हाल ही में जारी अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ) की 2026 की वार्षिक रिपोर्ट ने भारत को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बहस को तेज कर दिया है। इस बार विवाद का केंद्र केवल राष्ट्रीय नीतियां नहीं, बल्कि उत्तराखंड की समान नागरिक संहिता (यूसीसी) भी है। यह अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि पहली बार किसी हिमालयी राज्य के स्थानीय कानून को इस स्तर पर धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकार के वैश्विक मानकों के संदर्भ में परखा गया है।
रिपोर्ट में भारत को लगातार सातवें वर्ष “विशेष चिंता वाले देश” की श्रेणी में रखने की सिफारिश की गई है और उत्तराखंड की यूसीसी को धार्मिक स्वतंत्रता की कथित गिरती स्थिति के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
स्थानीय कानून से अंतरराष्ट्रीय बहस तक
उत्तराखंड देश का पहला राज्य है जिसने स्वतंत्रता के बाद समान नागरिक संहिता को लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए और उसे प्रशासनिक ढांचे के साथ जमीन पर उतारा। इस कानून का घोषित उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और भरण-पोषण जैसे नागरिक विषयों पर अलग-अलग निजी कानूनों के स्थान पर एक समान व्यवस्था लागू करना है। राज्य सरकार इसे महिलाओं के अधिकार, कानूनी समानता और सामाजिक न्याय से जोड़कर प्रस्तुत करती रही है।
लेकिन अमेरिकी आयोग ने इसे बिल्कुल अलग नजरिए से देखा है। आयोग का कहना है कि यह संहिता धार्मिक अल्पसंख्यकों—विशेषकर मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदायों—के उन निजी कानूनों को कमजोर करती है, जो लंबे समय से भारत के बहुलतावादी विधिक ढांचे का हिस्सा रहे हैं। इस तरह आयोग ने उत्तराखंड की यूसीसी को केवल एक राज्य स्तरीय कानून नहीं, बल्कि भारत के बदलते कानूनी और सामाजिक ढांचे के प्रतीक के रूप में पेश किया है।
यही कारण है कि उत्तराखंड का यह कानून अब केवल राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा। वह अंतरराष्ट्रीय अधिकार विमर्श, कूटनीतिक चर्चाओं और भारत की लोकतांत्रिक छवि के संदर्भ में भी पढ़ा जाने लगा है। जिस कानून को राज्य सरकार सामाजिक सुधार का कदम बता रही है, वही कानून अब वैश्विक स्तर पर धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की कसौटी पर कसकर देखा जा रहा है।
लिव–इन संबंध और निजता पर टकराव
रिपोर्ट की सबसे तीखी आपत्ति लिव-इन संबंधों के अनिवार्य पंजीकरण को लेकर सामने आई है। आयोग का मानना है कि वयस्कों के आपसी सहमति वाले संबंधों को राज्य के समक्ष दर्ज कराना निजता के अधिकार के दायरे में हस्तक्षेप की तरह देखा जा सकता है। रिपोर्ट में यह आशंका भी जताई गई है कि ऐसे प्रावधान अंतरधार्मिक या सामाजिक रूप से विवादास्पद समझे जाने वाले संबंधों पर निगरानी और दबाव का माध्यम बन सकते हैं।
यहीं से यह मुद्दा केवल कानूनी सुधार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता बनाम सामाजिक नियंत्रण की बहस में बदल जाता है। उत्तराखंड सरकार इस व्यवस्था को पारदर्शिता, महिलाओं की सुरक्षा और संबंधों में जवाबदेही से जोड़ती है, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे राज्य को निजी जीवन में अनावश्यक दखल का अवसर मिल सकता है।
इसी कारण यूसीसी के भीतर लिव-इन संबंधों से जुड़ा प्रावधान सबसे अधिक विवाद का कारण बना है। विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मुद्दों पर मतभेद अपेक्षित थे, लेकिन निजी संबंधों के पंजीकरण ने बहस को और संवेदनशील बना दिया है। यह प्रश्न अब केवल यह नहीं रह गया कि कानून क्या कहता है, बल्कि यह भी है कि राज्य नागरिकों के निजी जीवन की सीमा कहाँ तक तय कर सकता है।
जनजातीय छूट और सांस्कृतिक असमंजस
