दिल्ली हाई कोर्ट ने विदेशी फंडिंग के आरोपों को लेकर न्यूज़ पोर्टल न्यूज़क्लिक और उसके प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ दर्ज आर्थिक अपराध शाखा की एफआईआर और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ईसीआईआर को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि न्यूज़क्लिक कंपनी को मिली एफडीआई ने किसी कानून का उल्लंघन नहीं किया था।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि अगर एफआईआर में लगाए गए आरोपों को पूरी तरह सच भी मान लिया जाए, तो भी आईपीसी की धारा 406 और 420 के तहत अपराध के ज़रूरी तत्व नहीं बनते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी एफआईआर को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है।
जज ने फैसला सुनाया, “यह माना गया है कि अगर मुख्य अपराध (प्रेडिकेट ऑफेंस) के तहत दर्ज एफआईआर रद्द कर दी जाती है, तो ईसीआईआर भी अपने आप रद्द हो जाती है। नतीजतन, पूरी ईसीआईआर भी रद्द हो जाती है। एक बार जब ईसीआईआर ही रद्द हो जाती है, तो ईसीआईआर की कॉपी देने की मांग बेमतलब हो जाती है।”
सूचना और प्रसारण मंत्रालय की शिकायत पर अगस्त 2020 में दर्ज एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि न्यूज़क्लिक को अमेरिका की वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी से विदेशी निवेश के तौर पर 9.59 करोड़ रुपये मिले थे। यह रकम कथित तौर पर शेयरों के ऐसे लेन-देन से मिली थी जिसकी कीमत असल से ज़्यादा बताई गई थी, ताकि एफ़डीआई से जुड़े नियमों से बचा जा सके।
आरोप था कि फंड का एक बड़ा हिस्सा सैलरी, कंसल्टेंसी फीस और दूसरे खर्चों के ज़रिए निकाल लिया गया।
केस को रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि यह बात मानी गई थी कि वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी न्यूज़क्लिककी कंपनी पीपीके न्यूज़क्लिक स्टूडियो प्राइवेट लिमिटेड के कुल 23.07% शेयर के बदले कुल 4.5 मिलियन अमरीकी डॉलर का निवेश करने पर सहमत हुई थी, जो 1.5 मिलियन अमरीकी डॉलर की तीन किश्तों में किया जाना था।
इसमें यह भी बताया गया कि प्लेटफ़ॉर्म को 11.04.2018 को 1.5 मिलियन की पहली किश्त मिली थी।
चूंकि न्यूज़क्लिक का कहना था कि ऑनलाइन समाचार प्रकाशन में एफडीआई के लिए किसी रेगुलेटरी मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं थी, इसलिए कोर्ट ने गौर किया कि समाचार प्लेटफ़ॉर्म ने 2017 में केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय को एक पत्र लिखकर प्रिंट मीडिया से जुड़ी पॉलिसी और ऑनलाइन समाचार प्रकाशन के कारोबार में लगी कंपनी में एफडीआई के संबंध में स्पष्टीकरण मांगा था।
इस पर जस्टिस कृष्णा ने कहा कि जब अप्रैल 2018 में निवेश मिला था, तब डिजिटल न्यूज़ मीडिया में एफडीआई पर कोई सीमा (कैप) नहीं थी। जनवरी 2018 में सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी स्पष्टीकरण का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा: “एफडीआई नीति के संबंध में मंत्रालय से मिले जवाब से यह साफ था कि समाचारों के ऑनलाइन प्रकाशन पर कोई सीमा नहीं थी और इसलिए, याचिकाकर्ता और मेसर्स वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी के बीच हुआ समझौता, और नतीजतन 20.03.2018 का निवेश समझौता, किसी कानून का उल्लंघन नहीं करता है और न ही इससे किसी आपराधिक अपराध का पता चलता है। याचिकाकर्ता कंपनी के 7.69% शेयरों के बदले 11.04.2018 को 1.5 मिलियन अमरीकी डॉलर की राशि प्राप्त हुई थी।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि शेयरों का मूल्यांकन फेमा नियमों के अनुसार किया गया था और कीमत मेसर्स वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी और न्यूज़क्लिक के बीच उचित बातचीत और आपसी फैसलों के बाद तय की गई थी। कोर्ट ने कहा कि यह एक आर्थिक फैसला है जिससे किसी आपराधिक अपराध का संकेत नहीं मिलता।
कोर्ट ने कहा, “मूल्यांकन ‘डिस्काउंटेड कैश फ्लो’ की स्थापित विधि से किया गया था, जो वित्त मंत्रालय सहित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानक है। शेयरों की उचित कीमत का आकलन करते समय सभी संबंधित कारकों की उचित जांच की गई थी।”
जज ने आगे कहा कि भले ही यह मान लिया जाए कि न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म द्वारा ज़्यादा भुगतान किया गया था और अत्यधिक खर्च हुआ था, फिर भी इससे किसी आपराधिक अपराध का पता नहीं चलता। इसलिए, कोर्ट ने माना कि पैसे की हेराफेरी का आरोप टिकने योग्य नहीं है।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि आर्थिक अपराध शाखा की पिछली स्टेटस रिपोर्ट में दर्ज था कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने जांचकर्ताओं को सूचित किया था कि विदेशी आवक ‘ऑटोमैटिक रूट’ के तहत था और फेमा नियमों के तहत शेयरों को जारी करने या रिपोर्टिंग में कोई देरी नहीं हुई थी।
एफआईआर में लगाए गए अपराधों के तत्वों की जांच करते हुए, कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई शिकायतकर्ता नहीं था जिसने धोखाधड़ी का दावा किया हो। विदेशी निवेशक, वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी ने कभी यह आरोप नहीं लगाया कि उसे धोखा दिया गया था या न्यूज़क्लिक में निवेश करने के लिए उकसाया गया था।
कोर्ट ने कहा, “जांच के दौरान ऐसी कोई बात सामने नहीं आई… जिससे पता चले कि याचिकाकर्ता से कोई व्यक्ति परेशान हुआ हो या उसके साथ धोखाधड़ी की गई हो।” इसके साथ ही कोर्ट ने माना कि आईपीसी की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी का अपराध नहीं बनता है। इसी तरह, कोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 406 के तहत आपराधिक विश्वासघात का अपराध भी नहीं बनता, क्योंकि न तो कोई संपत्ति सौंपी गई थी और न ही संपत्ति के गलत इस्तेमाल का कोई आरोप था।
आईपीसी की धारा 120B के तहत आपराधिक साजिश के आरोप पर बात करते हुए – जिस पर मनी लॉन्ड्रिंग की जांच को आगे बढ़ाने के लिए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी ) ने भरोसा किया था – कोर्ट ने कहा कि किसी गैर-कानूनी मकसद या गलत तरीके के बिना सिर्फ़ निवेश समझौता करने को साजिश नहीं माना जा सकता।
ईसीआईआर को रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि आपराधिक साजिश के बेबुनियाद दावों के अलावा, ऐसा कोई भी ठोस आरोप नहीं था जिससे पीएमएलए की धारा 4 के तहत दंडनीय अपराध होने का ज़रा भी संकेत मिलता हो।
प्रबीर पुरकायस्थ को जून 2021 में इस मामले में गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा (कोई सख्त कार्रवाई नहीं) दी गई थी। इन अंतरिम आदेशों की अवधि समय-समय पर बढ़ाई जाती रही। ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले के सिलसिले में फरवरी 2021 में न्यूज़क्लिक के दफ़्तर और उसके संपादकों के घरों पर छापेमारी की थी और तलाशी व ज़ब्ती की कार्रवाई की थी।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)