प्रधानमंत्री अगर आंदोलनों के नाम से चिढ़ते हैं, आंदोलनजीवी जैसा शब्द गढ़ते हैं, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। सत्ता और आंदोलन के बीच तो छत्तीस का आंकड़ा होता ही है। लेकिन कॉरपोरेट और एनजीओ के परस्परविरोधी व्याकरण भी कम दिलचस्प नहीं होते।
ये दोनों ही सेक्टर अपने-अपने ढंग से समाज की बेहतरी में योगदान करते हैं। आर्थिक समृद्धि लाने और समाज को संसाधनों से लैस करने में कॉरपोरेट सेक्टर की भूमिका प्रत्यक्ष और प्रभावी होती है। फिर भी, सच यही है कि कॉरपोरेट सेक्टर का यह योगदान अमूमन साइड इफेक्ट के रूप में ही आता है। उसका यह घोषित और मुख्य मकसद नहीं होता। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो कॉरपोरेट सेक्टर समाज को बेहतर, समृद्ध और न्यायसंगत बनाने के तर्क से संचालित नहीं होता। वह अधिकतम संभव लाभ के तर्क का अनुसरण करता है। इसके लिए न तो किसी तरह की शर्मिंदगी महसूस करता है, न ही इसे छिपाता है।
एनजीओ सेक्टर की कहानी इससे एकदम अलग है। कौन सा संगठन अपने दावों, वादों और कसौटियों पर कितना खरा उतरता है, यह एक अलग सवाल है, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि एनजीए सेक्टर में सक्रिय हर छोटे-बड़े संगठन का मकसद समाज के किसी न किसी हिस्से को बेहतर बनाना, उस हिस्से से जुड़े लोगों की जिंदगी में क्वॉलिटी लाना, उनकी गरिमा सुनिश्चित करना होता है। इस अभियान के तहत सहज ही व्यवस्था या तंत्र की खामियों को दूर करने के साथ-साथ इससे जुड़े लोगों की सोच-समझ और व्यवहार को बेहतर बनाना इसके एजेंडे का हिस्सा बन जाता है।
ऐसे में आश्चर्य नहीं कि इस सेक्टर में सक्रिय पुराने और अनुभवी लोगों की एक साझा चिंता यह होती है कि नए आ रहे युवाओं की पर्सनैलिटी में ग्रोथ कैसे सुनिश्चित की जाए। कैसे ये युवा जल्द से जल्द अपना काम संभाल लें और अपने बाद आ रहे युवाओं को भली-भांति प्रशिक्षित भी करें। कुल मिलाकर इसका परिणाम यह होता है कि इंसान को बेहतर बनाने या बेहतर इंसान तैयार करने का काम इस सेक्टर के एजेंडे पर लगातार बना रहता है।
यह एक अच्छी स्थिति है, जिसका अपेक्षाकृत बुरा पहलू यह है कि व्यवहार में नए या बेहतर इंसान का निर्माण भी एक प्रॉजेक्ट का रूप ले लेता है। मार्केटिंग कंपनियों के टारगेट वाले इस युग में यह सेक्टर भी कम समय में अधिक रिजल्ट देने के दबाव से बच नहीं पाता। लिहाजा, अच्छा इंसान बनाने के प्रॉजेक्ट के साथ भी यह सवाल जुड़ा रहता है कि कैसे कम से कम समय में अधिक से अधिक अच्छे इंसान तैयार किए जाएं।
इसी बिंदु पर यह बहस जन्म लेती है कि कोई अच्छा इंसान बाइ-डिफॉल्ट तैयार हुआ है या बाइ-डिजाइन। चूंकि बाइ-डिफॉल्ट तैयार हुए लोग यूं ही तैयार हो जाते हैं, उनके पीछे कोई टाइम बाउंड प्रॉजेक्ट नहीं होता, इसलिए उस प्रक्रिया पर किसी का नियंत्रण भी नहीं होता। सो, उस पर टाइम वेस्ट करने के बजाय जोर इस बात पर होता है कि कैसे बाइ-डिजाइन अच्छे इंसान तैयार किए जाएं।
समस्या यह है कि बाइ-डिजाइन आप सीढ़ी तो तैयार कर सकते हैं, पेड़ नहीं तैयार कर सकते। बाइ-डिजाइन आप बेहतर सेल्समेन तो तैयार कर सकते हैं, इंसान नहीं तैयार कर सकते। और बाइ-डिजाइन एनजीओ तो चला सकते हैं, सही मायनों में आंदोलन नहीं खड़ा कर सकते।
(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)