वाराणसी। ऐतिहासिक दालमंडी गली के बाद अब बाबा विश्वनाथ की नगरी के सबसे पवित्र और प्राचीन महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर बुलडोज़र की मौजूदगी ने पूरे शहर को बेचैन और व्यथित कर दिया है। सिंधिया घाट तक प्रस्तावित कॉरिडोर निर्माण ने बनारस को एक बार फिर उसी पुराने, लेकिन आज और भी तीखे सवाल के सामने खड़ा कर दिया है कि क्या तथाकथित विकास की कीमत पर काशी की आत्मा सुरक्षित रह पाएगी?
घाट की सीढ़ियों पर आज भी चिताएं जल रही हैं। अग्नि अपने शाश्वत विधान में देह को भस्म कर रही है, लेकिन उन चिताओं के पास खड़े लोग खुद से यह सवाल पूछने से खुद को रोक नहीं पा रहे कि अगर विकास आस्था को ही राख कर दे तो फिर बचेगा क्या? विकास के नाम पर बनारस में जितने मंदिरों, प्रतिमाओं और पुरातन संरचनाओं को तोड़ा गया है वैसा ध्वंस शायद औरंगज़ेब के शासनकाल में भी नहीं हुआ होगा। यह बात अब घाटों पर फुसफुसाहट नहीं, खुला दर्द बन चुकी है।
मणिकर्णिका घाट पर कदम रखते ही सबसे पहले गंगा की वही परिचित धारा दिखाई देती है-निर्विकार, निश्चल और शाश्वत। चिताओं की अग्नि भी अपने तय विधान में जल रही है। मगर इस सबके बीच घाट की सीढ़ियों से टकराती भारी मशीनों की कर्कश आवाज़ उस ख़ामोशी को बार-बार चीर देती है, जो सदियों से जीवन और मृत्यु के इस महासंगम की पहचान रही है। महाश्मशान अब सिर्फ अंतिम विदाई का स्थल नहीं रह गया है, बल्कि आस्था, इतिहास और विकास के बीच खिंची एक गहरी, तकलीफ़देह रेखा बन चुका है।
काशी के 84 प्रमुख घाटों में शामिल मणिकर्णिका घाट का एक हिस्सा इन दिनों पुनर्विकास के दायरे में है। यही वह घाट है जिसे 18वीं सदी में लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर ने बनवाया था और बाद में स्वयं इसके जीर्णोद्धार का कार्य कराया। घाट की सीढ़ियां, पत्थरों की बनावट और आसपास खड़ी संरचनाएं सिर्फ स्थापत्य का नमूना नहीं हैं, बल्कि उस दौर की सोच, लोककल्याण और धार्मिक चेतना की गवाही भी देती हैं। आज वही विरासत प्रशासनिक परियोजनाओं और स्थानीय असंतोष के बीच फंसी, कराहती नज़र आती है।
मणिकर्णिका घाट पर इन दिनों जो घट रहा है, वह महज़ ईंट और पत्थर के टूटने की कहानी नहीं है। यह उन भावनाओं के बिखरने की दास्तान है, जिनसे काशी सदियों से सांस लेती आई है। जब महाश्मशान की सीढ़ियों पर बुलडोज़र उतरे और पत्थरों के साथ-साथ मूर्तियां व छोटे मंदिर ढहाए गए, तो घाट की राख में सिर्फ मलबा नहीं घुला, उसमें आस्था का दर्द, इतिहास की चीख और परंपरा की सिसकी भी शामिल हो गई।
मणिकर्णिका घाट कॉरिडोर के निर्माण के क्रम में नीचे घाट पर कुछ दिन पहले बुलडोज़र चलने की खबर जैसे ही फैली, पाल समाज में गहरा आक्रोश फैल गया। 13 जनवरी 2026 की दोपहर पाल समिति के अध्यक्ष महेंद्र पाल अपने साथियों के साथ मणिकर्णिका घाट पहुंचे। देवी अहिल्याबाई होल्कर की मूर्ति टूटने की बात कहते हुए उनकी आवाज़ में गुस्सा कम और पीड़ा कहीं ज़्यादा थी। देखते ही देखते वहां भीड़ जमा होने लगी। कोई सवाल पूछ रहा था तो कोई वीडियो बना रहा था और कोई चुपचाप टूटे पत्थरों को निहार रहा था मानो उनमें अपना अतीत तलाश रहा हो।
इसी बीच प्रशासनिक अधिकारी भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे और मणिकर्णिका घाट को खाली कराया गया। बाद में पाल समाज के अध्यक्ष महेंद्र पाल पिंटू ने मीडिया से बातचीत में कहा कि विकास के नाम पर धरोहरों को हटाया जाना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। घाट के चच्छन गुरु ने तल्ख़ लहजे में सवाल उठाया, “अगर विकास घाट का अस्तित्व ही खत्म कर दे, तो वह आखिर किसके लिए है?”
