हाल ही में संसद के सत्र में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री मोदी जब भागीदारी के लिए कक्ष में प्रवेश कर रहे थे, संसद में ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ का नारा गूंज उठा। भारत की संसदीय राजनीति में यह एक अभूतपूर्व दृश्य था। मोदी का दस साल से बनाये गये कल्ट पर विपक्ष द्वारा किया गया यह प्रहार मोदी पर नैतिक प्रश्न खड़ा कर रहा था और विपक्ष को खड़े होने की एक जमीन दे रहा था।
राहुल गांधी द्वारा वोट चोरी का आरोप उस समय और भी निखर कर सामने आ गया जब चुनाव आयोग की ओर से प्रेस सम्मेलन आयोजित किया गया और मुख्य चुनाव आयुक्त ने राहुल गांधी पर बाध्यकारी हलफनामा दायर करने की चेतावनी जारी किया। ज्ञानेश कुमार द्वारा जो दावे किये गये वे न सिर्फ असंगत थे, कई मामलों में गलत भी थे। इस पूरी कवायद में वोट चोरी का आरोप और भी पुख्ता होता हुआ दिखा।
वोट चुराना और गलत ढंग से वोट की संख्या को अपने पक्ष में बढ़ाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। मसलन, मेरा वोट कोई और डाल आये, यह वोट की चोरी में गिना जाना चाहिए। वोट चोरी की घटनाएं भारतीय चुनाव के आरम्भिक दौर में ही देखने को मिलती थीं। बाद के समय में, खासकर 1960-70 के दशक में बूथ लूटना, लोगों के वोट पर कब्जा करने की घटनाएं खूब देखी गईं। यह दौर बाहुबलियों के राज के तौर पर प्रचारित हुआ और जिसका प्रभाव 1980 तक बना रहा। ऐसे बाहुबली आज भी हैं लेकिन पहले वाली स्थिति नहीं रह गई है।
पिछले दो दशकों में स्थिति बदली है। यह बदलाव वोटरों के नाम गायब करना, वोट देने में बाधा पैदा करना और वोट की संख्या में वृद्धि करा देने जैसी प्रवृत्तियां बढ़ी हैं। राहुल गांधी ने इस तरह के आ रहे बदलाव को एक चुनाव क्षेत्र का विश्लेषण पेश कर वोट की संख्या में हो रही धांधली को उजागर किया। उन्होंने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का विश्लेषण करते हुए यह बताने का प्रयास किया कि वोटों की संख्या कृत्रिम तरीके से बढ़ा दिया गया है। ऐसे में, दो तरह की बातें सामने आ रही हैं: या तो वोटरों के नाम कट जा रहे हैं, या वोटरों की कृत्रिम तरीके से संख्या बढ़ रही है, या दोनों ही हो रहे हैं। ऐसे में यह मसला वोट चोरी का बनता नहीं है। यह वोटों की संख्या में किया गया फरेब है और नागरिक अधिकारों को वंचित करना है।
बिहार के मामले में हो रहे एसआईआर में लोगों के वोट के अधिकार छिनते हुए दिख रहे हैं। अभी तक झूठे वोटरों की संख्या सामने नहीं आया है। लेकिन, चुनाव आयोग ने जिस तरह से दो दिन पहले दूसरे दौर में 98 प्रतिशत वोटरों द्वारा दस्तावेज जमा करा दिये जाने का दावा किया है और जिस तरह की मीडिया से खबरें आ रही हैं, दोनों में निश्चित ही भेद दिख रहा है जिसे अंतिम दौर में हुए पंजीकरण के दौरान ही परखा जा सकता है।
