भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच हस्ताक्षरित Comprehensive Economic and Trade Agreement (CETA) को लेकर सरकार और गोदी मीडिया में अत्यधिक उत्साह देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर की मौजूदगी में इस समझौते को ‘नई आर्थिक साझेदारी की शुरुआत’ बताया गया। यह FTA 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को $100 अरब तक पहुंचाने का लक्ष्य रखता है, जिसमें श्रमिक-प्रधान उत्पादों के लिए ब्रिटेन में ज़ीरो टैक्स, भारतीय पेशेवरों के लिए आसान वीज़ा, और पारंपरिक GI उत्पादों को नए बाज़ार में ले जाने जैसी घोषणाएँ शामिल हैं।
लेकिन इस चमक-दमक के पीछे इस समझौते की वास्तविकता और संभावित खतरे को समझना आवश्यक है। क्या यह समझौता भारत के किसानों, कामगारों, कारीगरों, लघु उद्योगों और युवा पेशेवरों को वास्तविक अवसर प्रदान करता है? या यह एक बार फिर वैश्विक मुक्त व्यापार की आड़ में असमान व्यापारिक गठबंधन है, जहाँ आर्थिक लाभ का पलड़ा विदेशी कॉरपोरेट शक्तियों की ओर झुका हुआ है?
1. ब्रिटेन के लिए राहत, भारत के लिए जोखिम?
ब्रेक्ज़िट के बाद ब्रिटेन को वैश्विक व्यापार में नए भागीदारों की तलाश थी, और भारत जैसे तेज़ी से बढ़ते उपभोक्ता बाज़ार के साथ समझौता उसके लिए अत्यधिक लाभप्रद है। FTA के तहत भारत ने स्कॉच व्हिस्की और जिन पर आयात शुल्क को 150% से घटाकर 10 सालों में 40% तक लाने का वादा किया है। इसी तरह, ब्रिटिश गाड़ियों पर कर 100% से घटाकर 10% किया जाएगा।
ये कदम सीधे तौर पर देशी शराब निर्माताओं और ऑटोमोबाइल कंपनियों को प्रभावित करेंगे। भारत में शराब उद्योग का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में है और स्थानीय ब्रांड पहले ही बाज़ार में अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। विदेशी लक्ज़री ब्रांड्स की आसान पहुंच से उनका संकट और बढ़ेगा। वाहन निर्माण क्षेत्र में महिंद्रा और टाटा जैसी कंपनियाँ पहले ही जापान और कोरिया के साथ FTA के कारण बाज़ार हिस्सेदारी गंवा चुकी हैं।
2. सरकारी खरीद और रणनीतिक क्षेत्रों में विदेशी प्रवेश
FTA के तहत ब्रिटिश कंपनियों को भारत की सार्वजनिक खरीद प्रणाली तक पहुंच मिलेगी, विशेष रूप से स्वच्छ ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में। इसका मतलब यह है कि भारत की सरकारी परियोजनाओं में विदेशी कंपनियाँ अब प्रतिस्पर्धा में उतरे बिना भी प्रवेश कर सकती हैं।
OECD की रिपोर्ट ‘Government at a Glance (2023)’ बताती है कि विकसित देश आमतौर पर अपनी सार्वजनिक खरीद प्रणाली को विदेशी कंपनियों से सुरक्षित रखते हैं, जबकि विकासशील देश इन्हें उदारता से खोल देते हैं। इससे भारत की स्थानीय कंपनियाँ, खासकर लघु निर्माण कंपनियाँ, वैश्विक दिग्गजों के सामने टिक नहीं पातीं।
3. वीज़ा सुविधा: प्रतीकवाद बनाम वास्तविकता
सरकार ने दावा किया है कि इस समझौते से भारतीय पेशेवरों को ब्रिटेन में काम करने के बेहतर अवसर मिलेंगे, और वीज़ा प्रक्रिया सरल होगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि वीज़ा खुद इस FTA का हिस्सा नहीं है। केवल ‘temporary business visitors’ को सीमित छूट मिली है।
UK की Migration Advisory Committee और OECD की रिपोर्टें इस बात को रेखांकित करती हैं कि अधिकांश व्यापार समझौतों में वीज़ा की भाषा प्रतीकात्मक होती है, जब तक कोई स्पष्ट प्रवासन नीति नहीं बदलती, भारतीय पेशेवरों के लिए अवसर सीमित ही रहते हैं। UK-India Young Professionals Scheme के तहत साल में केवल 3000 वीज़ा दिए जाते हैं। यह भारत की जनसंख्या और पेशेवर मांग के अनुपात में बहुत ही नगण्य है।
4. कृषि उत्पाद: ड्यूटी फ्री एक्सेस की दोधारी तलवार
FTA के अनुसार भारत को 95% कृषि और प्रोसेस्ड फूड उत्पादों पर ज़ीरो ड्यूटी पहुंच मिलेगी। कागज़ पर यह सुनहरा अवसर लगता है, लेकिन यथार्थ में दोधारी तलवार है।
