Subscribe for notification
Categories: बीच बहस

लॉकडाउन की भेड़चाल और शातिर-अदृश्य गड़ेरिया

महामारी से बचने के लिए लॉक डाउन का आधार क्या है?

अगर चीन ने वुहान में लॉकडाउन नहीं किया होता तो कोविड-19  से लड़ने के लिए दुनिया किस प्रकार की रणनीति अपनाती? क्या तब भी विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) शारीरिक दूरी और आइसोलेशन जैसे वैज्ञानिक और अनुभव-सिद्ध उपायों से आगे बढ़कर  राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की जैसे अमानुषिक और अवैज्ञानिक कदमों की सलाह देता या उसकी सराहना करता?
इन सभी प्रश्नों का उत्तर है – नहीं।

पिछली एक सदी में अनेक ऐसी महामारियां फैली हैं, जिनका प्रसार विश्वव्यापी रहा है। इस विषय पर आगे बढ़ने से पहले इनमें से कुछ को याद कर लेना उपयोगी होगा। इनके नाम संभवत: कुछ ऐसी चीजों की ओर ध्यान दिलाएंगे, जिन्हें कोविड -19 के शोरगुल में हम भूल गए हैं। इनमें से तीन महामारियां ऐसी हैं, जो अब भी वैश्विक स्तर पर जारी हैं। कोविड -19 चौथी है। इनमें से कुछ के लिए न अभी तक वैक्सीन ईजाद किया जा सका है, न ही कोई प्रमाणिक दवा है।

मुख्य महामारियों के नाम हैं :  इंसेफेलाइटिस महामारी (1915-26 ई.), स्पेनिश फ्लू महामारी (1918-20 ई.), एशियन फ्लू महामारी (1957-1958 ई.), कालरा महामारी (1961-75 ई.), हांगकांग फ्लू महामारी (1968-70 ई. ), एचआईवी/एड्स महामारी (1981 ई. से अभी तक जारी) सार्स महामारी (2002-04 ई.), स्वाइन  फ्लू महामारी (2009-10 ई.), रिस्पेरेटरी सिंड्रोम कोरोना वायरस महामारी (2012 ई. से अभी तक जारी), ईबोला महामारी (2013 ई. से अभी तक जारी) और जिका वायरस महामारी (2015-16)।

इनमें से किसी महामारी में लॉक-डाउन जैसी कार्रवाई नहीं की गई।

कोविड -19 के मामले में इस अभूतपूर्व अफरातफरी का मुख्य कारण फेसबुक, ट्विटर, गूगल आदि टेक जाईंट्स द्वारा “कृत्रिम बुद्धिमत्ता” (आर्टिफिशियल इंटलीजेंस) का निरंतर विकास है।

व्यवसायिक  लाभ के लिए एलगोरिद्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सहारे आभासी दुनिया में मानव – समूहों को अलग-अलग इको-चैंबरों में बंद कर उनके अवचेतन मन द्वारा इच्छित सूचनाओं की बौछार की जा रही है। इस प्रकिया ने नगण्य मृत्यु दर वाले कोविड-19 को ऐसी अभूतपूर्व आपदा का रूप दे दिया, जिसके मनुष्यता पर ज्ञात- इतिहास में आए किसी भी संकट से अधिक घातक साबित होने की सम्भावना है (देखें, मेरा “कोविड 19 और सूचना प्रोद्योगिकी के दैत्य : नए जाल के साथ नया शिकारी” शीर्षक लेख )।

इसी प्रकार, लॉकडाउन की घोषणा भले ही भारत समेत अनेक देशों के राष्ट्रध्यक्षों ने स्वयं की हो, लेकिन यह उनका स्वयं का सुचिंतित निर्णय नहीं था, बल्कि एक भेड़चाल थी, जिसके आगे-आगे कुछ अदृश्य गड़रिए चल रहे थे। एक धर्मग्रंथ में ईसा नामक एक गड़रिया करूणा और मानवता का पथप्रर्दशक है, लेकिन महामारी का भय दिखाने वाले इन गड़रियों की भूमिका हमें एक अंधे कुएँ की मेड़ तक पहुंचाने की थी।