यहां राहुल गांधी ने ‘वोट चोरी’ पर दोहरी रणनीति का सहारा लिया है। वह बिहार में बने हुए हैं और जनता को भरोसा दिला रहे हैं कि ‘वोट चोरी’ होने नहीं देंगे। इस पूरे अभियान में चुनाव आयोग पूरी तरह से दबाव में है और उसकी कोशिश रहेगी कि वोट पंजीकरण की प्रक्रिया साफ-सुथरी रहे। वहीं इसी अभियान में भाजपा की चुनी हुई सरकार की वैधता पर ही गंभीर सवाल उठाकर उसके नैतिक आधार पर चोट कर रहे हैं।
चोरी एक अनैतिक मूल्य है। डकैती भी एक अनैतिक मूल्य माना जाता है। राहुल गांधी ने मोदी के खिलाफ चोरी शब्द का इस्तेमाल किया। इसके पहले वह ‘चौकीदार चोर है’ का अभियान चलाया। चोरी शब्द में व्यक्तिगत पहल मुख्य पक्ष होता है। इस तरह उनका हमला सीधा एक व्यक्ति था। यह ‘भ्रष्टाचार’ शब्द नहीं है जिसमें एक पूरी व्यवस्था, व्यक्तियों का समूह, संस्थाएं आदि होती हैं। इस शब्द का प्रयोग भाजपा कांग्रेस के खिलाफ अक्सर करती रही है। यह डकैती शब्द जैसा भी नहीं है जिसमें एक नेतृत्व होता है, जिसके साथ समूह होता है और हिंसा, बल प्रयोग होता है।
ऐतिहासिक तौर पर डकैती में रॉबिनहुड की सदाशयता और एक विद्रोही तेवर भी जुड़ा हुआ है। चोरी का आरोप ऐसे निहितार्थों को लेकर आता है जिसमें व्यक्तिगत आकांक्षाएं अनैतिकता के आधार पर बेहद षड्यंत्रकारी तरीके से पूरी की जाती हैं जिससे चोरी करने वाला अनुपस्थित दिखे, लेकिन लाभ का सारा हिस्सा खुद ले ले। चोरी किसी संपन्न की लूटपाट नहीं है, यह किसी जन-सामान्य की कमाई, बचत आदि की धूर्तता पूर्ण तरीके से चुरा लिया जाना है। इस शब्द का प्रयोग मार्क्सवाद की सरल पुस्तकों में पूंजीपति वर्ग द्वारा मजदूर के श्रम-अधिशेष पर कब्जा कर लिये जाने को ‘चोरी’ बताया गया है।
राहुल गांधी को ‘चौकीदार चोर है’ के अभियान में पीछे हटना पड़ा। इसका एक बड़ा कारण इस नारे की असंगतता थी। चौकीदार एक सामान्य मजदूर वर्ग का हिस्सा था और उसे ही चोर बता देना नैतिकता के मूल्य के आधार पर असंगत था। इसी के बाद राहुल गांधी ने अपने हाथ में संविधान पकड़ा। यह कथित तौर पर सेक्युलर प्रतीक था। इसमें दलित, गरीब और सामान्य नागरिक बहुमत में हैं जिनकी गिनती वोट के माध्यम से होती है और इसी के माध्यम से सरकार की वैधानिकता तय होती है। राहुल गांधी ने सरकार की वैधानिकता को इसी वोट के आधार पर चुनौती पेश किया। उन्होंने वोट की कथित ‘हेराफेरी’ के आंकड़ों को रखते हुए मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार की वैधानिकता पर ही सवाल उठा दिया।
खुद मोदी की राजनैतिक नैतिकता उस समय सवालों के घेरे में आ गई जब रातों-रात जयदीप धनखड़ महोदय को उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देना पड़ा। हमेशा मोदी के सामने झुके रहने वाले उपराष्ट्रपति का इस तरह से जाना मोदी की संवैधानिक संस्था के प्रति निष्ठा पर सवाल खड़े कर दिये। निश्चित ही, इस पूरी प्रक्रिया में कोई संवैधानिक उसूल नहीं टूटे लेकिन उसके निहितार्थों में मध्ययुगीन मनमानापन साफ दिख रहा था जिसका सीधा रिश्ता मोदी से ही बन रहा था। इस पूर्व बन चुके उपराष्ट्रपति द्वारा इस्तीफे के बाद पूरी तरह से चुप्पी साध लेना और सार्वजनिक स्थलों में अनुपस्थित रहना मोदी की राजनीतिक कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठा दिये।
