देश की संकटापन्न स्थिति के बीच पांच राज्यों में चुनावी बिगुल बजा!

दाद देनी पड़ेगी महामानव को जिन्होंने पक्का कलेजा करते हुए देश की संकटापन्न स्थिति में भी पूर्ण जीत का विश्वास लिए पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा करवा दी। इस बीच लोगों को बड़ा नागवार गुज़र रहा था कि दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ रही थी और महामानव चुनावी घोषणाओं में मस्त थे। आज समझ में आ गया कि वे इसीलिए जल्द से जल्द अपने चुनावी प्रलोभनों की सरकारी घोषणा में लगे हुए थे तथा तरह-तरह की अफवाहों का जमकर प्रचार करते रहे। उन्हें लेशमात्र भी देशवासियों की परवाह नहीं थी कि इस युद्ध का उन पर क्या असर पड़ेगा।

सब कुछ अपने आका पर छोड़ वे बंगाल की तृणमूल कांग्रेस की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के एमके स्टालिन, केरल के मुख्यमंत्री भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी के पिनरायी विजयन को हटाने प्रतिबद्ध रहे हैं और भाजपा शासन लाने के लिए बेताब हैं। लेकिन इन तीनों दक्षिण राज्यों में भाजपा का पैर जमाना आसान नहीं है। शर्त सिर्फ यह है कि चुनाव निष्पक्ष हों जिसकी कल्पना भाजपा के राज़ में करना मुश्किल है। लेकिन यदि अवाम बड़े पैमाने पर इन मुख्यमंत्रियों की पक्षधर है तो अधिक मतदान कर इन्हें पुनः सत्तारूढ़ कर सकता है।

कहा जा रहा है कि सारा दारोमदार एसआईआर की वास्तविक मतदाताओं की पूरी उपस्थिति पर निर्भर है क्योंकि ममता ने बड़े पैमाने पर अपने सपोर्टर्स के नाम ना होने का खुलासा किया जिस पर कोई अपील और दलील नहीं सुनी गई। असम में हेमंत विस्वा सर्मा पर भाजपा को पूर्ण रुप से विश्वास है उधर पुडुचेरी में एन रंगास्वामी अखिल भारतीय एन आर कांग्रेस के मुख्यमंत्री हैं। केंद्र शासित राज्य में वे जमे हुए हैं तो परिवर्तन की उम्मीद नहीं की जा सकती।भाजपा को आज्ञाकारी मुख्यमंत्री चाहिए।

इस सबके बावजूद यदि राज्यों में गैस और तेल का संकट मौजूद रहता है तथा देश की विदेश नीति पर महामानव की हार तथा मुस्लिम वोटर की वोट भाजपा से कटती है तो परिणाम बदल सकते हैं। क्योंकि असम, बंगाल, केरल में मुस्लिम वोटर की तादाद बड़ी है जो असरकारी हो सकती है।

ऐसा कहा जा रहा है इस चुनावी दौर में इन पांच राज्यों में तेल गैस संकट से उबरने की व्यवस्था भाजपा ने पहले से कर रखी है। देखना यह है कि भाजपा इन राज्यों में अपने कितने प्रतिशत वोट बढ़ाती है या सत्ता तक पहुंचती है। एक बात और गौर करने की है कि असम, छोड़कर केरल, बंगाल, तमिलनाडु के वोटर काफ़ी समझदार है। मुसीबतों के बीच महामानव का चुनाव कराना उनकी गहरी लोकतांत्रिक भावना का परिचायक नज़र आता है किंतु असलियत कुछ और है जो आगे चलकर पता चलेगी। अभी कहना कठिन है।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)

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