धनखड़-धमाका: मोगैम्बो खुश हुआ!

देश के संसदीय इतिहास में 21 जुलाई 2025 ‘धनखड़-धमाका’ के नाम से हमेशा के लिए दर्ज हो चुका है। इसका उल्लेख स्वर्णाक्षरों में होगा या अस्वर्णाक्षरों में, इसका फैसला इतिहासकार करेंगे। लेकिन यह निश्चित है कि इस धमाके ने उस मिथक और नैरेटिव को ध्वस्त कर दिया है कि पूंजीवादी लोकतंत्र के सत्ता गलियारों में सभी कार्रवाइयाँ पारदर्शिता के साथ संपन्न होती हैं।

आमतौर पर इतिहासकार और पत्रकार साम्यवादी सत्ताओं को ‘आयरन कर्टन’ (लौह दीवारें) से संबोधित करते रहे हैं; शिखर नेताओं के रहस्यमयी लोप के लिए मॉस्को और बीजिंग की सत्ताएँ लौह दीवारों के लिए कुख्यात रही हैं। लेकिन भारत के पूंजीवादी लोकतंत्र में ‘धनखड़-लोप’ या ‘धनखड़-धमाका’ किन अर्थों में भिन्न है, यह आप स्वयं तय करें। देश के दूसरे सर्वोच्च पद पर आसीन पदाधिकारी की कुछ ही घंटों में विदाई यह दर्शाती है कि पिछड़े देशों की पूंजीवादी लोकतांत्रिक सत्ताएँ अधिक रहस्यमय, अपारदर्शी और खतरनाक होती हैं।

पूंजीवादी व्यवस्थाओं में निरंकुश शासक बड़ी कलाकारी के साथ अपने विरोधियों को ठिकाने लगा देते हैं। वे कम निर्मम नहीं होते, लेकिन उदारता और सहिष्णुता का दुपट्टा ओढ़े रहते हैं। एकाधिकारवादी शासक अपने भक्तों से सौ प्रतिशत वफादारी की अपेक्षा रखते हैं। जरा-सी चूक आत्मघाती सिद्ध हो सकती है, क्योंकि असुरक्षा, भय और विश्वासघात की आशंकाएँ अधिनायकवादी शासक या चौकड़ी को जकड़े रहती हैं। इसलिए वे अपने समर्थकों और भक्तों से अभेद्य समर्पण की अपेक्षा करते हैं। धनखड़ से कहीं चूक हुई हो, समर्पण में रत्तीभर कमी आई हो, इसका नतीजा है सत्ता से निष्कासन। निश्चय ही, इस निष्कासन के बाद ‘मोगैम्बो खुश हुआ’ होगा!

संघ और मोदी-शाह ब्रांड भाजपा की किस चाल की चपेट में पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ आए, इसकी असलियत शोध के बाद ही स्पष्ट होगी। लेकिन इतना स्पष्ट है कि संघ और भाजपा की चालों के शिकार होने वाले धनखड़ पहले नेता नहीं हैं। इससे पहले बलराज मधोक, केशुभाई पटेल, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, यशवंत सिन्हा, शाहनवाज हुसैन, मुख्तार अब्बास नकवी, गोविंदाचार्य, उमा भारती, वसुंधरा राजे सहित अनेक नेता इसकी चपेट में आ चुके हैं। आगे भी ऐसे मामले सामने आते रहेंगे। लेकिन धनखड़ की अचानक विदाई से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मोदी-शाह ब्रांड भाजपा के सत्ता प्रतिष्ठान में भारी उथल-पुथल मची हुई है।

‘धनखड़-धमाका’ से जहाँ मोदी-शाह नेतृत्व की कार्यशैली पर उंगलियाँ उठ रही हैं, वहीं मातृ संस्था संघ सत्ताधारियों के सामने बेबस भी नजर आ रहा है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक संघ अपनी मर्जी का व्यक्ति भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बना सका है। मोदी-शाह की पसंद के व्यक्ति, जे.पी. नड्डा, ही फिलहाल पार्टी की कमान संभाले हुए हैं, हालाँकि उनका औपचारिक अध्यक्षीय कार्यकाल बहुत पहले समाप्त हो चुका है। नेपथ्य में संघ की हजार कोशिशों के बावजूद मोदी-शाह की सत्ता टस-से-मस नहीं हुई है। इससे संघ की लाचारी उजागर होती है।