भाजपा के ‘चाणक्य’ माने जाने वाले अमित शाह ने नये उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष की ओर से प्रस्तुत किये गये उम्मीदवार बी. सुदर्शन रेड्डी पर एक विवादित बयान दिया। और, छुपे तरीके से उन्हें उनके एक दिये गये निर्णय के आधार पर ‘नक्सलवाद’ से जोड़ दिया। यह मसला, सलवा-जुडूम से था। अमित शाह ने इतिहास के एक ऐसे पन्ने को खोल दिया, जिसमें भारतीय राजनीति के वे पन्ने भी हैं जिसमें आदिवासी समुदाय पर किये गये इस हमले में कारपोरेट समूहों ने खुली हिस्सेदारी किया था।
कहते हैं, बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। कई सारे जजों ने एक संयुक्त बयान जारी कर अमित शाह को न्यायपालिका पर सवाल उठाने की गंभीरता से अवगत कराया और अपनी आपत्ति दर्ज किया। यह मसला भी भारत की संवैधानिक स्वायत्तता पर किये गये हमले की तरह देखा गया।
आजकल संसद में अमित शाह भाजपा सरकार का नेतृत्व करते हुए दिख रहे हैं। वह संविधान का 130वां संशोधन बिल पेश कर ‘भ्रष्टाचार’ खत्म करने का दावा कर रहे हैं और विपक्ष पर आरोप लगा रहे हैं कि उनके भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान से उन्हें दुख क्यों हो रहा है? उनका यह आरोप उस समय आया है जब पूरे विपक्ष के खिलाफ ईडी और अन्य संस्थानों को लगा दिया गया है और भ्रष्टाचार के आरोपियों को अपनी पार्टी में या अपने गठबंधन का हिस्सा बना लिया।
आज भाजपा का 2011 से चला ‘भ्रष्टाचार विरोधी अभियान’ दम तोड़ने की ओर बढ़ गया है। जब कि राहुल गांधी का ‘चोर’ वाला आरोप एक नैतिक अभियान में बदलता जा रहा है। नैतिकता के इस दो छोर में पहला पूरी कांग्रेस पार्टी, उसकी सरकार के लोग थे। उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस आरोप से बचे रहे। मोदी ने उनके बचे रहने का मजाक उड़ाया था क्या वे रेनकोट पहनकर स्नान करते हैं! राहुल गांधी द्वारा चलाये जा रहे इस दूसरे छोर में खुद मोदी ही लपेटे में आ गये हैं। उनके साथ पूरी भाजपा राहुल गांधी के निशाने पर नहीं है। यह पार्टी से बाहर बैठे अडानी-अंबानी जैसे कॉरपोरेट समूह हैं।
राहुल गांधी मोदी पर हमला करते समय भाजपा और उसकी विचारधारा पर नहीं, आरएसएस और उसकी विचारधारा पर हमला कर रहे हैं। इस तरह चोरी और नैतिकता के सवाल को राहुल गांधी संसदीय दायरे से बाहर ले जाते हुए संसदीय राजनीति के बाहर के खिलाड़ियों कॉरपोरेट समूह और आरएसएस जैसे संगठनों की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। वह भाजपा जैसी संसदीय पार्टी को अपने हमले का मुख्य निशाना नहीं बना रहे हैं।
आने वाले समय में ‘नैतिकता’ का यह सवाल निश्चित ही विचारधारा से जाकर टकराएगा। मोदी और अमित शाह ‘अर्बन नक्सल’ का अनुवाद नक्सलवादी के रूप में ज़रूर ही करेंगे और राहुल गांधी के इस पूरे अभियान को विचारधारा के इन्हीं टकराहटों की ओर ले जाएंगे। यह मोदी-शाह के नेतृत्व के लिए ज्यादा आसान होगा। कारण, आज भी भारत की संसदीय राजनीति में ‘एक वोट’ की चाहे जितनी महिमा गाई जाएं, वोट के जनतंत्रीकरण से सारी पार्टियां डरती हैं।
