ग्राउंड रिपोर्ट: गंगा और गोमती के बीच फंसा गाजीपुर का गौरहट गांव, बाढ़ की वजह से शादी की उम्मीदें धूमिल

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गाजीपुर। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद में स्थित गौरहट गांव अपनी प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली के लिए मशहूर है। यह गांव गंगा और गोमती नदियों के बीच तीनों ओर से घिरा हुआ है, लेकिन इस प्राकृतिक सौंदर्य के पीछे गांव के लोगों का संघर्ष और तकलीफें छिपी हैं। हर साल बरसात के मौसम में बाढ़ की विभीषिका यहां के निवासियों के जीवन में तूफान बनकर आती है, जिससे उनका दैनिक जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। इस गांव के बुजुर्ग मूरत यादव (85 साल) का कहना है, “हमने सदियों से प्रकृति की मार झेली है। बाढ़ हमारे लिए एक नई चुनौती बनकर आती है, पर सरकार से आज तक कोई ठोस मदद नहीं मिली।”

गौरहट गांव के लोग बाढ़ के दौरान घर छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। इस प्राकृतिक आपदा का सबसे बड़ा असर यहां के बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है। गांव के निवासी रामेश्वर यादव बताते हैं, “हर साल हमें घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ता है। औरतों को मायके भेजना पड़ता है ताकि वे सुरक्षित रहें, और बच्चों को पढ़ाई के लिए दूसरे स्कूलों में भेजना पड़ता है। हमारे जीवन का हर हिस्सा बाढ़ के पानी में बह जाता है।”

दुखड़ा सुनाती गांव की महिलाएं

गांव की एक महिला सुमित्रा देवी की पीड़ा कुछ इस तरह व्यक्त होती है, “बाढ़ के समय हमारा घर जलमग्न हो जाता है। हमारे पास सुरक्षित छत नहीं होती, और सामान को बचाने का भी वक्त नहीं मिलता। बच्चों की पढ़ाई, रोजगार और स्वास्थ्य, सब कुछ प्रभावित होता है। हम अपने घर के बिना बेगाने जैसे महसूस करते हैं।”

गौरहट गांव के बच्चों में पढ़ाई के प्रति उत्साह तो है, लेकिन बाढ़ के कारण उनका भविष्य अंधकारमय नजर आता है। गांव का एक नौजवान छात्र, अपने हालात का वर्णन करते हुए बताता है, “हम हर साल बाढ़ में घर छोड़ते हैं, और स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते। कभी-कभी तो पूरा साल बर्बाद हो जाता है। हमारे लिए भविष्य की कल्पना भी डरावनी हो जाती है।”

गांव में शिक्षा की व्यवस्था भी दयनीय है। गांव में प्राथमिक विद्यालय तो है, लेकिन हर साल बाढ़ के समय बच्चों की पढ़ाई रोकनी पड़ती है। शिक्षा विभाग की तरफ से स्थायी व्यवस्था नहीं होती। इससे बच्चों की शिक्षा में अनावश्यक रुकावट आती है। गौरहट के बच्चों का भविष्य किसी की प्राथमिकता में नहीं है।

कृषि का विनाश: किसानों का दर्द

गौरहट की अधिकतर आबादी कृषि पर निर्भर है। हर साल खरीफ की फसल बाढ़ के पानी में डूब जाती है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। गौरहट गांव के नौजवान मुकेश यादव कहते हैं कि विकास के लिए आए फंड की स्थिति तो ऐसी है कि वह रास्ते में ही खर्च हो जाता है। अगर कोई यहां आकर गांव की हालत देखे तो इसे जंगल ही समझेगा। मंगलमय जीवन की कामना करना यहां के लोग जैसे भूल ही गए हैं। मंगल तभी संभव है जब गांव के लिए कोई स्थायी रास्ता बने और जीवन की दुश्वारियां कम हों। गांव की एक बड़ी समस्या यह भी है कि जब नौजवानों के लिए शादी की बात आती है, तो कोई भी अपनी बेटी को यहां ब्याहने के लिए तैयार नहीं होता। गांव की विकट स्थिति और तमाम मुश्किलें किसी भी बाहरी व्यक्ति के लिए अस्वीकार्य हैं।

