तर्क, विवेक और वैज्ञानिक चेतना पर आधारित, आगे की ओर बढ़ते राष्ट्र, आधिकारिक रूप से धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में विश्वास करने वाले देश की कसौटी फिलहाल न भी लगाएं तब भी, किसी भी संवैधानिक लोकतांत्रिक गणराज्य के हिसाब से भी पिछले सप्ताह में नजर आये वे दृश्य – विजुअल्स – भयावह हैं जिनमें सत्ता और विधायिका का कार्यकारी प्रमुख फैंसी ड्रेस पहने प्रमुदित और बालसुलभ कौतुक में डमरू बजाता हुआ दिखाई देता है।
वे बोलवचन डरावने हैं जिन्हें देश के सर्व-प्रमुख पदों में से एक – राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के – पद पर बैठा व्यक्ति बोलता है और सार्वजनिक रूप से उकसाने और भड़काने वाला ऐसा बयान देता है जिसे देने की हिम्मत अभी तक हाशिये पर बताये जाने वाले कट्टर और उन्मादी भी कम ही कर पाते थे। चूंकि दोनों ही काम एक दूसरे की संगति, सुर और ताल में हैं, इसलिए इसे महज संयोग या आलाप को मद्धम से उच्च होते हुए उच्चतर तक ले जाने की एक और कोशिश भर मानकर खारिज नहीं किया जा सकता है।
रामलीला में पहने जाने वाले वस्त्रों से प्रधानमंत्री का अभिषेक, उनकी परिधान-प्रियता के एक और शौक के पूरा हो जाने का अतिरेक मानकर अनदेखा नहीं किया जा सकता है। ये स्वांग और उसके साथ बोले गये संवाद दिखे से कहीं आगे, कहे और लिखे से कहीं अधिक सांघातिक अर्थ वाले हैं और उस आशंका की पड़ताल की दरकार रखते हैं, जिसे इस बार दिखावे के लिए भी छुपाने की कोशिश नहीं की गयी।
इस बार शुरुआत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार – एनएसए – अजित डोभाल ने की। शनिवार को ‘‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग- 2026’’ में मौजूद युवा दर्शकों से मंच से उन्होंने खुलेआम ‘इतिहास का प्रतिशोध लेने’ का आह्वान किया। ऐसा नहीं है कि भाषण की रौ में बहकर वे ऐसा बोल गए थे। उन्हें अच्छी तरह पता था कि कि वे क्या बोल रहे हैं। यह बात उन्होंने स्वयं भी स्वीकार की कि ‘प्रतिशोध शब्द अच्छा तो नहीं है, लेकिन प्रतिशोध भी अपने आप में बड़ी भारी शक्ति होती है। हमें अपने इतिहास का प्रतिशोध लेना है।’
प्रतिशोध किस बात का लेना है इसे भी स्पष्ट करते हुए उन्होने एक नए तरीके का शोध प्रस्तुत करते हुए कहा कि ‘हमारे गांव जले, हमारी सभ्यता को समाप्त किया गया, हमारे मंदिरों को लूटा गया। हम मूक दर्शक की तरह असहाय होकर देखते रहे। ये इतिहास हमें चुनौती देता है।’
अपने इस हिंसक आह्वान का औचित्य साबित करने और स्वीकार्य बनाने के लिए, देने को तो डोभाल ने भगत सिंह की फांसी, सुभाष चन्द्र बोस के संघर्ष और महात्मा गांधी के सत्याग्रह के हवाले भी दिए, मगर असल में यह प्रतिशोध किस तरह का होगा इसे उन्होंने अपनी ‘आस्थाओं’ के आधार पर एक महान भारत का निर्माण करने के आह्वान और उसी के साथ सेंट पीटर्सबर्ग के एक बूढ़े रब्बी और बिशप की कहानी के उदाहरण से साफ़ कर दिया।
कथित कहानी में वर्णित रब्बी के यहूदियों के साथ दो हजार साल से लंबे अत्याचार में बचाकर रखी गयी बदले की आग के भाव को, डोभाल ने बड़ा पावरफुल सेंटीमेंट बताया और कहा कि हमें उस सेंटीमेंट से ही प्रेरित होना चाहिए। ध्यान रहे, यह वह कहानी है जिसकी टेक पर इस्राइली यहूदीवाद टिका हुआ है और वह अपने कथित इतिहास का प्रतिशोध किस तरह ले रहा, यह बात फिलिस्तीन के नरसंहार के रूप में दुनिया देख समझ रही है।
जो बात शनिवार को डोभाल इशारों में कह रहे थे उसे अगले ही दिन रविवार को शिव के नाम पर न जाने किसका वेश धारे परिधान मंत्री ने सीधे-सीधे बोल दिया। सोमनाथ मन्दिर से डमरू बजाकर निकलते हुए उन्होंने इस मंदिर के बहाने निशाने साधे। मौका, 1026 में महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ मंदिर के विध्वंस के 1,000 वर्ष और 1951 में इसके ऐतिहासिक पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ बताया गया।