सारी पार्टियां वोट के ध्रुवीकरण और उसके नियंत्रण के लिए तरह-तरह के उपाय करती रही हैं जिसमें जनता का पक्ष की बजाय पार्टियों का पक्ष ही मुख्य तौर पर अभिव्यक्त होता रहा है। सच्चाई यही रही है कि वोट पार्टियों के कुलीनतंत्रों का गुलाम ही रहा है। यही कारण है कि भारत की कई सारी राजनीतिक पार्टियों, जिसमें नक्सलवाद से जुड़ी पार्टियां भी शामिल रही हैं, ने हिस्सेदारी करने से ही इंकार कर दिया। और, बाद के समय में इसे कार्यनीतिक तौर पर ही हिस्सेदारी करने का निर्णय लिया।
यह विडम्बना ही है कि जिस लालू यादव पर ‘चारा चोर’ होने का आरोप लगा उन्हीं की पार्टी और बेटे ने ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ के नारे को बिहार की सड़क पर उतार दिया और उसे लोकप्रिय बनाने की ओर ले गया है। संभव है कि ‘हीरा का चोर और खीरा का चोर एक ही नहीं होता है’ का मर्म लोगों को समझ में आ रहा हो। लेकिन, लालू यादव और उनकी पार्टी पर लगे आरोप का असर बेहद गहरा रहा है और उनकी पार्टी को लंबे समय तक सत्ता से बाहर रहना पड़ा है।
भारत की संसदीय राजनीति में शायद ही कोई यह दावा करे कि वह पूरी तरह से नैतिक है। राहुल गांधी ने जिस तरह से नैतिक होने का दावा करते हुए मोदी को अनैतिक कहने का साहस किया है उसके पीछे खुद मोदी की ही राजनीति है। मोदी सरकार ने जिस तरह से राहुल गांधी पर तरह-तरह के आरोप लगाये, और हर आरोप से वह साफ सुथरा होकर बाहर आ गये, उससे राहुल गांधी को खुद के नैतिक होने का दावा बढ़ता गया है। वह खुलकर बोलने लगे कि वह मोदी से नहीं डरते।
वह हमलावर होते हुए सीधा उन्हें ‘वोट चोर’ कहा और इसके लिए उन्होंने चुनाव आयोग के आंकड़ों का प्रयोग किया। उन्होंने अडानी और अम्बानी का तरफदार होने का आरोप लगाया। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बयानों के संदर्भ में उन्हें डरपोक बताया। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा राहुल गांधी की इस उभरते पक्ष को उनकी राजनीतिक परिपक्वता के तौर पर व्याख्यायित कर रहा है।
राहुल गांधी के इस उभार को परिपक्वता कहना किसी भी मायनों में उपयुक्त नहीं है। कोई भी राजनीतिक पार्टी, नेतृत्व तभी परिपक्व माना जा सकता है जब वह देश की जनता को एक राजनीतिक विकल्प, उसकी कल्पना क्षमता, उम्मीद और एक ठोस रास्ते को सृजित करने की क्षमता रखता हो; वह सभी को भागीदार हो जाने की सुनिश्चितता पैदा करता हो, और हम की शक्ल में आगे बढ़ने की क्षमता प्रदान करता हो। एक प्रदत्त राजनीतिक दायरे में राहुल गांधी ‘एक भले इंसान’ की तरह स्थापित हो रहे हैं और जिसके सामने मोदी का कद छोटा होता हुआ दिख रहा है। यह मूलतः एक कल्ट पॉलिटिक्स है जिसके नीचे भारत की राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज और संस्कृति का भयावह संकट अभी भी बोल सकने की स्थिति में नहीं है।
(अंजनी कुमार लेखक और टिप्पणीकार हैं।)