मुकेश यादव

मुकेश यादव, कहते हैं, “हम मेहनत से खेती करते हैं, लेकिन बाढ़ में फसलें बर्बाद हो जाती हैं। सरकार ने आज तक मुआवजे की कोई ठोस योजना नहीं बनाई है। हर साल हम अपनी मेहनत और सपनों को पानी में बहते देखते हैं।” मुकेश जैसे सैकड़ों किसान यहां अपनी आजीविका को खोते हैं। अपनी इस पीड़ा का जिक्र करते हुए कहते हैं, “हमारा जीवन खेती पर निर्भर है। हर साल बाढ़ के बाद फसल बर्बाद होती है, और हम कर्ज में डूबते चले जाते हैं। सरकार से हमें राहत की उम्मीद है, परन्तु वह मात्र आश्वासन तक ही सीमित रह जाती है।”

विवाह की समस्याएं और सामाजिक चुनौतियां

गौरहट गांव की बदनाम बाढ़ की वजह से यहां की लड़कियों के विवाह में भी समस्याएं आती हैं। गांव के बहुत से लड़के ऐसे हैं जिनकी शादियां दुश्वारियों के चलते नहीं हो रही है। एक महिला ने अपनी अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि हमारी तीन बेटे हैं। इस गांव में कोई अपनी बेटियों की शादी नहीं करना चाहता। लोग हमारे गांव का नाम सुनते ही मना कर देते हैं। हमारे बेटे कुंवारे रह जाते हैं, और हमारी बेटियों के रिश्ते नहीं होते। यह एक बड़ी सामाजिक समस्या है, जो बाढ़ के कारण उत्पन्न हुई है।” वह यह भी बताती हैं, “लोग कहते हैं कि गौरहट में बहू नहीं भेज सकते, क्योंकि यह गांव तो हर साल डूबता है। हमारे बेटे कुंवारे रह जाते हैं और उनकी शादी की उम्मीदें धूमिल हो जाती हैं।”

गौरहट गाँव की निवासी सरोजा देवी और उनके परिवार का हाल, यहाँ की विकट परिस्थितियों का जीवंत उदाहरण है। देवी की बेटी गुड़िया, जब अपने बच्चे को जन्म देने जा रही थी, तब उसे बेहद कठिन सफर तय करना पड़ा। गाँव से गंगा नदी के पार जाने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता है। करीब 3-4 किलोमीटर की दूरी तक नाव से जाना पड़ता है, फिर कहीं जाकर वह खानपुर अस्पताल तक पहुंच सकी। यह सफर हर किसी के लिए आसान नहीं होता, और न ही सुरक्षित। बारिश के दिनों में तो यह सफर और भी मुश्किल भरा हो जाता है। बाढ़ के दिनों में इस गांव में रेड अलर्ट जारी होता है।

सरोजा देवी के चार बेटे और चार बेटियाँ हैं। बेटियों की शादी तो किसी तरह हो गई, परंतु उनके तीन बेटों की शादी आज तक नहीं हो पाई। इसकी वजह यह है कि गाँव की विकट परिस्थितियाँ देखकर कोई भी अपनी बेटी का रिश्ता वहाँ देने को तैयार नहीं होता। एक बेटे की शादी हो भी चुकी है, पर बाकी बेटों के लिए इन हालातों ने जैसे एक अभिशाप बना दिया है। हर कोई सोचता है कि ऐसे जगह पर अपनी बेटी भेजना ठीक नहीं, जहाँ हर कदम पर मुसीबतें हैं।