मणिकर्णिका घाट पर मूर्तियों को तोड़े जाने का वीडियो वायरल होते ही विरोध के स्वर और तेज़ हो गए। घाट के आसपास रहने वाले लोगों ने आरोप लगाया कि इस कार्रवाई से उनकी रोज़ी-रोटी पर सीधा असर पड़ा है। घाट के पुरोहितों का कहना है कि यहां मौजूद शिवलिंग, छोटे मंदिर और रानी अहिल्याबाई होल्कर की मूर्ति को नुकसान पहुंचा है। उनका साफ कहना है कि विकास की आड़ में मूर्तियों और मंदिरों को तोड़ना कहीं से भी न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
वायरल वीडियो का सच
इन दिनों मणिकर्णिका घाट पर निर्माण कार्य पूरे ज़ोर-शोर से चल रहा है। “पगला बाबा” के नाम से वायरल हो रहे वीडियो में बुलडोज़र से पुराने मंदिरों को तोड़ते हुए दिखाया गया है। यही वीडियो अब शहर भर में बहस और बेचैनी का केंद्र बन गया है। कभी कॉरिडोर के नाम पर कार्रवाई की खबरें सामने आती हैं तो अब टूटे मंदिर और खंडित मूर्तियां इस आशंका को और गहरा कर रही हैं कि विकास की राह में पुरातन आस्थाओं को अपना स्थान छोड़ना ही पड़ेगा।
वायरल वीडियो में शिव मंदिर और गंगा मंदिर टूटे हुए दिखाई देते हैं। पगला बाबा सवाल उठाते हैं कि जब काम करने वाले मज़दूर और ठेकेदार भी हिंदू हैं तो मंदिरों को कैसे तोड़ा जा रहा है? अघोर मान्यताओं से जुड़ा काली माता का मंदिर और तारकेश्वर महादेव मंदिर के आसपास का इलाका भी तोड़फोड़ की जद में बताया जा रहा है। वीडियो में यह तीखी टिप्पणी भी गूंजती है, “धर्म की नगरी में धर्म ही धंधा बन गया है।”
कुछ दिन पहले अचानक जलासेन घाट से लेकर सिंधिया घाट तक गंगा किनारे स्थायी और अस्थायी निर्माण हटाने की कार्रवाई शुरू हुई। भारी मशीनों के शोर ने स्थानीय लोगों को सकते में डाल दिया। इस दौरान कई छोटे मंदिर ध्वस्त हो गए। मणिकर्णिका घाट पर बैठे पंडे, डोम और स्थानीय लोग बताते हैं कि विवाद तब खुलकर सामने आया, जब निर्माण के दौरान हटाए गए पत्थरों और मलबे के बीच देवी अहिल्याबाई होल्कर से जुड़ी प्रतिमा और अन्य धार्मिक संरचनाएं दिखाई दीं। यह दृश्य देखते ही घाट पर सवाल उठने लगे।
मणिकर्णिका घाट के समीप रहने वाले संजय मिश्रा कहते हैं, “जिस विरासत को तोड़ा जा रहा है, वह सिर्फ पत्थर नहीं, हमारी स्मृति है। हम पीढ़ियों से जानते आए हैं कि कौन-सी मणि कहां है और कौन-सी संरचना किस कथा से जुड़ी है। बिना बताए सब कुछ बदल दिया गया।”
संजय की बातों में वही चिंता झलकती है, जो घाट पर मौजूद कई चेहरों पर साफ दिखाई देती है। सबके मन में यह खौफ गहराता जा रहा है कि कहीं विकास के नाम पर पहचान ही न मिटा दी जाए। दूसरी ओर, प्रशासन का पक्ष इससे अलग है। अधिकारियों का दावा है कि मणिकर्णिका घाट पर चल रहा कार्य पूर्व से तय पुनर्विकास परियोजना का हिस्सा है। उनके अनुसार घाट पर मौजूद किसी भी मूर्ति या कलाकृति को नुकसान नहीं पहुंचाया गया है। सभी प्रतिमाओं और ऐतिहासिक अवशेषों को सुरक्षित रखा गया है और निर्माण पूरा होने के बाद उन्हें सम्मानपूर्वक यथास्थान स्थापित किया जाएगा।
कितना सच है प्रशासन का दावा
बनारस जिला प्रशासन अपने कारनामों पर उठ रहे सवालों को थामने के लिए यह दावा कर रहा है कि सोशल मीडिया पर फैल रहे कई वीडियो भ्रामक हैं और उन्हें तकनीकी तरीकों, यहां तक कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से तैयार किया गया है। प्रशासन का कहना है कि ऐसे मामलों की लगातार निगरानी की जा रही है और भ्रम फैलाने वालों को चिह्नित किया जा रहा है।
घाट पर चल रहे निर्माण कार्य को नज़दीक से देखने पर तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां करती है। हाइड्रा और अन्य भारी मशीनों की मदद से पक्के घाटों के कुछ हिस्से हटाए जा रहे हैं। सदियों पुराने पत्थर उखाड़े जा रहे हैं और उन्हें बड़ी नावों के ज़रिये गंगा के रास्ते दूसरी ओर पहुंचाया जा रहा है। प्रशासन का तर्क है कि इन पुरानी सामग्रियों को नष्ट नहीं किया जाएगा, बल्कि नई संरचनाओं में उनका पुनः उपयोग किया जाएगा।
यहीं से स्थानीय लोगों और कुछ सामाजिक संगठनों की आपत्ति शुरू होती है। उनका कहना है कि 300 साल से अधिक पुरानी संरचनाओं की मौलिकता इस तरह की प्रक्रिया में बुरी तरह प्रभावित होती है। उनके लिए मणिकर्णिका घाट महज़ एक श्मशान नहीं, बल्कि काशी की पौराणिक चेतना, उसकी आत्मिक स्मृति और उसकी जीवित परंपरा का केंद्र है। यहां हर पत्थर, हर सीढ़ी किसी कथा, किसी विश्वास और किसी स्मृति से जुड़ी हुई है, जिसे उखाड़कर दोबारा जोड़ देना इतिहास के साथ खिलवाड़ से कम नहीं।
पौराणिक मान्यता है कि मणिकर्णिका घाट पर भगवान विष्णु की मणि गिरी थी, जिससे इस घाट का नाम मणिकर्णिका पड़ा। लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर ने यहां केवल घाट का निर्माण नहीं कराया था, बल्कि यात्रियों के लिए धर्मशालाएं, पूजा की व्यवस्थाएं और एक संपूर्ण सामाजिक ढांचा खड़ा किया था। यही सब मिलकर मणिकर्णिका को महज़ श्मशान से कहीं आगे मोक्ष, विश्वास और लोककल्याण का प्रतीक बनाता है।

बनारस से इंदौर तक आक्रोश
बनारस के सबसे प्राचीन और पवित्र महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर देवी अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमा और घाट के एक हिस्से को ध्वस्त किए जाने की घटना का वीडियो जैसे ही वायरल हुआ, उसने देशभर में तीखी प्रतिक्रिया को जन्म दे दिया। 13 जनवरी को सामने आई इस कार्रवाई के बाद आक्रोश की लहर सिर्फ काशी तक सीमित नहीं रही, बल्कि मध्यप्रदेश के इंदौर तक जा पहुंची।
इतिहासकारों, सामाजिक संगठनों, साधु-संतों और आम नागरिकों का कहना है कि यह सिर्फ एक निर्माण संरचना का मामला नहीं, बल्कि काशी की आत्मा और उसकी ऐतिहासिक स्मृति का अपमान है। यह घटना इसलिए और अधिक संवेदनशील हो गई है क्योंकि पूरे देश में इस समय लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर की त्रि-जन्म शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है। ऐसे मौके पर काशी में उनसे जुड़ी धरोहरों को क्षति पहुंचने की तस्वीरों ने लोगों की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाई है।
देवी अहिल्याबाई होल्कर को काशी विश्वनाथ मंदिर, मणिकर्णिका घाट समेत देशभर के अनेक तीर्थ स्थलों के पुनरुद्धार के लिए जाना जाता है। मणिकर्णिका घाट का यह हिस्सा भी उसी ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक माना जाता रहा है। ऐसे में यहां हुआ कथित ध्वस्तीकरण कई लोगों को इतिहास के साथ की गई ज़्यादती जैसा महसूस हो रहा है।
महाश्मशान मणिकर्णिका घाट से जुड़ा वीडियो वायरल होते ही विवाद और तेज़ हो गया। वीडियो में घाट पर बुलडोज़र चलते हुए साफ़ दिखाई देते हैं। स्थानीय लोग “विकास के नाम पर विनाश” और “आस्था पर बुलडोज़र” जैसे नारे लगाते हुए नज़र आते हैं। आरोप यह है कि सौंदर्यीकरण और पुनर्विकास की आड़ में सदियों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक संरचनाओं को मिटाया जा रहा है।
वीडियो सामने आने के बाद बनारस में स्थानीय नागरिकों, पुरोहितों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने घाट पर पहुंचकर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि मणिकर्णिका घाट सिर्फ एक घाट नहीं, बल्कि सनातन परंपरा, मोक्ष की अवधारणा और काशी की जीवित विरासत का केंद्र है। यहां किसी भी तरह का निर्माण या ध्वस्तीकरण बिना व्यापक संवाद, ऐतिहासिक अध्ययन और स्थानीय समाज की सहमति के नहीं होना चाहिए। कई लोगों ने यह सवाल भी उठाया कि इस कार्रवाई से पहले पुरातत्व विशेषज्ञों, धर्माचार्यों और घाट से जुड़े समाज की राय क्यों नहीं ली गई?