संघ का यह शताब्दी वर्ष है। संघ का जन्मजात स्वप्न है भारत को हिंदू राष्ट्र में परिवर्तित करना और अखंड भारत की स्थापना करना। संभवतः इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उसने मोदी-शाह जोड़ी को खुली छूट दी होगी। शायद यह सोचा होगा कि यह गुजराती जोड़ी असंभव को संभव में बदलने का चमत्कार कर दिखाएगी। इस जोड़ी ने संघ को निराश भी नहीं किया; पूरी निरंकुशता के साथ स्वतंत्रता आंदोलन और लोकतंत्र के अर्थ ही बदल डाले।

संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं का ह्रास किया; नोटबंदी से वोटबंदी तक का चक्र चलाया; गैर-भाजपाई सरकारों के मार्ग में काँटे बिछाए; विपक्ष को भाजपा को ‘वॉशिंग मशीन’ से परिभाषित करने का अवसर दिया; अन्य दलों के भ्रष्ट नेताओं को पार्टी में शामिल कर उनकी सरकारें गिराईं; दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में मतदाता और जनसंख्या के आँकड़ों में हेरफेर का आरोप लगा; जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किया; मौखिक तीन तलाक को समाप्त किया; अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण करवाया; स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों को विवादास्पद बनाया और भारतीय समाज का सघन ध्रुवीकरण किया।

अब बिहार की बारी है। इसके बाद अगले वर्ष पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु सहित अन्य राज्यों में ‘चुनाव-परिणाम चोरी’ की बिसात बिछाई जाएगी। यह सब ‘हिंदुत्व’ के नाम पर किया जा रहा है। यह आरोप विपक्ष का है। इससे अधिक इस जोड़ी से संघ को और क्या चाहिए? इस जोड़ी ने अपने चमत्कारी नतीजों के लिए अपनी मातृ संस्था से कीमत भी वसूली है।

इस जोड़ी ने राज्य की संस्थाओं को असंवैधानिक शैली में निचोड़ने के साथ-साथ संघ के मेरुदंड को भी खोखला कर दिया। माया के तालाब में संघ कार्यकर्ता तैराकी करने लगे। दिल्ली के झंडेवालान क्षेत्र में स्थित एक समय सादगी का प्रतीक एकमाला केशवकुंज की इमारत आज गगनचुंबी अट्टालिका में परिवर्तित हो गई है। प्रचारकों की जीवनशैली भी पहले जैसी नहीं रही। संघ का नेतृत्व और पूर्णकालिक स्वयंसेवक सादगी, समर्पण, त्याग, तपस्या और बलिदान जैसी प्रवृत्तियों के प्रतीक माने जाते थे।

लेकिन पिछले एक दशक के मोदी-शाह शासनकाल में इन प्रतीकों पर सुख-सुविधाओं का मायाजाल छाया हुआ प्रतीत होता है। अनाम रखने की शर्त पर कुछ प्रचारक बताते हैं कि अब संघ नैतिक बल के स्थान पर ‘धन-बल’ पर टिका हुआ है। मोदी-शाह सत्ता इसकी ऑक्सीजन बनी हुई है। सत्ता द्वारा प्रदान किए गए कड़े सुरक्षा घेरे में संघ के शिखर नेतृत्व का अस्तित्व सुरक्षित रहता है। पल-पल की खबर सत्ता के शिखर तक पहुँचती रहती है। यही वजह है कि संघ के रिमोट कंट्रोल से प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह मुक्त हैं।

