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Categories: बीच बहस

हर साल आने वाला सैलाब क्यों नहीं है बिहार चुनाव का मुद्दा?

पटना। बिहार विधासभा चुनाव अपने शबाब पर पहुंच चुका है। इस बीच बिहार के सबसे बड़े हिस्से की परेशानी बाढ़ चुनावी मुद्दा बनता नजर नहीं आ रहा है। हालात यह हैं कि हर वर्ष उत्तर बिहार के अधिकांश हिस्से बाढ़ की तबाही झेलते हैं। सियासत के खेल में सत्ता और विपक्ष दोनों आखिर बाढ़ पर क्यों बोलना नहीं चाहते, यह एक बड़ा सवाल है।

हर वर्ष की तरह इस बार भी बिहार के लाखों लोगों को आपदा का दंश झेलना पड़ा। राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन के आंकड़ों के मुताबिक बाढ़ से सीतामढ़ी, शिवहर, सुपौल, किशनगंज, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, गोपालगंज, पश्चिम चंपारण, खगड़िया, पूर्वी चंपारण समेत 16 जिले प्रभावित रहे।

इसका असर 130 प्रखंडों की 1333 पंचायतों पर पड़ा। इससे 83 लाख 62 हजार 451 लोग सीधे प्रभावित दिखे। शासन के मुताबिक प्रभावित लोगों के लिए छह राहत शिविर थे। जहां 5186 लोगों के रहने का इंतजाम था, हालांकि सरकारी व्यवस्था व जानमाल के नुकसान के आंकड़ों पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं।

महेंद्र यादव, कोसी नव निर्माण मंच के संस्थापक

बाढ़ से बचाव और प्रभावित लोगों लिए राहत तथा पुनर्वास के लिए लंबे समय से संघर्षरत कोसी नवनिर्माण मंच के संस्थापक महेंद्र यादव कहते हैं कि बिहार चुनाव में बाढ़ का मुद्दा  नहीं बन पाता है। अक्सर नेता कुछ भी बोल कर चुनाव में वोट हथियाना चाहते हैं। सत्ताधारी दल के लोग राहत के नाम पर प्रभावित परिवारों को छह हजार रुपये की सहायता राशि देकर अपनी जिम्मेदारी पूर्ण मानते हैं, जबकि उनके द्वारा बनाए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) और मानदर के सभी मदों के लाभ पीड़ितों को नहीं मिल पाते। उसके लिए आंदोलन होते रहे हैं।

बाढ़ के निदान के लिए भी हाई डैम बनाने, नदियों को जोड़ने और तटबंध बनाने की बात कर देते हैं, जबकि बिहार में बाढ़ के कारणों को गंभीरता से जानने की सरकारी तौर पर कोई कोशिश नहीं की गई। फरक्का ने निर्विवाद रूप से बिहार में बाढ़ को बढ़ाया है, वहीं तटबंध भी, बाढ़ से बचाने से ज्यादा बांध टूटते हैं तो भारी तबाही मचाते हैं। सड़कें, पुल-पुलिया समेत आधारभूत साधनों के निर्माण के समय खानापूरी होती है। वास्तविक जल निकासी की व्यवस्था नहीं होती।

यदि चुनाव में बाढ़ के असल कारणों को जानने और उसके अनुसार समाधान करने का मुद्दा रहता तो जरूर रिवर लिंकिन, तटबंध निर्माण, हाई डैम की जगह फरक्का के डीकमीशनिंग, अलग-अलग तटबंधों की समीक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर में जल निकासी की समीक्षा  का मुद्दा उठता। जन संगठन के लोग लगातार कोशिश कर रहे हैं। हमें आशा है कि एक न एक दिन इस बुनियादी मुद्दे पर  राजनीतिक दलों को आना ही पड़ेगा।

जानमाल का होता है व्यापक नुकसान
बाढ़ हर वर्ष उत्तर बिहार के तकरीबन 16 जिलों को प्रभावित करती है। जहां जानमाल का भारी नुकसान ग्रामीणों को उठाना पड़ता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ढाई दर्जन से अधिक लोगों की जहां मौत हुई वहीं सैकड़ों पशुओं की जान चली गई। आपदा प्रबंधन विभाग के मुताबिक पांच लाख 50 हजार 792 लोगों को सुरक्षित निकाला गया। इस कार्य के लिए एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की छह टीमें लगाई गई थीं। प्रभावित लोगों के लिए 84 सामुदायिक रसोईघर बनाए गए थे, जहां से 75 हजार 142 लोगों को भोजन कराया जा रहा था।