इसके समापन समारोह में उन्होंने सोमनाथ मंदिर के ध्वंस और उसके पुनर्निर्माण को लेकर झूठे कथनों, असत्य वचनों की बौछार सी करके, संघ की शाखाओं में सुनाई जाने वाली कहानियों को ही इतिहास बताने में अपनी पूरी वाक् चतुराई को झोंक दिया। सोमनाथ पर हमलों को लेकर तथ्यों के आधार पर दर्ज अब तक के पूरे इतिहास को ही उन्होंने खारिज कर दिया और ऐसा करने वाले इतिहासकारों को धिक्कारते हुए कहा कि, ‘‘कुछ लोगों ने हमलावरों के कृत्यों पर पर्दा डालने की कोशिश की। किताबों में इन हमलों को केवल सामान्य ‘लूट’ बताकर खारिज कर दिया गया।’’
वे बोले कि ‘‘सोमनाथ पर एक बार नहीं, बल्कि बार-बार हमले हुए। अगर मकसद सिर्फ धन लूटना होता, तो वे एक बार लूटकर रुक जाते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मंदिर के स्वरूप को बदलने के लगातार प्रयास किए गए। नफरत, अत्याचार और आतंक के उस असली इतिहास को हमसे छिपाया गया।’’ अपने लक्ष्य को और साफ़ करते हुए मोदी ने कहा कि गजनवी से लेकर औरंगजेब तक, हमलावरों ने सोचा कि उन्होंने तलवार के दम पर सनातन सोमनाथ को हरा दिया है।
उन्हें पता था कि लोग यह सवाल उठा सकते हैं कि संघ और मोदी की भाजपा हमेशा सिर्फ ध्वंस और विध्वंस की ही याद क्यों करते हैं, कभी कोई बदलाव करने वाली सर्जनात्मक उपलब्धि उन्हें याद क्यों नहीं आती–स्वाधीनता दिवस 15 अगस्त से भी ज्यादा जोर-शोर से 14 अगस्त के विभाजन विभीषिका दिवस क्यों मनाते हैं। इसलिए, अपने संबोधन की शुरुआत में ही उन्होंने कह दिया कि यह आयोजन केवल विध्वंस की याद नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति के लचीलेपन और देश के स्वाभिमान का उत्सव है।
अब लचीलेपन से उनका क्या आशय था ये तो शायद उन्हें भी नहीं पता होगा मगर जिसे वह स्वाभिमान बताकर उसका उत्सव मनाने की बात कर रहे थे, उसके पीछे का इरादा एकदम स्पष्ट था। इसके लिए उन्होंने अपने ही देश के नागरिकों को चिन्हांकित करते हुए दावा किया कि दुर्भाग्य से आज भी देश में ऐसे लोग हैं जो सोमनाथ के पुनर्निर्माण के खिलाफ थे, वे इन्हें विभाजनकारी बताने तक जा पहुंचे। यह भी कहा कि आज उनकी साजिशों में तलवारों की जगह दूसरे हथियारों ने ले ली है।
पहले डोभाल और फिर स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा एक के बाद एक करके रचे, गढ़े और आगे बढ़ाए गए ये दोनों आख्यान न सिर्फ शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों के संविधान विरोधी आचरण के उदाहरण हैं बल्कि यह इतने बड़े पदों पर होने के बावजूद कथित ध्वंस के कपोलकल्पित इतिहास के जरिये असली इतिहास का ही ध्वंस भी है। यह इतिहास का प्रतिशोध नहीं बल्कि इतिहास के साथ ही प्रतिशोध है।
जिन मंदिरों को धार्मिक आधार पर तोड़े जाने का दावा किया जा रहा है वे भारतीय इतिहास में – अगर हैं भी तो – सिर्फ अपवाद में हैं। नियम मंदिरों में जमा धन-दौलत और संपत्ति को अपने कब्जे में लेने के लिए या उससे जुड़े राज्य पर अपनी प्रभुता प्रदर्शित करने के लिए, उन पर धावे बोलने का ही रहा था और इतिहास बताता है कि यह काम धर्म या मजहब के आधार पर नहीं किया गया। यह सिर्फ मुसलमान शासकों या बाहर से आये आक्रान्ताओं, हमलावरों ने नहीं किया था।
उस समय मंदिर धन और संपत्ति के बड़े केंद्र थे, जहां सोने, चांदी और बहुमूल्य रत्नों से बनी मूर्तियां व अन्य संपत्ति जमा होती थी। राजा इस विराट धन संपदा को राज्य की आमदनी का बड़ा स्रोत मानते थे और एक निश्चित अंतराल के बाद मंदिरों पर धावा बोलते और रकम बटोरते थे। इसके लिए बाकायदा विभाग बनाए जाते थे, मंत्री नियुक्त किये जाते थे।
