बुद्ध के बिहार पर “बामियानी तालिबान” का साया

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जब देश में सरकारें और संवैधानिक संस्थाएं कमजोर पड़ जाती हैं। अपने पथ से भटक जाती हैं। भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाती हैं। अपनी जिम्मेदारी से ज्यादा उनका ध्यान सुख-सुविधाओं और आरामतलबी पर हो जाती है। तभी देश में अराजकता फैलती है। और लोग तालिबानी न्याय करने लगते हैं। मोदी सरकार के साथ ही राज्य की सरकारें भी जमीनी मुद्दों को अनदेखा कर जातिवाद और धर्मवाद में उलझ कर रही गई हैं। उसका नतीजा तालिबानी हरकतों के तौर पर सामने आ रहा है। इस बीच बिहार में ढेर सारी ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्हें इस श्रेणी में रखा जा सकता है।

ऐसा नहीं कि महज बिहार ही इस तरह की वारदातों का केंद्र है। पूरा देश इसकी चपेट में है। हां इसके रूप अलग-अलग हैं। कहीं यह जय श्रीराम के नारे के नाम पर हो रहा है। तो कहीं पर इसने जाति और धर्म की चादर ओढ़ रखी है। कुछ जगहों पर ये वारदातें क्षेत्र के कंधे पर सवार हैं। तो कहीं ये भाषा की सवारी कर रही हैं। आदमी की जान सबसे सस्ती हो गयी है। हर संवेदनशील इंसान इस प्रश्न से रूबरू है कि आखिर इंसान इतना क्रूर कैसे हो गया है? देश की सर्वोच्च अदालत ने इन मामलों को संज्ञान में जरूर लिया है। और उसने आठ राज्यों को नोटिस भी जारी की है। लेकिन उसका कोई नतीजा निकलता नहीं दिखता है। क्योंकि उसके आदेशों को न तो सरकारें गंभीरता से लेती हैं और न ही दौलतमंद लोग।

अब जब मॉब लिंचिंग की घटनाओं को रोकने तथा 2018 के दिशानिर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग उठी तो सुप्रीम कोर्ट भी नींद से जागा है। उसने उत्तर प्रदेश, जम्मू कश्मीर,आंध्र प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, बिहार, झारखंड, असम, दिल्ली को नोटिस भेजा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल फिर वही है। क्या ये सरकारें सुप्रीम कोर्ट की नोटिस को गंभीरता से लेंगी? क्या मॉब लिंचिंग की वारदातों पर अंकुश लगेगा? क्या कानून लोगों में अपने प्रति भरोसा पैदा कर सकेगा?

बिहार में हुई वारदातों पर अगर नजरे दौड़ाएं तो रोहतास के दावथ थाना क्षेत्र में स्थित मलियाबाग में बच्चा चोरी के आरोप में दो महिलाओं पर बेकाबू भीड़ टूट पड़ी और उन्हें जमकर पीटा। रोष इतना ज्यादा था कि मौके पर पहुंचे पुलिस वाले जब उसे इलाज के लिए अस्पताल ले जाने की कोशिश किए तो लोग उन पर ही टूट पड़े।

भोजपुर जिले के बगही गांव में चार युवकों की किडनी और बच्चा चोर की शक के बिना पर पिटाई हो गयी। अगर कुछ बुजुर्ग हस्तक्षेप न करते तो उनकी जान चली जाती।

नवादा में मंगलवार को एक महिला को पहले डायन बताया गया और फिर उसकी पीट-पीट कर हत्या कर दी गयी। उसे चाकओं से भी गोदा गया। उससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह थी कि मारने वाले सभी उसी के गांव के रहने वाले थे। हत्यारी भीड़ का कहना था कि उसके चलते ढाई साल की एक बच्ची की मौत हो गयी। इस दौर में प्रेम करना तो मानों गुनाह हो गया है। पटना के फुलवारीशरीफ में इंटर के एक छात्र को इसका खामियाजा अपनी जान देकर चुकाना पड़ा।

सुपौल में एक युवती की हत्या कर भाग रहे युवक को ग्रामीणों ने वहीं खेत कर दिया। पटना में लोगों ने हत्या आरोपी युवक के घर पर धावा बोल दिया। भभुआ में महज चोरी की घटना पर एक युवक की बेरहमी से पिटाई कर दी गयी। भीड़ का गुस्सा जब इतने भी शांत नहीं हुआ तो उसने युवक के गुप्तांग पर पेट्रोल डाल कर उसे असह्य दर्द के लिए छोड़ दिया।