गड़ेरिया कौन था? इस प्रश्न के उत्तर में तथ्यों की लगभग सभी कड़ियां दुनिया के सबसे अमीर आदमियों में शुमार, परोपकार व्यवसाय के अगुआ बिल गेट्स की ओर इशारा करती हैं। वास्तव में इन कड़ियों को देखना भौंचक और मानसिक तौर पर अस्त-व्यस्त कर देने वाला अनुभव है। इस ओर देखने पर आप पाएंगे कि बिल एंड मिलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन (बीएमजीएफ)  प्राय: हर जगह मौजूद है, चाहे वह कथित महामारी की भविष्यवाणी हो, ‘जर्म-वार’ का ट्रायल हो, लॉकडाउन जैसे कड़े कदमों की वकालत हो, इन कड़े कदमों के लिए आधार उपलब्ध करवाने वाले अध्ययनों (मॉडलों) की प्रत्यक्ष-परोक्ष फंडिंग हो, या वैक्सीन की खोज, निर्माण और व्यवसाय हो। बल्कि इससे भी बहुत दूर और भीतर तक।

कथित महामारी ने डिजिटल इकोनॉमी को बढ़ाने तथा मनुष्य की आजादी को सीमित करने व डिजिटल सर्विलांस के लिए मौका उपलब्ध करवाया है। गेट्स फ़ाउंडेशन इन सभी की प्रक्रिया को तेज करने के लिए पहले से ही सक्रिय रहा है। इन चीजों का विरोध करने वाली आवाज़ों को दबाने और अविश्वनीय बनाने की कोशिश करने वाले अनेकानेक सुचिंतित प्रोजेक्टों को भी यह फ़ाउंडेशन चला रहा है।

इन कड़ियों को देखने पर स्वाभाविक सवाल उठता है कि ग़रीबों केस्वास्थ्य को लेकर चिंतित दिखने वाले, अनेक गरीब देशों को अनुदान देने वाले, बिहार के एक छोटे से गांव में गरीब की झोपड़ी में बैठ कर उनकी व्यथा सुनने वाले बिल गेट्स के इस रूप को हम कैसे देखें?  दुनिया भर में करोड़ों लोग बिल गेट्स में चतुर लोमड़ी और नदी किनारे घात लगा कर बैठे बूढ़े भेड़िये का चेहरा देखते हैं। इनमें विभिन्न देशों के कुछ अतिवादी-दक्षिणपंथी विचारधाराओं के संगठित समूह भी शामिल हैं।

बिल गेट्स जब भी अपने सोशल मीडिया एकाउँटों और ब्लॉगों पर कोविड-19 की भयावहता या वैक्सीन की अनिवार्यता के बारे में कुछ लिखते हैं, तो उन्हें एक षडयंत्रकारी के रूप में चित्रित करने वाली टिप्पणियों की बाढ़ आ जाती है। आम लोगों व दक्षिणपंथी समूहों के अतिरिक्त बिल गेट्स के अतिक्रमण कारी रूप का संकेत स्वास्थ्य, पर्यावरण, वैश्विक अर्थ-तंत्र आदि के अनेक विशेषज्ञ भी करते रहे हैं।

कुछ तथ्य देखें। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) के लिए बिल और मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन का स्थान पिछले कई वर्षों से किसी भी देश की चुनी हुई सरकार से अधिक महत्वपूर्ण है।

डबल्यूएचओ को इस साल तक सबसे अधिक पैसा अमेरिका सरकार से प्राप्त होता था। उसके बाद मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन का स्थान था। तीसरा स्थान ब्रिटेन का था। लेकिन इस साल कोविड के मामले में चीन का पक्ष लेने के आरोप में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उसकी फंडिंग बंद कर दी है। अब गेट्स फाउँडेशन डबल्यूएचओ का सबसे बड़ा डोनर है।

मीडिया-संस्थानों की कमजोरी से अच्छी तरह वाकिफ गेट्स फाउँडेशन का मीडिया-मैनेजमेंट पर बहुत बल रहता है। वह मीडिया संस्थानों को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभावित करने के लिए यह निरंतर नए तरीके ईजाद करता रहा है।

इस संबंध में अमेरिका के वॉक्स डॉट काम की स्वास्थ्य संवाददाता जूलिया बेलुज़ ने कुछ वर्ष पहले प्रकाशित “मीडिया गेट्स फाउंडेशन से प्यार करता है, लेकिन विशेषज्ञों को इस पर संदेह है’ शीर्षक  रिपोर्ट पढ़े जाने लायक है। उन्होंने अपनी पड़ताल में पाया कि शोध-पत्रिकाओं में विशेषज्ञों द्वारा गेट्स फाउंडेशन की गतिविधियों पर कुछ गंभीर सवाल उठाए जाते रहे हैं, लेकिन मुख्यधारा की मीडिया में उनकी कोई चर्चा प्राय: नहीं होती। सिर्फ मीडिया ही नहीं, बहुत कम ही विषय-विशेषज्ञ भी इस फ़ाउंडेशन के खिलाफ बोलने की हिम्मत जुटा पाते हैं।

