बीच बहस

किसान आन्दोलन: संविधान के आईने में विरोध-प्रदर्शन का अधिकार

1 और 2 दिसम्बर, 1948 को मूलभूत अधिकार कमेटी की रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान केएम मुंशी ने संविधान सभा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही थी कि वास्तव में सरकार की समालोचना करना लोकतंत्र का सारभूत तत्व होता है।

भारत के संविधान द्वारा सभी नागरिकों को तमाम मूलभूत अधिकार प्रदान किये गए हैं, जिनमें अभिव्यक्ति की आजादी, शांतिपूर्ण तथा अहिंसक तरीके से एकत्रित होकर सभा करना, तथा पूरे देश में स्वतंत्रतापूर्वक घूमने फिरने के अधिकार शामिल हैं।

यह सही है कि इन अधिकारों पर कुछ ‘यथोचित प्रतिबन्ध’ लागू होते हैं। उधर धारा 21 के तहत सभी नागरिकों के जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संरक्षण प्रदान किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने हिम्मत लाल के शाह (1973) मामले में इस बात की पुष्टि की थी कि राज्य के द्वारा कानून की आड़ में सार्वजनिक स्थल पर लोगों के इकठ्ठा होने पर रोक लगाने के जरिये सभा करने के मूलभूत अधिकार (राईट टू असेंबली) की अवहेलना नहीं की जा सकती है। नागरिकों के इस अधिकार को सुगम बनाने के लिए सरकार नियम बना सकती है तथा पब्लिक आर्डर बनाये रखने के लिए यथोचित प्रतिबन्ध लागू किये जा सकते हैं। लेकिन राज्य को अनुचित प्रतिबन्ध लागू करने का अधिकार नहीं होगा।

जस्टिस मैथ्यू ने अदालत के निर्णय से प्रबलता के साथ सहमति जताते हुए कहा था कि इकट्ठा होकर सभा करने की स्वतंत्रता का होना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का आवश्यक तत्व होता है। इस विचार की तह में असल में नागरिकों का यह अधिकार होता है कि लोग एक दूसरे से रूबरू होकर अपने विचार और समस्याओं के बारे में चर्चा कर सकें। विचार और समस्याओं की प्रकृति धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक अथवा सामाजिक हो सकती है।

उनके अनुसार, खुली जगहों पर तथा सार्वजनिक स्थलों पर इकट्ठा होकर सभा करना हमारे राष्ट्रीय जीवन की परंपरा का हिस्सा रहा है। सार्वजनिक सभा करने के अधिकार के कोई मायने नहीं रह जायेंगे यदि राज्य तथा स्थानीय प्रशासन उन सारे सार्वजनिक स्थलों को प्रतिबंधित कर दें, जहां अच्छी संख्या में लोग इकट्ठा होकर सभा करने का इरादा रखते हों।

उन्होंने यह भी कहा कि सार्वजनिक स्थल पर सार्वजनिक सभा आयोजित करने का अधिकार मूलभूत अधिकार होता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित किया हुआ यह एक लॉ है। संविधान की धारा 141 के तहत सभी से, चाहे वे नागरिक प्राधिकारी हों अथवा न्यायिक प्राधिकारी हों, यह अपेक्षा की जाती है कि वे सुप्रीम कोर्ट को संबल प्रदान करेंगे, अर्थात वे सब इस कानून का पालन करने के लिए बाध्य होंगे।

लेकिन हम पाते हैं कि किसान आन्दोलन के साथ पेश आने का केन्द्र तथा राज्य सरकारों का रवैया पूरी तरह उपरोक्त विधिक व्यवस्था के खिलाफ रहा है। न केवल वे संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं बल्कि किसानों को शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने, स्वतंत्रतापूर्वक आने जाने, तथा अपने विचारों को व्यक्त करने से रोका जा रहा है।

संविधान निर्माताओं द्वारा नागरिकों को मूलभूत अधिकार उपहार स्वरूप भेंट किये गए हैं तथा कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका सहित किसी को भी यह हक़ प्राप्त नहीं है कि उनको कमतर किया जा सके अथवा उनको छीना जा सके।

किसान नेताओं को, जिन्होंने पिछले दो महीनों से अधिक समय से शांतिपूर्ण आन्दोलन की अगुवाई की है, बिना वजह अपराधिक मामलों में फंसाया जा रहा है।

26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर हुयी हिंसा पूरी तरह से एक शर्मनाक घटनाक्रम था। उसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिये। लेकिन जिन लोगों का उस घटनाक्रम से कोई वास्ता नहीं था उनको बलि का बकरा नहीं बनाया जाना चाहिए।

लाल किले की सुरक्षा में हुयी चूक के मामले से दिल्ली पुलिस किस प्रकार अपना पल्ला झाड़ सकती है? हम यह बात शायद ही कभी जान पायें कि कैसे इतनी संख्या में लोगों ने लालकिले में घुसकर देश की छवि को धूमिल किया और उनको पुलिस के किसी प्रभावी प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा।

विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों तथा उनके लीडरान ने एक शांतिपूर्ण ट्रैक्टर परेड करने का इरादा किया था। कुछ लोगों ने लेकिन शांतिपूर्ण परेड को लक्ष्य से भटकाने का प्रयास किया।

आशा की जानी चाहिए कि पुलिस तथा खासकर अदालतें इस खेल की तह तक पहुंचकर दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करेंगी।

किसान वर्ग अपने भविष्य के बारे में चूंकि आशंकित है इसलिए वह विरोध प्रदर्शन के अपने अधिकार का इस्तेमाल कर रहा है। बैरिकेड तथा कीलें गाड़कर तथा पुलिस बल की अतिरिक्त कुमक लगाकर उनके जज्बे को कमजोर नहीं किया जा सकता है।

यह बड़ा ही दुखद है कि उनके आन्दोलन की निंदा करके उसको भारत विरोधी मुहिम का हिस्सा करार दिया जा रहा है। हमें आशा है कि इस मामले में देश का संप्रभु वर्ग बुद्धिमत्ता से परिचालित होगा।

(सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे का इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख। इसका हिंदी अनुवाद जनवादी महिला समिति की मधु गर्ग ने किया है।)

This post was last modified on February 7, 2021 2:58 pm

Share
Published by
%%footer%%