Sat. Aug 24th, 2019

बीमार लोकतंत्र का लक्षण हैं हिंसक जनप्रतिनिधि

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पिछले कुछ दिनों में अनेक युवा जन प्रतिनिधियों ने गलत कारणों से सुर्खियां बटोरीं। कीचड़बाज नीतेश राणे, बल्लेबाज आकाश विजयवर्गीय और पिस्तौलबाज कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन सभी हिंसा के चैंपियन बनने की कोशिश करते नजर आए। हो सकता है कि आने वाले दिनों में मर्यादा लांघते और अपना संयम खोकर हिंसा और अपराधों को प्रश्रय देते राजनेताओं द्वारा और भी अप्रिय और अशोभनीय दृश्य उत्पन्न किए जाएं। पिछले वर्ष मार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष हमारी सरकार स्वयं यह स्वीकार कर चुकी है कि देश की संसद और विधानसभाओं को सुशोभित करने वाले कुल 4896 सांसद-विधायकों में से 1765 पर 3045 आपराधिक मुकद्दमे चल रहे हैं। अर्थात हमारे 36 प्रतिशत विधि निर्माता स्वयं आपराधिक गतिविधियों में संलिप्तता के आरोपों से घिरे हैं। महाराष्ट्र और गोवा सरकार केंद्र को समय पर अपने राज्य के दागी सांसद- विधायकों के आंकड़े उपलब्ध नहीं करा पाईं अन्यथा यह प्रतिशत 36 से भी अधिक होता।

क्रिमिनल केसेस का सामना कर रहे सर्वाधिक सांसद- विधायक उत्तरप्रदेश के हैं, इसके बाद तमिलनाडु, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और केरल का नंबर है। राजनीति के अपराधीकरण पर अंकुश लगाने से संबंधित एक याचिका की सुनवाई के दौरान एमिकस क्युरी विजय हंसरिया ने देश की सर्वोच्च अदालत को दिसंबर 2018 में बताया कि वर्तमान और भूतपूर्व विधायकों पर लंबित आपराधिक मामलों की संख्या 4122 है जिनमें से 1991 मामलों में आरोप ही तय नहीं किए जा सके हैं। एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के अनुसार वर्तमान लोक सभा की स्थिति यह है कि बीजेपी के कुल निर्वाचित सदस्यों के 39 प्रतिशत अर्थात 116 सदस्य आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। कांग्रेस कम से कम इस संदर्भ में बीजेपी को पीछे छोड़ती दिख रही है और उसके 29 सदस्य क्रिमिनल केसेस का सामना कर रहे हैं जो पार्टी के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या का 57 प्रतिशत है। क्षेत्रीय दल भी कुछ पीछे नहीं हैं।

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जदयू के 13 (81 प्रतिशत), डीएमके के 10(43 प्रतिशत) और टीएमसी के 9(41 प्रतिशत) सांसद आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। इतनी बड़ी संख्या में क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले सांसदों के जीत कर आने में कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है क्योंकि भाजपा ने 40 प्रतिशत और कांग्रेस ने 39 प्रतिशत ऐसे प्रत्याशियों का चयन किया था जो आपराधिक मामलों में फंसे थे। कुल मिलाकर सर्वेक्षित 539 सांसदों में से 233 क्रिमिनल केसेस में फंसे हुए हैं। यह संख्या 2009 की तुलना में 44 प्रतिशत अधिक है। एडीआर की रिपोर्ट बतलाती है कि इन मामलों में 29 प्रतिशत मामले हत्या, हत्या के प्रयास, बलात्कार और नारियों पर किए गए अपराधों से संबंधित हैं। एडीआर के अनुसार 2009 की तुलना में अत्यंत गंभीर आपराधिक मामलों में फंसे सांसदों की संख्या में 109 प्रतिशत वृद्धि हुई है। भाजपा के 5, बसपा के 2 तथा कांग्रेस, एनसीपी और वायएसआर कांग्रेस के एक एक सांसद हत्या के आरोपी हैं।