सरोजा देवी और उनके परिवार ने आवास योजना के तहत घर मिलने की उम्मीद की थी। दो साल पहले उनका नाम आवास योजना में दर्ज भी हुआ था, लेकिन आज तक कोई खबर नहीं मिली। सरकारी कागजों में उनका नाम तो है, लेकिन ज़मीन पर कोई कार्य नहीं हुआ है। इस वजह से उनके परिवार को आज भी एक सुरक्षित और स्थायी घर का इंतजार है।

गाँव में जाने के लिए कोई पक्का रास्ता नहीं है, बारिश के मौसम में हालत और भी खराब हो जाती है। जंगल जैसी जगह पर बने इस गाँव में बरसात के समय पेड़ पर कीड़े-मकोड़े चढ़ आते हैं, जिससे लोगों का जीवन खतरे में पड़ जाता है। अगर एक पुल का निर्माण हो जाए तो लोगों की कई समस्याएं हल हो सकती हैं।

पानी की समस्या

यहाँ की सबसे बड़ी समस्या है पानी। गाँव के 70 प्रतिशत पानी में प्रदूषण है, जिसके कारण पीने का पानी मिलना मुश्किल हो जाता है। जिन घरों में शुद्ध पानी आता है, उन्हीं से पूरे गाँव के लोग पानी लेकर अपनी जरूरतें पूरी करते हैं। गाँव में पानी की टंकी का भी अभाव है, जिससे शुद्ध पानी हर किसी तक नहीं पहुँच पाता। एक बार अमित शाह गाँव में आए थे, लेकिन पानी की इस गंभीर समस्या पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

बरसात में यहाँ तक पहुंचना नामुमकिन हो जाता है। कीड़े-मकोड़े और जीव-जन्तु इतने अधिक होते हैं कि घरों में सुरक्षित रहना मुश्किल हो जाता है। सरोजा देवी बताती हैं कि घर में ऐसे हालात हैं कि कीड़ों से बचने के लिए उचित साधन भी नहीं है। एक पक्के घर और सुरक्षित रास्ते का सपना उनकी जिंदगी को थोड़ा राहत दे सकता है।

सैदपुर कस्बा पास होने के बावजूद इस गाँव की समस्याएँ बहुत बड़ी हैं। यदि एक पुल बन जाए, आवास योजना का लाभ मिल जाए, और शुद्ध पानी की व्यवस्था हो जाए तो इस गाँव के लोग एक बेहतर जीवन जी सकते हैं।

गौरहट गांव के दर्द और दुश्वारियां

गौरहट गांव की मुन्नी देवी की कहानी उस जद्दोजहद की मिसाल है, जो इस गांव के हर परिवार के जीवन में किसी न किसी तरह शामिल है। मुन्नी देवी के चार बेटे और दो बेटियाँ हैं, जिनमें से दो बच्चों की शादी हो चुकी है। तीन साल पहले जब उनके पति का निधन हुआ, तो मुन्नी देवी पर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। उनके पति मुंबई में एक तबेले में काम करते थे और इसी दौरान उन्हें लकवा मार गया था, जो अंततः उनके निधन का कारण बना।

मुन्नी देवी

मुन्नी देवी के घर की रोजमर्रा की ज़रूरतें और दो छोटे बच्चों की पढ़ाई उनके दो बड़े बच्चों की कमाई पर निर्भर हैं। खेती की हालत इतनी खराब है कि हर साल फसल बढ़ जाती है और ज्यादा कुछ हासिल नहीं होता।

मुन्नी देवी अपने परिवार को किसी तरह से चला रही हैं। बच्चों को पढ़ने के लिए नाव से भेजना पड़ता है, जो इस इलाके की रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने का एकमात्र साधन है। वह कहती हैं कि अगर एक पुल होता, तो उन्हें इतनी मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ता। कुछ साल पहले जब बीजेपी के वरिष्ठ नेता और मौजूदा गृह मंत्री अमित शाह गांव आए थे, तब गांव वालों ने उनसे अपनी समस्याओं के बारे में चर्चा की थी, लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं।

