और नीतीश के समाजवाद और इक़बाल को बीजेपी ने ज़मींदोज कर दिया

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उत्तर भारत के मुसलमानों को नीतीश पर नाज़ था। वे मानते थे कि नीतीश कुर्सी की लालच में भले ही उलटी-पलटी का खेल कर लेते हैं, लेकिन यह भी यक़ीन था कि वे सच्चे समाजवादी हैं और वक़्त पड़ने पर मुसलमानों के साथ दग़ा नहीं करेंगे। धोखा नहीं देंगे और फिर अपनी पूरी सेक्युलर छवि वाले इक़बाल को ध्वस्त नहीं करेंगे। लेकिन अब भारत के मुसलमान को अपनी सोच और समझ पर अफसोस हो रहा होगा। देश के मुसलमानों की रुदाली इसलिए नहीं है कि इस देश की एक सरकार ने उनकी थाती पर धावा बोल दिया है और देश का कोई भी नेता और राजनीतिक ताक़त कुछ भी करने की स्थिति में नहीं है।

पिछले दस सालों में मोदी सरकार ने कई कारनामे किए हैं। कई क़ानून बनाए हैं। कई बिल पेश किए और पास कराए। अयोध्या विवाद को भी देश ने देखा। तीन तलाक़ पर बने क़ानून को भी लोगों ने झेला। देश के कई इलाक़ों में मंदिर-मस्जिद विवाद को भी देश देख रहा है, लेकिन जिस गति से वक़्फ़ बिल के ज़रिए मुसलमानों पर हमला किया गया है, यह आज़ाद भारत और उस सेक्युलर जमात पर एक कलंक है, जिसकी चोट सालों तक इस देश के मुसलमान और सेक्युलर जमात को सालती रहेगी।

चंद्रबाबू नायडू से देश के मुसलमानों को कोई बड़ी राहत की उम्मीद नहीं थी। देश के मुसलमान मानते थे कि वे बिना पेंदी के लोटा हैं जो वक़्त के साथ कुछ भी कर सकते हैं। फिर देश के मुसलमान यह भी जानते थे कि चंद्रबाबू की राजनीति आंध्र प्रदेश तक ही सीमित है और वहाँ चुनाव होने में अभी चार साल का वक़्त है। जिन मुसलमानों के वोट से वे सत्ता तक पहुँचे हैं, उन्हें वे बाद में सहला भी सकते हैं। कोई नया झुनझुना पकड़ा सकते हैं। और बड़ी बात यह कि जब चुनाव आएगा तो अपनी रणनीति के मुताबिक वे बीजेपी का साथ छोड़ भी सकते हैं।

लेकिन अब देश का मुसलमान यह भी जान गया है कि भले ही बीजेपी इस बिल के ज़रिए हिंदुत्व के नाम पर हिंदुओं के एक और बड़े वोट पर क़ब्ज़ा कर सकती है और कह सकती है कि पहले अयोध्या विवाद को सुलझाया, फिर जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाया, फिर समान नागरिक संहिता पर काम किया, संभल के मामले को आगे बढ़ाया और काशी-मथुरा में जो हो रहा है उसको अंतिम परिणाम देना है – “हे देश के हिंदुओं, सब आ जाओ मेरी छतरी के नीचे! बीजेपी है तो देश है और मोदी है तो राष्ट्र है। बिना बीजेपी और मोदी के यह राष्ट्र कैसा?”

संसद में वक़्फ़ बिल के पास होने के बाद देश के कई इलाक़ों में जश्न का माहौल है। बीजेपी और संघ के लोग गाँव-गाँव पहुँचकर यह कह रहे हैं कि देखो यह बीजेपी और मोदी की सरकार ही है जो सबको खाना भी खिलाती है और धर्म की रक्षा भी करती है। अगले चुनाव में सब मिलकर एक बार फिर से ज़ोर लगाना ताकि मोदी की महिमा दुनिया भर में दिखे। बीजेपी रहेगी तभी हिंदू बचेगा और हिंदुत्व रहेगा। वरना सब ख़त्म हो जाएगा।

