हरिहरन : डेडिकेशन, क्रिएटिविटी और इनोवेशन से बनी अंतरराष्ट्रीय पहचान

बीसवीं सदी का आठवाँ दशक ग़ज़ल गायकी का सुनहरा दौर माना जाता है। यही वह दौर था, जब हमारे देश में एक साथ कई गायकों जगजीत सिंह, चित्रा सिंह, भूपिंदर सिंह, मिताली सिंह, पंकज उधास, चंदन दास, अहमद हुसैन—मोहम्मद हुसैन, तलत अज़ीज़, अनूप जलोटा, पीनाज मसानी, घनश्याम वासवानी, अशोक खोसला आदि ने अपनी गायकी से ग़ज़ल के शैदाइयों को मदहोश कर दिया। इन ग़ज़ल गायकों में एक अहम नाम हरिहरन का भी है, जिनकी ग़ज़ल गायकी का आग़ाज़ तो थोड़ा ठंडा रहा, लेकिन ग़ज़ल के जानिब उनके डेडिकेशन, क्रिएटिविटी और इनोवेशन ने जल्द ही उन्हें हर-दिल-अज़ीज़ ग़ज़ल सिंगर बना दिया।

हरिहरन ने हाल ही में अपनी ग़ज़ल जर्नी के पाँच दशक मुकम्मल किए हैं, इस दरमियान उनकी पहचान अंतरराष्ट्रीय ग़ज़ल गायक की हो गयी है। वाक़ई यह एक बड़ा कारनामा है। यह उपलब्धि इस लिए और भी अहम हो जाती है कि वह एक तमिल भाषी हैं और उन्होंने बचपन में अपने वालिदैन एच.ए. एस. मणि और अलामेलु मणि से कर्नाटक शास्त्रीय संगीत की तालीम हासिल की थी। ग़ज़ल के जानिब यह उनकी हद दर्जे की दीवानगी और जुनून ही है, जो उन्हें पहले हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत, फिर ख़याल गायकी और बाद में इंडियन सेमी—क्लासिकल म्यूजिक की ओर ले गया।

हरिहरन ने उस्ताद गुलाम मुस्तफ़ा ख़ान की शागिर्दी में अपने आपको लगतार मॉंझा और आज ग़ज़ल गायकी के उस आला मुक़ाम पर हैं, जिसका ख़्वाब उन्होंने कभी बचपन में देखा था। हरिहरन की दिल-आवेज़ शख़्सियत, ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव और उनकी ग़ज़ल गायकी के पाँच दशक का पूरा सफ़र किताब ‘उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन’ में दिलचस्प तरीक़े से सामने आया है। लेखक-पत्रकार आनन्द कक्कड़ ने बड़े ही दिल—ओ—जान से इस किताब को लिखा है। लिखा क्या, किताब का हर्फ़—हर्फ़ जिया है। आनन्द कक्कड़ सिर्फ़ लेखक ही नहीं हैं, वे हरिहरन की ग़ज़ल गायकी के बरसों से शैदाई और अक़ीदत—मंद भी हैं।

उन्होंने हरिहरन और उनकी ग़ज़लों को इबादत की हद तक चाहा व पूजा है। हरिहरन से उनका नाता कोई पैंतीस साल पुराना है। कक्कड़ ने हरिहरन के अनेक लाइव कॉन्सर्ट अटेंड किए हैं, उन्हें लाइव सुना है। उन पर बेशुमार लिखा है। उनसे कई मुलाक़ातें की हैं, तब जा कर यह किताब वजूद में आयी है। ज़ाहिर है कि जब कोई इस दीवानगी, गहराई और शिद्दत से काम करता है, तो यह उसकी किताब में भी नज़र आता है।

‘उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन’ की एक-एक लाइन हरिहरन और उनकी ग़ज़ल गायकी की मुहब्बत और बंदगी में डूबी दिखाई देती है। किसी प्लेबैक सिंगर या ग़ज़ल सिंगर पर हिन्दी में यह अपनी तरह की पहली किताब है, जिसमें ग़ज़ल गायकी का विस्तार से विश्लेषण किया गया है। वर्ना ज़्यादातर किताबें सूचनाओं और कुछ रंगीन तस्वीरों तक ही महदूद रहती हैं। 