इस घटना की गूंज मध्यप्रदेश के इंदौर तक सुनाई दी। देवी अहिल्याबाई होल्कर की नगरी माने जाने वाले इस क्षेत्र में भी लोगों ने नाराज़गी जताई। सामाजिक संगठनों और सांस्कृतिक संस्थाओं ने काशी में हुई कार्रवाई की निंदा करते हुए इसे लोकमाता के योगदान का अपमान बताया। उनका कहना है कि अहिल्याबाई होल्कर ने जीवनभर धार्मिक स्थलों को बचाने और संवारने का काम किया, ऐसे में उन्हीं से जुड़ी धरोहर को नुकसान पहुंचाना दुर्भाग्यपूर्ण और पीड़ादायक है।
इतिहासकारों का मानना है कि मणिकर्णिका घाट गुप्तकाल से लेकर मध्यकाल और आधुनिक इतिहास तक की निरंतरता को अपने भीतर समेटे हुए है। यहां हुआ कोई भी हस्तक्षेप केवल भौतिक ढांचे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह सांस्कृतिक स्मृति और धार्मिक परंपरा को भी गहरे स्तर पर प्रभावित करता है। विशेषज्ञों ने पूरे मामले की पारदर्शी जांच की मांग करते हुए यह स्पष्ट करने को कहा है कि ध्वस्तीकरण किस योजना के तहत और किस अनुमति से किया गया।
डीएम ने पेश की सफाई
घाट पर उठे विरोध और बढ़ते असंतोष के बीच जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार स्वयं सामने आए और प्रशासन का पक्ष रखा। मणिकर्णिका घाट की सीढ़ियों और निर्माण क्षेत्र के बीच खड़े होकर उन्होंने कहा कि यह पूरा मामला जानबूझकर फैलाया गया भ्रम है। उनके अनुसार, मणिकर्णिका घाट पर हर साल अंतिम संस्कार के लिए लाखों लोग आते हैं। जगह की लगातार कमी बनी रहती है और स्वच्छता तथा व्यवस्थाओं को बनाए रखना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती रहा है। इन्हीं व्यावहारिक समस्याओं को ध्यान में रखते हुए घाट के पुनर्विकास की योजना बनाई गई है।
जिला प्रशासन ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि मूर्तियों और कलाकृतियों को सुरक्षित निकालकर रखा गया है। पुनर्विकास का उद्देश्य घाट पर सुविधाओं को बेहतर बनाना है। प्रशासन के अनुसार, विकास कार्य मुख्य रूप से कच्चे हिस्सों और पुरानी सीढ़ियों के पुनर्निर्माण तक सीमित है। इस दौरान दीवारों पर लगी कुछ कलाकृतियां और मूर्तियां प्रभावित हुई हैं, जिन्हें संस्कृति विभाग ने सुरक्षित रख लिया है और कार्य पूर्ण होने के बाद उन्हें मूल स्वरूप में पुनः स्थापित किया जाएगा।
डीएम सत्येंद्र का कहना था कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कुछ वीडियो एआई की मदद से तैयार किए गए हैं, जिनका मकसद लोगों की भावनाओं को भड़काना है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिस ‘मणि’ को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है उसमें मौजूद मूर्तियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया है। उन मूर्तियों को संस्कृति विभाग के सहयोग से सुरक्षित तरीके से संरक्षित किया गया है, ताकि उनकी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता बनी रहे।
उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि निर्माण कार्य पूरा होने के बाद सभी मूर्तियों को फिर से उसी स्थान पर स्थापित किया जाएगा, जहां वे पहले थीं। जिलाधिकारी ने दो टूक कहा कि मणिकर्णिका घाट पर स्थित मूल मंदिरों को किसी भी तरह की क्षति नहीं पहुंचाई गई है और न ही पहुंचाई जाएगी। जो मंदिर जिस स्वरूप में हैं, वे उसी रूप में बने रहेंगे। उनके अनुसार, कलाकृतियों को नुकसान पहुंचाने की बातें निराधार हैं और प्रशासन ने हर महत्वपूर्ण संरचना को संरक्षित करने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं।
जिलाधिकारी ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील करते हुए कहा कि जो लोग जानबूझकर इस मामले में भ्रम फैला रहे हैं, उन्हें चिह्नित किया जा रहा है और आवश्यकता पड़ने पर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन का दावा है कि पुनर्विकास का उद्देश्य आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि मणिकर्णिका घाट को सुरक्षित, स्वच्छ और व्यवस्थित बनाना है।
सवाल जो अब भी खड़े हैं?
