बीच बहस

राफेल सौदे में गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट डील के बीच बिचौलिया कहां से आ गया ?

भारत सरकार ने राफेल सौदे का एलान करते हुए कहा था कि यह गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट डील है जिसमें कोई बिचौलिया शामिल नहीं होगा। इस सौदे के लिए भारत और फ्रांस की सरकारों के बीच सीधी बातचीत हुई और फैसला ले लिया गया। राफाल सौदा अब लाख टके का सवाल है कि इसमें बिचौलिया कहां से आ गया? जबसे फ्रांस की समाचार वेबसाइट मीडिया पार्ट ने राफाल सौदे में बिचौलिए को 10 लाख यूरो देने का खुलासा किया है तबसे मोदी सरकार और भाजपा को सांप सूंघ गया है, और बोलती बंद है। सरकार अपने बचाव में उच्चतम न्यायालय और सीएजी की क्लीन चिट का हवाला दे रही है, बिचौलिए के अस्तित्व पर चुप्पी साध रखी है।

गौरतलब है कि फ्रांस की समाचार वेबसाइट मीडिया पार्ट ने एक बार फिर राफेल लड़ाकू विमान सौदे में भ्रष्टाचार की आशंकाओं के साथ सवाल उठाए हैं। फ्रेंच भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी एएफए की जांच रिपोर्ट के हवाले से प्रकाशित खबर के मुताबिक, दासो एविएशन ने कुछ बोगस नज़र आने वाले भुगतान किए हैं। कंपनी के 2017 के खातों के ऑडिट में 5 लाख 8 हजार 925 यूरो (4.39 करोड़ रुपए) क्लाइंट गिफ्ट के नाम पर खर्च दर्शाए गए। मगर इतनी बड़ी धनराशि का कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। मॉडल बनाने वाली कंपनी का मार्च 2017 का एक बिल ही उपलब्ध कराया गया। एएफए की छानबीन में दासो एविएशन ने बताया कि उसने राफेल विमान के 50 मॉडल एक भारतीय कंपनी से बनवाए। इन मॉडल के लिए 20 हजार यूरो (17 लाख रुपए) प्रति नग के हिसाब से भुगतान किया गया। हालांकि, यह मॉडल कहां और कैसे इस्तेमाल किए गए इसका कोई प्रमाण नहीं दिया गया। रिपोर्ट में बताया गया है कि मॉडल बनाने का काम कथित तौर पर भारत की कंपनी देफ्सिस सल्युसंस (Defsys Solutions) को दिया गया। यह कंपनी दैसो की भारत में सब-कॉन्ट्रैक्टर कंपनी है।

दरअसल रक्षा सौदे की प्रक्रिया कुछ इस तरह से है कि सेना पहले अपनी जरूरत का ब्यौरा रक्षा मंत्री को देती है। रक्षा मंत्री संबंधित विभागों से मशविरे का बाद इसकी मंजूरी देते हैं। इसके बाद कैबिनेट की कमेटी में इस पर फैसला लिया जाता है जिस पर अंतिम मुहर प्रधानमंत्री लगाते हैं। जिसके बाद सेना हथियारों या फिर दूसरे साजो सामान का परीक्षण शुरू करती है। परीक्षण के बाद कंपनियों की आखिरी सूची तैयार होती है और उन्हें टेंडर भरने के लिए कहा जाता है। इस टेंडर में जिसकी कीमत कम होती है आमतौर पर उसे आपूर्ति के लिए मंजूरी मिल जाती है।  इस पूरी प्रक्रिया में एक लंबा समय लगता है और सेना को मिलने वाले सामान में काफी देरी होती है।

कहते हैं कि इसी देर से बचने के लिए इस पूरी प्रक्रिया को दरकिनार कर मोदी सरकार ने सीधे दोनों देशों की सरकारों के बीच (गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट डील) समझौते के तहत विमानों का सौदा किया। पेरिस में फ्रांस के राष्ट्रपति और भारत के प्रधानमंत्री ने इसका एलान किया और 17 महीने बाद दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों ने इस करार पर दस्तखत किए। इस प्रक्रिया में प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री के पास यह अधिकार है कि सेना की खास जरूरत को देखते हुए बिना पूरी प्रक्रिया से गुजरे करार कर लिया जाए और फिर भारत की संसद को इस बारे में जानकारी देकर बाकी की औपचारिकताएं पूरी कर ली जाएं।