इसी श्रेणी में कैबिनेट मंत्री जे.पी. नड्डा को रखा जाता है। अब भाजपा की केंद्रीय सत्ता ‘त्रिकोणी’ बन चुकी है: पहला आधारभूत पाया नरेंद्र दामोदरदास मोदी, दूसरा गृहमंत्री अमित शाह और तीसरा नड्डा। लेकिन नड्डा की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। मोदी और शाह से शक्ति अर्जित कर नड्डा संसद के दोनों सदनों और बाहर अपनी पार्टी, संघ और विपक्ष पर गुर्राते रहते हैं।

सर्वविदित है कि 21 जुलाई को जिस तल्ख लहजे में नड्डा ने राज्यसभा में विपक्ष पर हमला बोला था, वह संसदीय मर्यादाओं की दृष्टि से ‘असाधारण कृत्य’ था। सदन में सभापति जगदीप धनखड़ की उपस्थिति में नड्डा ने घोषणा की थी कि सदन की कार्यवाही में वही शामिल होगा जिसे वे स्वीकार करेंगे। सभापति धनखड़ नड्डा के इस आचरण को चुपचाप देखते-सहते रहे। उन्होंने नड्डा के कथन का प्रतिवाद नहीं किया। दोनों सदनों की कार्यवाहियों में काट-छाँट का अधिकार केवल लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति को होता है। लेकिन उस दिन नड्डा ने संसदीय मर्यादा का उल्लंघन करने के साथ-साथ परोक्ष रूप से सभापति और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की पद-गरिमा की धज्जियाँ उड़ाई थीं। निश्चित रूप से सभापति के लिए यह दृश्य असहनीय रहा होगा।

याद रहे, डॉ. राधाकृष्णन, डॉ. जाकिर हुसैन, वी.वी. गिरि, जस्टिस मोहम्मद हिदायतुल्लाह, डॉ. शंकर दयाल शर्मा, कृष्णकांत, वेंकट रमण, के.आर. नारायणन, भैरों सिंह शेखावत, मोहम्मद हामिद अंसारी जैसे प्रतिष्ठित विद्वान सभापति पद को सुशोभित कर चुके हैं। वैसे, धनखड़ ने अपने अमर्यादित कारनामों से उपराष्ट्रपति और सभापति दोनों पदों की गरिमा को बार-बार आघात पहुँचाया था। वे प्रधानमंत्री मोदी के सामने करबद्ध खड़े दिखाई देते रहे हैं। बेशक, उन्हें उनके कर्मों का सटीक फल मिला है। लेकिन मूल मुद्दा यह है कि पूंजीवादी लोकतंत्र के शासक भी ‘लौह परकोटे’ में रहते हैं। इस परकोटे के भीतर अनेक कुचक्र, षड्यंत्र और चक्रव्यूह रचे जाते हैं, और अवांछित व्यक्तियों को समय-समय पर निपटा दिया जाता है।

सत्ता के विभिन्न बुर्जों पर कमजोर चौकीदारों को बैठाया जाता है ताकि बगावत का खतरा न रहे। ऐसे चौकीदारों की तलाश में निर्वाचित निरंकुश शासक या चौकड़ी हमेशा लगी रहती है। जयपुर, भोपाल, रायपुर, भुवनेश्वर, गांधीनगर जैसे स्थानों की मुख्यमंत्री की गद्दी पर जनाधार-रहित नेताओं का जमावड़ा है। इनमें से कोई भी मुख्यमंत्री मोदी-शाह सत्ता के विरुद्ध बगावत की सोच भी नहीं सकता।

मध्य प्रदेश के पूर्व लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को केंद्र में कृषि मंत्री बनाकर निस्तेज कर दिया गया है। यदि मोदी-शाह सत्ता के लिए कोई चुनौती है, तो वह है उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। अभी तक योगी जी ‘मेमना-दशा’ में ढले नहीं हैं। हो सकता है, उन्हें चक्रव्यूह में घेरने की कोशिशें चल रही हों! अगली खुशी के इंतजार में मोगैम्बो हो!

(रामशरण जोशी वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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