गौरहट: एक अलग दुनिया

दरअसल गौरहट गांव एक आइलैंड की तरह है, जहाँ मुख्य रूप से यादव समुदाय के लोग रहते हैं। यहाँ के लोग मुख्यतः पशुपालन और कृषि पर निर्भर हैं। गाय-भैंस और बकरियों को पालकर ही ये लोग अपनी आजीविका चलाते हैं। कुछ लोग सब्जियों की खेती भी करते हैं, लेकिन बारिश और बाढ़ के समय यह भी कठिन हो जाता है।

गौरहट गांव के महेंद्र सिंह की पत्नी कैंसर से जूझ रही हैं, और उनका इलाज बनारस में चल रहा है। गांव से बनारस तक का सफर उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। हर बार जब उन्हें बनारस जाना होता है, तो नाव ढूँढनी पड़ती है। बारिश का मौसम और बाढ़ के दिन उनके जीवन में अतिरिक्त मुश्किलें ले आते हैं।

महेंद्र सिंह

महेंद्र सिंह बताते हैं कि बाढ़ के समय उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ता है। बाढ़ के दौरान लगभग एक महीने तक गांव से बाहर जाना उनकी मजबूरी बन जाती है, क्योंकि इन हालातों में गाँव में रहकर राशन और पशुओं के चारे का इंतजाम करना बहुत कठिन होता है। जिनके रिश्तेदार सक्षम हैं, वे उन्हें अपने यहाँ बुला लेते हैं, लेकिन जिनके पास ऐसा सहारा नहीं है, उनके लिए हर साल का बाढ़ का मौसम एक विकट संघर्ष लेकर आता है। गंगा का पानी जब अपने उफान पर होता है, तो पूरे गांव के लोग इस विपत्ति से घिर जाते हैं।

उम्मीद और हकीकत का फासला

गौरहट गांव के लोग पिछले कई सालों से एक पुल और अन्य मूलभूत सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। सरकार के तमाम वादों के बावजूद आज भी यहां के लोग इन्हीं तकलीफों में जीने को मजबूर हैं। पानी की समस्या से लेकर, बाढ़ के समय होने वाली दिक्कतें और आवागमन के साधनों की कमी – इन सबने गांव को एक विकट स्थिति में डाल रखा है। मुन्नी देवी, महेंद्र सिंह और गांव के बाकी लोग इस उम्मीद में हैं कि कभी न कभी उनकी आवाज़ सरकार तक पहुंचेगी और उन्हें इन कठिनाइयों से राहत मिलेगी।

दुखड़ा सुनाती गुड़िया

तकलीफें और विकास की आस

गौरहट गांव के रामकुमार सिंह को गांव का संपन्न किसान माना जाता है। लेकिन संपन्नता की यह तस्वीर उतनी चमकदार नहीं है जितनी बाहर से दिखती है। हर साल रामकुमार अपने खेतों में अरहर, मूंग और तिल की बुवाई करते हैं, उम्मीद में कि इस बार फसल अच्छी होगी और नुकसान की भरपाई हो जाएगी। लेकिन हर बार बाढ़ आती है और उनकी सारी मेहनत पानी में बह जाती है। खरीफ की फसल तो जैसे बाढ़ की भेंट चढ़ने के लिए ही बोई जाती है। हिम्मत फिर भी हार नहीं मानती, साल-दर-साल नई उम्मीदों के साथ खेतों में बीज बोए जाते हैं, पर हर साल वही निराशा हाथ लगती है।

गौरहट गांव की बुजुर्ग महिला सुमित्रा देवी कहती हैं कि इस गांव में रहना किसी जद्दोजहद से कम नहीं। उनके बेटे को गांव से बाहर नौकरी करने की जरूरत है, लेकिन यहां की समस्याएं इतनी अधिक हैं कि वह गांव छोड़कर नहीं जा सकता। बारिश के मौसम में घर के औरतों और बच्चों की सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बन जाती है। अगर परिवार का कोई सदस्य घर पर न हो, और किसी की तबीयत खराब हो जाए, तो अस्पताल ले जाने के लिए भी कोई रास्ता नहीं है। खेतों, पगडंडियों और कीचड़ से होकर सफर करना पड़ता है, जो बारिश के दिनों में और भी मुश्किल भरा हो जाता है।