संस्कृत के कवि कल्हण अपनी प्रसिद्घ रचना राजतरंगिणी – जिसे कश्मीर के प्रामाणिक इतिहास का दर्जा दिया जाता है – में दर्ज करते हैं कि किस तरह वहां के राजा हर्ष देव ने अपने राज्य में धन की कमी को पूरा करने के लिए कई हिंदू मंदिरों को लूटा और नष्ट कर दिया। मंदिरों की मूर्तियों को पिघलवाकर उनसे सिक्के बनवाए और इस काम के लिए एक अलग विभाग भी बनाया था।
राजा हर्षदेव अकेले नहीं थे–सातवीं शताब्दी के पल्लव और चालुक्य, नौवीं शताब्दी के पांड्य और सिंहल, दसवीं शताब्दी के राष्ट्रकूट और प्रतिहार राजाओं, ग्यारहवीं शताब्दी के चोल राजा राजेन्द्र प्रथम द्वारा लूट के लिए मंदिरों पर हमले करने की अनेक घटनाएं इतिहास में दर्ज हैं। यह भी दर्ज है कि 12वीं सदी के अंत में परमार राजा सुभटवर्मन ने, जिस गुजरात में सोमनाथ है उसी गुजरात के अनहिलवाड़ा पर आक्रमण के दौरान जैन और हिंदू मंदिरों को लूटा था।
ये बड़े साम्राज्यों के उदाहरण हैं – छोटे और मझोले राजे-रजवाड़े भी अपने आर्थिक संकट से उबरने के लिए ऐसा ही किया करते थे। बारहवीं शताब्दी में हुए कल्हण – जो पक्के से वामपंथी तो नहीं ही थे – सहित सभी प्राचीन और आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि मन्दिरों की इस लूट-पाट का मुख्य उद्देश्य पूरी तरह से आर्थिक था, इसका धर्म-वर्म से दूर तक का रिश्ता नहीं था।
खुद हर्षदेव ने हिंदू और बौद्ध दोनों मंदिरों को लूटा। वह सूअर का मांस खाता था, जो इस कुतर्क का खंडन करता है कि वह मुस्लिम प्रभाव में आकर यह लूट-पाट करता था। यही स्थिति सोमनाथ के साथ थी जिसे कुल जमा 17 बार लूटा गया, हर बार गजऩी का महमूद नहीं आया था; जो भी आया था वह धर्मध्वज उठाये मूर्ति तोड़ने नहीं आया था, देश के सबसे समृद्ध और धनी मंदिर की संपदा लूटने आया था । इनमें से ज्यादातर हमलों के बाद हमलावर राज करने के लिए रुके नहीं, मालमत्ता लूटकर चलते बने।
वास्तव में धार्मिक आधार पर तोड़े और मिटा दिए गए पूजा स्थलों में बौद्ध मठ और विहार, जैन धर्मानुयायियों के जिनालय सबसे अधिक संख्या में हैं और इनका ध्वंस किसी गजऩी वाले महमूद या हिन्दू मां के बेटे औरंगजेब ने नहीं उन्हीं ने किया था, जिनके ध्वज को धारण किये मोदी चुनिन्दा शासकों को निशाना बनाकर संघ का विभाजनकारी एजेंडा आगे बढ़ा रहे थे और डोभाल प्रतिशोध की यलगार कर रहे थे।
ऐसा ही झूठ सोमनाथ के पुनर्निर्माण के प्रसंग को लेकर बोला गया। दावा किया गया कि सरदार पटेल चाहते थे मगर उन्हें तबके प्रधानमंत्री नेहरू ने रोक दिया था। असलियत यह है कि जब स्वयं को सनातनी हिन्दू बताने वाले महात्मा गांधी को यह पता चला कि सौराष्ट्र की सरकार सोमनाथ मंदिर बनाने के लिए पांच लाख रुपया दे रही है तब 28 नवम्बर 1947 को, दिल्ली में अपनी प्रार्थना सभा में उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जूनागढ़ की सरकार, सरकारी खज़़ाने से सोमनाथ मंदिर का निर्माण नहीं कर सकती।
गांधी द्वारा दरियाफ्त किये जाने पर स्वयं सरदार पटेल ने कहा था कि ‘जब तक मैं जिंदा हूं, सरकारी खज़़ाने से एक पैसा सोमनाथ मंदिर के निर्माण के लिए नहीं दिया जाएगा। हिन्दू समाज चाहे तो चंदा करके मंदिर का निर्माण कर सकता है।’ यह संवैधानिक स्थिति थी और ऐसा सिर्फ सोमनाथ के समय ही नहीं हुआ।
हाल में अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को लेकर दिए, अन्यथा अस्पष्ट फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट रूप से कहा था कि एक ट्रस्ट बनाकर सार्वजनिक चंदे से निर्माण किया जाना चाहिए। यही बात तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री के बीच हुए पत्राचार में है जिसमें नेहरू उनसे कहते हैं कि राष्ट्रपति के नाते उनका जाना उचित नहीं होगा। हालांकि इसके बाद भी राजेंद्र बाबू गए।
मोदी शायद जानबूझकर भूल गए कि राम मन्दिर के शिलान्यास और उद्ïघाटन के समय तो नेहरू नहीं थे, मगर दोनों समय के राष्ट्रपति इन कार्यक्रमों में नहीं दिखे!!