मणिकर्णिका घाट के पुनर्विकास को लेकर प्रशासन जिस परियोजना का हवाला दे रहा है, वह काग़ज़ों पर सुव्यवस्थित, आधुनिक और पर्यावरण के अनुकूल दिखाई देती है। 18 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हो रहे इस प्रोजेक्ट को सीएसआर फंड से पूरा किया जाना है और इसकी निगरानी नगर निगम के ज़िम्मे है। कार्यदायी संस्था का दावा है कि लगभग 29 हज़ार 350 वर्गमीटर क्षेत्र में यह पूरा ढांचा विकसित किया जाएगा।
गंगा किनारे की दलदली ज़मीन को ध्यान में रखते हुए 15 से 20 मीटर नीचे तक पाइलिंग कर सख़्त मिट्टी तक पहुंच बनाई गई है, ताकि बाढ़ के समय घाट की संरचना सुरक्षित रहे और भविष्य में किसी तरह का तकनीकी ख़तरा न हो। प्रशासन का कहना है कि यह पूरी योजना वैज्ञानिक और दीर्घकालिक सोच के साथ तैयार की गई है।
परियोजना के अनुसार, मणिकर्णिका महाश्मशान घाट को एक ऐसे परिसर के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां दाह संस्कार से जुड़ी तमाम प्रक्रियाएं एक ही स्थान पर व्यवस्थित ढंग से पूरी हो सकें। योजना में 25 मीटर ऊंची चिमनी लगाने का प्रस्ताव है, ताकि चिताओं से उठने वाली राख और धुआं ऊपर की ओर फैल जाए और आसपास रहने वाले लोगों के घरों, गलियों और मंदिरों तक न पहुंचे। स्थानीय निवासियों की वर्षों पुरानी शिकायतों को इसी व्यवस्था के ज़रिये कम करने की बात कही जा रही है।
इसके साथ ही मृतकों के स्नान के लिए पवित्र जलकुंड, अपशिष्ट ढोने के लिए विशेष ट्रॉलियां और मुंडन के लिए अलग क्षेत्र विकसित करने का दावा किया गया है। दाह संस्कार क्षेत्र को चारों ओर से आंशिक रूप से कवर किया जाएगा, जिसमें पांच बर्थ, सर्विस एरिया और अपशिष्ट संग्रह की व्यवस्था होगी। परिजनों के लिए प्रतीक्षालय, सीढ़ियां और भूतल पर पंजीकरण कक्ष बनाए जाने की योजना भी शामिल है। खुले में दाह संस्कार के लिए 18 प्लेटफॉर्म प्रस्तावित हैं।
इसके अलावा लकड़ी के भंडारण का अलग क्षेत्र, सामुदायिक प्रतीक्षाकक्ष और दो सामुदायिक शौचालय भी इस नए स्वरूप का हिस्सा बताए जा रहे हैं। निर्माण में चुनार और जयपुर के पत्थरों के इस्तेमाल की बात कही जा रही है, ताकि घाट का रंग-रूप पारंपरिक बना रहे।
एक नजर में विकास योजना
· दो सामुदायिक शौचालय और हरित क्षेत्र
· भूतल का कुल क्षेत्रफल: 29,350 वर्ग फीट
· दाह संस्कार क्षेत्र: 12,250 वर्ग फीट
· प्रथम तल का कुल क्षेत्रफल: 20,200 वर्ग फीट
· घाट पर 32 शव प्लेटफॉर्म और प्रदूषण रहित चिमनी
· बड़े पैमाने पर पर्यटकों के लिए विजिटर मार्ग
· भूतल पर पंजीकरण कक्ष, लकड़ी भंडारण क्षेत्र, सामुदायिक प्रतीक्षा कक्ष
· आसपास के क्षेत्र का सुंदरीकरण और विकास
· रूपा फाउंडेशन के सीएसआर फंड से होने वाले काम का शिलान्यास प्रधानमंत्री ने किया
घाट के पुनर्विकास पर लगभग 18 करोड़ रुपये कोलकाता के रूपा फाउंडेशन के सीएसआर फंड से खर्च हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7 जुलाई, 2023 को महाश्मशान मणिकर्णिका पुनर्विकास का शिलान्यास किया था। इसमें चुनार के बलुआ पत्थरों और जयपुर के गुलाबी पत्थरों का उपयोग किया जा रहा है।

मोक्ष की अवधारणा है मणिकर्णिका
ज़मीन पर खड़े लोग इस “नए स्वरूप” को महज़ एक निर्माण परियोजना के तौर पर नहीं देख रहे। उनके लिए मणिकर्णिका घाट कोई साधारण ढांचा नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपरा, मोक्ष की अवधारणा और काशी की सांस्कृतिक स्मृति का जीवित प्रतीक है। लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा बनवाए गए घाट से जुड़ी हर सीढ़ी, हर पत्थर और हर संरचना को लोग इतिहास का हिस्सा मानते हैं।
यही वजह है कि जब मलबे के बीच मूर्तियां दिखाई दीं, तो नाराज़गी केवल तोड़-फोड़ तक सीमित नहीं रही, वह आस्था पर चोट के एहसास में तब्दील हो गई। लोगों को लगा कि उनके विश्वास, उनकी स्मृतियों और उनकी पहचान के साथ बग़ैर पूछे छेड़छाड़ की जा रही है।
एक्टिविस्ट दिलीप सिंह कहते हैं कि प्रशासन बार-बार भरोसा दिला रहा है कि मूर्तियां सुरक्षित हैं और उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाया गया, लेकिन स्थानीय लोग यह सवाल कर रहे हैं कि अगर सब कुछ सुरक्षित था, तो बिना किसी पूर्व सूचना के संरचनाएं क्यों हटाई गईं। अगर पुरानी सामग्री और मूर्तियों को दोबारा स्थापित किया जाना है, तो उन्हें खुले तौर पर जनता के सामने क्यों नहीं रखा गया?