हमारी वर्तमान संसद के 30 सांसद हत्या के प्रयास के आरोपी हैं जबकि 19 सांसद महिलाओं पर होने वाले अपराधों के मामलों में संलिप्त हैं। इनमें से तीन पर बलात्कार का आरोप है। केरल के इडुक्की संसदीय क्षेत्र के कांग्रेस सांसद डीन कुरियाकोसे 204 आपराधिक मामलों के साथ इस अप्रिय सूची में लज्जाजनक प्रथम स्थान पर हैं। एडीआर के विश्लेषण में जो सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा है वह अपराधियों को मिलती जन स्वीकार्यता की ओर संकेत करता है। यदि 2019 के लोकसभा चुनावों को आधार बनाया जाए तो चुनावों में घोषित आपराधिक मामलों वाले प्रत्याशी के विजय की संभावना 15.5 प्रतिशत है जबकि स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवार के जीतने की उम्मीद केवल 4.7 प्रतिशत है।

बहरहाल जो घटनाएं चर्चा में हैं उनकी प्रकृति का विश्लेषण आवश्यक है। नीतेश राणे और आकाश विजयवर्गीय रसूखदार नेताओं की संतान हैं और उत्तराधिकार में मिली राजनीतिक लोकप्रियता तथा शक्ति का अहंकार इनके व्यवहार में स्पष्ट दिखता है। कांग्रेस के विधायक नीतेश राणे और भाजपा विधायक आकाश विजयवर्गीय अपने-अपने राज्यों में विपक्ष में हैं क्योंकि महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना तो मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार है। दोनों ही नेता पुत्र अधिकारियों और राजनेताओं के भ्रष्ट गठबंधन को अच्छी तरह जानते हैं और शायद जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे इससे लाभान्वित भी होते रहे हैं। कल तक घर के दरबार में हाजिरी भरने वाले अधिकारियों की हुक्मउदूली और नाफरमानी इन्हें नागवार गुजर रही है। विरोध का जो हिंसक तरीका इन्होंने अख्तियार किया है वह स्वयं को पुलिस और अदालत से ऊपर समझने तथा आरोपी को दोषी घोषित कर दंडित करने की उस मानसिकता का परिचायक है जिससे आजकल मॉब लिंचिंग करने वाले नौजवान संचालित हो रहे हैं।

स्थान स्थान पर अल्पसंख्यकों, दलितों, पुलिस कर्मियों, सैनिकों और सरकारी कर्मचारियों पर हिंसक आक्रमण करने वाली भीड़ के अनुचित और अराजक व्यवहार का इससे अधिक खुला समर्थन और क्या हो सकता है कि देश के भविष्य को तय करने वाले युवा नेता न केवल हिंसा का आश्रय लें और इसके बाद अपने किए पर पश्चाताप भी न करें। हो सकता है कि इन नेताओं द्वारा पार्टी की अनुशासनिक कार्रवाई के प्रहसन अथवा इन्हें निर्दोष घोषित करने के बहाने तलाशती कानूनी प्रक्रिया के दौरान अपने किये पर खेद भी व्यक्त किया जाए। किंतु इस खेदप्रकाश का स्वरूप तो लाचार लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था पर किये गए एक भारी भरकम अहसान जैसा ही होगा।

 प्रणव सिंह चैंपियन का प्रकरण जरा भिन्नता लिए हुए है। उत्तरप्रदेश की राजनीति में संगठित अपराधों में संलिप्त तथा अपने प्रभाव क्षेत्र में अपनी समानांतर सरकार चलाने वाले नेताओं की एक लंबी फेहरिस्त है। उत्तराखंड बनने के बाद विधायक प्रणव सिंह चैंपियन नवगठित राज्य के गैंगस्टर लीडर्स की सूची के नवीनतम नाम हैं। अपराध के क्षेत्र में अपना डंका बजाने वाले इन नेताओं के लिए अब बाहुबली जैसा सम्मानजनक संबोधन गढ़ लिया गया है। हरिशंकर तिवारी( चिल्लूपार,गोरखपुर,1985), अतीक अहमद(1989, इलाहाबाद), रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया(1993,कुंडा), मुख्तार अंसारी(1996,घोसी) जैसे राजनेता-जनप्रतिनिधि बाहुबलियों की अगली कड़ी के रूप में प्रणव सिंह चैंपियन को देखा जा सकता है।