रिपोर्ट का सबसे सूक्ष्म और गंभीर पक्ष उत्तराखंड की अनुसूचित जनजातियों को यूसीसी से बाहर रखने की व्यवस्था पर केंद्रित है। राज्य सरकार ने जनजातीय समुदायों को कानून के दायरे से बाहर रखा है, ताकि उनकी पारंपरिक सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। सामान्य दृष्टि से इसे संवेदनशील और व्यावहारिक कदम माना गया।
लेकिन अमेरिकी आयोग इसे एक कानूनी विरोधाभास के रूप में देखता है। उसका तर्क है कि यदि सरकार स्वयं यह मानती है कि कुछ समुदायों की परंपराएं इतनी विशिष्ट हैं कि उन्हें एक समान कानून के भीतर समेटना उचित नहीं, तो यही तर्क अन्य धार्मिक समुदायों के निजी कानूनों पर भी लागू होना चाहिए। इसी बिंदु पर रिपोर्ट यूसीसी की “समानता” की अवधारणा पर सवाल खड़ा करती है।
आयोग की चिंता केवल वर्तमान छूट तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि आज दी गई यह छूट भविष्य में स्थायी न भी रहे। यदि आगे चलकर “राष्ट्रीय एकरूपता” या “कानूनी समानता” के नाम पर जनजातीय समुदायों की विशिष्ट विवाह, उत्तराधिकार या पारिवारिक परंपराओं को भी सामान्य कानून के अधीन लाने की कोशिश हुई, तो इससे उनकी सांस्कृतिक स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।
उत्तराखंड के जौनसारी, भोटिया और राजी जैसे समुदायों की विशिष्ट सामाजिक परंपराओं को देखते हुए यह चिंता पूरी तरह निराधार नहीं मानी जा सकती।
इस तरह रिपोर्ट जनजातीय समुदायों को दी गई छूट को सुरक्षा के रूप में नहीं, बल्कि एक अस्थायी राजनीतिक संतुलन के रूप में पढ़ती है। उसके अनुसार, यह व्यवस्था फिलहाल विरोध को टाल सकती है, लेकिन दीर्घकाल में सांस्कृतिक अधिकारों के भविष्य को अनिश्चित बना सकती है। यही वह बिंदु है, जहाँ यूसीसी की बहस धार्मिक स्वतंत्रता से आगे बढ़कर सांस्कृतिक अस्तित्व और सामुदायिक स्वायत्तता तक पहुँच जाती है।
भारत का प्रतिवाद और व्यापक असर
भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को सख्ती से खारिज किया है। विदेश मंत्रालय का स्पष्ट मत है कि यह आकलन पक्षपातपूर्ण, प्रेरित और चुनिंदा दृष्टिकोण पर आधारित है। भारत का कहना है कि उसकी बहुलतावादी सामाजिक संरचना, संवैधानिक संस्थाएं और न्यायिक व्यवस्था किसी बाहरी आयोग के मूल्यांकन से न तो संचालित होती हैं और न ही परिभाषित।
सरकार यह भी स्पष्ट करती है कि उत्तराखंड की समान नागरिक संहिता संविधान के नीति निर्देशक तत्वों—विशेषकर अनुच्छेद 44—की दिशा में एक वैधानिक पहल है और यह पूरी तरह भारत का आंतरिक मामला है। भारत का यह भी कहना है कि किसी विदेशी निकाय को राज्य के विधायी निर्णयों पर इस प्रकार टिप्पणी करने से पहले अपने देश के भीतर धार्मिक असहिष्णुता, पूजा स्थलों पर हमलों और प्रवासी समुदायों के प्रति बढ़ती कटुता पर भी ध्यान देना चाहिए।
वास्तविकता यह है कि अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग एक सलाहकारी संस्था है और उसकी सिफारिशों को अमेरिकी सरकार पर अनिवार्य रूप से लागू करने का कोई बाध्यकारी दायित्व नहीं होता। भारत जैसे बड़े लोकतंत्र और रणनीतिक साझेदार के खिलाफ कठोर कदम उठना आसान नहीं है। फिर भी ऐसी रिपोर्टों का प्रभाव शून्य नहीं होता। वे अंतरराष्ट्रीय नीति-चर्चा, मानवाधिकार विमर्श, वैश्विक मीडिया के आख्यान और कूटनीतिक वार्ताओं में संदर्भ बिंदु बन जाती हैं।
यह विवाद केवल एक रिपोर्ट और एक कानून का नहीं, बल्कि दो दृष्टियों का है। एक दृष्टि राज्य की है, जो समान नागरिक संहिता को न्याय, लैंगिक समानता और विधिक एकरूपता का माध्यम मानती है। दूसरी दृष्टि अधिकार-आधारित है, जो पूछती है कि समानता की कीमत कहीं विविधता, निजता और सांस्कृतिक स्वायत्तता तो नहीं बन रही।
उत्तराखंड की यूसीसी इसी टकराव का नया और सबसे चर्चित उदाहरण बनकर उभरी है। आने वाले समय में बहस और गहरी होगी, क्योंकि असली सवाल अब केवल यह नहीं है कि कानून कितना “समान” है, बल्कि यह भी है कि वह भारत जैसे बहुस्तरीय समाज में कितना न्यायपूर्ण, संतुलित और समावेशी साबित होता है।
(जयसिंह रावत देहरादून में बसे वरिष्ठ पत्रकार हैं।)