Tuesday, November 29, 2022

उत्तराखंड: हेलंग की घटना से सांसत में सरकार

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देहरादून। उत्तराखंड में चमोली जिले के हेलंग गांव में महिलाओं से चार-पत्ती छीनने का मामला अब चमोली प्रशासन, पुलिस और राज्य सरकार के गले की फांस बन गया है। उत्तराखंड आंदोलन के बाद संभवतः यह पहला मौका है, जब इस घटना ने एक स्वतःस्फूर्त आंदोलन का रूप ले लिया है। उत्तराखंड आंदोलन के बाद यह भी पहली बार हो रहा है, जब राज्य भर के तमाम संगठनों से एक साथ, एक स्वर में 24 जुलाई को हेलंग चलो का आह्वान किया है और इसकी सफलता के लिए राज्यभर में प्रयास शुरू कर दिये हैं। 24 जुलाई हेलंग चलो की कॉल इस मायने में भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है कि राज्य में काफी पहले से छोटे-छोटे समूहों में अलग-अलग मसलों को लेकर आंदोलन किये जा रहे थे और एक सामूहिक जन आंदोलन खड़ा करने की जरूरत महसूस की जा रही थी। यदि सब कुछ इसी तरह चलता रहा तो इस बात की पूरी संभावना है कि हेलंग की घटना के बहाने राज्यभर की आंदोलनकारी शक्तियां एकजुट होने के लिए कमर कस रही हैं।

खास बात यह है कि राज्य सरकार भी इस बात को अच्छी तरह समझ रही है कि उत्तराखंड के अब तक अलग-अलग समूहों में और अलग-अलग मसलों पर आंदोलन कर रही शक्तियां एक मंच पर आ गईं तो स्थिति को संभाल पाना काफी कठिन हो जाएगा। हालांकि राज्य सरकार पर पुलिस बल है और वह अर्द्ध सैनिक बलों को भी आंदोलनकारियों को कुचलने के लिए बुलवा सकती है। लेकिन, इस मामले में उत्तराखंड का इतिहास कुछ और रहा है। यहां जब-जब सत्ताओं ने जनांदोलनों को कुचलने का प्रयास किया, तब तक जनांदोलन और मजबूत हुए। इस बात को समझते हुए राज्य सराकर अब तक फूंक-फूंककर कदम रख रही है। 

आगे बढ़़ने से पहले एक बार जान लें कि यह मामला आखिर है क्या। दरअसल हेलंग क्षेत्र में टिहरी हाइड्रो पावर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (टीएचडीसी) कंपनी एक हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट बना रही है। प्रोजेक्ट का नाम है विष्णुगाड-पीपलकोटी जल विद्युत परियोजना। इस परियोजना के लिए हेलंग गांव का काफी जमीन विभिन्न कार्यों के लिए अधिग्रहीत की जा चुकी है। फिलहाल गांव वालों के पास अलकनन्दा नदी से लगता एक छोटा सा जंगल का टुकड़ा बचा हुआ है। गांव में परिवार इस जंगल से अपने पशुओं के लिए चारापत्ती की व्यवस्था करते हैं। टीएचडीसी के लिए सुरंग बना रही एचसीसी कंपनी को मक डालने के लिए डंपिंग जोन की जरूरत थी। इसके लिए एक चाल चली गई। ग्राम प्रधान और वन पंचायत के सरपंच से मिलकर ग्राम सभा की ओर से एक प्रस्ताव तैयार किया गया और टीएचडीसी कंपनी से गांव के लिए खेल मैदान बनाने का आग्रह किया गया।

इस तथाकथित सर्व सम्मत प्रस्ताव पर तेजी से काम हुआ। तय हुआ कि हेलंग गांव में गौचर-पनघट की जो थोड़ी सी जमीन अलकनन्दा के किनारे वाले ढलान पर बची है। एचसीसी कंपनी वहां सुरंग से निकलने वाले मलबे को डंप करे और जब जमीन समतल हो जाए तो उसे खेल मैदान बनाया जाए। जोशीमठ में एक्टिविस्ट अतुल सती ने इस जमीन का निरीक्षण किया। उनका कहना है कि कई मीटर गहरे इस ढलान को भरना संभव नहीं है। यह डंपिंग ग्राउंड सिर्फ नाम का होगा। लोगों के घास और पेड़ दब जाएंगे और मलबा आखिरकार जाएगा अलकनन्दा में ही। वे यह भी बताते हैं कि यहां ऑलवेदर रोड का मलबा डंप करने के लिए खेल मैदान बनाने का शिगूफा पहले भी छोड़ा गया था, लेकिन खेल मैदान नहीं बना।

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महिला से घास छीनती सुरक्षा बल की कर्मी