जूलिया बेलुज़ जेनेवा में 19-24 मई, 2014 के दौरान आयोजित वर्ल्ड हेल्थ एसेंबली में बतौर पत्रकार शामिल हुईं थीं। जब उन्होंने वहां आमंत्रित विश्व-प्रसिद्ध स्वास्थ्य विशेषज्ञों व अन्य लोगों से फ़ाउंडेशन के बारे में पूछना चाहा तो अधिकांश कन्नी काटने लगे। उन्होंने देखा कि अक्सर लोग इस संबंध में कोई भी बात ऑन रिकार्ड नहीं करना चाह रहे थे क्योंकि उन्हें मौजूदा समय में फ़ाउंडेशन से फंडिंग मिल रही थी, या फिर वे अतीत में गेट्स के लिए काम कर चुके थे।

फ़ाउंडेशन पर अपने एक शोध में क्विन मैरी कॉलेज, लंदन में ग्लोबल हेल्थ की प्रोफेसर सोफी हरमन ने भी पाया था कि इस विषय को नजदीक से जानने वाला “हर आदमी गेट्स फाउंडेशन को चुनौती देने से डरता है क्योंकि कोई भी नहीं चाहता कि फाउंडेशन से मिलने वाली उनकी फंडिग बंद हो।”

भारत में यही हालत है। भारत में सैकड़ों 
स्वास्थ्य संबंधी संस्थाएं गेट्स फाउंडेशन के अनुदान से चल रही हैं। आईटीवी नेटवर्क और संडे गार्डियन के एडिटोरिल डायरेक्टर माधव दास नलपत अपने एक लेख में  बताते हैं कि भारत में स्वास्थ्य संवाददाताओं पर फाउंडेशन की ओर से अपने पक्ष में जाने वाली खबरों की लगातार बमबारी की जाती है।

आंध्र प्रदेश की मासूम गिनी पिग

बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन द्वारा प्रायोजित संस्था ‘प्रोग्राम फॉर एप्रोप्रिएट टेक्नोलॉजी इन हेल्थ’ (पाथ) ने वर्ष 2009 में भारत में आदिवासी और दलित बच्चियों पर सरवाइकल कैंसर के वैक्सीन का का कथित तौर पर ‘डेमोनस्ट्रेशन’ किया था, जिसमें कई बच्चियों की मौत हो गई थी। बाद में जांच में पाया गया था कि ‘डेमोनेस्ट्रेशन’ के नाम पर दरअसल नियमों को धता बता कर वैक्सीन का क्लिनकल ट्रायल किया जा रहा था।

इस मामले में राज्य सरकारों के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और भारत की स्वास्थ्य संबंधी शीर्ष संस्था इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की जो भूमिका सामने आई थी, वह हिला देने वाली है।

सरवाइकल कैंसर (ग्रीवा कैंसर) सर्विक्स की लाइनिंग, यानी गर्भाशय के निचले हिस्से को प्रभावित करता है।  ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) नामक वायरस से होने वाली यह बीमारी यौन-संबंध तथा त्वचा के संपर्क से फैलती है।

‘प्रोग्राम फॉरएप्रोप्रिएट टेक्नॉलॉजी इन हेल्थ’ (पाथ) को इसके वैक्सीन के ट्रायल के लिए ऐसी बच्चियों की आवश्यकता थी, जिन्हें मासिक-धर्म आरंभ नहीं हुआ हो। उन्होंने इसके लिए सरकारी स्कूलों की छात्राओं व अनुदान प्राप्त सरकारी हॉस्टलों में रह रही 9 से 13 वर्ष की उम्र की बच्चियों को चुना। वैक्सीन के दुष्प्रभावों के बारे में न बच्चियों को बताया गया, न ही उनमें से कई के माता-पिता से सहमति ली गई। बल्कि इससे संबंधित नियमों का उल्लंघन करते हुए हॉस्टल के वार्डन से ट्रायल के लिए निर्धारित फार्म पर सहमति ली गई। जिन कुछ बच्चियों के निरक्षर माता-पिता से कथित तौर पर सहमति ली गई, उनसे अंग्रेजी में लिखे हुए कागजातों पर फर्मों पर अंगूठे का निशान ले लिया गया। इन कागजों को न पढ़ सकते थे, न ही उन्हें बताया गया कि इनमें क्या लिखा है। इनमें से अधिकांश आदिवासी परिवारों की थीं, जबकि कुछ दलित व पिछड़ा वर्ग की थीं। इनमें अधिकांश मजदूरी करके गुजर बसर करते थे।