‘उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन’ को लेखक ने ग्यारह अध्यायों ‘ग़ज़ल के सांस्कृतिक राजदूत-हरिहरन’, ‘ग़ज़ल गायकी की नई सुबह : हरिहरन घराना’, ‘उस्ताद हरिहरन की ग़ज़ल गायकी का स्वर्णिम सफ़रनामा’, ‘सम्मान-यात्रा’, ‘ग़ज़ल के शिल्पकार हरिहरन : संगीत मनीषियों की नज़र में’, ‘रू-ब-रू : कुछ दूर हमारे साथ चलो, हम दिल की कहानी कह देंगे’, ‘रिश्तों में गूँजता संगीत’, ‘अनुभूतियों का आलोक : हरिहरन’, ‘डिस्कोग्राफ़ी’, ‘हरिहरन की गायी 50 बेहतरीन ग़ज़लों का संकलन एवं पाठ’ और ‘फ़ोटो गैलरी’ में बाँटा है।

इसके अलावा किताब में मशहूर-ओ-मारूफ़ शायर, नग़मा—निगार जावेद अख़्तर और शायर फ़रहत शहज़ाद के आशीर्वचन भी शामिल हैं। किताब की भूमिका में ही आनन्द कक्कड़ ने पाठकों को स्पष्ट कर दिया है, ‘‘यह किताब हरिहरन जी के व्यक्तित्व और दर्शन का आईना है, जो एक आदमी से लीजेंड बनने की प्रेरणादायक दास्तान भी है।’’ (पेज-11) ज़ाहिर है कि पाठक किताब को पढ़ते-पढ़ते जैसे आगे बढ़ते हैं, उन्हें इस आईने में हरिहरन की तस्वीर साफ़ दिखाई देने लगती है। वे उनकी ग़ज़ल की गायकी से रू-ब-रू हो जाते हैं। यह किताब उनमें हरिहरन की ग़ज़लें सुनने की एक ऐसी प्यास जगा देती है, जो शायद ही कभी बुझे।

यही लेखक के लेखन की कामयाबी है। आनन्द कक्कड़, हरिहरन को ‘ग़ज़ल के सांस्कृतिक राजदूत’ के तौर पर देखते हैं। और इसके पीछे उनकी यह दलील है-‘‘आधी सदी के सफ़र में हरिहरन के चालीस से अधिक ग़ज़ल एल्बम एवं एकल ग़ज़ल वीडियो रिलीज़ हुए हैं। आपने अपने संगीत ज्ञान से ग़ज़ल गायकी को एक अलग रंग और शैली प्रदान की, जो हर वर्ग के श्रोताओं की पसंद बनी। आज भी जिस निरंतरता और गरिमा के साथ हरिहरन देश-विदेश में अपने ग़ज़ल कॉन्सर्ट्स करते हैं, नए एल्बमों के माध्यम से वे ग़ज़ल की संवेदना और अभिव्यक्ति को नई पीढ़ी तक पहुँचा रहे हैं, वह सब मिलकर उन्हें ‘ग़ज़ल के सांस्कृतिक राजदूत के रूप में प्रतिष्ठित करता है।’’ (पेज-32)

‘ग़ज़ल गायकी की नई सुबह : हरिहरन घराना’ अध्याय में लेखक ने ग़ज़ल गायकी को पाँच घरानों-बेगम अख़्तर, मेहदी हसन, गुलाम अली, जगजीत सिंह और हरिहरन में बाँटा है। इस अध्याय में न सिर्फ़ उन्होंने इन अज़ीम सिंगरों के बारे में विस्तार से जानकारी दी है, बल्कि उनके बाद इस घराने या विरासत को कौन आगे बढ़ा रहा है और सच मायने में कौन उनकी नुमाइंदगी कर रहा है ? उन ग़ज़ल गायकों के नाम दिए हैं। साथ ही वह बेगम अख़्तर, मेहदी हसन, गुलाम अली, जगजीत सिंह और हरिहरन की दस यादगार ग़ज़लों का भी ज़िक्र करते हैं।

