डॉ अंबेडकर और कार्ल मार्क्स के दर्शन को समझा जाय तो अंबेडकर का मानना था कि समाज में सामाजिक सुधार के बिना आर्थिक या राजनीतिक सुधार संभव नहीं है, वहीं कार्ल मार्क्स का कहना था कि आर्थिक सुधार जीवन का आधार है। भौतिकता ही सभी चीजों को तय करती है। दोनों फिलोसॉफी दो पिलर पर खड़ी है एक सामाजिक सुधार के तो दूसरी आर्थिक सुधार पर।
सामाजिक सुधार आत्मसम्मान पर केंद्रित है। भारत एक जाति आधारित देश है,जिसमें अनेकों जातियां है और जाति आधारित शोषण तो पूछिए मत। भारत में वर्णव्यवस्था ने लोगों को चार वर्णों में बांटा है ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र। शूद्रों को निम्न काम सौंपे गए और उनके लिए कुछ नियम बनाए गए जिसमें कहा गया कि उन्हें सेवा भाव रखना है। उन्हें उसके बदले कुछ मांगने की इच्छा नहीं रखनी है, उन्हें अपनी परछाईं किसी ब्राह्मण या ऊंची जाति पर पड़ने नहीं देना है। उन्हें घी खाने की मनाही थी, उन्हें अच्छे कपड़े और स्टील के बर्तन में पानी लेने की मनाही थी, शूद्रों के लिए स्कूल और मंदिर के रास्ते बंद थे। ऐसी अनेकों पाबंदियां थी जिसके कारण उनकी स्थिति दयनीय और ब्राह्मणों समेत ऊंची जातियों द्वारा शोषित थी।
हिंदू धर्म के वर्णव्यवस्था ने शूद्रों को पहले सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आधार पर कमजोर किया और फिर उन्हें अशुद्धता के खांचे में डाल कर अस्पृश्यता का भाव पैदा किया,और ना केवल अपने आपको शुद्ध घोषित किया बल्कि हजारों सालों से निचली जातियों को शोषित करके, उनके आत्मसम्मान के साथ खिलवाड़ किया और समाज के सारे संसाधनों पर अपना कब्जा बना कर राज किया हैं।
वहीं कार्ल मार्क्स का मानना था कि व्यक्ति एक आर्थिक प्राणी है, आर्थिक आधार ही सभी चीजों को तय करती है। इनका केंद्र बिंदु भौतिकता है। वो कहते है सत्ता का एक मात्र साधन निजी संपत्ति है। भौतिक परिस्थितियां ही सत्ता बनाती है। उनके अनुसार राजनीतिक और सामाजिक सुधार एक बहुत बड़ा भ्रम है, बिना आर्थिक सुधार के सभी तरह का सुधार संभव ही नहीं है। हालांकि उनका ये विचार यूरोप के औद्योगिक और फ्रांस की क्रांति के दौरान आया और उन्होंने मजदूरों के लिए कहा कि दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है और पाने के लिए पूरा संसार हैं।
अगर यह कहा जाय कि कार्ल मार्क्स का समाज को देखने का वर्गीय विचार ठीक था तो अंबेडकर के विचार को मानने वाले कुछ लोग इससे असहमत हो सकते हैं पर फिर भी गंभीरता से विचार किया जाए तो मार्क्स के विचार जाति के सवाल पर भी ज़्यादा असर करते नज़र आता हैं।
कार्ल मार्क्स का विचार भी सभी सामाजिक समस्याओं पर प्रहार करता है। ये बात सही है कि मार्क्स के विचार का जन्म यूरोप में जन्मी परिस्थितियों के कारण हुआ है लेकिन कार्ल मार्क्स के विचारों में जाति का सवाल भी है। इस बात को तो स्वीकार किया जाता हैं कि जातीय भेदभाव सामाजिक समस्या है लेकिन इसको बढ़ावा दिया जाना या इसकी वजह आर्थिक कारक भी रहा है।