यह सभी सक्रिय राजनीति में हैं, अनेक बार सांसद विधायक बन चुके हैं और इनमें से अनेक तो मंत्री पद भी संभाल चुके हैं। चाहे वह बिहार हो या उत्तरप्रदेश या उत्तराखंड या देश कोई अन्य प्रदेश, इन गैंगस्टर्स की कहानी कमोबेश एक जैसी है, राजनीतिक पार्टियां इनके बाहुबल की आवश्यकता चुनावी राजनीति में सफलता के लिए बड़ी शिद्दत से महसूस करती रही हैं किंतु इनकी बढ़ती बदनामी से किनारा कर अपना दामन पाक साफ दिखाने की रणनीति भी इन राजनीतिक दलों ने सदैव अपनाई है। यह गैंगस्टर्स राजनीतिक संरक्षण और माननीय कहलाने की चाह में राजनीति में आते हैं और कभी इस दल या उस दल के सदस्य बनते हैं, कभी निर्दलीय ही चुनाव में अपनी किस्मत आजमाते हैं तो कभी अपनी खुद की पार्टी बना लेते हैं। 

यह घटनाएं कुछ गंभीर प्रश्नों को  छेड़ती हैं। जब जन प्रतिनिधि सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों पर लापरवाही, असंवेदनशीलता और भ्रष्टाचार के आरोप लगा कर हिंसक मारपीट और अभद्रता को समाधान के रूप में प्रस्तुत करते हैं तो क्या यह हमारी समूची लोकतांत्रिक प्रणाली के प्रति उनकी अनास्था और अविश्वास को नहीं दर्शाता है? क्या जनता को सुविधा और सेवा दिलाने तथा सरकारी अमले से काम लेने की सारी व्यवस्थाएं खंडित हो गई हैं? क्या राजनीतिक संरक्षण और भ्रष्टाचार का जो कुचक्र सभी राजनीतिक दलों ने मिलजुलकर चलाया है अब वह उन पर ही भारी पड़ रहा है? क्या हमारा समाज इतना भ्रष्टाचार पसंद हो गया है कि उसे भ्रष्ट जनप्रतिनिधि अधिक उपयोगी लगता है क्योंकि वह कुछ ले देकर काम तो करा देता है? क्या हिंसा को अब हमारे समाज और विशेषकर राजनीति में घोषित मान्यता मिल रही है?

क्या सचमुच हम उस युग में पहुंच रहे हैं जब लोग कहेंगे कि वह जनप्रतिनिधि ही क्या जिस पर दर्जन भर एफआईआर न हों और जो खुल कर हाथों और जबान का शारीरिक-शाब्दिक हिंसा के लिए इस्तेमाल न करे? क्या हमें ईमानदार और सिद्धान्तनिष्ठ जनप्रतिनिधि के स्थान पर एक ऐसा अपराधी ज्यादा उपयोगी लगता है जो अपने आतंक के बल पर हमारी सही गलत जरूरतों को पूरा कर दे? जब हम इन दुर्दांत अपराधियों के समक्ष शरणागत होकर न्याय की मांग करते हैं तो न केवल इनका महिमामंडन कर इन्हें रॉबिन हुड का दर्जा दे देते हैं बल्कि संविधान, न्याय व्यवस्था और सरकार को अनुपयोगी और अक्षम भी सिद्ध कर देते हैं, क्या यह लोकतंत्र के हित में है?

