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Friday, September 24, 2021

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मुक्ति कामना का प्रतीक ‘द व्हाइट टाइगर’

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एक सफेद शेर है जो पिंजरे में कैद है और उसकी बेचैनी, उसका गुस्सा और उसकी तड़प- सब एक तरफ और दुनिया के झंझट और मुसीबतें एक तरफ,  अरविंद अडिगा के उपन्यास पर आधारित फिल्म “द व्हाइट टाइगर” को हिंदी में देखना सुखद था, मूल फ़िल्म यद्यपि अँग्रेजी में है पर डबिंग और डायलॉग डिलीवरी इतनी शानदार है कि लगता नहीं कि कहीं हिंदी के साथ अन्याय हुआ है, इस उपन्यास को पुरस्कार मिलने के बाद बहुत पहले पढ़ा था और तब के हालात, बाजार हम लोगों के जीवन पर इतना हावी नहीं था जितना आज है और उस संदर्भ में इस फिल्म को देखना शायद मौजूँ है कि किस तरह से जहां एक ड्राइवर को अमीर परिवार में ट्रीट किया जाता है, वहीं वह ड्राइवर अपने संस्कार और उच्च महत्वाकांक्षाओं के चलते क्या से क्या कर डालता है।

यह फिल्म एक गांव के बच्चे के साथ विकसित होती है जो अपने पिता की लाश को जलते हुए देखता है कि पिता जीवन भर संघर्ष करते रहे और जब मरे तो त्रासदी का एक संसार छोड़ गए, उस बच्चे का जमींदार के प्रति आकर्षण, विलासिता और गाड़ियों के प्रति सम्मोहन उसे गांव से बाहर निकलने की कगार पर ले आता है, ऊँचे जीवन जीने की तमन्ना में गांव के ही जमींदार को अपना आदर्श मानकर शहर की ओर रुख करता है- घर परिवार को छोड़कर; शहरों की ओर लोगों का “मौसमी पलायन” कर जाना एक स्थाई भाव है भारतीय ग्रामीण व्यवस्था का; निश्चय ही शहरों की जो चकाचौंध है, सुविधाएं, अर्थ तंत्र और व्यवस्था है वह गांवों से श्रेष्ठ है और गांवों की जो माली एवं दीनहीन हालत है उससे इनकार नहीं किया जा सकता, परंतु बावजूद इसके ग्रामीण क्षेत्र के किशोर लड़के- लड़कियां और युवा इस जाल में फंसते हैं और शहरों में आकर इस तरह से धंस जाते हैं कि फिर कभी वे निकल नहीं पाते झुग्गियां, प्लॉट, किश्तों के संजाल में जीवन खप जाते हैं।

मेरे अपने अनुभव में गत 40 वर्षों में मैंने हजारों गांव देखे हैं और लाखों युवाओं को बघेलखंड, बुंदेलखंड, मालवा, निमाड़ के लोगों को दिल्ली मुम्बई से लेकर गुजरात और देश के सुदूर हिस्सों में जाकर काम करते हुए देखा है; विस्थापन और पलायन का दर्द अपने 38 वर्ष की नौकरी में महसूस भी किया है खानाबदोशों की तरह जीना कितना भारी होता है, पलायन पर जाने वाले ये लोग शुरुआत में तो मजदूरी और पेट पालने के लिए पलायन करते हैं, परंतु बाद में इन्हें शहरों का चस्का ऐसा लगता है कि घर-परिवार भूल जाते हैं और शहरों में एक ऐसे चक्र में फंस जाते हैं कि फिर मौत ही इन्हें जुदा करती है- सेक्स, जुआ, सट्टा, विलास, रुपया, हवस और अंत में अपराधों के साथ एक हो जाना ही नियति साबित होता है।

ओटीटी माध्यम पर एक उपन्यास पर फ़िल्म देखना सुखद है, विक्रम सेठ के सूटेबल ब्वाय से बेहतर यह फ़िल्म बनी है हालांकि मीरा नायर और ईरानी मूल के निर्देशक रमीन बहरानी दोनों ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के व्यक्तित्व हैं पर फिर भी रमीन ने इस फ़िल्म में जादू किया है, यह फ़िल्म ज़्यादा बेहतर है अभिनय, कला, वास्तविकता, निर्देशन और सिनेमेटोग्राफी के हिसाब से।

कहानी बहुत सरल है- एक हलवाई परिवार का युवा शहर के जमींदार और सवर्ण परिवार में काम करने आता है और वह बेहद चालाकी से एक मुसलमान ड्राइवर को हटाकर खुद पहला मुख्य ड्राइवर बन जाता है पर जाति और बाकी गैर बराबरी को बहुत बारीकी से चोट करते हुए यह दर्शाया है कि मुसलमानों से हलवाई बेहतर है, जाति का यह दंश उसे चुभता है और वह बदला लेने की सोचता है हर बार, जमींदार की। पर अमेरिकन बहू प्रियंका चोपड़ा और आधुनिक बेटा राजकुमार राव अपने पिता महेश मांजरेकर की तरह नहीं हैं – वे ड्राइवर अर्थात आदर्श गौरव को अपने समकक्ष मानते हैं और अंत तक बराबरी का दर्जा देते हैं, प्रियंका और राजकुमार के बीच के वैवाहिक तनाव, द्वंद्व और परिवेश साथ ही अमेरिका लौट जाने का आग्रह उनके बीच झगड़े पैदा करता है और इस सबका साक्षी आदर्श बनता है- जो ड्राइवर है और उनके हर कृत्यों का गवाह है और ये ऊँचे समाज के असली रंग ही उसे चालाक बनाते हैं, बाकी नौकरों के साथ रहकर भी वह उनमें घुल नहीं पाता और हमेशा बड़े स्वप्न देखता है।

