Thu. Feb 20th, 2020

अल्लामा इकबाल का नाम सुना है साहब !

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अल्लामा इकबाल।

लखनऊ। कुछ लोग थे जो वक्त के सांचे में ढल गए, कुछ वैसे हुए जिन्होंने सांचे बदल दिए। यह लाइन उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव एनसी बाजपेयी ने एक बार सुनाई थी। मौका था तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का जन्मदिन और जगह थी लखनऊ में विक्रमादित्य मार्ग स्थित समाजवादी पार्टी का मुख्यालय। सूबे के सबसे बड़े नौकरशाह का इस तरह तत्कालीन मुख्यमंत्री के जन्मदिन के मौके पर पार्टी मुख्यालय में जाकर इस तरह चापलूसी करना सबको हैरान भी कर गया। मैं भी कवरेज के सिलसिले में वहां मौजूद था और जनसत्ता में खबर दी। जनसत्ता तब खबर लेता भी था और देता भी था। खैर उत्तर प्रदेश में हमने नौकरशाही का रंग बदलते हुए देखा है। मायावती के राज में सब नीला नीला होते देखा है। हाथियों की प्रतिमा की सफाई भी देखी है। मायावती के आगे पीछे चलने वाले चापलूस नौकर और नौकरशाह भी देखें हैं। और उससे पहले भाजपा के राज में उन कलेक्टर को भी देखा जो कारसेवक बन गए थे। नौकरशाही सत्ता के हिसाब से रंग बदलती हैं। पर सत्ता तो बदलती रहती है।

ज्यादा रंग बदलना ठीक नहीं। सत्ता बदलने पर ऐसे नौकरशाह को बहुत परेशानी का भी सामना करना पड़ता है। नीरा यादव से लेकर अखंड प्रताप सिंह उदाहरण हैं। ताजा मामला पीलीभीत जिले का है जहां ‘सारे जहां से अच्छा….’ लिखने वाले इकबाल की नज्म पढ़वाने पर प्रिंसिपल निलंबित कर दिए गए । वजह विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और बजरंग दल की स्थानीय इकाई की शिकायत पर निलंबित कर दिया गया। इन संगठनों का आरोप है कि छात्र सुबह की प्रार्थना में लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी गीत गा रहे थे। अनपढ़ , कुपढ़ और लोग हो सकते हैं पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर से तो यह उम्मीद नहीं की जा सकती।

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‘लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी’ गीत इकबाल ने 117 साल पहले 1902 में लिखी थी जैसी जानकारी मिली है। इसे कई स्कूलों में गया जाता है। फोटो में पूरा गीत भी लिखा है। यह देश को समर्पित गीत /नज्म है। ठीक उसी तरह जैसे इकबाल की मशहूर रचना ‘सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान…..थी ।यह आजादी की लड़ाई का गीत था। पर वे क्या जाने जिनके वैचारिक पूर्वज आजादी की लड़ाई से ही दूर रहे। वे न हिंदी समझ पाते हैं न ही अच्छी उर्दू। वर्ना ‘लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी’ नज्म का अर्थ तो समझ लेते। ‘लब पे आती है दुआ’ को अल्लामा इकबाल के नाम से प्रसिद्ध मोहम्मद इकबाल ने 1902 में लिखी थी। 117 साल पुरानी इस गीत को गाए जाने पर किसी शिक्षक को निलंबित किया जाना सभी को हैरान करने वाला है। करीब 270 विद्यार्थियों वाले स्कूल में फुरकान अली न केवल प्रिंसिपल थे बल्कि अकेले शिक्षक भी थे। उनके निलंबन के बाद स्कूल में कोई शिक्षक नहीं बचा है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की शिकायत की ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (बीईओ) उपेंद्र कुमार ने जांच शुरू की। उन्होंने अपनी जांच में पाया गया कि स्कूल में बच्चे सुबह की सभा में अक्सर यही गीत गाते थे।

इस मामले पर पीलीभीत के जिला अधिकारी वैभव श्रीवास्तव ने कहा कि प्रिंसिपल को इसलिए निलंबित किया गया है क्योंकि वह छात्रों से राष्ट्रगान नहीं करवाता था। प्रिंसिपल अगर छात्रों को कोई अन्य कविता पढ़ाना चाहते थे, तो उन्हें अनुमति लेनी चाहिए। अगर वह छात्रों से कोई कविता गान कराते हैं और राष्ट्रगान नहीं कराते हैं तो उनके खिलाफ आरोप बनता है।दूसरी तरफ  निलंबित शिक्षक फुरकान अली ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है। उनका कहना है कि छात्र लगातार राष्ट्रगान करते हैं और इकबाल की कविता कक्षा एक से आठ तक उर्दू पाठ्यक्रम का हिस्सा है।उन्होंने आगे कहा, ‘विहिप और हिंदू युवा वाहिनी कार्यकर्ताओं ने मुझे निकालने की मांग करते हुए स्कूल और कलेक्टरेट के बाहर विरोध किया। मैंने सिर्फ वह कविता गाई है जो सरकारी स्कूल के पाठ्यक्रम का हिस्सा है। मेरे छात्र भी प्रतिदिन सभा के दौरान भारत माता की जय जैसे देशभक्ति के नारे लगाते हैं।

बहरहाल इस पूरे मामले से यह साफ़ है कि छोटे से लेकर बड़े अफसर सत्ता को खुश करने के लिए किसी भी सीमा तक जा सा सकते हैं ।स्कूलों में अलग अलग प्राथना होती है ।हम लोग जब स्कूल में थे तो आजादी मिले डेढ़ दो दशक ही तो हुआ था पर ऐसा राष्ट्रवाद नहीं उबल रहा था कि रोज इसका इम्तहान लिया जाता हो ।तरह तरह के गीत अलग अलग स्कूलों में गाये जाते थे ।कहीं पर ‘ वह शक्ति हमें दो। तो कहीं पर जन मन गण। कोई अफसर स्कूल में क्या गया जायेगा यह तय भी नहीं करता। यह सरकार का काम भी नहीं है। ज्यादातर राष्ट्रवादी नेता और अफसरों के बच्चे तो ईसाई स्कूलों में पढ़ते हैं ,वे क्या गीत गातें हैं कभी जाकर सुनिए तो।

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