यह ट्रायल तेलंगाना (तत्कालीन आंध्रप्रदेश) के खम्मम जिला और गुजरात के बडोदरा जिला में किया गया था।
खम्मम में सात बच्चियों की ट्रायल के दौरान मौत हो गई, जबकि लगभग 1200 मिर्गी का  दौरा, पेट में मर्मांतक पीड़ा,  सिरदर्द और मूड-स्वींग जैसे साइड इफेक्ट का शिकार हुईं।

महिला सशक्तिकरण के लिए काम कर रहे ‘सामा’ नामक एक स्वयंसेवी संगठन के संज्ञान लेने और निरंतर सरकार को पत्र लिखने व जन सभा करने के बाद इसकी जांच शुरू हुई।

आरंभ में इसकी जांच आंध्रप्रदेश के स्वास्थ्य विभाग ने की, जिसमें बच्चियों की मौत की जिम्मेवारी से पाथ को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि इन बच्चियों की मौतें अलग-अलग ऐसे कारणों से हुईं, जिसे वैक्सीन ट्रायल से सीधे तौर पर नहीं जोड़ा जा सकता। जबकि सच्चाई यह थी, वैक्सीन ट्रायल के दौरान मारी गई बच्चियों का पोस्टमार्टम तक नहीं करवाया गया था। बिना पोस्टमार्टम के यह पता लगाना असंभव था कि उनकी मौत वैक्सीन से हुई अथवा नहीं।

स्वयंसेवी संगठनों द्वारा निरंतर आवाज़ उठाने पर भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसकी जांच के लिए समिति का गठन किया, जिसने पाथ की लापरवाही तथा भारत के संरक्षित जनजातीय समुदायों की लड़कियों को इस ट्रायल में शामिल करने पर सवाल उठाए थे। इस समिति ने 2011 में जारी अपनी रिपोर्ट में पाया कि वैक्सीन ट्रायल के लिए प्रतिभागियों की सहमति लेने के दौरान उन्हें इसके बारे में अच्छी तरह जानकारी नहीं दी गई थी। न ही ट्रायल करने वाली संस्था ने ऐसे ट्रायलों के लिए बने उचित मानकों का प्रयोग किया था। लेकिन इस समिति ने भी ‘पाथ’ को मौतों की जिम्मेवारी से अलग रखने की हर संभव कोशिश की। 

वर्ष 2011 में इस मामले की जांच के लिए भारत सरकार ने स्थाई संसदीय समिति (PSC)  के माध्यम से करने का फैसला किया। 30 अगस्त, 2013 को भारतीय संसद में पेश की गई समिति की रिपोर्ट में जो तथ्य सामने आए, उसने पाथ, की आपराधिक संलिप्तता तो समाने आई ही, भारत की स्वास्थ्य संबंधी सर्वोच्च शोध व कार्यान्वयन संस्था इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर), ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई), एथिक्स कमेटी (इसी ) की कार्यप्रणाली ही संदेह के घेरे में आ गई।

संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में परीक्षण के दौरान मरने वाली लड़कियों का पोस्टमॉर्टम करने में विफल रहने के लिए पाथ और आईसीएमआर को दोषी ठहराया। साथ ही, समिति ने पाया कि महिलाओं के स्वास्थ्य की रक्षा करने के प्रयास के बजाय, पाथ विदेशी दवा कंपनियों का एक सचेत उपकरण था, जो भारत सरकार को अपने सार्वभौमिक वैक्सीन कार्यक्रम (Universal Immunisation Programme) में एचपीवी वैक्सीन को शामिल करने के लिए राजी करने के लिए लॉबिंग कर रहा था। इसके तहत इस वैक्सीन को निर्धारित अंतराल पर लोगों काे दिया जाता, जिसका भुगतान भारत सरकार करती।  समिति ने कहा कि इस संबंध में “देश में चिकित्सा अनुसंधान के लिए सर्वोच्च निकाय के रूप में कार्यरत इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) अपनी अनिवार्य भूमिका और जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह से विफल रही है।” ..” बल्कि इसने “अति उत्साहित होकर  ‘प्रोग्राम फॉर एप्रोप्रिएट टेक्नोलॉजी इन हेल्थ’ (पाथ) की साजिशों के सुचिंतित फैसिलेटर की भूमिका निभाई और इसके लिए अन्य सरकारी एजेंसियों के अधिकार-क्षेत्रों का उल्लंघन तक किया, जिसके लिए यह कड़ी निंदा और कड़ी कार्रवाई की पात्र है।” समिति ने पाया कि आइसीएमआर पाथ को लाभ पहुंचाने के लिए उत्सुक था कि उसने सरकार का अनुमोदन मिलने से पूर्व ही इस वैक्सीन को देश में प्रयोग करने के बारे में  करार (एमओयू) पर हस्ताक्षर कर दिए थे।

गौरतलब है कि पाथ को धन उपलब्ध करवाने वाले बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन से आईसीएमआर को भी अकूत धन अनुदान के रूप में प्राप्त होता है, जिसमें वैज्ञानिकों के सभा-सेमिनार और ग्लोबल यात्रा-आवास आदि का व्यय भी शामिल रहता है। गेट्स फाउंडेशन की वेबसाइटों पर आईसीएमआर को मिलने वाले इस दान का ब्योरा देखा जा सकता है।

भारत में इसी आईसीएमआर के पास कोविड संबंधी नीतियों की कमान है। इस संस्थान द्वारा किए जा रहे फैसलों में बिल मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन की नीतियों का प्रभाव साफ तौर पर देखा जा सकता है, चाहे वह लॉक डाउन को कई चरणों में बढ़ाते जाने की वकालत करना हो या कोविड -19 से हुई मौतों की गणना के लिए फाउंडेशन की नीतियों के अनुकूल गाइड लाइन जारी करना।

दरअसल, इसमें संदेह नहीं कि वैश्विक स्वास्थ्य के क्षेत्र में गेट्स फाउंडेशन ने अनेक सकारात्मक भूमिकाएं भी निभाई हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब इसके परोपकारी कार्य और व्यापार एक-दूसरे में घुलने मिलने लगते हैं।

एक निजी संगठन के रूप में, गेट्स फाउंडेशन केवल अपने तीन मुख्य ट्रस्टियों: बिल, मेलिंडा और वॉरेन बफेट के प्रति जवाबदेह है। जनता या विभिन्न देशों के चुने हुए प्रतिनिधियों के प्रति इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है।  फ़ाउंडेशन वैक्सीन और दवा निर्माता कंपनियों  (बिग फर्मा)में बड़े पैमाने पर निवेश करता है तथा अनेक पड़तालों में पाया गया है कि इसने  संबंधित कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाली नीतियाँ बनाई और उन्हे आक्रामक ढंग से गरीब और विकासशील देशों पर थोपा।

अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि अनेकानेक शाखाओं वाला यह फ़ाउंडेशन आज इतना विशालकाय हो चुका है कि इसकी गतिविधियाें को पड़ताल और निगरानी के दायरे में लाना असंभव सा हो गया है।

बहरहाल, इस लेख में हम यह देखने की कोशिश करें कि किस प्रकार भारत का लॉकडाउन सिर्फ दुनिया का सबसे सख्त लॉकडाउन ही नहीं था, बल्कि सुझाए गए एक अमानवीय, अवैज्ञानिक निदान का अंधानुकरण मात्र था। अगर कोई महामारी थी, तब भी भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले गरीब  देश के लिए लॉकडाउन जैसा कदम, महामारी की तुलना में बहुत अधिक घातक साबित होने वाला था, जो हुआ भी।