घाट पर बैठे पुरोहित, डोम समाज के लोग और आसपास रहने वाले परिवार एक सुर में यही बात कहते हैं कि विकास ज़रूरी है, लेकिन संवाद और संवेदनशीलता उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है। उनका कहना है कि काशी में बदलाव आदेश से नहीं, सहमति और समझ से होते आए हैं।
मणिकर्णिका का यह विवाद दिन-ब-दिन और गहराता जा रहा है। प्रशासन की ओर से लगातार आश्वासन दिए जा रहे हैं। मंडलायुक्त एस. राजलिंगम ने कहा, “होल्कर ट्रस्ट के प्रतिनिधियों को आश्वस्त किया गया है कि मणिकर्णिका घाट पुनर्विकास परियोजना के अंतर्गत अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमाएं पूरे सम्मान के साथ स्थापित की जाएंगी।”
वहीं नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल ने बताया कि गुरुधाम मंदिर में कुल छह मूर्तियों को सुरक्षित रखा गया है। उन्होंने कहा, “मणिकर्णिका घाट पर निर्माणाधीन परियोजना में इन मूर्तियों को उनके यथास्थान पूरे सम्मान और गरिमा के साथ स्थापित किया जाएगा।”
पुनर्विकास परियोजना से जुड़ी कार्यदायी संस्था की ओर से भी सहयोग का भरोसा दिलाया गया है। रूपा फाउंडेशन के संयोजक सिद्धांत अग्रवाल ने कहा, “मणिकर्णिका घाट के मामले में हमारी संस्था जिला प्रशासन के साथ है। प्रशासन की ओर से जो भी दिशा-निर्देश मिलेंगे, उनका पूरी तरह पालन किया जाएगा। इस संबंध में कार्यदायी संस्था से भी बातचीत की जा चुकी है।”
राज परिवार के प्रतिनिधि पहुंचे बनारस
मणिकर्णिका घाट पर महारानी अहिल्याबाई होल्कर की मूर्तियों को क्षति पहुंचने का मामला अब केवल प्रशासनिक या निर्माण विवाद भर नहीं रह गया है। यह काशी की ऐतिहासिक स्मृति और सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न बन चुका है। इसी संवेदनशील पृष्ठभूमि में खासगी देवी अहिल्याबाई होल्कर ट्रस्ट के अध्यक्ष और इंदौर राजपरिवार के प्रतिनिधि यशवंत होल्कर बुधवार को वाराणसी पहुंचे।
उन्होंने गुरुधाम मंदिर परिसर में रखी गई महारानी की साबूत और खंडित मूर्तियों के समक्ष नतमस्तक होकर क्षमायाचना की और विधिवत शुद्धि-पूजन संपन्न कराया। गुरुधाम मंदिर में इस समय महारानी अहिल्याबाई होल्कर की दो साबूत और दो खंडित मूर्तियां रखी गई हैं।
मूर्तियों के सामने खड़े होकर यशवंत होल्कर ने कहा कि काशी में रानी अहिल्याबाई की स्मृतियों के साथ ऐसा व्यवहार न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि पूरी तरह अक्षम्य भी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इंदौर राजपरिवार और ट्रस्ट ने कभी यह कल्पना भी नहीं की थी कि काशी जैसी पवित्र नगरी में महारानी की विरासत के साथ ऐसा आचरण होगा। ट्रस्ट और राजपरिवार इस पूरे घटनाक्रम की कठोर शब्दों में भर्त्सना करता है।
यशवंत होल्कर ने बताया कि मणिकर्णिका घाट की मढ़ी के चारों कोनों पर स्थापित महारानी अहिल्याबाई की चार मूर्तियां तोड़ी गई हैं। इनमें से दो मूर्तियां खंडित अवस्था में मिली हैं, जबकि अन्य दो का केवल निचला हिस्सा ही उपलब्ध हो पाया है। उन्होंने प्रशासन से मांग की कि इन मूर्तियों का शेष हिस्सा सात दिनों के भीतर ट्रस्ट को सौंपा जाए, ताकि उनका विधिवत संरक्षण और पुनर्निर्माण कराया जा सके।
मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, “मैं मानता हूं कि मणिकर्णिका घाट पर जो हुआ, वह शायद भूलवश हुआ हो। लेकिन सवाल यह है कि ऐसी भूल हुई कैसे? स्थानीय स्तर पर ज़िम्मेदार लोगों ने पहले क्यों नहीं सोचा कि वे किस विरासत के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं। यह पूरी तरह अक्षम्य है और इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों की पहचान होनी चाहिए।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि घाट के स्वरूप में किसी भी तरह का बदलाव ट्रस्ट की सहमति के बिना नहीं हो सकता। मणिकर्णिका घाट केवल एक संरचना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर है, जिसके संरक्षण और संवर्द्धन की ज़िम्मेदारी ट्रस्ट पर है।
बाद में यशवंत होल्कर ने मंडलायुक्त एस. राजलिंगम और नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल से करीब आधे घंटे तक विमर्श किया। इस बातचीत के बाद उन्होंने गुरुधाम मंदिर परिसर में महारानी अहिल्याबाई होल्कर की साबूत मूर्तियों का शुद्धि-पूजन कराया और खंडित मूर्तियों के समक्ष खड़े होकर क्षमायाचना की। इस दौरान उन्होंने राजपरिवार की पारंपरिक सफेद टोपी पहनी हुई थी। इंदौर राजपरिवार में यह टोपी तब पहनी जाती है, जब कोई सदस्य प्रायश्चित और क्षमा-भाव के साथ पूजा करता है।
अहिल्याबाई की बेटी हुईं थी सती
इतिहास के पन्नों में झांकें तो मणिकर्णिका घाट से महारानी अहिल्याबाई होल्कर का रिश्ता केवल शासन और निर्माण तक सीमित नहीं दिखाई देता, बल्कि वह एक गहरे, निजी और असह्य दुख से भी जुड़ा हुआ है। अपनी पुत्री मुक्ताबाई के सती होने के बाद महारानी भीतर तक टूट गई थीं। यह वह समय था जब सत्ता, वैभव और राजमहल सब कुछ अर्थहीन लगने लगा था। इसी पीड़ा और वैराग्य के दौर में, वर्ष 1791 में, उन्होंने मणिकर्णिका घाट का जीर्णोद्धार कराया ताकि दिवंगत आत्माओं की अंतिम क्रिया निर्विघ्न और सम्मान के साथ संपन्न हो सके।
कहा जाता है कि पुत्री के सती होने के बाद महारानी की जीने की जिजीविषा लगभग समाप्त हो गई थी। यह घटना उनके जीवन का ऐसा आघात थी, जिससे वे कभी उबर नहीं सकीं। इसी दुख की छाया में, चार वर्ष बाद, 1795 में उन्होंने स्वयं देह त्याग दी। मणिकर्णिका घाट का पुनर्निर्माण केवल स्थापत्य कार्य नहीं था, बल्कि एक मां के शोक, करुणा और लोककल्याण की भावना का मौन स्मारक भी था।
मणिकर्णिका घाट पर जिन मूर्तियों को तोड़े जाने का आरोप है, उनका महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहरा पुरातात्विक और ऐतिहासिक भी है। महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने अपने पूरे जीवनकाल में देश के केवल तीन तीर्थ स्थलों पर अपनी मूर्तियां स्थापित करवाई थीं—गया, महेश्वर और काशी। काशी में एक मूर्ति विश्वनाथ मंदिर में स्थापित की गई थी, जबकि चार मूर्तियों का एक विशेष और दुर्लभ सेट मणिकर्णिका घाट की मढ़ी के चारों ओर लगाया गया था।
यही कारण है कि इन मूर्तियों को पहुंची क्षति को केवल तोड़-फोड़ नहीं, बल्कि इतिहास और विरासत पर गहरी चोट के रूप में देखा जा रहा है।