अगर एक संकल्पना गढ़ी जाय कि वर्णव्यवस्था ने सिर्फ़ चार वर्ण बनाए होते लेकिन आर्थिक स्त्रोतों को सामान रूप से वितरित किए होते और दलितों को किसी प्रकार का व्यवसायिक रोक या शिक्षा से वंचित नहीं किया गया होता तो दलित समाज के लोगों को अपमान नहीं झेलना पड़ता। बल्कि दलित आज एक ब्रांड होता, ठीक उसी प्रकार जैसे आज “द ग्रेट चमार” हुआ है, ठीक वैसे ही जैसे चमार ब्रांड के बनाए गए प्रोडक्ट में पूरी दुनिया भर में नाम कमाया और जानी-मानी हस्तियों में अपने आप को इस ब्रांड के साथ जोड़ करके दुनिया के सामने प्रस्तुत किया। ऐसा इसीलिए नहीं हो सका क्योंकि संसाधन की मार ने दलितों को आर्थिक रूप से कमजोर किया और उन्हें सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से शोषित करके उनपर अछूत का टैग लगा दिया।
अगर दलित आर्थिक रूप से मजबूत रहते, शिक्षित रहते तो ब्राह्मणवाद के सर्वोच्चता को खारिज कर देते, अपना इतिहास बना पाते जैसे आजकल हो रहा हैं। उस इतिहास में अछूत या शूद्र शब्द एक समुदाय होता अस्पृश्यता या तो होती नहीं या फिर उसका मतलब “जिसे छुआ नहीं जाता है” नहीं होता बल्कि अछूत सिर्फ़ एक समुदाय होता।
कभी-कभी ऊंची जातियों के व्यक्ति से ये बात पूछने पर कि “आप सरनेम को कैसे देखते है” उनके द्वारा तुरंत ये बात कही जाती है कि सरनेम केवल एक पहचान है, उससे कोई छोटा या बड़ा नहीं होता सब लोग समान है। फिर समाज में अस्पृश्यता या ग़ैरबराबरी ने अपनी जगह कैसे बनाई। क्यों कुछ लोगों के पास ज़मीन का बड़ा-बड़ा हिस्सा है और कुछ लोगों के पास पेट पालने के बराबर भी ज़मीन नहीं है। जाति सामाजिक स्तर से ज्यादा आर्थिक आधार पर शोषण करने के लिए बनाई गई हैं। क्या कोई व्यक्ति अपने से बराबर के व्यक्ति का शोषण करता है या कर पाएगा?
हज़ारों की संख्या में युवा क्यों सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं? इस बात के लिए कम कि उन्हें सामाजिक रूप से नीचा समझा जाता है, बल्कि इस बात के लिए ज्यादा कि हमारी संपन्नता ही हमारी पहचान बनेगी। ये बात ठीक है कि संपन्नता के बावजूद भी उनकी जाति नहीं बदलती हैं,अगर वो चमार है तो चमार ही रहते हैं लेकिन संपन्नता के बाद इस बात की परवाह नहीं होती है कि कोई किस जाति से है।
वो किसी के लिए दुखद बात नहीं होती है, ना किसी को इस बात की फिकर होती है कि वर्णव्यवस्था में कोई चौथे स्थान पर है या हिंदू धर्म में हमारी जगह नकारात्मक है, क्योंकि हमारी चेतना कहती है कि हम इंसान हैं, हमारे पास भी वो सब चीजे हैं जो ऊपर कहे जाने वाली जाति के पास हैं, शोषित करने पर हम शोषण नहीं सहेंगे, बल्कि उन्हें मात दे देंगे।
लोगों की आर्थिक संपन्नता उन्हें आपके पास खाने-पीने, बैठने-उठने या शादी-विवाह करने पर मजबूर करती है। आज गांव में पूछने पर कि क्या आपके साथ ऊंची जाति के लोगों का उठना-बैठता होता है तो जवाब हमें आसानी से मिल जाता है कि शिक्षा और नौकरी होने के कारण हमारे यहां बड़ी जाति के लोगों का भी उठना-बैठना होता है, या वो हमारे घर खाते-पीते भी हैं। भौतिक संपन्नता जाति के सवाल को वर्ग में बदल देती है और आज इसलिए बड़ी-बड़ी हस्तियां अपनी जाति से ज्यादा अपने वर्ग में शादी विवाह करना पसंद कर रहे हैं।
