-परिधि से किसान बाहर क्या हो गया है, यूं कह लें आउट ऑफ फ़ैशन हो गया है। इसकी वजह खौफ़ है या नासमझी है, पता नहीं, पर दिल्ली की मैली जमुना किनारे बैठे लोकतन्त्र के झंडाबरदार बुद्धिजीवी तो इस विषय पर बात करते भी दिखाई नहीं देते। पर पंजाब के अधिकांश बुद्धिजीवी (जिनमें सूट-बूट के ऊपर सूफ़ी चादर ओढ़कर हाथ में कासा लिए सत्ता की अंधी गलियों में बऊवाते पत्रकार-संपादक भी शामिल हैं) यह मानते हैं कि यह अध्यादेश न सिर्फ़ पंजाब के लोगों, ख़ासकर किसानों और भूमिहीन मजदूरों के हितों के विरुद्ध है बल्कि भारतीय संविधान में शामिल सहकारी संघवाद (फ़ेडेरलिज्म) की भावना के भी विरुद्ध है।  

अकाली दल के लिए भी यह अध्यादेश गले की हड्डी बने हुए हैं क्योंकि उनका जनाधार मुख्य रूप से किसानों के बीच है। अकाली नेता सुखबीर सिंह बादल अपने जनाधार को बचाने के लिए बेशक केंद्र सरकार की ही बोली बोल रहे हैं लेकिन उन्होंने कृषि एवं किसान कल्याण, ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को पत्र लिखा था जिसके जवाब में कृषि मंत्री ने भी उन्हें ‘पीठ पलोसा-पत्र’ लिख दिया है।

प्रदर्शन करती महिलाएं और घायल किसान।

तोमर के अनुसार कृषि अध्यादेश, 2020 किसानों को लाभकारी मूल्य पर अपनी उपज बेचने की स्वतंत्रता देता है। और भी बहुत कुछ। अब यह बातें सुखबीर बादल के गले नहीं उतर रही हैं और वह इस बात से अच्छी तरह से वाकिफ़ हैं कि उन्हें ‘फुद्दू’ बनाया जा रहा है और उन्हें भी इन्हीं शब्द-जाल से आम आदमी और किसानों को ‘फुद्दू’ बनाना है।     

स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव का यह सवाल तो किसी भी दृष्टि से नाजायज़ नहीं है कि अगर सरकार किसानों के फायदे के लिए खेती-बाड़ी से संबन्धित क़ानूनों से सचमुच ऐतिहासिक बदलाव लाना चाहती थी तो उसे इन क़ानूनों पर संसद और सर्वजन के बीच बहस और जांच-परख से कन्नी काटने की क्या जरूरत थी? पर इसके साथ ही वह यह भी कहते दिखाई देते हैं कि किसानों के हक में सोचने वाले बहुत से विशेषज्ञ, जिनके ज्ञान पर मैं भरोसा पालकर चलता हूं, इन ‘सुधारो’ को सही दिशा में उठा कदम बता रहे हैं। ऐसे विशेषज्ञों में अशोक गुलाटी सरीखे अर्थशास्त्री और पूर्व कृषि-सचिव सिराज हुसैन और हरीश दामोदरन सरीखे विश्लेषक भी शामिल हैं। तो फिर, हमें इन तीन नीतिगत सुधारों पर सोच-विचार के लिए दिमाग की खिड़कियां बिल्कुल खोलकर निकलना चाहिए।  

चलिये वही कर लेते हैं।  

अध्यादेशों का यह पैकेज तीन कानूनों की खिचड़ी है। तीनों कानून अध्यादेश की थाली में परोसे गये हैं। पहला कानून है अत्यावश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodity Act 1955) का इस कानून मे केंद्र सरकार ने संशोधन किया है ताकि खाद्य-उत्पादों पर लागू संग्रहण की मौजूदा बाध्यताओं को हटाया जा सके। पहले व्यापारी फसलों को किसानों के औने-पौने दामों में खरीदकर उसका भंडारण कर लेते थे और फिर बाद में कालाबाज़ारी करते थे, उसको रोकने के लिए अत्यावश्यक वस्तु अधिनियम के तहत व्यापारियों द्वारा कृषि उत्पादों के एक सीमा से अधिक भंडारण पर पाबंदी थी।

अब इस नए अध्यादेश के तहत आलू, प्याज़, दलहन, तिलहन व तेल के भंडारण पर लगी रोक को हटा लिया गया है। यानि व्यापारियों की पार्टी ने बड़े व्यापारियों को कालाबाजारी करने के लिए रास्ता साफ कर दिया है। अब अंबानी-अडानी अपने सुपर मार्केट या अपने बड़े-बड़े गोदामों में कृषि उत्पादों का भंडारण करेंगे और बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों (जिसमें भक्तजन भी शामिल होंगे) को बेचेंगे। ‘फ़क़ीर’ के झोले से निकला यह पहला अजगर है। 