इंदौर राजपरिवार के प्रतिनिधि यशवंत होल्कर ने स्पष्ट किया कि उनकी ओर से जांच की मांग केवल दोषियों पर कार्रवाई के लिए नहीं है। उन्होंने कहा, “किस पर कार्रवाई होगी या नहीं, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है। सबसे ज़रूरी यह है कि भविष्य में काशी में ऐसा कभी न हो।” उन्होंने सवाल उठाया कि अगर काशी के वर्तमान स्वरूप से महारानी अहिल्याबाई होल्कर के योगदान को हटा दिया जाए, तो काशी में आखिर बचेगा ही क्या—यह प्रश्न आज विद्वत समाज से लेकर आम जनमानस तक सभी के सामने खड़ा है।
यशवंत होल्कर ने भरोसा दिलाया कि ट्रस्ट पुरातात्विक पद्धति से मूर्तियों का पुनर्निर्माण कराने में पूरी तरह सक्षम है। जब तक मणिकर्णिका घाट का नया निर्माण पूरा नहीं हो जाता, तब तक इन मूर्तियों को छोटे विश्वनाथ मंदिर (अहिल्याबाई घाट) के गर्भगृह में सुरक्षित रखा जाएगा और उनकी नियमित पूजा के लिए पुजारी नियुक्त किए जाएंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मणिकर्णिका घाट सहित देशभर में ट्रस्ट से जुड़ी संपत्तियों के संरक्षण और संवर्द्धन का अधिकार ट्रस्ट को सर्वोच्च न्यायालय से प्राप्त है।
मणिकर्णिका घाट पर लोकमाता महारानी अहिल्याबाई होल्कर से जुड़ी मूर्तियों को क्षति पहुंचने का मामला अब एक संवेदनशील और गहरे भावनात्मक मोड़ पर पहुंच गया है। इसी सिलसिले में खासगीदेवी अहिल्याबाई होल्कर ट्रस्ट के अध्यक्ष यशवंत होल्कर 13 जनवरी 2026 को काशी पहुंचे। उन्होंने गुरुधाम मंदिर परिसर में रखी गई महारानी अहिल्याबाई की साबूत और खंडित मूर्तियों के समक्ष नतमस्तक होकर क्षमायाचना की और इस पूरे घटनाक्रम को “दुर्भाग्यपूर्ण और अक्षम्य भूल” करार दिया।
यशवंत होल्कर ने कहा कि काशी जैसी पवित्र और ऐतिहासिक नगरी में महारानी अहिल्याबाई होल्कर की स्मृतियों के साथ इस तरह के व्यवहार की कल्पना भी नहीं की जा सकती। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा, “यह भले ही भूलवश हुआ हो, लेकिन ऐसी भूल भी अक्षम्य है।” उनका कहना था कि महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने अपने जीवन में कभी परंपरा, आस्था और विरासत से समझौता नहीं किया। ऐसे में उनसे जुड़ी धरोहरों के साथ हुई लापरवाही अत्यंत पीड़ादायक है।
पीएम व सीएम के नाम पत्र
मणिकर्णिका प्रकरण की निष्पक्ष जांच और मूर्तियों की सुरक्षा को लेकर ट्रस्ट ने बड़ा कदम उठाया है। यशवंत होल्कर ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के नाम लिखे गए पत्र मंडलायुक्त की मौजूदगी में नगर आयुक्त को सौंपे। इन पत्रों में मांग की गई है कि मणिकर्णिका घाट पर क्षतिग्रस्त और हटाई गई महारानी अहिल्याबाई होल्कर की मूर्तियों को खासगीदेवी अहिल्याबाई होल्कर ट्रस्ट की सुपुर्दगी में दिया जाए, पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच कराई जाए और इस चूक के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जाए।
ट्रस्ट की ओर से यह भी आग्रह किया गया कि खंडित मूर्तियों का शेष हिस्सा सात दिनों के भीतर ट्रस्ट को सौंपा जाए, ताकि उनका विधिवत संरक्षण और पुनर्स्थापन संभव हो सके। गुरुधाम मंदिर परिसर में हुई इस मुलाकात के दौरान मंडलायुक्त एस. राजलिंगम और नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल भी मौजूद रहे। यशवंत होल्कर ने प्रशासनिक अधिकारियों से साफ कहा कि यह सुनिश्चित करना बेहद ज़रूरी है कि काशी में भविष्य में ऐसा कोई कदम दोबारा न उठे, जिससे ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत को ठेस पहुंचे।
उन्होंने कहा कि मणिकर्णिका घाट केवल एक श्मशान नहीं, बल्कि सनातन परंपरा, मोक्ष की अवधारणा और काशी की आत्मा का प्रतीक है। महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने जिस श्रद्धा और संवेदनशीलता के साथ काशी के घाटों, मंदिरों और तीर्थों का निर्माण और पुनरुद्धार कराया था, उसी भावना के अनुरूप उनकी स्मृतियों की रक्षा होनी चाहिए।
गुरुधाम मंदिर में ‘मर्डर मिस्ट्री’ सा दृश्य
हिन्दुस्तान अख़बार के अनुसार, 13 जनवरी 2026 को गुरुधाम मंदिर परिसर में एक अजीब और असहज दृश्य देखने को मिला। नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल खंडित और साबूत मूर्तियों को ऐसे निहार रहे थे, मानो किसी मर्डर मिस्ट्री को सुलझा रहे हों। वे मूर्तियों को नीचे से ऊपर तक देख रहे थे और फोन पर किसी को यथास्थिति की जानकारी दे रहे थे। इसी दौरान मूर्तियों को कपड़े में लपेटकर अंदर रखने की तैयारी की जा रही थी।
दिलचस्प यह रहा कि जब यशवंत होल्कर मंदिर पहुंचे, तो उनके लिए भी तत्काल द्वार नहीं खोला गया। करीब दस मिनट बाद मंडलायुक्त एस. राजलिंगम के पहुंचने पर दरवाज़ा खोला गया, तब जाकर ट्रस्ट अध्यक्ष और उनके साथ आए कर्मचारी परिसर में प्रवेश कर सके। यहां तक कि पूजा सामग्री लेकर पहुंचे ट्रस्ट के कर्मचारी और पुजारी भी कुछ समय तक बाहर ही रोके गए।
मणिकर्णिका घाट का यह पूरा प्रकरण अब केवल निर्माण या प्रशासनिक निर्णय का सवाल नहीं रह गया है। यह काशी की आत्मा, उसके इतिहास और लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की विरासत से जुड़ा ऐसा प्रश्न बन चुका है, जिसके उत्तर आने वाले दिनों में यह तय करेंगे कि विकास की इस दौड़ में विरासत को कितना सम्मान मिल पाएगा।
मानवाधिकार आयोग में शिकायत
मणिकर्णिका घाट पर चल रहे पुनर्विकास कार्य के दौरान ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व की मूर्तियों व संरचनाओं को क्षति पहुंचने का मामला अब प्रशासनिक बहस से आगे बढ़कर कानूनी और संवैधानिक दायरे में प्रवेश कर चुका है। सफाइयों और आश्वासनों के बीच इस पूरे घटनाक्रम को लेकर उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई है।
यह शिकायत इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता डॉ. गजेंद्र सिंह यादव द्वारा की गई है, जिन्होंने इसे केवल निर्माण या प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और मानव गरिमा से जुड़ा गंभीर मामला बताया है।
डॉ. यादव ने मानवाधिकार आयोग के साथ-साथ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), वाराणसी सर्किल को भी एक विस्तृत पत्र प्रेषित किया है। इस पत्र की प्रतिलिपि वाराणसी के जिलाधिकारी को भी भेजी गई है। पत्र में मणिकर्णिका घाट के ऐतिहासिक स्वरूप, लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर की विरासत और वहां मौजूद मूर्तियों व संरचनाओं के पुरातात्विक महत्व का उल्लेख करते हुए निष्पक्ष जांच और संरक्षण की मांग की गई है।