ज़ाहिर है कि ग़ज़ल गायकी के शैदाइयों के लिए किताब में यह एक एडिशनल तोहफ़ा है, जो उन्हें ख़ूब पसंद आएगा। एक लिहाज़ से देखें, तो किताब के इब्तिदाई अध्यायों में लेखक ने ग़ज़ल गायकी का पूरा इतिहास पाठकों के सामने रख दिया है। एक अहम बात और, किताब में ग़ज़लों की रिकॉर्डिंग और म्यूजिक कम्पनियों से सम्बन्धित छोटी-छोटी जानकारियाँ भी पाठकों को चौंकाने का काम करती हैं। इसमें लेखक का विस्तृत अध्ययन और ज्ञान साफ़ दिखाई देता है। मिसाल के तौर पर अविभाजित भारत में 1902 में ‘द ग्रामोफ़ोन कम्पनी ऑफ़ इंडिया’ ने रिकॉर्ड बनाने की शुरुआत की।

कोलकाता की प्रसिद्ध तवायफ़ गौहर जान की आवाज़ में पहला रिकॉर्ड इसी वर्ष रिलीज़ हुआ। बेगम अख़्तर का पहला रिकॉर्ड 1930 में कलकत्ता में रिकॉर्ड हुआ था। 1969 में उनका पहला एलपी रिकॉर्ड या विनाइल रिकॉर्ड स्टीरियो रिकॉर्डिंग के साथ रिलीज़ हुआ। जगजीत सिंह को अपना पहला एलपी रिकॉर्ड बनाने का मौक़ा अपने पहले इपी रिकॉर्ड के क़रीब पन्द्रह साल बाद मिला था। हरिहरन ने हिन्दी फ़िल्म ‘रोजा’, ‘बॉम्बे’, ‘लम्हे’, ‘ताल’, ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘गुरु’, ‘ख़ामोशी’ समेत देश की अनेक भाषाओं में तक़रीबन दस हज़ार से ज़्यादा फ़िल्मी गीतों का पार्श्वगायन किया है।

‘उस्ताद हरिहरन की ग़ज़ल गायकी का स्वर्णिम सफ़रनामा’ अध्याय में हरिहरन का पूरा ज़िंदगीनामा और संगीतनामा पेश किया गया है। इस अध्याय में हरिहरन के बारे में वह छोटी-छोटी जानकारियाँ हैं, जो उनके चाहने वाले तफ़सील से जानना चाहते हैं। मसलन हरिहरन ने प्रोफे़शनल ग़ज़ल गायकी का आग़ाज़ 1974 में किया था। दूरदर्शन के ‘आरोही’ कार्यक्रम में उन्होंने ‘निशाँ तो यूँ थे रहगुज़र में बहुत’ गायी थी। 1977 में हरिहरन ने पार्श्व गायन के मैदान में क़दम रखा। जयदेव के संगीत निर्देशन में उन्होंने अपनी पहली ग़ज़ल ‘अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो’ गायी।

हरिहरन पहले भारतीय ग़ज़ल गायक हैं, जिन्होंने विदेशी स्टूडियो में विदेशी संगीतकारों के साथ अपना एल्बम ‘सुकून’ रिकॉर्ड किया। 1981 से 1992 के दरमियान हरिहरन के बारह ग़ज़ल एल्बम, तो 1995 से 1998 के बीच आठ ग़ज़ल एल्बम रिलीज़ हुए। हरिहरन ने गायक-संगीतकार लेस्ली लुईस के साथ टीम बनाकर जो ‘कोलोनियल कज़िन्स’ एल्बम निकाला, उसने संगीत के क्षेत्र में कई रिकार्ड बनाए। यह एलबम प्लैटिनम की बिक्री को पार कर गया, तो इस जोड़ी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक अवार्ड मिले।

