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Categories: बीच बहस

यूपी सरकार को चेतावनी और एक आयोग के गठन के साथ विकास दुबे मसले पर हो गयी सुप्रीम कोर्ट में लीपापोती

उत्तर प्रदेश सरकार को यह हिदायत देते हुए कि विकास दुबे एनकाउंटर जैसी गलती भविष्य में न हो उच्चतम न्यायालय ने कानपुर में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या और इसके बाद मुठभेड़ में विकास दुबे और उसके पांच सहयोगियों की मौत की घटनाओं की जांच के लिये उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और भारतीय विधि आयोग के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस बीएस चौहान की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच आयोग के गठन के मसौदे को बुधवार को अपनी मंजूरी दे दी। चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामासुब्रमणियन की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पेश अधिसूचना के मसौदे को मंजूरी देते हुए कहा कि इसे अधिसूचित कर दिया जाये।

राज्य सरकार द्वारा गठित जांच आयोग के अन्य सदस्यों में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश शशि कांत अग्रवाल और उप्र के सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक केएल गुप्ता शामिल हैं। इस मामले की वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सुनवाई के दौरान पीठ ने केन्द्र को जांच आयोग को सचिवालय सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश दिया और कहा कि यह सहयोग राष्ट्रीय जांच एजेन्सी या किसी अन्य केन्द्रीय एजेन्सी द्वारा उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

कानपुर के बिकरु गांव में 2 जुलाई को सीओ समेत आठ पुलिसकर्मियों की हत्या के आरोपी विकास दुबे के एनकाउंटर मामले की बुधवार को उच्चतम न्यायालय में सुनवाई हुई। पीठ ने कहा है कि एक हफ्ते में आयोग अपनी जांच शुरू करे और आने वाले दो महीने में इसे पूरा कर लिया जाए। बीते सोमवार को हुई सुनवाई में चीफ जस्टिस एसए बोबड़े ने विकास के एनकाउंटर की जांच के लिए दोबारा आयोग बनाने का निर्देश दिया था। बुधवार को हुई सुनवाई में उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जरनल तुषार मेहता पेश हुए। उन्होंने पूर्व जज जस्टिस  बीएस चौहान और उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व डीजी केएल गुप्ता को आयोग में शामिल करने का प्रस्ताव रखा, जिस पर पीठ ने सहमति दे दी। आयोग की अध्यक्षता बीएस चौहान करेंगे।

तुषार मेहता ने कहा कि आयोग जांच करेगा कि 64 क्रिमिनल केस होने के बाद भी विकास जमानत या पैरोल पर बाहर आने में कैसे कामयाब हो गया? कौन उसे संरक्षण दे रहा था? कोर्ट ने कहा कि, ये सबसे महत्वपूर्ण पहलू है, जिसकी जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जांच आयोग उन परिस्थितियों की भी जांच करेगा जिनमें विकास दुबे, जिसके खिलाफ 65 प्राथमिकी दर्ज थीं, जमानत पर रिहा हुआ।

पीठ ने कहा कि यह जांच आयोग कानून के तहत अपनी रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय  के साथ ही राज्य सरकार को भी सौंपेगा। पीठ ने कहा कि वह कार्य शर्तों के साथ आयोग के हाथ बांधने के पक्ष में नहीं है। पीठ का कहना था कि जांच आयोग की जांच का दायरा पर्याप्त व्यापक होना चाहिए। पीठ ने कहा कि जांच आयोग को आठ पुलिसकर्मियों की हत्या और इसके बाद विकास दुबे तथा उसके कथित सहयोगियों की मुठभेड़ में मौत की घटनाओं की जांच करनी होगी।

उच्चतम न्यायालय विकास दुबे और उसके पांच कथित सहयोगियों की पुलिस मुठभेड़ में मौत की घटनाओं की न्यायालय की निगरानी में सीबीआई या एनआईए से जांच कराने के लिये दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इनके अलावा कुछ याचिकाओं में कानपुर के बिकरू गांव में तीन जुलाई को आधी रात के बाद विकास दुबे को गिरफ्तार करने गयी पुलिस की टुकड़ी पर घात लगाकर पुलिस पर हुए हमले में पुलिस उपाधीक्षक देवेन्द्र मिश्रा सहित आठ पुलिसकर्मियों के मारे जाने की घटना की जांच कराने का भी अनुरोध किया गया था ।

विकास दुबे 10 जुलाई को मुठभेड़ में उस समय मारा गया, जब उज्जैन से उसे लेकर आ रही पुलिस की गाड़ी कानपुर के निकट भौती गांव इलाके में कथित तौर पर दुर्घटनाग्रस्त हो गयी और मौके का फायदा उठाकर दुबे ने भागने का प्रयास किया। दुबे के मारे जाने से पहले अलग-अलग मुठभेड़ों में उसके पांच कथित सहयोगी भी मारे गये थे।

पीठ ने आयोग का दफ्तर दिल्ली में रखने की मांग को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि आयोग यूपी से ही काम करेगा। कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि आयोग को स्टाफ यूपी सरकार नहीं, बल्कि केंद्र सरकार मुहैया करवाएगी। आयोग के अध्यक्ष अपनी इच्छा से भी स्टाफ का चयन कर सकते हैं। याचिकाकर्ताओं ने यूपी सरकार की तरफ से आयोग के सदस्यों का नाम सुझाए जाने पर एतराज जताया, लेकिन मामले की सुनवाई कर रही पीठ के अध्यक्ष चीफ जस्टिस एसए बोबड़े ने इसे खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस ने कहा कि मैंने खुद जस्टिस चौहान के साथ काम किया है। शायद मैं भी उनका नाम आयोग के अध्यक्ष के तौर पर सुझाता।

पीठ ने यह भी साफ कर दिया है कि पुलिसकर्मियों की हत्या की जांच के लिए यूपी सरकार की तरफ से गठित एसआईटी अपना काम करती रहेगी। उच्चतम न्यायालय  एसआईटी के तरफ से की जा रही जांच की निगरानी नहीं करेगा। पीठ ने कहा कि अगर किसी याचिकाकर्ता को एसआईटी पर एतराज़ है, तो वो हाईकोर्ट जा सकता है।

याचिकाकर्ता, अनूप अवस्थी ने तर्क दिया कि दुबे की हत्या के आदेश सीधे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यालय से आए थे। अनूप अवस्थी ने आग्रह किया इस प्रकार, सीएमओ द्वारा निभाई गई भूमिका पर भी ध्यान देना चाहिए । पीठ  ने कहा कि आयोग जांच के सभी पहलुओं पर गौर करेगा।

वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद और संजय पारिख ने तब यूपी राज्य में मुठभेड़ों की बढ़ती संख्या के बड़े मुद्दे पर प्रकाश डाला। पारिख ने इस बात पर प्रकाश डाला कि दुबे और उसके सहयोगियों द्वारा पुलिस अधिकारियों की जघन्य हत्या को देखने के लिए विचाराधीन एसआईटी का गठन किया गया था। बाद में दुबे की हत्या की जांच के लिए एसआईटी का गठन नहीं किया गया था। इस पर कोर्ट ने जवाब दिया, हम संदर्भ की शर्तों को परिभाषित करके एसआईटी के हाथ नहीं बांध सकते। यह यथासंभव विस्तृत होना चाहिए। एसआईटी किसी भी संबंधित घटनाओं की जांच करने के लिए स्वतंत्र है। एसआईटी का गठन को यहां चुनौती नहीं दी गयी है।

(वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on July 28, 2020 4:49 pm

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