अभी एक सप्ताह भी नहीं बीते हैं जब छपरा में मवेशी चोरी के आरोप में उग्र भीड़ ने तीन युवकों की पीट-पीट कर मार डाला। उसी दिन वैशाली में भी इसी तरह की दो घटनाएं घटीं। भीड़ के शिकार एक युवक पर बैंक के लूटने का आरोप था। इसी इलाके में मंदिर में चोरी के आरोप में एक महिला को पहले निर्वस्त्र किया गया फिर उसकी पिटाई की गयी।

अराजकता किस कदर परवान पर है उसकी एक दूसरी नजीर पीएमसीएच में देखने को मिली। यहां अधीक्षक की कुर्सी पर एक महिला जाकर बैठ गई। जब उपाधीक्षक ने उससे परिचय पूछा तो महिला ने कहा कि तुम उपाधीक्षक हो लिहाजा अपना काम करो। मैं आज से पीएमसीएच की अधीक्षक हूं। दरअसल अधीक्षक का कार्यभार उपाधीक्षक ने संभाल रखा है। बाद में किसी तरह पीएमसीएच प्रशासन ने महिला को वहां से बाहर निकाला।

क्या है भीड़ की यह उन्मादी हिंसा और क्या हैं इसके कारण? इसकी सामान्य परिभाषा तो यही है कि जब भीड़ नियंत्रण से बाहर जाकर एक या अधिक व्यक्तियों पर किसी अपराध के संदेह में हमला करती है तो उसे मॉब लिंचिंग कहते हैं। सामान्यत: ये घटनाएं बिना परिणाम सोचे-समझे किसी अपराध के बाद या अफवाह के कारण होती हैं। लोग किसी को भी अपराधी समझ लेते हैं और फिर कानून हाथ में ले लेते हैं।

बड़ा सवाल यह है कि आखिर लोग कानून अपने हाथों में क्यों लेते हैं? मामला कहीं न कहीं कानून व्यवस्था व पुलिस के प्रति अविश्वास से जुड़ा है। प्रख्यात पत्रकार सुरेंद्र किशोर कहते हैं कि चोरी की घटना और पकड़े गए चोर की पीट-पीटकर हत्या के समय भीड़ के दिमाग में पुलिस की निष्क्रियता और घटना को लेकर आक्रोश हावी रहता है।

ऐसी घटनाओं के पीछे कानून का समाप्त होता डर भी है। अगर भीड़ की हिंसा में शामिल लोगों में यह भय हो कि इसकी उन्हें सजा मिलेगी और वह किसी भी रूप में नहीं बच पाएंगे। तो ऐसी वारदातों पर लगाम लगायी जा सकती है। आज की तारीख में सरकारों के मुद्दे से भटकने तथा संवैधानिक संस्थाओं के सरकारों के इशारे पर काम करने से लोगों के मन से कानून का भय लगातार कम हुआ है।

यही सब कारण है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के फैसले को लागू करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान गृह मंत्रालय को नोटिस जारी किया। जब सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2018 में भीड़ की हिंसा रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे। तब कोर्ट ने राज्य सरकारों को याद दिलायी थी कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी उनकी है। कोर्ट ने संसद से भी भीड़ की हिंसा के खिलाफ सख्त कानून बनाने के लिए कहा था। सच्चाई यह है कि अब तक इस तरह की वारदातों की केंद्र व राज्य सरकारों ने अनदेखी की है। प्रधानमंत्री मोदी मामलों की भर्त्सना तक सीमित रहे हैं।

मोदी ने अपने दोनों कार्यकालों में एक बार भी मॉब लिंचिंग के मामले का संज्ञान नहीं लिया है। वह घटनाओं की भर्त्सना करते रहे और इस तरह के मामले होते रहे। जय श्रीराम पर हिंसा होती रही और मोदी चुप बैठे रहे। चुप रहते भी क्यों नहीं ? खुद भी तो विभिन्न मंचों से जय श्रीराम के नारे का उद्घोष करते रहे हैं। दरअसल मोदी सरकार अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबा देना चाहती है। और उस लिहाज से ये घटनाएं उसके लिए किसी वरदान से कम नहीं रही हैं। जो न केवल सारी समस्याओं से लोगों का ध्यान हटा दे रही हैं बल्कि एक ऐसे मुद्दे पर समाज में ध्रुवीकरण कर रही हैं जो सत्तारूढ़ पार्टी का बुनियादी एजेंडा है। लिहाजा न रोजगार की बात होगी न शिक्षा की। न अस्पताल के बारे में पूछा जाएगा और न ही जीवनस्थितियों के सुधार के बारे में।

(लेखक चरण सिंह पत्रकार हैं और आजकल एक दैनिक समाचार पत्र में कार्यरत हैं।)     

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