गौरहट गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है, जो शायद इस गांव की सबसे बड़ी समस्या है। आसपास कोई अस्पताल नहीं है, और विवाद होने पर पुलिस भी यहां आने से कतराती है। बरसात के दिनों में यहां सांपों की भी समस्या बढ़ जाती है। नदी के रास्ते सांपों के झुंड गांव की तरफ आ जाते हैं, जिससे खेती-बाड़ी करना मुश्किल हो जाता है। हर साल कोई न कोई सांप के काटने से अपनी जान गंवा देता है। ऐसे में जहरीले जंतुओं से बचाव के कोई साधन भी नहीं हैं, जिससे ग्रामीणों की चिंता और बढ़ जाती है।

पानी और बिजली की समस्या

गौरहट गांव में पीने के पानी की समस्या बेहद गंभीर है। गांव का पानी प्रदूषित है और पीने लायक नहीं है। लोग दूर-दूर से पीने का पानी लाने पर मजबूर हैं। गाजीपुर जिला प्रशासन से कई बार पानी की टंकी और शुद्ध पेयजल की मांग की गई, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही निकला। गांव में पानी की टंकी का अभाव है, और बिजली तो आती है, मगर इतनी दबे पांव कि लोग सोते ही रह जाते हैं। इस गांव का दुर्भाग्य यह है कि यह बनारस जिले के समीप है, लेकिन बनारस जैसी सुविधाएं यहां से नदारद हैं।

गौरहट गांव के लोग एक साधारण से पुल का सपना संजोए बैठे हैं, जो गंगा के सोते पर बन जाए और उनके जीवन में कुछ राहत ला सके। इस पुल के बनने से गांव के लोगों को आवागमन में सुविधा होगी, और जीवन की समस्याएं कुछ हद तक आसान हो जाएंगी। गांव के लोगों की आस यही है कि उनकी आवाज़ सरकार तक पहुंचे और वे भी जीवन की बुनियादी सुविधाओं का लाभ उठा सकें।

कविता सिंह

गौरहट गांव के लोगों का कहना है कि सरकार द्वारा उनके गांव में बुनियादी सुविधाओं की कमी है। एकमात्र सड़क भी बाढ़ के पानी में डूबी रहती है। धीरज मिश्रा, गांव के एक छोटे व्यवसायी, कहते हैं, “गांव में स्वास्थ्य केंद्र नहीं है। बारिश के मौसम में हमारे लिए इलाज की सुविधा भी मयस्सर नहीं होती। अगर कोई बीमार हो जाए तो उसे इलाज के लिए गाजीपुर जाना पड़ता है, जो बाढ़ के समय असंभव हो जाता है। सरकार को हमारी सुध कब आएगी, यह हम नहीं जानते।”

नन्हकू यादव गौरहट गांव के वरिष्ठ नागरिक हैं, भावुक होकर कहते हैं, “हमने सदियों से इस बाढ़ को झेला है। पर कोई हमारी तरफ देखता तक नहीं। आज तक गांव में पक्की सड़क नहीं बनी है। ऐसा लगता है कि हम गौरहट के लोग कागज पर ही मौजूद हैं।”

राजनाथ यादव कहते हैं कि गौरहट गांव के लोग हर साल बाढ़ का सामना करते हैं, लेकिन हमारी समस्याओं का समाधान अब तक नहीं हो सका है। हम शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है और अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। प्रशासन द्वारा तुरंत प्रभाव से राहत दी जाए और यहां के निवासियों की समस्याओं का हल निकाला जाए, तभी गौरहट का भविष्य सुरक्षित हो सकता है।

(आराधना पांडेय स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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