आवश्यकता से अधिक नकल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत 22 मार्च, 2020 को जनता-कर्फ्यू का आह्वान कर अपने इक़बाल, विपक्ष की दिशाहीनता और जनता की मासूमियत का लिटमस टेस्ट किया था। जिसके शत-प्रतिशत सफल होने के बाद 25 मार्च से भारत में दुनिया का सबसे सख्त और लंबा लॉकडाउन रहा। यहां दरअसल लॉकडाउन नहीं, बल्कि वास्तविक कर्फ्यू था, जिसका संकेत प्रधानमंत्री ने स्वयं अपने 24 मार्च की उद्घोषणा में ‘कर्फ्यू जैसा’ कहकर दे दिया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर अपनी जनता के सामने स्वयं को एक विजनरी विश्व नेता के रूप प्रस्तुत करने की कोशिश करते दिखते हैं। लेकिन सच्चाई यह थी कि थाली-ताली बजाने से लेकर मोमबत्ती जलवाने तक का उनका हर कदम सिर्फ यूरोपीय देशों की नकल था। उन अमीर देशों के मध्यवर्ग ने लॉक डाउन के दौरान स्वतः एक दूसरे का मनोबल बढ़ाने के लिए स्फूर्त ढंग से ताली और थाली बजाई थी, जिसे मोदी ने भारत में एक लोकोन्मुख राजकीय उत्सव के रूप में पेश किया।

इन भावनात्मक मामलों में ही नहीं, बल्कि अन्य तकनीकी, वैज्ञानिक और रणनीतिक मामलों में भी भारत सरकार के पास कुछ भी मौलिक नहीं था। सरकार विश्व-स्वास्थ्य संगठन (डबल्यू.एच.ओ.) और बिल एंड मिलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन जैसे संगठनों द्वारा दिए जा रहे निर्देशों का कठपुतली की भांति पालन कर रही थी। प्रधानमंत्री की कार्रवाइयों में जनता के प्रति जवाबदेही का कोई पुट नहीं था, बल्कि वे सिर्फ विश्व-समुदाय द्वारा पीठ थपथापाए जाने के लिए आतुर थे।

डबल्यू.एच.ओ. की मातृसंस्था यूनाइटेड नेशंस की वेबसाइट पर 24 मार्च को प्रकाशित डबल्यूएचओ के मार्गदर्शन के अनुसार, पूरे भारत में लॉकडाउन” शीर्षक खबर बताती है कि किस प्रकार भारत ने इस अतिवादी कदम की घोषणा करते हुए अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं को भूल कर सिर्फ डबल्यू.एच.ओ.के निर्देशों का पालन किया।

इसी प्रकार एक मई से देश को ग्रीन और रेड जोन में बांटने की कवायद भी भारत के नौकरशाहों ने नहीं खोजी थी, बल्कि यह फ्रांस के तीन प्राध्यापकों द्वारा 6 अप्रैल को प्रकाशित गणितीय मॉडल पर आधारित थी, जिसका पालन करने की सलाह वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की वेबसाइट पर दी गई थी। इन प्राध्यापकों ने यह मॉडल वुहान के अनुभव को ध्यान में रखते हुए बनाया था।

इस मॉडल में दरअसल ग्रीन जोन के बहाने गैर-संक्रमण वाले उन इलाकों को सबसे पहले खोलने की जरूरत बताई गई थी, जहां से ‘लेबर-मार्केट’ को मजदूरों की सप्लाई मिल सके। प्रवासी मजदूरों को औद्योगिक महानगरों से वापस अपने घर न लौटने देने की कोशिश भी इसी रणनीति का हिस्सा थी। भारत में इसी मॉडल के अंधानुकरण के आधार पर देश को विभिन्न रंगों के जोन में बाँटने की कोशिश की गई, जो असफल रही।

लेकिन मोदी के इन कदमों को भारतीय मीडिया और कुछ विदेशी संस्थाओं से खूब प्रशंसा मिली। प्रशंसा करने वालों में डबल्यू.एच.ओ.के अतिरिक्त सिर्फ बिल गेट्स भी थे, जिन्होंने अप्रैल के दूसरे सप्ताह में पत्र लिख कर मोदी की तारीफ की।

गेट्स ने न सिर्फ लॉकडाउन की तारीफ की बल्कि कहा कि उन्हें “खुशी हुई कि भारत सरकार कोविड-19 की प्रतिक्रिया में अपनी असाधारण डिजिटल क्षमताओं का पूरी तरह से उपयोग कर रही है और कोरोना वायरस ट्रैकिंग, संपर्क ट्रेसिंग और लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने के लिए सरकार ने ‘आरोग्य सेतु’ डिजिटल ऐप लॉन्च किया है। हम आपके नेतृत्व और आपकी सरकार के सक्रिय कदमों की सराहना करते हैं।

