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Categories: बीच बहस

निहित स्वार्थों की भेंट चढ़ गया सुशांत की मौत का मामला

फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह की मुंबई में संदिग्ध मौत हुई। मुंबई पुलिस ने पोस्टमार्टम कराकर जांच प्रारंभ कर दी। मीडिया ने पहले फिल्म-माफिया गठजोड़ के कारण सुशांत द्वारा आत्महत्या करने की खबर चलाई। इसके पटना में सुशांत के पिता ने रिया चक्रवर्ती के परिवार पर सुशांत को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने तथा उसके धन का दुरुपयोग का मुकदमा लिखाया। अब प्रारंभ हुई राजनीति। उच्चतम न्यायालय के आदेश पर  सीबीआई जांच हो रही थी, यकायक प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) जांच में कूद गया। अगली सुबह नारकोटिक्स विभाग भी नमूदार हो गया, जिसने रिया चक्रवर्ती को गिरफ्तार करके अपनी उपादेयता सिद्ध कर दी।

फिलहाल ड्रग्स की लेन-देन के मामले में गिरफ़्तार अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती को 22 सितंबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। रिया चक्रवर्ती की गिरफ़्तारी के बाद भी सुशांत मामले में अभी तक यह साफ़ नहीं हो सका है कि उसकी मौत हत्या थी या उकसा कर कराई गई आत्महत्या। सीबीआई और ईडी ने अपनी जांच का परिणाम अभी घोषित नहीं किया है। यह कहना है उत्तरप्रदेश के अवकाश प्राप्त आईजी बद्री प्रसाद सिंह का।

गौरतलब है कि सुशांत सिंह की मौत के एक महीने बाद 25 जुलाई को उनके पिता ने पटना के राजीव नगर थाने में रिया के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराई थी। उसमें परिवार ने रिया चक्रवर्ती पर पैसा ऐंठने और आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया था, लेकिन रिया की गिरफ़्तारी के बाद भी ये सवाल वहीं पर जस का तस बना हुआ है। सुशांत के परिवार ने रिया पर जो आरोप लगाए, उनका जवाब नहीं मिला है। सुशांत की मौत में रिया की भूमिका तो साबित नहीं हुई है? फिर जांच में अभी तक क्या मिला? रिया की गिफ़्तारी के बाद भी ये सवाल बरकरार है कि ड्रग्स का सुशांत सिंह राजपूत की मौत से क्या लेना देना है?

सुशांत सिंह डिप्रेशन के शिकार थे। ये बात रिया चक्रवर्ती ने एक निजी चैनल को दिए अपने इंटरव्यू में बताई थी। उनका जिन डॉक्टरों से इलाज चल रहा था, उनसे जुड़े दो डॉक्टरों के कमेंट भी मीडिया में दिखाए गए, लेकिन सुशांत के परिवार ने खुल कर इस बात को कभी स्वीकार नहीं किया बल्कि इन्हें बेबुनियाद बताया है। उनके परिवार के वकील विकास सिंह ने 3 सितंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि सुशांत 2019 तक बिल्कुल ठीक थे।

जब से रिया सुशांत की ज़िंदगी में आईं तब से सुशांत को मानसिक परेशानी हुई। रिया ने ऐसे हालात बनाए कि सुशांत की मानसिक स्थिति और ख़राब होती चली गई। अगर 2013 में सुशांत की तबीयत ख़राब हुई होगी तो ये मामूली सी बात होगी और ये डिप्रेशन नहीं कहा जा सकता।

इन तमाम आरोप-प्रत्यारोपों के बीच अभी तक ऐसी कोई बात किसी जांच करने वाली एजेंसी ने पुख़्ता प्रमाण के साथ नहीं कही है कि सुशांत की मानसिक स्थिति (डिप्रेशन) कैसी थी और उनकी मौत का इससे क्या सम्बंध है। सुशांत गांजा पीते थे तो सुशांत की मौत में गांजा पीने की क्या भूमिका है यह भी अभी तक साफ़ नहीं हुआ है।

रिटायर्ड आईजी बद्री प्रसाद सिंह ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है कि नियमानुसार पटना पुलिस को यह अभियोग विवेचना के लिए मुंबई पुलिस को भेजनी थी, क्योंकि प्रथम सूचना में वर्णित सभी आरोपों का घटनास्थल मुंबई से था, लेकिन बिहार में आसन्न विधानसभा चुनाव के कारण सुशांत को बिहार का लाल बता कर बिहार पुलिस स्वयं विवेचना के लिए मुंबई गई, जहां उसे सहयोग न मिलना था न मिला।

बिहार के बड़बोले डीजीपी ने एक पुलिस अधीक्षक वहां भेजा, जिसे महाराष्ट्र सरकार ने क्वारंटीन कर दिया। अब लड़ाई बिहार तथा महाराष्ट्र की सरकारें लड़ने लगीं। अपना कानूनी पक्ष कमजोर देखकर बिहार सरकार ने इस मुकदमे की जांच सीबीआई से कराने की संस्तुति की, जिसे कानूनी प्रावधानों का उलंघन करते हुए केन्द्र ने जांच सीबीआई को सौंप दी।