डॉ. यादव का कहना है कि मणिकर्णिका घाट केवल एक श्मशान नहीं, बल्कि सनातन परंपरा, मोक्ष की अवधारणा और काशी की सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रतीक है। ऐसे स्थल पर बिना पर्याप्त संवाद और संरक्षण के की गई किसी भी कार्रवाई को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक, इस तरह की घटनाएं सीधे तौर पर नागरिकों के धार्मिक अधिकारों और सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा से जुड़ी होती हैं, जिनकी अनदेखी मानवाधिकारों के उल्लंघन की श्रेणी में आती है।
डॉ. गजेंद्र सिंह यादव ने बताया कि इंदौर राजपरिवार और खासगी देवी अहिल्याबाई होल्कर ट्रस्ट अपनी ओर से पीएमओ और सीएमओ उत्तर प्रदेश के संपर्क में हैं, लेकिन चूंकि पूरा घटनाक्रम काशी में घटित हुआ है, इसलिए उन्होंने स्वयं वाराणसी आकर स्थानीय प्रशासन से संवाद करना उचित समझा।
उन्होंने कहा, “ट्रस्ट के कर्मचारियों और सोशल मीडिया के माध्यम से जो जानकारी सामने आई, उसने मुझे भीतर तक विचलित कर दिया। मैं खुद को काशी आने से रोक नहीं सका। जब तक स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो जाती और सभी बातें पटरी पर नहीं आ जातीं, तब तक मैं यहीं रहूंगा।”
गुरुधाम मंदिर परिसर में उस वक्त सख़्त सुरक्षा व्यवस्था देखने को मिली, जब खंडित और साबूत मूर्तियों की गहन जांच की जा रही थी। परिसर में मौजूद अतिरिक्त लोगों से अनुरोधपूर्वक बाहर जाने को कहा गया। गेट पर तैनात सिपाही को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि बिना अनुमति किसी को भी अंदर प्रवेश न दिया जाए। इसके बाद अधिकारियों ने मूर्तियों की स्थिति, क्षति और संरचनात्मक हालात की बारीकी से पड़ताल शुरू की। कुछ सफाईकर्मी और कर्मचारी भी परिसर में मौजूद थे, जिन्हें जांच पूरी होने तक सीमित दायरे में रखा गया।
मुखर हुई राजनीति
मणिकर्णिका घाट पर मंदिरों और मूर्तियों को कथित तौर पर तोड़े जाने के मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने वाराणसी के मणिकर्णिका घाट के पुनर्विकास को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि मौजूदा सत्ता के लिए “विकास” और “सौंदर्यीकरण” अब ऐसे औज़ार बन चुके हैं, जिनके ज़रिये देश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को मिटाया जा रहा है।
सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर अपनी बात रखते हुए खड़गे ने कहा कि मणिकर्णिका घाट कोई साधारण घाट नहीं है। इसका उल्लेख गुप्तकालीन इतिहास में मिलता है और लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर ने अपने शासनकाल में इसका पुनरुद्धार कराया था। ऐसी दुर्लभ और अमूल्य धरोहर को आज पुनरुद्धार के नाम पर तोड़ना इतिहास के साथ अन्याय है। उनके अनुसार, यह केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृतियों को मिटाने का प्रयास है।
खड़गे ने आरोप लगाया कि भोंडे सौंदर्यीकरण और खुले व्यवसायीकरण के नाम पर मणिकर्णिका घाट में बुलडोज़र चलाया गया, जिससे काशी की धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान को गहरी चोट पहुंची है। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है मानो इतिहास की हर निशानी को मिटाकर उसकी जगह सत्ता की छाया छोड़ दी जाए।
वाराणसी में मणिकर्णिका घाट पर चल रहे पुनर्विकास कार्य को लेकर स्थानीय स्तर पर भी विरोध तेज़ हुआ है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस तोड़फोड़ की प्रक्रिया के दौरान अहिल्याबाई होल्कर की लगभग सौ वर्ष पुरानी मूर्ति को नुकसान पहुंचाया गया। इस आरोप ने प्रशासन और सरकार दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
खड़गे ने प्रशासनिक दलीलों पर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे पहले “कॉरिडोर” के नाम पर छोटे-बड़े मंदिरों और देवालयों को तोड़ा गया और अब प्राचीन घाटों की बारी आ गई है। उन्होंने कहा कि काशी दुनिया का प्राचीनतम जीवंत शहर है। अध्यात्म, संस्कृति, शिक्षा और इतिहास का अनुपम संगम, जो पूरी दुनिया को आकर्षित करता है। उनके अनुसार, इस विरासत के साथ छेड़छाड़ के पीछे व्यावसायिक हितों को लाभ पहुंचाने की मंशा साफ़ दिखाई देती है।
कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री से दो सीधे सवाल पूछे। पहला-क्या जीर्णोद्धार, स्वच्छता और सौंदर्यीकरण इस तरह नहीं किया जा सकता था कि विरासत सुरक्षित रहती? उन्होंने संसद परिसर का उदाहरण देते हुए कहा कि किस तरह महात्मा गांधी और बाबासाहेब आंबेडकर समेत देश की महान हस्तियों की प्रतिमाओं को बिना व्यापक विमर्श के एक कोने में स्थानांतरित कर दिया गया।
इसी तरह उन्होंने आरोप लगाया कि जलियांवाला बाग स्मारक में भी पुनरुद्धार के नाम पर स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी ऐतिहासिक निशानियों को मिटा दिया गया।
दूसरे सवाल में खड़गे ने पूछा कि मणिकर्णिका घाट में बुलडोज़र का शिकार बनी सैकड़ों वर्ष पुरानी मूर्तियों को तोड़कर मलबे में क्यों डाला गया? क्या उन्हें किसी संग्रहालय में सुरक्षित नहीं रखा जा सकता था? उन्होंने प्रधानमंत्री के कथन, “मां गंगा ने बुलाया है” की याद दिलाते हुए कहा कि आज वही मां गंगा और उनकी गोद में बसे घाट उपेक्षा और तोड़फोड़ के शिकार हो रहे हैं।
इस बीच यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने मणिकर्णिका घाट के साथ-साथ दालमंडी परियोजना का भी जिक्र करते हुए चेतावनी दी कि अगर काशी की धरोहर से खिलवाड़ नहीं रुका, तो सड़क से सदन तक उग्र जनआंदोलन होगा। सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा,
“भाजपा सरकार ‘रिनोवेशन’ के नाम पर लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर की ऐतिहासिक धरोहर मणिकर्णिका घाट को तोड़ रही है। यह विकास नहीं, काशी की आत्मा और सनातन संस्कृति पर हमला है।”
कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने भी सवाल उठाया, “काशी वेदों-पुराणों में वर्णित है, मोक्ष का द्वार है। उसी काशी में विकास के नाम पर विनाश किया जा रहा है। पहले काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लिए सैकड़ों मंदिर तोड़े गए, अब फिर से बुलडोज़र चल रहा है। जब प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में आस्था पर हमला हो रहा है, तब स्वयंभू धर्मरक्षकों की चुप्पी क्यों?”