दरअसल यह सौदा सीधे सरकारों के बीच बातचीत होने के कारण तुलनात्मक रूप से आसान होता है और इसमें लगने वाला समय भी कम है। कोई बिचौलिया नहीं होने की वजह से भ्रष्टाचार की आशंका भी कम रहती है। भारत ने अमेरिका से गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट डील करके एफएमएस के तहत करीब 15 अरब अमेरिकी डॉलर की कीमत के साजोसामान खरीदे हैं। 10 साल पहले अमेरिका से इस तरह का कोई सामान नहीं खरीदा जाता था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तर्क दिया था कि यह समझौता भारत और फ्रांस सरकार के बीच किया गया है। डील में तय किया गया कि 36 राफाल विमान फ्लाई-अवे कंडीशन में खरीदे जाएंगे और दासो एविएशन को मिलने वाली रकम का एक हिस्सा भारत में निवेश किया जाएगा। इस निवेश के लिए दासो को किसी भारतीय कंपनी को ऑफसेट पार्टनर चुनना था और जिन कंपनियों के साथ उसने करार किया उसमें अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस लिमिटेड भी है। दरअसल सबसे बड़ी साझीदारी रिलायंस के साथ ही हुई थी।

रक्षा में निवेश को लेकर जो नियम बने थे, उसे मोदी सरकार ने 2017 में बदल दिया था। नई एफडीआई नीति के मुताबिक, कोई विदेशी कंपनी रक्षा क्षेत्र में 49 फीसदी तक निवेश कर सकती है और इसके लिए उसे कैबिनेट की मंजूरी की जरूरत नहीं पड़ेगी। दासो और रिलायंस का समझौता इसी नई नीति के बनने के बाद हुआ है।

राहुल गांधी अपने भाषणों और ट्वीट के जरिए आरोप लगाते रहे हैं कि जिस डील पर मनमोहन सरकार मंथन कर रही थी, उसकी संभावित राशि से करीब तीन गुना राशि मोदी सरकार चुका रही है। कांग्रेस का कहना है कि यूपीए 126 विमानों के लिए 54,000 करोड़ चुका रही थी, वहीं अब मोदी सरकार सिर्फ 36 विमानों के लिए 58,000 करोड़ रुपये दे रही है।

कांग्रेस प्रवक्ता सुरजेवाला ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि यह डील सरकार से सरकार के बीच है तो फिर इसमें बिचौलिया कहां से आ गया। इसके साथ ही सुरजेवाला ने कहा कि सरकार सीएजी, प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, संसद, भाजपा कोई भी नहीं बताता राफेल जहाज की कीमत क्या है?

सुरजेवाला ने कहा कि राफेल कंपनी ने कहा कि यह पैसा राफेल एयरक्राफ्ट के मॉडल बनाने के लिए दिया था। फ़्रांस के एएफए ने द साल्ट से पूछा कि आपको अपनी ही कंपनी के मॉडल बनाने के लिए कॉन्ट्रैक्ट हिंदुस्तान की कंपनी को देने की क्या जरूरत थी, आपने इसे गिफ्ट टू क्लाइंट क्यों लिखा और वे मॉडल हैं कहां? रिपोर्ट में बताया गया कि जब इस खर्च पर दासो से स्पष्टीकरण मांगी गई तो अपनी सफाई में कंपनी ने एएफए को 30 मार्च 2017 का बिल मुहैया कराया जो भारत की डिफसिस सोल्युसन्स की तरफ से दिया गया था। यह कंपनी दासो की भारत में सब-कॉन्ट्रैक्टर कंपनी है। यह बिल राफेल लड़ाकू विमान के 50 मॉडल बनाने के लिए दिए ऑर्डर का आधे काम के लिए था। हर एक मॉडल की कीमत करीब 20 हजार यूरो से अधिक थी।

This post was last modified on April 6, 2021 4:44 pm

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