नेताओं की इस भाषा से तो गली के गुंडे भी शर्मा जाएं

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दिल्ली के चुनाव प्रचार का स्तर गांव के किसी पंचायत से भी नीचे गिर गया है। नेता ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं जिसे कोई ग्राम प्रधानी का प्रत्याशी भी बोलने से शर्माएगा। ये नेता भी कोई सामान्य नहीं हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल या फिर देश की सबसे बड़ी पंचायत में बैठने वाले लोग इसमें शामिल हैं। एक सज्जन हैं अनुराग ठाकुर। हालांकि उन्हें किस लिए वित्त मंत्रालय में जूनियर मंत्री बनाया गया यह बात देश आज तक नहीं जान सका। वैसे भी अर्थशास्त्र से ठाकुर का 36 का रिश्ता है। ऊपर से उन्हें देश की बिगड़ी अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने की जिम्मेदारी सौंप दी गयी है।

इतना बोझ तले दबे ठाकुर दो दिन बाद संसद में पेश होने वाले बजट में भला क्या सहयोग करते। लिहाजा उन्होंने अपनी पूरी भड़ास जनता पर ही निकालनी शुरू कर दी जो दिल्ली की एक सभा में देश के गद्दारों को…..के नारे के तौर पर सामने आया। यह भाषा न केवल सभ्य समाज के खिलाफ है बल्कि देश के संविधान की धज्जियां उड़ाकर उसे तार-तार कर देता है। लेकिन खुद अनुराग ठाकुर को यह नारा देने से पहले दो बार सोचना चाहिए था। अगर यही बात इतिहास में लागू कर दी जाती तो उनके तमाम राजनीतिक पुरखे समय से पहले मौत के घाट उतार दिए जाते।

सबसे पहले उस सावरकर को गोली मारी जाती जिन्होंने न केवल अंग्रेजों से छह-छह बार माफी मांगी थी बल्कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब पूरा देश अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहा था और सुभाष चंद्र बोस सिंगापुर में भारतीय सैनिकों को लेकर आजाद हिंद फौज बना रहे थे उस समय सावरकर अंग्रेजी सेना में सैनिकों की भर्ती के लिए जगह-जगह कैंप लगवा रहे थे। यह गोली उस हेडगेवार समेत गोलवलकर को मारी जाती जिन्होंने 52 सालों तक आरएसएस के हेडक्वार्टर पर तिरंगा नहीं फहरने दिया।

यह गोली जनसंघ के पहले अध्यक्ष और नेहरू कैबिनेट में मंत्री रहे श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सीने में उतरती जिसने देश का विभाजन करने वाली मुस्लिम लीग के साथ तब के संयुक्त बंगाल में सरकार बनायी थी और खुद उसके उप मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन इन नेताओं के मुंह का बवासीर है कि घटने की जगह बढ़ता ही जा रहा है। ठाकुर के बोल की नफरती गंध अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि सत्तारूढ़ जमात के एक और सदस्य ने सांप्रदायिक बयान से माहौल को विषाक्त कर दिया। पार्टी के दिल्ली से सांसद प्रवेश वर्मा ने शाहीन बाग की तरफ इशारा करते हुए राजधानी के लोगों को डराने वाले अंदाज में वह बात कही जो किसी सभ्य समाज का शख्स सोच भी नहीं सकता है।

उन्होंने कहा कि आज अगर शाहीन बाग को शांत नहीं किए तो कल उसके लोग आपके घरों में घुस-घुस कर महिलाओं का बलात्कार करेंगे। दरअसल जिसके दिमाग में जो कुछ चलता रहता है वही उसके मुंह से निकलता है। बलात्कारी जमात से ताल्लुक रखने वाले प्रवेश वर्मा से इससे ज्यादा की उम्मीद भी नहीं की जा सकती है। जनता तो क्या किसी का बलात्कार करेगी। लेकिन ऐसा कुछ कहने से पहले वर्मा को अपने गिरेबान में जरूर झांक लेना चाहिए था। क्योंकि उनके अपनों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। आसाराम से लेकर चिन्यमानंद और सेंगर से लेकर राम रहीम अगर गिना जाएगा तो नाम खत्म नहीं होंगे और अंगुलियां कम पड़ जाएंगी। इसलिए बात बिल्कुल उसके उलट है। देश में अगर बीजेपी की सत्ता और बनी रही तो इन जैसे बलात्कारियों का न केवल मनोबल बढ़ेगा बल्कि उनकी संख्या में भी बढ़ोत्तरी होगी। दरअसल यह सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है। और इसके सूत्रधार पार्टी और सरकार के सेकेंड इन कमांड अमित शाह हैं। इसकी शुरुआत उन्होंने ही की थी।

जब उन्होंने कहा था कि ईवीएम पर बटन इतने जोर से दबाइये कि करंट शाहीन बाग को लगे। तभी इस तरह के बयानों के लिए रास्ता साफ हो गया था। लेकिन शाह को यह बात जरूर समझनी चाहिए कि करंट शाहीन बाग को नहीं बल्कि नागपुर को लगने जा रहा है। ये सारी स्थितियां बताती हैं कि बीजेपी नेताओं ने संविधान को ताक पर रख दिया है और पूरी जमात एक गिरोह की तरह काम कर रही है। जिसकी अगुआई सुप्रीम कोर्ट से तड़ीपार हो चुका शख्स कर रहा है। और उसे गुजरात दंगों से जुड़े उस शख्स का संरक्षण हासिल है जो आज भी लोगों को कपड़ों से पहचान लेता है। यह काम कोई ऐसा ही शख्स कर सकता है जिसे सांप्रदायिक खेल का पुराना अनुभव हो। लेकिन इन सारे मामलों में जिस एक संस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बनती है वह है सुप्रीम कोर्ट। उसने देश के संविधान की सुरक्षा और संरक्षा की जिम्मेदारी ले रखी है। और सभी के लिए न्याय की कैसे गारंटी की जाए यह सुनिश्चित करना उसका काम है। लेकिन इतिहास के इस नाजुक मोड़ पर अपनी भूमिका में न खड़ा होकर उसने सभी देशवासियों को निराश किया है।

सुप्रीम कोर्ट की प्राथमिकता में संविधान को चोट पहुंचाने वाले मुद्दों की जगह कुछ ऐसे सवाल हैं जो ऐन-केन-प्रकारेण इन्हीं ताकतों को मजबूत करते दिख रहे हैं। नहीं तो भला इस दौर में गुजरात में ओड में हुए दंगों के आरोपियों को जमानत देने का क्या तुक बनता है। इससे पहले सबरीमाला पर पुनर्विचार पीठ गठित कर उसने इन्हीं ताकतों का हौसला बढ़ाया था। और उसके बाद अयोध्या पर आए फैसले ने कोर्ट की मंशा को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया था। कश्मीर के 370 का सवाल अभी भी उसके एजेंडे में नहीं है। नागरिक संशोधन कानून पर जब पूरा देश जल रहा है तो मामले की सुनवाई करने की जगह सुप्रीम कोर्ट सारी जिम्मेदारी जनता पर डालकर खुद नीरो बन गया है।

(लेखक महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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