बंगाल का चुनाव किसी निर्णायक जंग से कमतर नहीं। यह बीजेपी और टीएमसी के बीच वजूद की लड़ाई है। यह ऐसी लड़ाई है जिसमें कोई भी दल हारने को तैयार नहीं है। यकीनन कोई तो हारेगा और कोई जीतेगा। सरकार तो बनेगी लेकिन बड़ा सवाल यही है कि एक बार फिर से टीएमसी की सरकार होगी या फिर बीजेपी कोई बड़ा खेल करके सरकार बनाने को तैयार होगी।
बंगाल का चुनावी चौसर काफी दिलचस्प है। कहने को सत्तारूढ़ टीएमसी हर दृष्टि से आगे है और मजबूत भी दिख रही है लेकिन बीजेपी के लगातार बढ़ते जनाधार और वोट प्रतिशत के कारण भी कहानी का सस्पेंस बढ़ता जा रहा है।
पिछले चुनाव में बीजेपी 38 वोट शेयर के साथ 77 सीटें जीतने में कामयाब हो गई थी। बीजेपी के लिए यह किसी करिश्मे से कम नहीं था। और इस बार बीजेपी बड़ी तैयारी के साथ मैदान में है और लगे हाथ इस बार चुनाव आयोग की जो तैयारी है उसके आधार पर यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि बंगाल में इस बार बड़ा खेल संभव है।
और खेल हुआ तो टीएमसी का मामला बिगड़ सकता है, सरकार जा सकती है और फिर टीएमसी में बड़ी भगदड़ भी मच सकती है।
दूसरी तरफ़, अगर टीएमसी इस बार भी चुनाव फतह करती है तो बीजेपी का खेल ख़त्म हो सकता है।
बंगाल चुनाव पर आगे की चर्चा की जाए इससे पहले वहां चुनावी मैदान में खड़े वाम दल और कांग्रेस की भूमिका को लेकर भी चर्चा कर लें। वाम दलों का अपना ही गठबंधन है। और तमाम वाम दल आपसी तालमेल से मैदान में उतर रहे हैं। बड़ी बात यह भी है कि इस बार सीपीआई एमएल भी वाम दलों का एक प्रमुख धरा है। जानकार कह रहे हैं कि बीजेपी और टीएमसी की लड़ाई में भले ही इस बार भी सीपीआई और सीपीएम कोई बड़ा करिश्मा न दिखा पाए लेकिन सीपीआई एमएल की चुनावी लड़ाई कुछ ख़ास परिणाम ला सकती है।
और ऐसा हुआ तो खेल बड़ा ही रोचक हो सकता है। इस बार की लड़ाई में वाम दल सत्ता में पुनर्वापसी की लड़ाई नहीं लड़ रहे। इसकी अभी कल्पना भी नहीं है। उसकी लड़ाई तो पहचान भर की है। वजूद बचे तो बात बने। लेकिन उनका वोट प्रतिशत आज भी मौजूद है और इस बार के चुनाव में भी वाम दलों का वोट प्रतिशत वैसा ही बना रहा तो बीजेपी और टीएमसी की मुश्किलें बढ़ सकती है। संभव है कि कुछ सीटों पर रोचक परिणाम भी सामने आयें। खासकर त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति में, कुछ हजार वोट भी परिणाम बदल सकते हैं।
इस बार के चुनाव में कांग्रेस भी अपने दम पर मैदान में खड़ी है। बंगाल में कांग्रेस को खोने के लिए कुछ बचा नहीं है। उसे कुछ भी हासिल होता है तो बड़ी बात हो सकती है लेकिन एक बात तय है कि अगर कांग्रेस पांच छह सीटों पर भी कोई चमत्कार कर जाती है, तो बड़ी बात होगी और फिर चुनाव परिणाम को एक नयी दिशा दे सकती है।
हालांकि अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी हो सकती है लेकिन जो हालत दिख रहे हैं और जिस तरह से बीजेपी आक्रामक रूप से चुनाव आयोग के साथ टीएमसी को घेर रही है उससे यह संकेत भी मिल रहा है कि चुनाव परिणाम के बाद वाम दल और कांग्रेस किंग मेकर भी भूमिका में आ सकते हैं। ऐसी हालत में ममता को बड़ा धक्का लग सकता है और फिर सूबे की पूरी राजनीति एक नयी कहानी रच सकती है।
बंगाल के इस चुनाव में एक और फैक्टर उभरता जा रहा है। ओवैसी की पार्टी और टीएमसी के बागी हुए हुमायूँ कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी के गठजोड़ को भी कमतर नहीं कहा जा सकता। अगर ममता बनर्जी को मुस्लिम वोट बैंक पर यकीन है तो उसी मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करते हुमायूँ कबीर और ओवैसी भी करते दिख रहे हैं। ओवैसी बिहार में भी अपनी पार्टी को स्थापित कर चुके हैं और राजद समेत कांग्रेस को भी सबक सिखा सीखा चुके हैं, ऐसे में इस बार ममता के वोट बैंक में बड़ा सेंध लग सकता है।