वरदान के बजाय अभिशाप बन गईं ये नदियां
उत्तर बिहार की नदियों के बारे में कहा जाता है कि छठे दशक के पूर्व तक यह किसानों के लिए वरदान के रूप में थीं। नदियों की जब तक अविरल धारा बहती थी, तब तक किसानों के लिए यह धान की खेती के लिए लाभदायक साबित होती थींl लाल और काले रंग की देसरिया धान की बहुत  अधिक उपज होती थी। जानकार बताते हैं कि वर्ष 1950 तक एक दशक में कभी कभार बाढ़ आती थी, लेकिन नदियों में बांध और तटबंध बनते गए और तबाही का भी औसत बढ़ता गया। मौजूदा समय में जल संसाधन विभाग के द्वारा 4000 किलोमीटर और राजस्व विभाग के द्वारा 2000 किलोमीटर लंबाई में बांधों का निर्माण किया जा चुका है। जबकि वर्ष 1950 के पूर्व तक इसकी लंबाई मात्र डेढ़ सौ किलोमीटर थी।

रणजीव, नदी और जल विशेषज्ञ

जल और नदी विषय के विशेषज्ञ सामाजिक कार्यकर्ता रणजीव कहते हैं कि भारत में खेती पहले प्रकृति पर आधारित थी। बरसात के चतुर मास के पूर्व ही किसान अपनी तैयारी कर लेते थे। नदी के पानी के सहारे खरीफ की अच्छी खेती होती थी। नदी से काफी दूरी पर लोग अपना निवास भी बनाते थे। बाद के सालों में बाढ़ से बचाव के नाम पर बांध और तटबंध बनते गए। ये राजनेता, ठेकेदार और इंजीनियर के लिए सरकारी धन की लूट का एक बेहतर जरिया बन गया है।  वे वैशाली जिले की एक बड़ी नेता का नाम लेते हुए कहते हैं कि उनके संरक्षण में ग्रामीण पहले बरसात के समय बांध को काट देते थे, जिससे कि भारी तबाही से बचा जा सके। बदले में उनके लिए यह बड़ा बोट बैंक था। यह तटबंध सुरक्षा नहीं करते मात्र इसका एहसास भर कराते हैं।

यह नदियां मचाती हैं तबाही
कोसी नदी- सुपौल, सहरसा, खगड़िया, भागलपुर।
महानंदा नदी- किशनगंज, कटिहार।
कमला नदी- मधुबनी, दरभंगा।
बागमती नदी- सीतामढ़ी, दरभंगा, खगड़िया।
बूढ़ी गंडक- पूर्वी चंपारण, मुजफ्फरपुर, वैशाली।
गंडक नदी- पश्चिम चंपारण, गोपालगंज, सारण।

आपदा प्रबंधन प्राधिकार पर उठते रहे हैं सवाल
बिहार सरकार ने बाढ़ से बचाओ और राहत उपाय को लेकर नीतियों के निर्माण के लिए आपदा प्रबंधन प्राधिकार का गठन किया है। इसका मुख्यमंत्री पदेन अध्यक्ष और शासन के कार्यकारी प्रमुख उपाध्यक्ष होते हैं। इनके द्वारा तैयार किए गए नियम और योजनाओं पर आपदा प्रबंधन विभाग कार्य करता है, लेकिन इसकी योजनाएं धरातल पर कम नजर आती हैं। बाढ़ को लेकर सरकारें कितना गंभीर रही हैं, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है।

ऊंचे तटबंधों के निर्माण का ग्रामीण कर रहे विरोध
बाढ़ से बचाव के नाम पर ऊंचे तटबंधों के  निर्माण पर सवाल उठते रहे हैं। बागमती तटबंध के निर्माण की प्रक्रिया पिछले दो दशक से चल रही है, लेकिन मुजफ्फरपुर जिले में गायघाट से लेकर डेढ़ सौ किलोमीटर लंबाई में किसानों के विरोध के चलते तटबंध का निर्माण ठप पड़ा है, इसकी शुरुआती लागत 9000 करोड़ रुपये निर्धारित की गई थी।

तटबंधों को लेकर ग्रामीणों का अनुभव ठीक नहीं है। 18 मेगावाट की पनबिजली परियोजना सुपौल जिले के कटया  में स्थापित की गई, लेकिन मात्र एक दिन 3 मेगावाट बिजली का उत्पादन करने के बाद से यह बंद पड़ा है। यही हाल वाल्मीकि नगर पनबिजली परियोजना का है। लोगों की शिकायत है कि तटबंधों के निर्माण में कमीशनखोरी के चक्कर में गुणवत्ता के साथ खेल का खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। बाढ़ से राहत के लिए सरकारें कभी गंभीर नहीं दिखीं।

(पटना से स्वतंत्र पत्रकार जितेंद्र उपाध्याय की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on October 27, 2020 2:10 pm

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