दूसरा, केंद्र सरकार ने एक नया कानून ‘फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रोमोशन एंड फेसिलिटेशन) अध्यादेश, 2020, एफपीटीसी नाम से बनाया है जिसका मकसद कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी) के एकाधिकार को खत्म करना और हर किसी को कृषि-उत्पाद खरीदने-बेचने की अनुमति देना है। इसके तहत केंद्र सरकार ‘एक देश, एक कृषि मार्केट’ बनाने की बात कह रही है। इस अध्यादेश के माध्यम से पैन कार्ड धारक कोई भी व्यक्ति, कम्पनी, सुपर मार्केट किसी भी किसान का माल किसी भी जगह पर खरीद सकते हैं। इस बात की कोई गारंटी नहीं दी है कि प्राइवेट पैन कार्ड धारक व्यक्ति, कम्पनी या सुपर मार्केट द्वारा किसानों के माल की खरीद एमएसपी  (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर होगी।

अब नए अध्यादेश के जरिये सरकार किसानों के माल की एमएसपी पर खरीद की अपनी ज़िम्मेदारी व जवाबदेही से बच जाएगी। कृषि माल की जो खरीद एपीएमसी मार्केट से बाहर होगी, उस पर किसी भी तरह का टैक्स या शुल्क नहीं लगेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि टैक्स या शुल्क लगाने वाली एपीएमसी मार्केट व्यवस्था धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। किसान व खरीददार कम्पनी के बीच विवाद होने की स्थिति में इस अध्यादेश के तहत कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता। न्यायालय सरकार के अधीन नहीं होते और न्याय के लिए कोर्ट में जाने का हक हर भारतीय को संविधान में दिया है, नए अध्यादेश की वजह से किसानों को न्याय मिलना बहुत मुश्किल हो जाएगा। अब किसी ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ को फ़ौज खड़ी करने की जरूरत नहीं है। आओ, लूटो और बिना किसी रोक-टोक के निकल लो। मित्रों, ‘फ़क़ीर’ के झोले से निकला यह दूसरा अजगर है। 

तोमर का सुखबीर बादल को लिखा गया पत्र।

तीसरा, एक नया कानून ‘एफएपीएएफएस’ (फ़ार्मर्स एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस एंड फार्म सर्विसेज आर्डिनेंस,2020) बनाया गया है। इसके तहत कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा दिया जाएगा जिसमें बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ खेती करेंगी और किसान उसमें सिर्फ मजदूरी करेंगे। इस नए अध्यादेश के तहत किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर बन के रह जायेगा। किसानों का शोषण करने वाली कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के अब तक के छोटे-मोटे प्रयोग असफल ही रहे हैं। मदर डेयरी ने भी मटरों के लिए उत्तर प्रदेश में कोशिश की थी और नकामयाबी ही हाथ लगी थी।

मोदी जी को तो याद ही होगा कि पिछले साल गुजरात में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करने आई पेप्सीको कंपनी ने किसानों पर कई करोड़ का मुकदमा किया था। एग्री जिंसों की कीमतों में भारी उठा-पटक होती रहती है, ऐसे में किसी एग्री जिंस में अनुबंध के समय जो भाव तय किया गया है, उसके बाद फसल की पकाई के उसमें बड़ी तेजी या फिर गिरावट आती है तो कंपनी के साथ ही किसान को भी मुनाफे और घाटे में शामिल होना होगा। अगर किसी प्राकृतिक आपदा से कोई नुकसान होता है, तो कंपनी का अनुबंध निरस्त माना जायेगा। सरकार की भी मुआवजा देने की जवाबदेही नहीं होगी। मेरे प्यारे देशवासियों, ‘फ़क़ीर’ के झोले से निकला यह तीसरा अजगर है जो भारतीय किसानों को निगल जाएगा।

अब देखा जाए तो ये तीनों अलोकतांत्रिक अध्यादेश ही किसानों के अस्तित्व के लिए अजगर हैं।  

रही बात कानून और संविधान की तो यह बात तो स्वयं योगेंद्र यादव भी मानते हैं कि ‘केंद्र सरकार को ऐसी शक्ति कहां से मिल गई है जो वह कृषि और अन्तर्राज्यीय व्यापार के मसले पर कानून लाये। आखिर, कृषि राज्य-सूची के अन्तर्गत आने वाला विषय है। ये बात सच है कि खाद्य-सामग्रियों का वाणिज्य और व्यापार समवर्ती सूची के अन्तर्गत दर्ज है लेकिन अगर राज्यों को कृषि उपज विपणन समिति अधिनियम को पारित करने का अधिकार है तो फिर यह मानकर चलना चाहिए कि उन्हें इस अधिनियम के उल्लंघन का भी हक हासिल है। जहां तक संविधान का सवाल है, ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता जो माना जाये कि केंद्र सरकार के पास अनुबंध आधारित कृषि के बारे में कानून बनाने का अधिकार है। सो पहली नजर में तो यही जान पड़ता है कि एफएपीएएफएस असंवैधानिक है। 

