बीच बहस

राजसत्ता के लिए अतिरिक्त ताकत और जनता के लिए अतिरिक्त संकट साबित हुआ कोविड

कोविड से कई चीजें बदली हैं ये बात सच है, लेकिन किसी भी तरह का संरचनात्मक या कोई बड़ा बदलाव समाज, राजनीति या अर्थनीति में हुआ है ऐसा मानना थोडा मुश्किल है। स्थितियों का मूल्यांकन दो भागों में बांटकर किया जा सकता है- एक लॉक डाउन के दौरान, और दूसरा लॉक डाउन खुलने के बाद। लॉक डाउन की स्थिति में सब कुछ या तो ठहरा हुआ रहा या फिर किसी तरह चलता रहा। इस अवधि में होने वाले मामूली बदलावों को एक व्यापक सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक बदलाव के रूप में नहीं स्वीकारा जा सकता। लॉक डाउन खुलते ही सभी चीजें वैसे ही चलती रहीं जैसे वो पहले चला करती थीं। उनमें कुछ भी नया नहीं था। कई समाज विज्ञानियों का मानना है कि कोविड ने पूरे तंत्र को पूरी तरह से बदल डाला है, जब हमने उनसे कुछ उदाहरण मांगे तो वे इधर-उधर की दैनिक मामूली बातों को गिनवाने लगे। कोई भी ठोस संरचनात्मक बदलाव के उदाहरण उनके पास नहीं थे।

हाँ, कुछ बदलाव हुए हैं, लेकिन वे सत्ता पक्ष की तरफ से हुए और वे किसी भी रूप में कोविड से प्रेरित या प्रभावित होने के कारण नहीं हुए, बल्कि उनकी पहले की योजनाओं का ही क्रियान्वयन मात्र था। कोविड ने उन्हें मात्र एक बेहद ही अनुकूल “अवसर” उपलब्ध करवाया। इस “अवसर” में विरोध के स्वर की संभावनाएं कम और उसके कुचल दिए जाने की ताकत भरपूर थी। आम आदमी की पड़ताल करें तो न तो उनके पारंपरिक संस्थाओं में कुछ बड़ा बदलाव हुआ और न उनकी सामुदायिक चेतना में कुछ व्यापक घटा-बढ़ा। महामारी से उनका भय भी अस्थायी था, सत्ता के लिए उनका गुस्सा भी क्षणिक ही रहा, और जीवन-मृत्यु को देखने की दृष्टि भी जस की तस ही रही।     

थोड़ी नजर राजनीतिक तंत्र पर डालते हैं। क्या राजनीति से जुड़ी संस्थाओं ने कोविड से कोई सबक लेते हुए अपने कार्य-प्रणाली या तंत्र में किसी भी तरह का बदलाव किया? या फिर क्या इस दौरान या बाद में कोई ऐसी राजनीतिक या लोकतान्त्रिक संस्था या चेतना का निर्माण हुआ जिसने कि मौजूदा तंत्र को गंभीरता से प्रभावित किया हो? जवाब बिल्कुल ही नकारत्मक होगा। इन समयों में भी राजनीतिक तंत्र ने अपनी सत्ता की भूख को ही अधिक प्रदर्शित किया। लोग लगातार मर रहे थे उस समय भी सभी राजनीतिक दल राष्ट्रीय हितों के बजाय दलगत राजनीति में आकंठ डूबे हुए रहे। उनकी निष्ठा जनता से अधिक अपने-अपने दलों और व्यक्तिगत स्वार्थों से ही जुड़ी रही। वैक्सीन को लेकर भी राजनीति होती रही और जो आज भी जारी है।

सत्ता-पक्ष ने इसे अपनी महान उपलब्धि की तरह पेश किया तो विपक्ष ने इसकी उपलब्धता या अनुपलब्धता को लेकर अपनी राजनीतिक पैंतरेबाजी दिखाई। उत्तर-प्रदेश में कोविड के चरम काल में भी पंचायत चुनाव हों या बंगाल के चुनाव सबमें राजनीतिक दलों ने साबित किया कि सत्ता ही उनका अंतिम लक्ष्य है, न कि जनता का जीवन और उनका मुद्दा। उनके चुनाव प्रचार के तरीके रहे हों, या फिर चुनाव आयोग के मतदान की प्रणाली, या फिर राजनेताओं की सत्तालोलुप राजनीतिक चेतना सब पहले की ही तरह रहा। माना जाता है कि हर मृत्यु हमें जीवन की क्षणभंगुरता का अहसास कराती है, लेकिन यह बात कम-से-कम राजनीतिक तंत्र पर कत्तई लागू नहीं होती। “शवों की नदियों” से भी इनका हृदय परिवर्तन नहीं होता।