कोयला माफिया, भ्रष्टाचार, राजनीति, षड्यंत्र, सेक्स, स्त्री अस्मिता, द्वंद्व, पीढ़ियों का अंतर, काम के तरीके, रिश्वत, जानवरों से बदतर जीवन जी रहे लोगों की जिंदगी, लाइफ स्टाइल और इस सबके बीच आदर्श के आदर्श टूटते जाते हैं, वह बिखरने लगता है और एक दिन एक बस्ती में जाकर एक पागल के समान एक व्यक्ति के सामने नंगा हो जाता है और खूब हंसता है- वह यह दर्शाना चाहता है कि वह जहां से आया था उसकी जमीन यही है पर जिस समाज में वह काम करके साहब बनने के लिए श्रम कर रहा है उसने उसे नंगा कर दिया है और यह संस्वीकृति पूरे विकास पर और देश के ऊपर एक भदेस तरीका है जो दर्शक को सुन्न कर देता है- गंदगी के बीच जीवन और नायक का नंगा हो जाना शायद हम सबके लिए एक जवाब है और बहुत बड़ा सवाल कि आखिर इन सबका अंत कब और कहाँ होगा।

हालांकि नायक अपने मालिक की हत्या कर देता है और गांव से आये भतीजे को लेकर बैंगलोर चला जाता है जहाँ आउट सोर्सिंग के नाम पर देश में आजीविका की कमी और तेजी से पनपे ठेकेदारों के जाल को दिखाता है , गांव के इस लड़के ने लैपटॉप चलाना सीख लिया इंटरनेट भी और अब वह एक बड़ी फ़ौज को काम देकर उनमें अपना परिवार खोजता है क्योंकि अपना परिवार वह बरसों पीछे छोड़ आया है और बैंगलोर में बसे बिहार, उप्र के लोगों की लगभग यही कहानी है।

फ़िल्म में राष्ट्रपति भवन से लेकर संवैधानिक संस्थानों के दृश्य हैं और नायक बलराम कहता है कि जब मालिक संसद में जाकर मंत्री को तगड़ी रिश्वत देकर आ सकता है जो हमारी मेहनत का रुपया है तो मालिक को मारकर यह रूपया लूट लेने में कुछ गलत नहीं है और वह इस विचार को अंजाम भी देता है जो कि चिंताजनक है, नायक के नँगे हो जाने से ज़्यादा दर्दनाक है मालिक का बार -बार मंत्री को संसद या बंगले पर रिश्वत देना जो अब हम सबके लिए बेहद आम बात है, हमारा राष्ट्रीय चरित्र ही रिश्वत के इर्द गिर्द घूमता है।

निसंदेह, यह फ़िल्म उपन्यास के साथ बहुत हद तक न्याय करती है और यह दिखाती है कि हम सबके भीतर एक व्हाइट टाइगर है जो बेचैन है, तड़प रहा है , पिंजरे से निकलकर क़ैद से मुक्ति पाना चाहता है बस मौके की तलाश है, और मौका किसी को मिल जाता है और कोई उम्र भर इंतज़ार करता रहता है।

आदर्श गौरव का अभिनय इस फ़िल्म की जान है। उनमें बहुत संभावनाएं नजर आती हैं मुझे क्योंकि जो परिपक्वता इस फ़िल्म में उन्होंने दिखाई है वह अद्भुत है और पूरी फिल्म में वे सबसे प्रभावी कलाकार साबित हुए हैं बाकी तो मंजे हुए लोग हैं ही पर आदर्श ने वाकई आदर्श अभिनय किया है जो लंबे समय तक सराहा जाएगा, एक आम चेहरा जो कमाल का है।

यह फ़िल्म कलात्मकता और चकाचौंध के बीच वैचारिक कहानी और विचारों के प्रवाह में एक कंकड़ उछालने के लिये देखी जाना चाहिए और निश्चित ही निर्देशक इसमें सफल हुए हैं, इस फ़िल्म के प्रदर्शन पर रोक की मांग भी उठी थी पर कोर्ट ने अनुमति नहीं दी, यह फ़िल्म जरूर देखी जाना चाहिये- ताकि एक भद्र समाज का असली चेहरा लोगों को नज़र आये क्योंकि उपन्यास अंग्रेजी में होने से बड़े वर्ग ने नहीं पढ़ा होगा, क्योंकि एक बाहरी निर्देशक कैसे बारीकी से चीज़ों को पकड़ता है और छोटी-छोटी हरकतें, कैमरे और संवादों के जरिये हमारी सच्चाई हम तक ही पहुंचाता है।

(संदीप नाईक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और आजकल मुंबई में रहते हैं।)

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