इस जमीन को खेल मैदान बनाने का झांसा देकर डंपिंग ग्राउंड बनाने का गांव के ज्यादातर लोग विरोध कर रहे हैं। गांव की एक महिला मंदोदरी देवी 15 जुलाई को जब चारा-पत्ती पीठ पर लादे लौट रही थीं तो उन्होंने इस जमीन पर पेड़ कटे हुए देखा। विरोध किया तो वहां मौजूद सीआईएसएफ और पुलिस ने उनके साथ दुर्व्यवहार करके पीठ पर लदा चारा-पत्ती छीनने का प्रयास किया, जिसका किसी ने वीडियो बना दिया और यह वीडियो वायरल हो गया। इस घटना के बाद तीन महिलाओं और एक पुरुष को हिरासत में लिया गया। उनके साथ एक दो वर्ष के बच्चे को भी करीब डेढ़ घंटे तक मौके पर ही सरकारी गाड़ी में बिठाकर रखा गया और फिर जोशीमठ थाने ले जाया गया, जहां छह घंटे बिठाये रखने के बाद निजी मुचलके पर रिहा किया गया।

वीडियो वायरल होने के शुरुआती दौर में चमोली पुलिस और चमोली जिला प्रशासन ने कुछ वीडियो और पोस्ट, ट्विटर के माध्यम से हेलंग में घास छीनने वाले वायरल वीडियो के माध्यम से पूरे मामले में लीपपोती करने और पीड़ित महिलाओं को झूठा साबित करने का प्रयास किया, लेकिन जब इन प्रयासों से लोगों का गुस्सा और बढ़ता नजर आया तो राज्य महिला आयोग ने चमोली के डीएम को मामले की जांच करने के आदेश दिये। लेकिन, राज्य के लोगों ने इस आदेश पर सवाल उठाने शुरू कर दिये। लोगों का कहना था कि डीएम खुद इस मामले में पार्टी हैं। वे महिलाओं को झूठा साबित करने का प्रयास कर चुके हैं, ऐसे में उनसे जांच करवाने का कोई औचित्य नहीं है। मामला बढ़ता देख मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने खुद हस्तक्षेप किया और मामले की जांच गढ़वाल कमिश्नर से करवाने के आदेश जारी किये।

राज्य के लोगों और आंदोलनकारी शक्तियों को मुख्यमंत्री के इस आदेश पर भी भरोसा नहीं है। लोग इस मामले को ठंडे बस्ते में डालने का प्रयास मान रहे हैं और पिछली कई घटनाओं की याद दिला रहे हैं, जिनमें जांच कमेटी बैठाई गई, लेकिन वह जांच कभी पूरी नहीं हुई। इन मामलों में प्रमुख रूप से राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित गैरसैंण में सड़क की मांग कर रहे घाट क्षेत्र के लोगों पर लाठीचार्ज और देहरादून में एक अधिकारी द्वारा मेडिकल कॉलेज की डॉक्टर को अपनी पत्नी के चेकअप के लिए घर पर बुलाए जाने के मामले की जांच के आदेश शामिल हैं। लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह जांच भी पिछली जांचों की तरह ही होगी।

इस बीच इस घटना के विरोध में 19 और 20 जुलाई को राज्यभर में जिला और तहसील मुख्यालय स्तर पर धरने-प्रदर्शनों का आयोजन किया गया और संबंधित अधिकारियों के माध्यम से मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन भेजा गया। आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए अब राज्यभर के तमाम संगठन 24 जुलाई को हेलंग जाने पर आमादा हैं। इसके लिए चार लोगों की एक कमेटी का गठन किया गया है, जो राज्यभर से आने वाले लोगों के साथ संवाद स्थापित कर आपस में समन्वय स्थापित करेगी। इस बीच नैनीताल हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने भी हेलंग की घटना को लेकर एक बैठक आयोजित की। बैठक में घटना पर नाराजगी जताने के साथ ही हेलंग को लेकर किये गये आंदोलन का समर्थन किया गया।

दरअसल राज्य बनने के बाद से लगातार ठगे जा रहे उत्तराखंड के लोगों के मन में 22 वर्षों से जमा गुस्सा इस घटना के बहाने फूट पड़ा है। खासकर भूकानून को लेकर जिस तरह से राज्य के लोगों के साथ छल किया गया और 2018 में भूकानून में संशोधन के बाद जिस तरह से राज्य के पहाड़ बड़े-बड़े सेठ-साहूकार खरीद रहे हैं, उसे राज्य के लोग बहुत संजीदगी से देख रहे थे और सामूहिक रूप से आवाज उठाने की जरूरत महसूस कर रहे थे। हेलंग की घटना इसमें महत्वपूर्ण साबित हो रही है। यही वजह है कि हेलंग का वीडियो वायरल होने के बाद जहां इस घटना को सिरे से खारिज करने और कुछ वीडियो जारी कर महिलाओं के गलत साबित करने के प्रयास किये गये, वहीं अब मुख्यमंत्री स्तर तक जांच करवाने की बात कही जा रही है।

फिलहाल एक तरफ जहां राज्य सरकार आंदोलन के इस आसन्न संकट को भांपते हुए मामले को किसी न किसी तरह से शांत करने के प्रयास में जुटी हुई है, वहीं दूसरी ओर कई संगठन हेलंग पहुंचने की तैयारी कर रहे हैं। हेलंग न पहुंच पाने वाले कई संगठनों और अन्य लोगों ने 24 जुलाई को अपने-अपने स्तर पर अपनी-अपनी जगहों पर ही आंदोलन करने की घोषणा की है।

(देहरादून से वरिष्ठ पत्रकार और एक्टिविस्ट त्रिलोचन भट्ट की रिपोर्ट।)

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