Sunday, October 17, 2021

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देश की उच्च अदालतों के जजों के चयन में आखिर पारदर्शिता क्यों नहीं?

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पुराने जमाने में, कुछ अपवाद स्वरूप यथा वैशाली, कपिलवस्तु, रोम आदि को छोड़कर, जहाँ उस प्राचीनकाल में राजा का चुनाव भी गणतांत्रिक ढंग से ठीक पांच साल के लिए होता था, भारत में 1947 के ठीक पूर्व तक और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में कहीं-कहीं अभी भी राजे-रजवाड़े राज्य करते थे। आश्चर्य की बात है कि इंग्लैंड, जापान आदि बहुत से देशों में आज के आधुनिक समय में अभी भी राजा-रानी हैं। आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था के ठीक विपरीत उस समय किसी राज्य के राजा के मृत्यु के उपरांत राज्य की बागडोर सदा राजा के उत्तराधिकारियों यथा उसके पुत्र, पुत्रियों या किसी निकट संबंधी के ही हाथ में जाना निश्चित होता था। समय ने करवट लिया और अब कुछ अपवादों को छोड़कर, दुनिया के अधिकांश देशों में उस प्राचीनकाल के राजा-रजवाड़ों के युग का अंत हो गया और अब लोकतांत्रिक व संसदीय व्यवस्था के तहत संसदीय व गणतंत्रीय शासनकाल की शुरूआत हुई, जिसमें पुराने राजाओं की तरह राज्य की बागडोर पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित न होकर केवल 5 वर्ष के लिए जनता अपने मताधिकार के अधिकार के तहत जनप्रतिनिधियों का चुनाव करती है। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी विचलन से बचाने के लिए कुछ स्वायत्त लोकतांत्रिक नियामक संस्थान जैसे सुप्रीम कोर्ट, रिजर्व बैंक, सीबीआई, चुनाव आयोग, राष्ट्रीय साँख्यिकी आयोग आदि बनाए गए हैं।

परन्तु अभी पिछले दिनों कुछ राष्ट्रीय स्तर के सुप्रतिष्ठित समाचार पत्रों में एक बहुत ही दुःखी, स्तब्ध और चौंकाने वाले कुछ तथ्यात्मक रिपोर्ट वाले समाचार प्रकाशित हुए हैं, जिनके अनुसार भारतीय राष्ट्र राज्य के सबसे बड़े स्वायत्त लोकतांत्रिक नियामक संस्थान न्यायपालिका जिसके अंतर्गत हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट भी आते हैं, के जजों के चयन में घोर अनियमितता, लोकतान्त्रिक नियमों की अवहेलना व असंसदीय व्यवहार के बारे में सूचना इस देश की 135 करोड़ जनता के संज्ञान में आया है। समाचार पत्रों की रिपोर्ट के अनुसार आज न्यायपालिका में न्यायालयों में पूर्व में पदासीन रहे उच्च पदस्थ लोगों यथा हाईकोर्ट या सुप्रीमकोर्ट में पदासीन रहे भूतपूर्व जजों के परिवार वाले ही मसलन उनके बेटे, भतीजे या रिश्तेदार ही वर्तमान में भी जज बने बैठे हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में आज भी मुख्य जज सहित कुल 31 जज हैं, जिनमें 6 जज, पूर्व जजों के बेटे ही कुँडली मारकर बैठे हैं। इसके अलावे देश के अन्य 13 हाईकोर्ट्स में भी जज के पद पर आसीन 88 जज भी किसी न किसी भूतपूर्व जज, वकील या न्यायपालिका से जुड़े किसी रसूखदार व्यक्ति के परिवार या रिश्तेदार ही हैं। इस रिपोर्ट का श्रोत सुप्रीमकोर्ट की अधिकारिक वेबसाइट और अन्य 13 हाईकोर्ट्स के डेटा पर आधारित है, भारत के शेष हाईकोर्ट्स के डेटा आश्चर्यजनक रूप से उपलब्ध ही नहीं है।  इस रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि सुप्रीमकोर्ट में इस देश के कुछ 250 से 300 विशेष घरानों के लोग ही जज बनते हैं। यह उनका खानदानी अधिकार बन गया है। सबसे दुःखद और क्षुब्ध करने वाली बात यह है कि भारत के 135 करोड़ जनसंख्या वाली आम जनता के परिवारों के तीक्ष्णतम्, कुशाग्रतम् बुद्धि और अति उच्चतम् मेधावी युवा-युवतियों के सुप्रीमकोर्ट में जज बनने के दरवाजे को भी इन कुछ गिने-चुने घरानों के लोगों ने पूर्णतः अवरूद्ध कर रखा है।