इसी तरह समाज के जो भी हिस्से होते हैं, जैसे विवाह, नातेदारी या फिर और भी कोई अन्य सामाजिक सम्बन्ध वे वैसे ही निभाए जा रहे हैं जैसे कोविड से पहले निभाए जाते थे। इन संबंधों के भीतर के झूठ-फरेब हों या संबंधों के लिए समर्पण सब जैसे थे वैसे ही बने रहे। विवाह में बारात की संख्या का घटा दिया जाना, विवाह का सादगीपूर्ण माहौल में होना या फिर कुछेक विवाहों में कुछ परम्पराओं जैसे दहेज आदि के टूटने को सामाजिक परिवर्तन नहीं माना जा सकता, क्योंकि तात्कालिक कानूनी दबावों के कारण इसका प्रभाव तो पड़ा, लेकिन यह प्रभाव स्थायी नहीं रहा। लॉक डाउन खुलते ही, और अनगिनत जगहों पर लॉक डाउन के दौरान भी विवाह में कोविड पूर्व तरीकों और परम्पराओं को ही अपनाया गया। आम आदमी की तो बात ही छोड़िये, राजकीय अधिकारियों और राजनेताओं आदि के कई मामले सामने आये थे जिसमें उन्होंने अपने घरेलू समारोहों में कोविड-नियमों को भी ताक पर रखकर आयोजन किया था। इसी तरह दहेज आदि का इस दौरान नहीं लिया जाना कोई नई बात नहीं, क्योंकि कमोबेश ये सब पहले भी होते ही रहे हैं। सामाजिक संबंधों की जो भी संस्थाएं थी, न तो वे ही बदलीं और न उनके कार्य करने की प्रणाली।  

आर्थिक तंत्र को अगर देखें तो इसमें भी कुछ भी व्यापक बदलाव कोविड के कारण नहीं हुआ, जैसा कि हमने पहले ही कहा कि इसमें जो कुछ भी हुआ वह पहले की योजनाओं का ही विस्तार था। जैसे कृषि बिल हो या फिर ऑनलाइन मोड का प्रचलन आदि। नया कृषि बिल तो नव-उदारवादी रूप धारण किये अर्थतंत्र की पूर्व की ही माँग थी। कोई भी प्रावधान जिसमें राज्य का अधिकतम जन-सरोकार हो वह नव-उदार होते अर्थतंत्र के मूल्यों के उलट है। नव उदार अर्थतंत्र में राज्य का अपने लोक-कल्याणकारी स्वरूपों को त्यागकर वैश्विक बाजार के लिए प्रबंधक की भूमिका में आना एक अपरिहार्य शर्त होती है। “आत्म-निर्भर-भारत” का मूल भाव ऐसे ही अर्थ तंत्र से है जिसमे राज्य अपने सामाजिक सरोकारों से मुक्त होना चाहती है। और इस अवधि में ऐसे तमाम जनविरोधी बिलों को लाये जाने का मकसद बाजार और पूंजीपतियों के हितों के प्रति निष्ठा दिखलाना ही है। इसका कोविड या जनता से कोई विशेष सम्बन्ध नहीं। इसी तरह ऑनलाइन मोड का प्रचलन भी ‘डिजिटल-इंडिया’ के सन्दर्भ में ही देखा जाना चाहिए, कोविड ने इसमें आंशिक भूमिका निभाई।

ऑनलाइन मोड में बहुत कुछ होते रहने के बाद भी लोगों को अब भी इसकी आदत नहीं पड़ी है, वे उसी पारंपरिक शैली की तरफ लौटना चाहते हैं जिसमें वे वर्षों से जीते आ रहे थे। ऑनलाइन होना और ऑफलाइन होना एक पीढ़ीगत आदत है जिसे दो-तीन वर्षों में पूरी तरह से नहीं लाया जा सकता। अर्थतंत्र का तबाह होना और अचानक से फैली बेरोजगारी के बीज भी उसी तंत्र में मौजूद हैं जिसमें पूंजीपतियों के हितों को ध्यान में रखा जाता हो, न कि आम जनता को। अचानक से आई एक नए किस्म की बेरोजगारी, जिसे वर्ल्ड बैंक ने ‘द-न्यू-पुअर’ कहा है, पहले से ही चली आ रही बेरोजगारी और भुखमरी की कड़ी मात्र है, जिसे पूरी दुनिया में कोविड-काल की ख़राब नीतियों ने खाद-पानी दिया। ऐसे आर्थिक संकट को बड़े आर्थिक बदलाव के रूप में देखना ठीक नहीं माना जा सकता।

यह समस्या का बढ़ना है और फिर समस्या का खुलकर सामने आ जाना, न कि कोई नई समस्या का अचानक से आ जाना। इन सबों के बावजूद न तो आर्थिक नीतियों में कोई बड़ा बदलाव देखा जा सकता है और न इनके किसी संरचना में ही कोई बड़ा रूपांतरण हुआ है। राजकीय या वैश्विक अर्थतंत्र पहले की ही तरह पूंजी केन्द्रित है। इसी तरह एक समय में मजदूरों के ‘रिवर्स-माइग्रेशन’ को एक संरचनात्मक बदलाव के रूप में देखा जा रहा था, लेकिन लॉक-डाउन खुलते ही धीरे-धीरे वे फिर से अपने पुराने गंतव्य पर लौट गए या आज भी लौटने के लिए अनुकूल समय के इंतजार में हैं; घर लौटकर भी वे नहीं लौटे। न गाँव का वीरानापन बदला और न शहर की बदसूरत समृद्धि। 

महामारी ने आखिर कोई बड़ा बदलाव क्यों नहीं किया? यह बड़ा विषय है, लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि महामारी राजसत्ता के लिए एक अतिरिक्त-ताकत (सरप्लस पॉवर) है और जनता के लिए अतिरक्त-संकट (सरप्लस क्राइसिस); और बड़े बदलाव के लिए सत्ता पक्ष के मन-मिजाज का भी महत्त्व होता है।

(यह लेख पंजाब स्थित लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के डॉ. केयूर पाठक और तमिलनाडु सेंट्रल यूनिवर्सिटी के डॉ. चित्तरंजन सुबुधि द्वारा लिखा गया है।)

This post was last modified on July 4, 2021 8:13 am

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