बिहार के ग्रामीण इलाक़ों से लेकर शहरी इलाक़ों में बीजेपी और संघ के हज़ारों लोग यात्रा कर रहे हैं और लोगों को समझा भी रहे हैं कि “मोदी है तो देश है। बीजेपी है तो हिंदुत्व है।”

लेकिन बीजेपी ने एक और खेल कर दिया। बिहार के सारे सेक्युलर जमात को भी नंगा कर दिया। नीतीश का इक़बाल ख़त्म किया। चिराग के मुस्लिम प्रेम को ध्वस्त किया और एनडीए के साथ जितने और भी कथित समाजवादी जुड़े हुए हैं, उनके पाखंड को भी उजागर कर दिया। अब इन लोगों की राजनीति कहीं की नहीं रह जाएगी।

बिहार में अभी कुछ ही महीने बाद चुनाव होने हैं। नीतीश और जेडीयू वाले चाहते हैं कि नीतीश फिर से सीएम बनें। लेकिन क्या बीजेपी भी कुछ यही चाहती है? हरगिज़ नहीं। वह तो चाहती है कि नीतीश का पतन हो। ख़ुद से पतन हो जाए तो ज़्यादा बेहतर, और ख़ुद से पतन की तरफ नहीं बढ़ें तो बीजेपी उस दिशा में ले जाए।

वक़्फ़ बिल के समर्थन के नाम पर अब बीजेपी ने नीतीश कुमार को कुएँ में धकेल दिया है – एक ऐसा कुआँ जहाँ सिर्फ़ अँधेरा ही है। नीतीश को एक बड़े वोट बैंक से काट दिया गया है। मुसलमानों का वोट नीतीश को न मिले इसका पूरा इंतज़ाम बीजेपी ने कर दिया है। नीतीश जितना कमज़ोर होंगे, बीजेपी की राह उतनी ही सरल होगी। बीजेपी को सिर्फ़ नीतीश को ख़त्म करना था, वह उसने कर दिया। बाक़ी जेडीयू तो बीजेपी की झोली में पहले से ही है।

नीतीश के बाद जेडीयू में नेता कौन है? कोई सांसद और विधायक भले हो सकता है, लेकिन उनकी पहचान क्या है? जातीय और धार्मिक उपद्रव को छोड़ दिया जाए तो जेडीयू के बाक़ी नेताओं को पहचानता कौन है? बीजेपी यह जानती थी। और उसे पता था कि नीतीश के अलावा बाक़ी का जेडीयू उसका ही तो है। कौन नहीं है? जो कल तक अमित शाह को उसी संसद में बेइज़्ज़त करने से बाज़ नहीं आता था, आज वही जेडीयू नेता शाह का भक्त बना प्रवचन दे रहा है। इस बात को बीजेपी भी जानती है और शाह भी।

जो नीतीश कुमार अभी रमज़ान के दिनों में टोपी पहने रोज़ा खोलते नज़र आए थे, अब वही नीतीश कुमार बिहार के मुसलमानों से मुँह छुपा रहे हैं। वे यह भी जानते हैं कि राजनीति ख़त्म हो गई है। नीतीश यह भी जानते हैं कि उनकी कई कमज़ोरियाँ अब बीजेपी के पास चली गई हैं। कुछ दिन पहले ही राजद नेता तेजस्वी यादव और उनकी बहन ने नीतीश पर यह इल्ज़ाम लगाया था कि वे बताएं कि रेल मंत्री रहते हुए उन्होंने किसके नाम पर रेल चलाई थी। बिहार का बच्चा-बच्चा यह सब जानता है। अब बीजेपी के हाथ एक बड़ा कांड लग गया है। समय आने पर वही बीजेपी उनसे सूद के साथ सब कुछ वसूल करेगी।

नीतीश के साथ बीजेपी क्या कुछ करेगी और जेडीयू के बाक़ी नेता क्या कुछ करेंगे इसका इंतज़ार बिहारी समाज को भी है। कोई नीतीश से पूछ सकता है कि देर रात तक संसद जिन मुद्दों पर चल रही है, क्या यही देश की असली समस्या है? क्या यह संसद ग़रीबी, बेरोज़गारी, महँगाई, पड़ोसी देशों के साथ अनबन और लोकतंत्र के सभी स्तंभों में फैले भ्रष्टाचार जैसे मसलों पर कभी देर रात तक चली है? या कोई चलाना चाहता है?