सौ हाथ रस्सा, सिरे पर गाँठ यह कि किसान जहाँ मर्जी जाकर अपनी फसल बेच सकता है अब एमएसपी वाली जवाबदेही से सरकार मुक्त हो जाएगी। ‘गूगल’ के सर्च-इंजिन के मुताबिक दुनिया के सबसे मूर्ख प्रधानमंत्री ने यह योजना उन किसानों के लिए बनाई है जो अपने घर से आढ़ती के पास मंडी जाने के लिए भी पड़ोसी से पैसे उधार लेता है। 85% किसान छोटे किसान हैं और उनके पास बहुत थोड़ी ज़मीन है। जिससे उन्हें मुनाफ़ा तो नहीं ही हो रहा है बल्कि वह क़र्ज़ के बोझ तले दबते चले जा रहे हैं।

ज्यादा दूर ना जाएँ और सिर्फ पिछले साल की ही बात करें तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक साल 2019 में रोजाना 28 किसानों (खेत मालिक और कृषि मजदूर) और 89 दिहाड़ी मजदूरों ने आत्महत्या की है। ये जानकारी सरकारी संस्थान से मिली है। वर्ष 2019 में 10281 किसानों और खेतिहर मजदूरों ने जान दी है। जबकि 32,559 दिहाड़ी मजूदरों ने इस अवधि में आत्महत्या की है।

ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी को किसानों की आत्महत्या के इन आंकड़ों की ख़बर नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी अपने गोद लिए गाँव के किसानों की हालत से वाकिफ नहीं हैं। पर इन सब बातों को लेकर मोदी शर्मसार नहीं हैं, उन्हें परेशानी इस बात से है कि इस पर लोग बात क्यों करते हैं। जहां तक शर्मसारी का सवाल है तो प्रधानमंत्री के ही गोद लिए एक गांव की वस्तुस्थिति के बारे में खोजी रिपोर्ट करने वाली वरिष्ठ पत्रकार सुप्रिया शर्मा पर एफआईआर दर्ज किए जाने की ख़बर किसे शर्मसार करती है? 

पिछले दिनों अमेरिका ने भारत पर आरोप लगाया था कि उसकी कृषि सब्सिडी विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में दी गई जानकारी से काफी अधिक है। मोदी जी की फूक सरक गयी। उन्होंने महामृत्युंजय का पाठ किया, हवन-यज्ञ करवाए। एड़ियाँ उठा-उठाकर नारे लगाए-अब की बार ट्रम्प सरकार। फिर डब्ल्यूटीओ ने कह दिया कि सब्सिडी से व्यापार का स्वरूप विकृत होता है इसलिए इसे कम करना चाहिए। मोदी जी ने तुरंत कृषि अध्यादेशों का मोदी त्रिशूल तैयार करवाया।

प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका, विश्व बैंक या विश्व व्यापार संगठन (डबल्यूटीओ) को अपना 56 इंची का सीना दिखाने की हिम्मत करना तो दूर की बात है उनके सामने घुटनों के बल बैठे दिखाई देते हैं। वैसे भी डबल्यूटीओ के सीने पर लगे ‘मैक-वर्ल्ड’, ‘टर्बो-कैपिटलिज़्म’, ‘मार्केट फंडामेंटलिस्म’, ‘कैसिनों-कैपिटलिज़्म’ और ‘कैंसर-स्टेट कैपिटलिज़्म’ के तमगे देखकर बड़े-बड़े तानाशाहों के होश फ़ाख्ता हो जाते हैं। यह बात भी किसी से छुपी नहीं है कि डब्ल्यूटीओ ग्लोबल पूंजीवादी व्यवस्था की शीर्ष संस्था है जिसकी प्राथमिकता नियोक्लासिकल आर्थिक सिद्धान्त के आधार पर धनी देशों के हितों की रक्षा करना है और गरीब देश आँखें बंद करके उसकी जी-हजूरी में लगे हुए हैं और अपने देश की जनता की बलि दे रहे है। 

पंजाब ने कृषि अध्यादेशों का मोदी त्रिशूल तोड़ दिया है। देखना दिलचस्प होगा कि अन्य राज्य भी यह हौसला कब दिखाते हैं! 

(देवेंद्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल लुधियाना में रहते हैं।)

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