India-ASEAN और India-Sri Lanka जैसे पिछले व्यापार समझौतों के बाद भारत का कृषि व्यापार घाटा कई गुना बढ़ा। सस्ते आयातित खाद्य उत्पादों ने भारतीय किसानों को बाज़ार से बाहर कर दिया। जैसे केरल और असम के चाय उत्पादक, मणिपुर के मसाला किसान, और आंध्र के मूंगफली किसान विदेशी प्रतिस्पर्धा से प्रभावित हुए।
ब्रिटिश खाद्य कंपनियाँ ब्रांडिंग, पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स में सक्षम हैं, जबकि भारतीय किसान और प्रोसेसर सरकारी सहायता के बिना रिटेल शेल्फ़ तक पहुंच ही नहीं पाते।
5. GI उत्पादों की खोखली उम्मीदें
FTA के जरिए भागलपुरी रेशम, कोल्हापुरी चप्पल, पश्मीना शॉल आदि को ब्रिटेन के रिटेल बाज़ार में स्थान मिलने की बात की गई है। लेकिन 2022 के IIFT अध्ययन में यह सामने आया कि GI टैग मिलने के बावजूद 60% उत्पादकों को निर्यात से कोई सीधा लाभ नहीं होता। वे बिचौलियों के जरिए काम करते हैं और उनके उत्पादों का मुनाफ़ा उन्हें नहीं, मार्केटिंग एजेंसियों को जाता है।
इस प्रकार यह GI उत्पाद भी ब्रांडेड हेंडलर्स के लाभ का साधन बनते हैं, न कि स्थानीय कारीगरों की आर्थिक उन्नति का।
6. ‘मेक इन इंडिया’ बनाम ‘इंपोर्ट फ़्रॉम UK’
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह कहते हैं कि यह समझौता ‘Make in India’ को गति देगा, तो वह दावा विरोधाभासी लगता है। जब भारत में विदेशी शराब, गाड़ियाँ, प्रोसेस्ड फूड और वित्तीय सेवाएँ सस्ती और सुलभ हो जाएंगी, तो घरेलू उत्पादकों की प्रतिस्पर्धा क्षमता घटेगी।
FTA के तहत भारत के कई टैरिफ 15% से घटाकर 3% कर दिए गए हैं, जबकि ब्रिटेन की ओर से केवल सीमित टैरिफ रियायतें दी गई हैं। यह स्पष्ट असंतुलन दर्शाता है कि भारत ने कहीं ज़्यादा बाज़ार खोला है, जबकि ब्रिटेन ने संरक्षण की सीमाएं बनाए रखीं।
7. डिजिटल और सेवा क्षेत्र: असमान निवेश पहुँच
FTA में यह कहा गया है कि भारत के वित्तीय, IT, और एजुकेशनल सेवाओं को UK बाज़ार में अवसर मिलेगा, और UK को भारत की बीमा सेवाओं में हिस्सेदारी। लेकिन ब्रिटिश कंपनियों के पास पहले से ही भारतीय वित्तीय क्षेत्र में गहरी पैठ है, जबकि भारतीय कंपनियों को ब्रिटेन की लॉबी और नीतियों में प्रवेश करना बेहद कठिन रहता है।
इसके अलावा, भारत में डाटा सुरक्षा और डिजिटल सेवा नीति अभी भी विकसित हो रही है, जिससे विदेशी डिजिटल कंपनियाँ भारतीय डाटा और सेवाओं पर नियंत्रण बना सकती हैं, जिसका दूरगामी असर होगा।
8. FTA का ऐतिहासिक ट्रैक रिकॉर्ड: घाटे का सौदा
भारत ने 2010 के बाद ASEAN, Japan, South Korea, आदि के साथ कई FTA किए। CII-KPMG (2019) और Ministry of Commerce के अध्ययन दिखाते हैं कि इन समझौतों के बाद भारत का व्यापार घाटा तेजी से बढ़ा, खासकर उन देशों से जहाँ से सस्ते आयात बढ़े।
यह अनुभव बताता है कि जब तक भारत के घरेलू उद्योगों, किसानों और कारीगरों को संरक्षित नहीं किया जाता, FTA से निर्यात कम और आयात अधिक होता है।
FTA या Favour The Angrez?
भारत और ब्रिटेन के बीच हुआ यह व्यापार समझौता आर्थिक नहीं, राजनीतिक और रणनीतिक गणनाओं पर आधारित है। एक ओर जहां ब्रिटेन को ब्रेक्ज़िट के बाद राहत मिली है, वहीं भारत के लिए यह समझौता सरकार की उपलब्धियों में सजावट के काम आ सकता है। क्योंकि सरकारी नीतियां किसानों, MSMEs, पेशेवरों, और कारीगरों को ठोस समर्थन नहीं देतीं। FTA का असली मूल्यांकन इस बात से होगा कि: क्या भारतीय उत्पादकों को विदेशी बाज़ार में निष्पक्ष अवसर मिला? क्या पेशेवरों को वीज़ा से वाकई लाभ हुआ? क्या GI उत्पादों के निर्माता समृद्ध हुए? और सबसे अहम, क्या घरेलू उद्योग इस समझौते के बाद भी जीवित रह सके? यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ में है, तो यह FTA भी एक और औपनिवेशिक छाया के रूप में इतिहास में दर्ज होगा, जहाँ भारत ने फिर से बाज़ार खोला और दूसरे ने मुनाफ़ा कमाया।
(मनोज अभिज्ञान स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)