यह सवाल बीजेपी वालों से नहीं, नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू से पूछने की ज़रूरत है।

ख़ैर, आगे क्या होगा यह तो वक़्त ही बताएगा लेकिन बीजेपी के जल में फँसे नीतीश कुमार को झटका लगना शुरू हो गया है। जेडीयू के वक़्फ़ संशोधन बिल को समर्थन करने पर अब पार्टी में बग़ावत शुरू हो गई है। पार्टी के मुस्लिम नेता पार्टी के इस फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं। बिल के विरोध में जेडीयू नेता डॉ. मोहम्मद क़ासिम अंसारी ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफ़ा दे दिया है। क़ासिम अंसारी ने अपना त्याग पत्र जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भेजा है। इसके साथ ही, उन्होंने वक़्फ़ संशोधन बिल को लेकर अपनी गहरी नाराज़गी भी ज़ाहिर की है।

क़ासिम अंसारी ने पत्र में कहा, “वक़्फ़ बिल ने मुझे और लाखों मुसलमानों को गहरा आघात पहुँचाया है। जेडीयू के नेताओं का इस बिल को समर्थन देने का तरीका न केवल असंवेदनशील है, बल्कि यह पसमांदा मुसलमानों के ख़िलाफ़ है।” उन्होंने यह भी लिखा कि लोकसभा में ललन सिंह द्वारा इस बिल का समर्थन करते हुए दिया गया वक्तव्य उन्हें बहुत आहत करने वाला था।

डॉ. क़ासिम अंसारी पेशे से डॉक्टर हैं। अंसारी जेडीयू में एक प्रमुख मुस्लिम चेहरा माने जाते हैं। पिछला विधानसभा चुनाव पूर्वी चंपारण के ढाका सीट से लड़ा था, लेकिन वे हार गए। बीते कई सालों से पार्टी के भीतर अल्पसंख्यक समुदाय के मुद्दों को उठाने में सक्रिय रहे हैं। वे पसमांदा मुस्लिम समाज से आते हैं। पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर की तरह वे भी पसमांदा मुस्लिम वर्ग से आते हैं। आने वाले विधानसभा चुनाव में भी वे ढाका विधानसभा क्षेत्र के संभावित प्रत्याशी थे। उनकी राजनीतिक पहचान नीतीश कुमार के सेक्युलर और सामाजिक न्याय के एजेंडे से जुड़ी रही, जिसके चलते वे मुस्लिम समुदाय में प्रभाव रखते थे।

उम्मीद की जा रही है कि जेडीयू से अधिकतर मुस्लिम नेता बाहर निकल जाएँगे। वे चाहे जहाँ भी जाएँ, लेकिन नीतीश उनके रडार पर होंगे। उनकी हार में ही मुसलमानों की जीत होगी। बीजेपी चाहे आगे बढ़ जाए लेकिन बिहारी मुसलमान की नज़र में नीतीश गिर गए हैं। उनका इक़बाल ख़त्म हो गया है। उनका तेज़-पुंज मलिन हो गया है।

चलते-चलते, राजद नेता लालू यादव की यह हुंकार यहाँ रखना ज़रूरी है कि एम्स में भर्ती लालू यादव वहीं से बीजेपी को ललकार रहे हैं और कह रहे हैं:
“संघी-भाजपाई नादानों, तुम मुसलमानों की ज़मीनें हड़पना चाहते हो, लेकिन हमने हमेशा वक़्फ़ की ज़मीनें बचाने के लिए कड़ा क़ानून बनाया है, और इसे लागू करवाने में मदद की है। मुझे अफ़सोस है कि आज के इस कठिन दौर में, जहाँ अल्पसंख्यकों, ग़रीबों, मुसलमानों और संविधान पर हमला हो रहा है, मैं संसद में नहीं हूँ, लेकिन मैं हमेशा आपके ख़्यालों, विचारों और चिंताओं में हूँ। यह देखकर अच्छा लगता है कि मेरी विचारधारा, नीति और सिद्धांतों पर मेरी प्रतिबद्धता, अडिगपन और स्थिरता को आज भी महत्व दिया जा रहा है।”

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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