अनेक रिपोर्ट्स बताती हैं कि विश्व स्वास्थ संगठन, बिल गेट्स की ऐसी जेबी संस्था बन चुका है तथा गेट्स की दिलचस्पी स्वास्थ्य और वैक्सीन बाजार के अतिरिक्त लोगों की डिजिटल ट्रेसिंग में भी है।

अपने पत्र में बिल गेट्स ने जिस कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग एप को लागू करने के लिए मोदी की तारीफ की, उसकी अविश्वसनीयता और इसके माध्यम से लोगों की आजादी पर पहरे का संदेह अनेक देशों में व्यक्त किया जा रहा है। कई देशों ने नागरिकों के विरोध के कारण इसे लागू नहीं किया है, जबकि कई देशों ने इस एप को इस प्रकार बनाया है ताकि आंकड़े केंद्रीकृत रूप से जमा न हों, बल्कि उन्हें इस प्रकार विकेंद्रित रूप से जमा किया जाए कि उन पर संबंधित व्यक्ति का अधिक से अधिक नियंत्रण रहे। भारत में इन आंकड़ों पर पूरी तरह केन्द्रीय नियंत्रण रखा गया है।

इसके बाद 14 मई को मोदी और बिल गेट्स ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए बातचीत की, जिसके बिना आवाज के फुटेज भारतीय टी.वी. चैनलों को उपलब्ध करवाए गए। इसलिए हमारे पास यह जानने का कोई साधन नहीं है कि उन दोंनों के बीच वास्तव में क्या-क्या बातचीत हुई। राज्य सभा टी.वी. की वेबसाइट पर इस बातचीत का जो ब्योरा प्रसारित हुआ है, उसमें बताया गया कि  “उन्होंने कोविड -19 पर वैश्विक प्रतिक्रिया, वैज्ञानिक नवाचार और वैश्विक समन्वय के महत्व पर चर्चा की ताकि वे (भारत और गेट्स फ़ाउंडेशन) मिलकर इस महामारी का मुकाबला कर सकें।” मोदी ने बिल गेट्स को कहा कि “गेट्स फाउंडेशन कोविड-19 के बाद दुनिया की जीवन शैली, आर्थिक संगठन, सामाजिक व्यवहार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के प्रसार के तरीकों में परिवर्तन के विश्लेषण का नेतृत्व करे। भारत अपने स्वयं के अनुभवों के आधार पर इस तरह के विश्लेषणात्मक अभ्यास में योगदान देकर खुश होगा।”

यह बातचीत दो देशों के बीच की नहीं, बल्कि 140 करोड़ जनसंख्या वाले प्रभुत्वसंपन्न लोकतंत्र भारत और एक ऐसी संस्था के प्रमुख के बीच की थी, जिसकी गैरजिम्मेदारी और सनक के खिलाफ पिछले एक दशक से अधिक समय से दुनिया भर में आवाजें उठ रही हैं। भारत के प्रधानमंत्री द्वारा उपरोक्त बातचीत में बिल गेट्स को “कोविड-19 के बाद दुनिया की जीवनशैली, आर्थिक संगठन, सामाजिक व्यवहार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के प्रसार के तरीकों में परिवर्तन के विश्लेषण का नेतृत्व” का प्रस्ताव देने के गंभीर निहितार्थ हैं।

पिछले ही महीने इटली की संसद में सांसद ‘सारा कुनियल’ ने बिल गेट्स को मानवता का अपराधी बताया है। सारा कुनियल ने सदन में आधुनिक राजनीतिक दर्शन के जनक माने जाने वाले ब्रिटिश दार्शनिक थॉमस हॉब्स (5 अप्रैल, 1588 ई.- 4 दिसंबर, 1679 ई.) को उद्धृत करते हुए कहा कि “हम लोगों को निश्चित रूप से समझ में आ गया है कि हमें अकेले वायरस से नहीं मरना है। हमें आपके कानूनों की बदौलत गरीबी से पीड़ित, दुर्गति को प्राप्त होने और मरने दिया जाएगा, और  [हॉब्स के सर्वश्रेष्ठ शासन के सिद्धांत की तरह] सारा दाेष नागरिकों पर मढ़ दिया जाएगा [कि उन्होंने स्वयं ही अपनी रक्षा के लिए स्वतंत्रता का हरण करवा लेना पसंद किया था]।”