नियमानुसार सीबीआई जांच, केन्द्र सरकार संबंधित राज्य की अनुशंसा पर ही कर सकता है और संबंधित राज्य महाराष्ट्र था न कि बिहार। मामला उच्चतम न्यायालय  गया, जिसने सभी पक्षों को सुनकर सीबीआई को जांच सौंप दी।

सुशांत के पक्ष में सिने तारिका कंगना राणावत ने जोशीले बयान दागे प्रतिउत्तर में महाराष्ट्र की स्वयंभू हितचिंतन शिवसेना ने कंगना को चेतावनी दी तथा बृहन्मुंबई के तेजतर्रार अधिकारियों ने कंगना के मुंबई के कार्यालय को अवैध निर्माण बताकर जमींदोज कर दिया। कंगना को उच्च न्यायालय ने अस्थाई राहत तो दी, लेकिन दफ्तर ध्वस्त होने के बाद।

इस संपूर्ण प्रकरण में मुंबई पुलिस तथा महाराष्ट्र सरकार ने यदि जांच में सुशांत के परिवार वालों को विश्वास में लेकर मुकदमा मुंबई में ही कायम कर लिया होता तो पटना में मुकदमा न लिखा जाता। बिहार पुलिस को मुकदमा लिख कर नियमानुसार प्रथम सूचना अग्रिम जांच के लिए मुंबई पुलिस को भेजना चाहिए था। स्वयं विवेचना का उनका निर्णय विधि सम्मत नहीं था।

यदि दोनों पुलिस में मतभेद था तो डीजीपी बिहार ‌मुंबई पुलिस आयुक्त या अन्य वरिष्ठ अधिकारी से अथवा बिहार के मुख्यमंत्री महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से बात करते, लेकिन ऐसा नहीं ‌हुआ। शायद अलग राजनीतिक दल की सरकारों के कारण। बिहार सरकार ने अवैधानिक रूप से इस प्रकरण को सीबीआई को सौंपने की बात की थी।

डीजीपी बिहार शालीनता का परिचय न देकर, प्रतिदिन मीडिया में अपनी तीरंदाजी करते रहे। बिहार में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। सुशासन बाबू को बिहारियों का मसीहा साबित करने का मौका मिल गया। केंद्र सरकार को भी बिहार की सीबीआई जांच की मांग स्वीकार नहीं करना चाहिए थी। दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट में स्पष्ट है कि सीबीआई जांच के लिए संबंधित प्रदेश की सहमति पर ही केन्द्र सीबीआई जांच का आदेश दे सकता है।

घटना महाराष्ट्र की थी सो महाराष्ट्र का अनुरोध आवश्यक था, अन्यथा किसी राज्य की घटना को दूसरे राज्य में मुकदमा लिखा कर उस राज्य की सहमति से सीबीआई जांच हो जाएगी। यह संघीय ढांचे को कमजोर करेगा। पश्चिमी बंगाल में भी चुनाव में देर नहीं है। कल को ममता दीदी रिया को बंगाल की बेटी बना कर चुनाव में उतर सकती हैं।

उन्होंने कहा है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया का व्यवहार मुकदमा लिखाने के बाद से ही रिया पर लगे सभी आरोप सही मानकर मुंबई पुलिस को निकम्मा, भ्रष्ट तथा हत्यारों का साथी साबित करती रही। सीबीआई, ईडी, नारकोटिक्स ब्यूरो की सभी कार्रवाइयों का आंखों देखा हाल बताती रही। इतनी एकपक्षीय, निकृष्ट रिपोर्टिंग मैंने आज तक नहीं देखी। यह चौथा खंभा तो अन्य तीन खंभों से भी अधिक सड़ चुका है।

रिया की गिरफ्तारी तो हो गई है, पर उसे ड्रग्स केस में कोई दंड मिल सकेगा इस पर भी सवालिया निशान हैं। एनसीबी ने रिया के पास से कोई ड्रग्स सीज नहीं किया है। पूरा केस इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस पर बनाया गया है। जहां तक वॉट्सऐप चैट में ड्रग्स की बातचीत है तो भले ही ड्रग्स की बात सामने आई हो, लेकिन क्या जिस माल को लेकर बात हो रही है वो डिलीवर हुआ था या नहीं? ये बताना भी एनसीबी के लिए मुश्किल होगा। जहां तक एनसीबी को दिए गए बयानों की बात है तो ये कोर्ट में मान्य होंगे या फिर नहीं इसका मामला उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ में लंबित है।

वैसे भी रिया ने सत्र अदालत में डाले गए जमानती प्रार्थना पत्र में अपने बयान को दबाव डालकर लिए जाने का आरोप लगाया है और यह भी कहा है कि एनसीबी के केवल पुरुष अधिकारियों ने उससे पूछताछ की है, कोई महिला अधिकारी इसमें शामिल नहीं थी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

This post was last modified on September 10, 2020 11:17 am

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