संसद और विधानसभाओं में कुर्सियां उछालते और आपस में जूतमपैजार करते जन प्रतिनिधि क्या पारस्परिक विमर्श और संवाद के सेतु के भंग होने की अप्रिय सूचना नहीं दे रहे होते हैं? जब हमारे जन प्रतिनिधि प्रश्न पूछती जनता, जन समस्याओं को उठाते पत्रकारों, असंतोष व्यक्त करते कार्यकर्ताओं और शासकीय नियमों का हवाला देते अधिकारियों के प्रति उग्र और हिंसक हो जाते हैं तो क्या वे सहिष्णुता और संवाद जैसे आधारभूत लोकतांत्रिक मूल्यों पर अपनी अश्रद्धा व्यक्त नहीं कर रहे होते हैं? आतंक का पर्याय समझे जाने वाले खूंखार गैंगस्टरों की चुनावी सफलता क्या हमारी पुलिस व्यवस्था, न्याय प्रणाली और चुनाव प्रक्रिया में मौजूद घनघोर विसंगतियों की ओर संकेत नहीं करती है? इन सवालों के जवाब तलाशे जाने चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने चार्जशीट दायर होने को किसी प्रत्याशी को अयोग्य ठहराने के लिए पर्याप्त न मानते हुए 25 सितंबर 2018 के अपने एक आदेश में सरकार से कहा था कि गंभीर और जघन्य अपराधों में अदालत से आरोप तय होने के बाद संबंधित व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से रोकने एवं उनकी सदस्यता समाप्त करने के लिए सरकार कठोर कानून बनाए। कोर्ट ने यह भी कहा था कि सभी उम्मीदवार नामांकन दाखिल करने के बाद कम से कम 3 बार अखबार में अपना आपराधिक विवरण और अन्य जानकारियों वाले हलफनामे का ब्यौरा प्रकाशित कराएंगे और इसके अतिरिक्त समाचार चैनल के जरिए भी 3 बार इसे प्रसारित कराएंगे ताकि मतदाताओं को उनके विषय में जानकारी मिल सके। साथ ही राजनीतिक दल अपनी वेबसाइट पर उम्मीदवार का यह विवरण अपलोड करेंगे। सुप्रीम कोर्ट इससे पहले राजनेताओं पर चल रहे आपराधिक मामलों के त्वरित निपटान के लिए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन का निर्देश भी दे चुका है।

किंतु सरकार और चुनाव आयोग का रवैया देश की सर्वोच्च अदालत के इस आदेश के विषय में टालमटोल वाला ही रहा है। यदि सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों का पालन किया भी गया है तो यह महज खानापूर्ति की भांति ही रहा है। लेकिन यह भी सच है कि सुप्रीम कोर्ट के इन दिशा निर्देशों में यह भोला और मासूम विश्वास छिपा है कि जनता अपराधी प्रत्याशियों के काले कारनामों से अपरिचित होने के कारण धोखे से उनका चयन कर लेती है। जबकि सच्चाई यह है कि जिन बाहुबलियों की हम बात कर रहे हैं उनके कारनामों की चर्चा तो जन जन की जबान पर होती है और उन्हें टिकट देने का एक प्रमुख आधार भी हिंसा और आतंक के साम्राज्य में उनकी बादशाहत होती है। आज तो ऐसा लगता है कि इनके रोंगटे खड़े कर देने वाले अपराधों का विवरण प्रचारित करने पर इनकी विजय का अंतर और बढ़ जाएगा तथा विभिन्न राजनीतिक दलों में इन्हें अपनी ओर खींचने की होड़ सी मच जाएगी। जनता को इनके चयन के लिए दोषी ठहराने से पूर्व हमें यह स्वीकार होगा कि हम एक ऐसी व्यवस्था में रह रहे हैं जहां जनता को अपने वाजिब हक और सहूलियतों को पाने के लिए रिश्वत, पहुंच और बल प्रयोग की मदद लेनी पड़ती है। 

जनता यह देखती है कि सरकार, उसकी पुलिस और मुल्क के कानून के रखवाले आम लोगों की जिंदगी आसान करने के बजाए मुश्किल बना रहे हैं। लेकिन जब यही लोग इन बाहुबलियों के आगे दंडवत होकर उनकी चाकरी करते नजर आते हैं तब जनता इन अपराधियों को अपना भगवान मानने पर मजबूर हो जाती है। जनता को इस बात के लिए जरूर गुनाहगार ठहराया जा सकता है कि वह फौरी राहत के लिए देश और समाज के दीर्घकालिक हितों की अनदेखी कर रही है। किंतु आज के जमाने में गांधी जी का साधनों की शुद्धि का आग्रह तो शायद किसी को स्वीकार नहीं है। कोई नहीं चाहता कि साधनों की शुद्धि बरकरार रखने के लिए लम्बा संघर्ष किया जाए और कष्ट उठाया जाए। यह कहना भी बहुत सरल है कि राजनीति में अच्छे लोगों को आना चाहिए किंतु अधिकांश अच्छे लोगों की नियति इरोम शर्मिला और आतिशी मार्लेना जैसी ही होती है।