कुनियल इटली की राजधानी रोम से सांसद हैं। उन्होंने अपने भाषण के अंत में अध्यक्ष को संबोधित करते हुए कहा कि  “आप मेरी ओर से प्रधानमंत्री ग्यूसेप कोंट को सलाह दें कि अगली बार जब भी उन्हें परोपकारी बिल गेट्स का फोन आए, तो वह उस कॉल को मानवता के खिलाफ अपराध के लिए सीधे इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट में फारवर्ड करें। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो हमें बताएं कि हमें उन्हें किस रूप में परिभाषित करना चाहिए? क्या हम उन्हें एक ऐसे दोस्त वकील के रूप में परिभाषित करें, जो अपराधी से सलाह लेता है?” कुनियल ने अपने भाषण में गेट्स फांउडेशन द्वारा भारत में गेट्स द्वारा किए गए वैक्सीन ट्रायल का भी जिक्र किया।

कुनियल के इस भाषण की सोशल-मीडिया पर ख़ासी चर्चा हुई है, जिसे दबाने के लिए गेट्स फाउंडेशन और टेक-जायंट्स (गूगल, फेसबुक, ट्विटर आदि) के पैसे से संचालित ‘फैक्ट चेकिंग’ संस्थाएं जोरशोर से सक्रिय हैं। मैंने ऊपर उद्धृत लेख में इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली के बारे में भी बताया है।

गेट्स के बारे में अगर आप इंटरनेट पर कुछ सर्च करेंगे तो इन सबके ऊपर दर्जनों फैक्ट चेकिंग संस्थाओं के लिंक आएंगे, जिनमें तथ्यों को चयनित रूप से प्रस्तुत कर गेट्स से संबंधित हर नकारात्मक खबर का खंडन प्रस्तुत किया गया होगा। सूचना-तंत्र के डिजिटल होने का यह एक बड़ा खतरा है कि उसे केंद्रीकृत रूप से संचालित किया जा सकता है। यह सरकारी सेंसरशिप और परंपरागत मीडिया-मोनोपोली की तुलना में कई गुना घातक है।

ऐसी फैक्ट चेकिंग संस्थाएं अनेक राजनीतिक संगठनों-व्यक्तियों व अन्य निहित स्वार्थों से प्रेरित संस्थाओं के पैसों से चलाई जा रही हैं। हालांकि ऐसी भी संस्थाएं हैं, जिनके उद्देश्य किंचित जन-पक्षधर हैं, लेकिन प्राय: तकनीकी और आर्थिक रूप से उतने संपन्न नहीं है कि सर्च इंजनों की फीड में उनके रिजल्ट ऊपर आ सकें। उद्देश्य चाहे जो हो, लेकिन ये संस्थाएं विचारों, तर्क-प्रणालियों, तथ्यों और भावनाओं के सहज संचरण में बाधक हैं और जानने और बोलने जैसे मूलभूत नागरिक अधिकारों के दमन में किसी राज-व्यवस्था द्वारा प्रायोजित सेंसरशिप की तरह ही; बल्कि उससे अधिक ही नुक़सानदेह साबित हो रही हैं। कोरोना-काल के बाद की दुनिया में इनका प्रभाव और बढ़ेगा।

चिंताजनक बात यह है कि भारतीय समाज, राजनीति और मीडिया में इन चीजों की कोई चर्चा नहीं है, जबकि पिछले कुछ वर्षों से विभिन्न अफ्रीकी सरकारों के प्रतिरोध के कारण भारत का स्थान बिल मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन, अमेरिकी सरकार की संस्था ‘सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन’ (सी.डी.सी.) आदि की पसंदीदा प्रयोगस्थली के रूप में ऊपर चढ़ता जा रहा है।

जबकि यह लॉक डाउन उन धूर्त गड़रियों के लिए कुछ ऐसी नई रोमांचक मंजिलों के सफर की शुरुआत बन सकता है, जहां हर दीवार पर हमारे लिए बदहाली और मौत लिखा होगा।

[प्रमोद रंजन की दिलचस्पी सबाल्टर्न अध्ययन और आधुनिकता के विकास  में रही है। ‘साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’, ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, ‘महिषासुर : मिथक व परंपराएं’ और ‘शिमला-डायरी’ उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। संपर्क : +919811884495, janvikalp@gmail.com]

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

This post was last modified on June 13, 2020 12:16 pm

Share