आस्था, अधिकार और विरासत का सवाल
हिंदुत्ववादी नेता अजय शर्मा ने मणिकर्णिका घाट पर चल रहे निर्माण कार्य को लेकर सरकार और प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विकास कार्य के दौरान घाट पर मौजूद मणियां और अन्य ऐतिहासिक प्रतीकों को हटाया गया जो सनातन परंपरा और काशी की प्राचीन धार्मिक विरासत के साथ सीधा खिलवाड़ है।
अजय शर्मा स्पष्ट शब्दों में कहते हैं, “सरकार को मंदिरों और धार्मिक स्थलों के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ से बचना चाहिए। काशी की पहचान उसके मंदिरों और घाटों से है और विकास के नाम पर उनकी मौलिक संरचना को नुकसान पहुंचाना न केवल अनुचित है, बल्कि आस्था और परंपरा के विरुद्ध भी है। अपनी बेशर्मी छिपाने के लिए प्रशासनिक अफसर दावा कर रहे हैं कि हटाई गई मूर्तियां पुन: स्थापित की जाएंगी। बनारस की सरकार यह तो बताए कि हाइड्रा लगाकर तोड़ी गई मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा कैसे की जा सकती है? ”
काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत राजेंद्र तिवारी की आवाज़ में आज आस्था की करुणा नहीं, बल्कि आक्रोश की आग है। वह कहते हैं, “पहले विश्वनाथ मंदिर के आसपास के प्राचीन मंदिरों को ढहाया गया, फिर दालमंडी को रौंदा गया और अब महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर बुलडोज़र चलाया जा रहा है। यह सिलसिला महज़ संयोग नहीं, बल्कि उस विरासत पर सीधा वार है, जिसने काशी को काशी बनाया।”
वह याद दिलाते हैं कि विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के दौरान ऐतिहासिक अक्षयवट हनुमान मंदिर को तोड़ दिया गया, जबकि सरकारी काग़ज़ों में साफ़ दर्ज था कि मंदिर के स्वरूप से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। दुनिया में अक्षयवट केवल तीन ही थे-काशी, गया और प्रयाग। लेकिन काशी खंड में वर्णित उस ऐतिहासिक प्रतीक को मिटाने में एक पल भी नहीं लगाया गया।
पूर्व महंत की सूची लंबी और पीड़ा से भरी है।
उनके अनुसार, “कॉरिडोर के नाम पर ब्रह्मेश्वर की मूर्ति, नकुलेश्वर महादेव, द्रोपदादित्य, भगवान कल्कि का मंदिर और शंकराचार्य द्वारा स्थापित सरस्वती मंदिर तक को नहीं छोड़ा गया। मणिकर्णिका घाट पर स्वर्गद्वारेश्वर महादेव, बद्रीनाथ मंदिर और शिव कचहरी का अस्तित्व मिटा दिया गया। शनिदेव का मंदिर, पंचमुखी गणेश मंदिर ढहा दिए गए। संतों की समाधियां गायब हो गईं, मानो वे कभी थीं ही नहीं। ऐतिहासिक कारमाइकल लाइब्रेरी, गोयनका लाइब्रेरी और देवकीनंदन खत्री का आवास—सब स्मृति से बाहर कर दिए गए।”
वह तल्ख़ स्वर में कहते हैं, “पुतली वाला शिवाला गायब कर दिया गया और उसकी जगह वीवीआईपी के लिए आलीशान इमारत खड़ी कर दी गई। ऐतिहासिक द्रोपदी कूप को पाट दिया गया। पूरे परिसर में लगभग दो सौ कूपों को भर दिया गया। नीम, पीपल और बरगद के बारह विशाल वृक्षों की बलि दे दी गई-वह भी छलपूर्वक। जिन भवनों को तोड़ा गया, उनका इतिहास सौ वर्षों से भी अधिक पुराना था। बीजेपी सरकार ने काशी में जितने मंदिरों और मूर्तियों की बलि ली, उतना तो औरंगजेब के शासन में भी ध्वंश नहीं किया गया था।”
कभी देश-दुनिया से लोग बनारस इसलिए आते थे कि वे उन गलियों में चल सकें, जहां हर मोड़ पर इतिहास सांस लेता था। आज वही एंटिक विरासतें मलबे में बदल चुकी हैं। विश्वनाथ कॉरिडोर का एक द्वार मणिकर्णिका घाट पर खोल दिया गया है, जहां मुर्दे जलते हैं, वहीं से कुछ कदम पहले अब गंगा में डुबकी लगाई जा रही है।
मणिकर्णिका घाट से जुड़ा यह पूरा प्रकरण अब किसी एक परियोजना या निर्माण तकनीक तक सीमित नहीं रह गया है। यह आस्था, अधिकार और सांस्कृतिक विरासत के उस सवाल में बदल चुका है, जहां प्रशासनिक आश्वासन, कानूनी हस्तक्षेप और जनभावनाएं आमने-सामने खड़ी हैं। काशी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच और संरक्षण की प्रक्रिया कितनी ईमानदार होगी, और क्या लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की विरासत को वह सम्मान मिल पाएगा, जिसकी अपेक्षा इस नगरी ने सदियों से की है।
मणिकर्णिका घाट पर आज भी चिताओं की आग जल रही है। मंत्रोच्चार और शोक की आवाज़ें गंगा की लहरों में घुल रही हैं, लेकिन उनके बीच एक अजीब-सा सन्नाटा भी पसरा हुआ है। यह सन्नाटा उस सवाल का है, जो काशी बार-बार खुद से पूछ रही है कि क्या आधुनिकता की इस दौड़ में उसकी सदियों पुरानी आत्मा, उसकी विरासत और उसकी स्मृतियां सुरक्षित रह पाएंगी, या वे विकास के मलबे में कहीं दबकर रह जाएंगी?
(विजय विनीत–बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)