पूरे दलित समाज की संपन्नता एक दिन जाति के सवाल को मिटा देगी सबके पास बराबर की शक्ति, शिक्षा और संपन्नता होगा तो जाति का सवाल पीछे रह जाएगा।
मैं यह लेख उस वक्त लिख रही हूँ जब देश के मुख्य न्यायाधीश पर मनुवादी मानसिकता से ग्रसित एक व्यक्ति ने उन्हें अपमानित करने के लिए जूता फेंका। ये घटना इस बात को और पुख्ता कर देती है कि क्या आर्थिक हैसियत सामाजिक बराबरी लाने में मददगार साबित हो रहा है तो आपको लगेगा नहीं, आर्थिक संपन्नता सामाजिक बराबरी लाने में मददगार सिद्ध नहीं हो रहा है। लेकिन ये बात पूरी तरह सत्य नहीं है क्योंकि दलितों में कुछ ही लोगो के पास आर्थिक संपन्नता है, कुछ ही लोगों का प्रतिनिधित्व शक्ति संरचना में है।
पूरा दलित समाज संपन्न नहीं लेकिन दूसरी तरफ हिंदूधर्म ने उच्च जातियों को हजारों सालों से शासन करने वाला ही नहीं बनाया है बल्कि हजारों साल से सम्पन्न भी बनाया है। उन्हें अपने पूरे समुदाय के ताकत का अहसास है। सोने पर सुहागा ये बात है कि पिछले दशक से ऊंची जातियों को अपने ताकतवर होने का अहसास इसलिए ज्यादा हो रहा है क्योंकि आजाद भारत में सरकार के महत्वपूर्ण जगहों पर उच्च जातियों के लोग रहे हैं, ऊंची सेवाओं और बिजनेस व्यवसाय में इन्हीं का बोलबाला रहा हैं, सरकार की इन्हीं की भाषा बोलती रही है।
लेकिन दलितों में अभी भी एक गांव में 2 या 4 लोगों को ही अपने संपनता का अहसास है, बाकी लोग अभी भी अपने रोटी कपड़े के सवाल में घिरे है। चूंकि रोटी कपड़े का सवाल उन्हें जाति के सवाल के साथ खड़ा नहीं कर पाता है। क्योंकि यह छुटपुट संपन्नता ही समाज में व्याप्त है जिसके कारण पूरा समाज संपूर्ण ताकत का एहसास नहीं कर पाता हैं। इसी कारण से जाति का सवाल हल नहीं हो पारहा हैं।
आज भी यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न बना हुआ है कि दलित समाज या वंचित तबके के पूरे हिस्से में एक साथ आर्थिक संपन्नता कब आएगी। जब तक संपूर्ण दलित समाज एक साथ मुक्त होकर के आर्थिक संपन्नता हासिल नहीं करेगा उसे सामाजिक और राजनीतिक ताकत भी हासिल नहीं होगी और उसका शोषण इसी तरह जारी रहेगा। आज उनके शोषण का कारण ना केवल उनके एकता की कमी, सामाजिक और राजनीतिक कारण है बल्कि आर्थिक भी रहा है।
जातीय शोषण वर्गीय शोषण की तरह एक साथ सबको शोषित नहीं करती इसलिए इसमें एक साथ आवाज़ भी नहीं उठाई जाती है। एक व्यक्ति या कुछ लोगों के साथ हुए अपमान पर पूरे दलित समाज को दुख ज़रूर होता है पर एक साथ सबका खून नहीं खौलता है। लेकिन मार्क्स का वर्ग संघर्ष धरातल पर इसलिए देखा गया क्योंकि उसमें एक समूह का एक साथ शोषण हो रहा था और उनमें जब अपने शोषण के प्रति अहसास आया तो मेहनतकशों ने एक साथ क्रांति का आगाज़ किया।
इसलिए कार्ल मार्क्स का विचार जाति के सवाल का भी हल है।
(सीमा भारती का लेख। वह लखनऊ विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं।)