इस अध्याय की ख़ासियत हरिहरन की ग़ज़ल जर्नी के साथ-साथ संगीत की दुनिया के बदलावों पर भी लेखक की नज़र होना है। इस अध्याय में उन्होंने ग़ज़ल एल्बम बनाने वाली म्यूजिक कम्पनियों का पूरा ब्यौरा और उनके कारोबार के उतार-चढ़ाव की जानकारी भी दी है। इ.पी. रिकॉर्ड, एलपी रिकॉर्ड से लेकर कैसेट, ऑडियो सीडी, एम पी 3 और डिजिटल संगीत फॉर्मेट, म्यूजिक प्लेटफॉर्म्स, संगीत डाउनलोड तक का सफ़र साथ-साथ चलता है। 

‘सम्मान यात्रा’ अध्याय में हरिहरन को मिले अभी तक सम्मान और पुरस्कारों का विस्तृत विवरण है, तो ‘ग़ज़ल के शिल्पकार हरिहरन : संगीत मनीषियों की नज़र में’, ‘अनुभूतियों का आलोक : हरिहरन’ और ‘रिश्तों में गूँजता संगीत’ अध्याय के अंतर्गत संगीत मनीषियों, संगीत सहायकों, दोस्तों और क़रीबियों की नज़र से हरिहरन की ग़ज़ल गायकी का जायज़ा है।

जिसमें हरिहरन के बारे में आशा भोसले, उस्ताद अमज़द अली ख़ान, पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, उस्ताद ज़ाकिर हुसैन, पंडित विश्व मोहन भट्ट, पंडित अजय पोहनकर, ए. आर. रहमान, रीता गांगुली, रूना लैला, लेस्ली लुईस, शंकर महादेवन, छाया गांगुली, जॉली मुखर्जी, ताहिर फ़राज़ समेत अड़सठ लोगों के ख़यालात शामिल हैं। ‘रू-ब-रू : कुछ दूर हमारे साथ चलो, हम दिल की कहानी कह देंगे’ जैसा कि टाइटल से ज़ाहिर है, इस अध्याय में हरिहरन का एक लम्बा इंटरव्यू है। जिसमें हरिहरन ने हर उस सवाल का जवाब दिया है, जो उनके चाहने वाले उनसे जानना चाहते हैं।

लेखक ने इंटरव्यू को इस तरह संयोजित किया है कि हरिहरन और उनकी ग़ज़ल गायकी के पचास साल का पूरा सफ़र आँखों के सामने तैरने लगता है। इस बातचीत में कई दिलचस्प क़िस्से भी सामने आते हैं। मसलन हरिहरन के रूहानी गुरु उस्ताद मेहदी हसन से उनकी पहली मुलाक़ात कैसे हुई। 

‘डिस्कोग्राफ़ी’ अध्याय के तहत लेखक ने हरिहरन के अभी तक आये ग़ज़ल एल्बम की मुकम्मल जानकारी दी है। जिसमें एल्बम का नाम, यह किस साल रिलीज़ हुई, एल्बम के शायर व संगीतकार के नाम के साथ उन ग़ज़लों के टाइटल भी शामिल हैं। ‘हरिहरन की गायी 50 बेहतरीन ग़ज़लों का संकलन एवं पाठ’ अध्याय के अंतर्गत लेखक ने उन सभी ग़ज़लों का संकलन किया है, जो हरिहरन की आवाज़ में हमेशा के लिए ज़िंदा-ए—जावेद हो गईं। ज़ाहिर है कि ग़ज़ल के शैदाइयों के लिए यह पैकेज भी बेहद पसंद आएगा। ‘फ़ोटो गैलरी’ में हरिहरन की कई यादगार तस्वीरें हैं। ‘उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन’ वाक़ई ख़ूबसूरत छपी है।