उक्त रिपोर्ट में मुंबई हाईकोर्ट के एक मजे हुए, प्रसिद्ध कानूनविद्, वरिष्ठ वकील द्वारा नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट कमीशन कानून मतलब एन.जे.ए.सी.एक्ट को चुनौती देते हुए कॉलेजियम सिस्टम के असंवैधानिकता और अलोकतांत्रिक रवैये पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए सुप्रीमकोर्ट में याचिका लगाने का भी जिक्र है। इस रिपोर्ट में सुप्रीमकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम सिस्टम पर संशय व्यक्त करते हुए कहा गया है कि यह सिस्टम बहुत ही रहस्यमयी, गुप-चुप और अपारदर्शी तरीके से काम करता है। यहाँ के उच्च न्यायपालिका में रिक्त हुए पदों का न तो कभी नोटिफिकेशन जारी होता है, न उसका कभी किसी मिडिया आदि में विज्ञापन निकलता है। अभी पिछले दिनों सुप्रीमकोर्ट के बार एसोसिएशन के एक प्रतिष्ठित एडवोकेट ने कॉलेजियम सिस्टम की कमियों और पक्षपातपूर्ण दुर्नीतियों पर करारा हमला बोलते हुए कहा था कि इस सिस्टम में सुयोग्य और क़ाबिल लोगों की पूर्णतः अवहेलना की जाती है और सुप्रीमकोर्ट में कॉलेजियम सिस्टमरूपी चोर दरवाजे से ऐसे नाकारा और अयोग्य लोगों की नियुक्ति की जाती है, जिनके ताल्लुकात न्यायपालिका, राजनीति और भारतीय समाज में दमदार, रसूखदार और प्रभावशाली लोगों से होती है। ये नाकारा और अयोग्य लोग उक्त वर्णित कथित बड़े लोगों के भाई-भतीजे-रिश्तेदार या खानदान के होते हैं।

अब सुप्रीमकोर्ट में मुख्य जज और अन्य 30 जजों की वर्तमान नियुक्ति की कार्यप्रणाली पर एक दृष्टिपात कर लें। इस प्रक्रिया में मुख्य जज सहित अन्य सभी 30 जजों की नियुक्ति के लिए भारत का राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 124 (2) के तहत कार्यवाही करता है। मुख्य जज की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति अपनी इच्छानुसार ? सुप्रीमकोर्ट के अन्य जजों से सलाह लेता है, सुप्रीमकोर्ट के जजों के चुनाव में अर्हता मतलब  योग्यता के लिए सामान्यतः अन्य सभी भारतीय सिविल सेवाओं जैसे ही नियम हैं यथा वह भारत का नागरिक हो, वह कम से कम 5 साल तक किसी उच्च न्यायालय में जज रहा हो या वह राष्ट्रपति की राय में 10 वर्ष किसी कोर्ट में प्रतिष्ठित वकील के रूप में वकालत किया हो आदि-आदि। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट के अन्य जजों की अनुशंसा पर भारत का राष्ट्रपति सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्याधीश का चयन कर देता है। इसी प्रकार अन्य 30 जजों की चुनावी प्रक्रिया में भारतीय गणराज्य के राष्ट्रपति महोदय सुप्रीमकोर्ट के मुख्य जज से किसी जज या किसी कथित प्रतिष्ठित वकील के नाम देने का अनुरोध करता है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य जज अपनी इच्छानुसार सुप्रीमकोर्ट के ही चार जजों के समूह से उस व्यक्ति के बारे में विचार-विमर्श करके, उनकी अनुशंसा के आधार पर उस व्यक्ति विशेष का नाम भारतीय राष्ट्रपति को प्रस्तावित करके भेज देता है और राष्ट्रपति महोदय उसे सुप्रीम कोर्ट का जज चुन लेते हैं। उक्तवर्णित सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस या अन्य जजों के चयन प्रक्रिया को ध्यानपूर्वक चिन्तन करने पर यह स्पष्टरूप से परिलक्षित होता है कि उक्त चयनप्रक्रिया में  लोकतांत्रिक व पारदर्शिता का पूर्णतः अभाव है।