कहने की जरूरत नहीं कि इस सारी कवायद के पीछे असली मकसद नाकामियों, नाकाबिलियतों और उन चौतरफा गिरावटों पर पर्दा डालना है, जिनके चलते देश और उसमें रहने वाली जनता की मुश्किलें बढ़ी हैं और दूर-दूर तक सुधार के कोई लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं। लोगों की याददाश्त इतनी भी कमजोर नहीं कि उन्हें याद ही न हो कि जो डोभाल शूरवीरता का बखान और आह्वान कर रहे हैं उनके रहते पुलवामा, पहलगाम और गलवान और सिन्दूर आदि, आदि दर्जन भर मामलों में क्या-क्या नहीं हुआ।
जो मोदी हजार-ग्यारह सौ वर्ष के गौरव की कहानी सुनाकर लोगों को बहला रहे हैं उनके 11 वर्षों में भारत दुनिया की नजऱों से लेकर अपनी आर्थिक सामर्थ्य तक में कितना नीचे आ गया है। यही सब छुपाना है इसलिए कभी इस तो कभी उस बहाने उन्माद को भडक़ाना है।
सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजऩवी के हमले के समय की एक कथा है कि महमूद गजनवी के सैनिकों ने जब रस्सियों से परकोटे पर चढक़र हमला किया, तो उसके जवाब में मंदिर के पुजारियों और रक्षकों ने जोर-जोर से मंत्र-तंत्र का जाप करके, शंख और घंटी बजाकर, प्रतिरोध किया। उसके बाद क्या हुआ यह इतिहास है। ठीक यही कहानी आज विडम्बना के रूप में दोहराई जा रही है।
डोनाल्ड ट्रम्प बांहें मरोड़े जा रहा है–उद्योग-धंधे, खेती-किसानी, रोजगार और जीवन सहित सारा देश उसके हमलों से आहत और प्रभावित हो रहा है और बजाय उससे निबटने के, सोमनाथ में डमरू और घंटा घड़ियाल बजाया जा रहा है। इतिहास से सबक लेने की बजाय इतिहास से प्रतिशोध की बातें हो रही हैं। जिस समय जनता की एकता सबसे ज्यादा जरूरी है, ठीक उसी समय उसे कमजोर और विभाजित करने के नए-नए तरीके ढूंढे जा रहे हैं।
संघ की शताब्दी वर्ष में ऐसा करके क्या हासिल किया जाना है यह बताते हुए संघ प्रमुख शहर शहर घूम रहे हैं। गांव-गांव में हिन्दू सम्मेलनों का ताम-झाम करके नफरती जहर की होम डिलीवरी की जा रही है। गांधीनगर में दूषित पानी से सौ से अधिक लोगों का बीमार होना और इंदौर में गंदे पानी से डेढ़ दर्जन बच्चों की मौत बताती है कि जहरीला असर किस कदर जानलेवा होता है। फिर यह तो नफरती जहर है जो सिर्फ मनुष्यों की नहीं सभ्यताओं की भी जान लेने की क्षमता रखता है।
निस्संदेह सब कुछ चिंताजनक है। इसे रोकने के लिए सचेत हस्तक्षेप जरूरी है। आमतौर से नागरिक समाज को, खासतौर से मेहनतकश अवाम को यह जिम्मा उठाना होगा। जिन असफलताओं और अपराधों से ध्यान बंटाने के लिए यह सब किया जा रहा है उन्हें जोर-शोर से सामने लाना होगा। जो झूठ वे बोल रहे हैं उसका पर्दाफाश करना होगा। बड़ी-बड़ी लामबंदियां करनी होंगी। अगले महीने 12 फरवरी को मजदूर-किसानों की राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल, इसी तरह की लामबंदी है। ऐसी और पहलों की जरूरत है।
(बादल सरोज लोकजतन के संपादक हैं और अखिल भारतीय किसान सभा के सयुंक्त सचिव हैं।)