किताब का लेआउट डिजाइन से लेकर उसके अध्यायों का वर्गीकरण सुचिंतित दिखाई देता है। लेकिन यह किताब ग्लेज्ड पेपर पर रंगीन तस्वीरों के साथ कॉफी टेबल बुक के तौर पर प्रकाशित होती, तो और भी दिलकश नज़र आती। प्रकाशक चाहता, तो इसके दो संस्करण निकल सकते थे। एक पेपरबैक संस्करण आम पाठकों के लिए होता। खै़र! किताब का फ्लैप लेखक-आलोचक ओम निश्चल ने लिखा है।

ढाई सौ शब्दों के इस फ्लैप में मुझे वर्तनी की तीन बड़ी ग़लतियाँ नज़र आयीं-गायकी-गायिकी, ख़ुसूसियत-ख़ुशूशियत, अहसासात-अहसासातों। जबकि अहसासात ख़ुद बहुवचन है। हिन्दी की तरह लेखक ने इसमें मात्रा का और इज़ाफ़ा कर दिया है। इसके अलावा किताब में कुछ लफ़्ज़ ग़लत हो गए हैं-जज़्बात-जज़्बातों, शे’र-शेर, ताना बाना-तना बना, विविधतापूर्ण गायक-विभिन्नतापूर्ण गायक और बहज़ाद लखनवी-शहज़ाद लखनवी। 

कुछ तथ्यात्मक ग़लतियों की तरफ़ भी ध्यान गया। मसलन ‘पाकिस्तान में उर्दू अवाम की मातृभाषा थी।’ (पेज-30) जबकि सच बात तो यह है कि उर्दू वहाँ राष्ट्रभाषा ज़रूर है, लेकिन देश के अलग-अलग सूबों में अवाम की मातृभाषा मुख़्तलिफ़ है। पंजाबी, पश्तो, सिंधी, सराइकी और बलूची आदि भाषाएं पाकिस्तानी अवाम के बीच उर्दू से कहीं ज़्यादा बोली जाती हैं। यही नहीं बांग्लादेश की मशहूर गायिका रूना लैला को पाकिस्तान की गायिका बताया गया है।

बातचीत में जिस तरह से बोलने के आदाब होते हैं, लेखक ने किताब में कहीं-कहीं ठीक उसी तरह से लिखा है। जबकि आपने की जगह उन्होंने, आप-वे, आपसे-उनसे का इस्तेमाल अगर हो जाता, तो उससे कहीं एहतिराम में कोई कमी नहीं आती। कहीं-कहीं नाम के आगे ‘श्री’ का इस्तेमाल भी ग़ैर-ज़रूरी और अजीब लगता है।

कहने को किताब के टाइटल का इंतिख़ाब ख़ास लोगों के साथ एक सर्वे के आयोजन के बाद फायनल किया गया है, लेकिन यह उतना सटीक नहीं लगता। टाइटल से ऐसा एहसास होता है कि हरिहरन ग़ज़ल के उस्ताद हैं। सच बात तो यह है कि वह ग़ज़ल गायकी के उस्ताद हो सकते हैं, लेकिन उस्ताद-ए-ग़ज़ल अतिशयोक्तिपूर्ण लगता है। किताब के नवें अध्याय ‘डिस्कोग्राफ़ी’ के फॉन्ट काफ़ी छोटे हो गए हैं। जिससे पाठकों को पढ़ने में परेशानी पेश आ सकती है।

इन छोटी-छोटी ख़ामियों को अगर छोड़ दें, तो ‘उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन’ एक ऐसी यूनिक किताब है, जिसे हर संगीत रसिक ख़ास तौर पर ग़ज़ल गायकी के शौक़ीन के कलेक्शन में ज़रूर शामिल होना चाहिए। किताब पढ़कर न सिर्फ़ वे हरिहरन और उनकी ग़ज़ल गायकी से अच्छी तरह तआरुफ़ कर पाएंगे, बल्कि सुगम संगीत के क्षेत्र में ग़ज़ल गायकी के पूरे सफ़र से भी उनकी वाक़फ़ियत होगी। 

किताब : उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन

लेखक : आनन्द कक्कड़

प्रकाशक : सर्व भाषा ट्रस्ट नई दिल्ली

मूल्य : 599 रुपए

पेज : 288 

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