उक्त सभी रिपोर्ट्स को ध्यानपूर्वक अध्ययन करने पर भारत का कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति यह सहज में ही अनुमान लगा सकता है कि सुप्रीमकोर्ट और अन्य हाईकोर्ट्स में जजों के चुनाव की प्रक्रिया में सब कुछ राष्ट्रपति, मुख्य जज और कुछ अन्य जजों के इच्छानुसार और उनके विवेकानुसार ही होता है। जजों के चुनावी प्रक्रिया में कहीं भी लोकतांत्रिक, संवैधानिकता, योग्यता आदि मूल्यों का कहीं रंचमात्र भी इसमें जरा भी कहीं भी उल्लेख नहीं है। इसीलिए देश के तमाम हाईकोर्ट्स और सुप्रीमकोर्ट में पूर्व जजों, वरीष्ठ वकीलों और मात्र 250 से 300 खानदानों के कुछ कथित कुलदीपक न जाने कितने दिनों से अपने बाप, चाचा, मामा और फूफा के सिफारिश पर जज बने बैठे हैं। कल्पना करें कितने दुःख, हास्यास्पद और आश्चर्य की बात है कि भारत जैसे देश में कोई रसूखदार मंत्री का बेटा साधारण एल.एल.बी की परीक्षा उत्तीर्ण करके किसी कोर्ट में 10 साल सफलतापूर्वक वकालत कर ले, उसके कुछ वर्षों बाद वह अपने बाप के रसूख के बल पर राष्ट्रपति महोदय की नजरों में एक प्रतिष्ठित वकील भी आसानी से बन जाएगा फिर उसे सुप्रीमकोर्ट के 30 जजों में उसकी नियुक्ति कर दी जाएगी। कुछ वर्षों तक सुप्रीमकोर्ट के जज के पद पर कार्य करने के पश्चात राष्ट्रपति महोदय की संस्तुति लेकर सुप्रीमकोर्ट के सीधे मुख्य जज का शपथ लेकर माननीय सुप्रीमकोर्ट का माननीय मुख्य जज बन भी सकता है। इस पर तुर्रा यह कि इन सिफारिश पर बन बैठे जजों को इनकी अयोग्यता, इनके भ्रष्टाचार, इनके पक्षपातपूर्ण व्यवहार, इनके दुर्व्यवहार आदि कदाचारों पर इनको हटाने की प्रक्रिया बेहद जटिलतम् और दुष्कर है। मसलन ऐसे कतिपय कदाचारी, भ्रष्टाचारी व बेईमान जजों को भी उनके पद से हटाने के लिए बाकायदा संसद की दो-तिहाई बहुमत से पारित किए और लाए गए प्रस्ताव के माध्यम से ही भारत के राष्ट्रपति ही इन्हें पदमुक्त कर सकता है, जबकि संसद में यह दो-तिहाई सांसदों का बहुमत लाना ही लगभग बहुत ही दुष्कर, कठिन और टेढ़ी खीर की बात है। उसके किंचित कदाचार पर, उसे हटाने के लिए करोड़ों आमजन द्वारा चुनी संसद के दो-तिहाई सांसदों द्वारा पारित प्रस्ताव के द्वारा ही राष्ट्रपति ही हटा सकता है। यह भी भारतीय लोकतंत्र का एक नायाब नमूना ही है।

सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट्स में जजों की नियुक्ति की यह अत्यंत घृणित, विद्रूपतापूर्ण, पक्षपातपूर्ण, संवैधानिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाता और माखौल बनाता, पूर्णतया असंवैधानिक व अलोकतांत्रिक नाटक अब बन्द होना ही चाहिए। भारत की करोड़ों जनता की आशा की किरण इन न्याय के मंदिरों से अब भाई-भतीजावाद और सिफारिशी संस्कृति का पूर्णतया खात्मा होना ही चाहिए। सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट्स में जज बनना अब किसी की भी बपौती और विशेष पारिवारिक अधिकार कतई नहीं रहना चाहिए। भारतीय लोकतांत्रिक व संविधान सम्मत राष्ट्र राज्य में सुप्रीमकोर्ट हो या हाईकोर्ट्स उनके जजों के चुनाव में पूर्णतया पारदर्शिता, निष्पक्षता और संविधान सम्मत प्रक्रिया अन्य सिविल सेवाओं की तरह अपनाई ही जानी चाहिए। अखिल भारतीय न्यायिक सेवा परीक्षा के सर्वश्रेष्ठ चयनित उम्मीदवारों को ही सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट्स में जज नियुक्त किए जाने का लोकतांत्रिक, पारदर्शी प्रक्रिया होनी चाहिए। भविष्य में उक्त इस परीक्षा के चयनित उम्मीदवारों को ही सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट्स में जज जैसे अतिमहत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया जाना चाहिए और इन पहले से सिफारिश पर रखे, कुंडली मारे बैठे, अपने उटपटांग, बहुसंख्यक लोगों के हित के खिलाफ अक्सर निर्णय देने वाले इन सभी नाकारा, भ्रष्ट जजों को भारत का राष्ट्रपति जबरन एकमुश्त सेवामुक्त करे और भविष्य में सुप्रीमकोर्ट से होने वाले निर्णय संविधान सम्मत, संसदीय गरिमा के अनुकूल बनाए गए विद्वान, निष्पृह और निष्पक्ष जजों के माध्यमों से इस देश में सर्वजनहिताय और सर्वजनसुखाय तथा न्यायोचित्त निर्णय हों, तभी भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में, समाज में इस राष्ट्रराज्य में वास्तविक न्याय की अनुगूंज सुनाई देगी।

(लेखक के ये नीजि विचार हैं, निर्मल कुमार शर्मा पर्यावरणविद और टिप्पणीकार हैं। आप आजकल गाजियाबाद में रहते हैं। )

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