यह बात और है कि बंगाल के कुछ प्रतिशत मुसलमान भी हुमायूँ कबीर और ओवैसी के साथ जुड़ते हैं तो जाहिर है कि इसका खामियाजा टीएमसी को ही भुगतना पड़ सकता है और इसका लाभ बीजेपी को मिल सकता है। ऐसे में टीएमसी चाहे जैसे भी हो सरकार बनाने में कामयाब भी हो जाए लेकिन बीजेपी के आगामी खेल का खतरा टीएमसी को बना रहेगा। बिहार इसका नवीनतम उदाहरण है।
इधर लगातार तीन कार्यकाल पूरे कर चुकी ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी के सामने स्वाभाविक रूप से सत्ता-विरोध की चुनौती है। इसे भांपते हुए पार्टी ने बड़ा संगठनात्मक दांव खेला है। 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर नए चेहरों को मौका दिया गया है। यह कदम जहां बदलाव का संकेत देता है, वहीं यह भी स्वीकार करता है कि जमीनी स्तर पर असंतोष मौजूद है। जानकार यह भी कह रहे हैं कि इनमें से बहुत से नेता ओवैसी और हुमायूं कबीर के साथ जा सकते हैं और ऐसा हुआ तो इसका सीधा लाभ बीजेपी उठा सकती है।
ममता बनर्जी खुद भवानीपुर सीट से चुनाव लड़ रही हैं, जहां उनका सीधा मुकाबला भाजपा के नेता और नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी से है। 2021 में नंदीग्राम में मिली हार का मनोवैज्ञानिक असर अभी भी इस मुकाबले पर छाया हुआ है, भले ही टीएमसी ने तब भी सत्ता बरकरार रखी थी।
इस चुनाव की सबसे असाधारण और विवादास्पद पृष्ठभूमि मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण है। अंतिम सूची में करीब 62 लाख नामों के विलोपन के बाद मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ रह गई है। इसके अलावा लगभग 60 लाख नाम अब भी जांच के अधीन हैं।
यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि चुनावी नैरेटिव का केंद्र बन चुका है। टीएमसी इसे भाजपा पर “मताधिकार छीनने” के आरोप के रूप में पेश कर रही है, जबकि भाजपा इसे सूची की शुद्धता का सवाल बता रही है। लेकिन इस विवाद ने दूसरे मुद्दों —रोजगार, उद्योग, स्वास्थ्य— को पीछे धकेल दिया है।
भाजपा 2021 के मुकाबले मजबूत स्थिति से चुनाव में उतरी है, जब उसने 38% वोट शेयर के साथ 77 सीटें जीती थीं। 2016 के मुकाबले यह बड़ी छलांग थी। 2026 में पार्टी के पास सत्ता तक पहुंचने का अवसर तो है, लेकिन कई सीमाएं भी साफ दिख रही हैं। राज्य में सांस्कृतिक और भाषाई विविधता के साथ तालमेल बिठाने में भाजपा की कठिनाइयां बार-बार उजागर हुई हैं। इसके अलावा, संगठनात्मक स्तर पर गुटबाजी भी पार्टी की ताकत को कमजोर करती दिखती है।
2024 के कोलकाता रेप-मर्डर केस ने जरूर टीएमसी के खिलाफ माहौल बनाया था, लेकिन भाजपा उस गुस्से को स्थायी राजनीतिक समर्थन में पूरी तरह तब्दील नहीं कर पाई है।
दूसरी ओर, टीएमसी अपेक्षाकृत अधिक संगठित नजर आ रही है। ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की जोड़ी पार्टी को केंद्रीकृत और आक्रामक नेतृत्व दे रही है। दार्जिलिंग क्षेत्र में भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा के साथ गठबंधन भी टीएमसी को क्षेत्रीय संतुलन साधने में मदद कर सकता है।
ऐसे में यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं है, बल्कि यह भी तय करेगा कि बंगाल की राजनीति किस दिशा में जाएगी। क्या टीएमसी चौथी बार सत्ता में लौटकर अपनी पकड़ और मजबूत करेगी, या भाजपा अपने विस्तार की सीमा तोड़कर पहली बार सरकार बनाने में सफल होगी?
फिलहाल, तस्वीर धुंधली है। सत्ता-विरोध, मतदाता सूची का विवाद, नेतृत्व की टकराहट और जमीनी मुद्दों का हाशिए पर जाना—ये सभी संकेत देते हैं कि बंगाल 2026 का चुनाव असाधारण और अनिश्चितताओं से भरा होगा।
(अखिलेश अखिल पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)