यदि अच्छे लोग चुनावी राजनीति में सफल होते भी हैं तो यह सफलता उन्हें अपनी अच्छाई की बलि देकर ही मिलती है और बाद में सत्ता उनकी बची खुची अच्छाई का भी अपहरण कर लेती है जैसा हम आप पार्टी की अब तक की यात्रा में देख रहे हैं। जब हम राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए चुनाव सुधारों की बात करते हैं तो हमारा पूरा ध्यान उन प्रावधानों के निर्माण पर होता है जिनके प्रयोग द्वारा अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोका जाए या उनकी सदस्यता समाप्त की जाए किंतु इस बात पर कोई चर्चा नहीं करता कि चुनाव इस प्रकार कैसे आयोजित किए जाएं कि इनमें धनबल और बाहुबल के प्रयोग के लिए कोई स्थान ही नहीं न रह जाए। जिस दिन ऐसा हो जाएगा राजनीति का अपराधीकरण अपने आप रुक जाएगा। 

जब हम युवा जनप्रतिनिधियों को गैंगस्टरों की भांति हिंसा और आतंक की राजनीति करते देखते हैं तो हमें यह सोचने को विवश होना पड़ता है कि कहीं इन नेताओं के आदर्श नेहरू-लोहिया-अटल जैसे लोकतंत्र के चैंपियन न होकर कोई माफिया डॉन नुमा राजनेता तो नहीं है जो बस हिंसा और खूनखराबे के चैंपियन हैं। जिस तरह राजनीति में घोषित अपराधियों और इन्हें अपना आदर्श मानने वाले राजनेताओं की बाढ़ सी आई हुई है और इन्हें चुनावी सफलता भी मिल रही है उसे देखते हुए देश और लोकतंत्र के भविष्य के लिए चिंतित होना स्वाभाविक है। डॉ राजेंद्र प्रसाद ने एक अवसर पर कहा था कि यदि निर्वाचित जनप्रतिनिधि अच्छे चरित्र वाले और ईमानदार हों तो वे एक कमजोर संविधान से भी अच्छा काम ले लेंगे। लेकिन यदि वे भ्रष्ट और दुष्चरित्र हैं तो एक बेहतरीन संविधान भी (जैसा हमारा संविधान है) देश का भला नहीं कर पाएगा। आज तो स्थिति ऐसी बन गई है कि हिंसा प्रिय जनप्रतिनिधि संविधान को ही बदलने की बात करने लगे हैं। 

 अहिंसा आदर्श लोकतंत्र की स्थापना की अनिवार्य शर्त है। यद्यपि यह भी सत्य है कि सत्ता अपने स्थायित्व और वर्चस्व के लिए शक्ति की मांग करती है। किंतु लोकतांत्रिक प्रणाली में कानून, संविधान और जन दबाव जैसे अनेक कारक सेना, पुलिस एवं सरकारी अमले जैसे सत्ता को शक्ति प्रदान करने वाले केंद्रों को निरंकुश होने से रोकते हैं और इन्हें जनता के हित में कार्य करने हेतु विवश करते हैं। जब भ्रष्टाचार आदि के कारण सत्ता को ताकत और स्थिरता देने वाले ये अवयव अपनी भूमिका नहीं निभा पाते हैं तो शक्ति के आपराधिक केंद्रों का उदय होता है जो सत्ता के वर्चस्व को बनाए रखने में अपना योगदान तो देते हैं किंतु इनकी बुनियाद आतंक, हिंसा और दमन पर टिकी होती है, इनकी प्रकृति अनैतिक और जनविरोधी होती है। हिंसक और अपराधी जनप्रतिनिधि इस बात के सूचक हैं कि लोकतांत्रिक प्रणाली रोगग्रस्त हो रही है। जो सरकारें चल रही हैं वे कहीं न कहीं – जनता द्वारा,जनता के हित,जनता की सरकार- के लोकतांत्रिक आदर्श के अनुरूप नहीं हैं। लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है और लोकतंत्र के रोगों का उपचार भी अंततः उसे ही करना होगा।

(डॉ. राजू पांडेय स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल रायगढ़ में रहते हैं।)

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