झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में कैबिनेट की 23 दिसंबर को हुई बैठक में पेसा नियमावली को मंजूरी दे दी गई है। इसके बाद अब अधिसूचना जारी होते ही यह कानून लागू हो जाएगा। मतलब झारखंड में पेसा (पंचायत उपबंध, अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम-1996 लागू करने का रास्ता साफ हो गया है।
बताते चलें कि “पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996” पेसा को अनुसूचित क्षेत्रों के आदिवासी समाज की परंपराओं, संस्कृति और स्वशासन को मान्यता देने और उन्हें सशक्त बनाने के लिए बनाया गया था। लेकिन इन 29 वर्षों के दरमियान भारत के अनुसूचित क्षेत्रों में विधिवत नियमावली नहीं बन पाई थी। इस कानून की नियमावली बनने से अनुसूचित जनजाति समुदाय को कई सीधे लाभ होते।
पेसा कानून मूलतः अपनी पारंपरिक व्यवस्था के अनुसार अपने क्षेत्र-अधिकार, जो अनुसूचित क्षेत्र (पांचवीं अनुसूची) का क्षेत्र कहलाता है, के भीतर आने वाले सभी प्राकृतिक संसाधनों (जल-जंगल-जमीन) पर नियंत्रणात्मक प्रशासनिक अधिकार देता है।सरल भाषा में, इसे ही स्वशासन कहा जाता है।
पेसा कानून 1996 के नियमावली बन जाने से अनुसूचित जनजातियों को क्या क्या लाभ प्राप्त होता :
■ ग्राम सभा को सर्वोच्च अधिकार प्राप्त होगा।
ग्राम सभा (गाँव की आमसभा) को भूमि, जल, जंगल और खनिजों पर निर्णय लेने का अधिकार मिलेगा।
बाहर से कोई कंपनी, ठेकेदार या सरकार बिना ग्राम सभा की अनुमति के कोई काम नहीं कर सकती।
■ भूमि और संसाधनों की रक्षा होगी।
आदिवासियों की जमीन किसी को भी जबरन नहीं दी जा सकेगी।
■ विस्थापन और बेदखली पर रोक लगेगी।
खनन, उद्योग और विकास परियोजनाओं में ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य होगी।
■ परंपरागत रीति-रिवाज और संस्कृति की सुरक्षा होगी।
ग्राम सभा अपने पारंपरिक कानून, रीति-रिवाज और न्याय व्यवस्था चलाएगी, इससे आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान बनी रहेगी।
■ स्थानीय स्वशासन मजबूत होगा।
ग्राम सभा गाँव के प्रशासन, योजनाओं, स्कूल, स्वास्थ्य सेवा, पानी-बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं पर सीधा नियंत्रण कर सकेगी।
पंचायतें अब आदिवासी समाज के हित में निर्णय ले सकेगी।
■ खनिज और प्राकृतिक संपदा पर अधिकार स्थानीय जनजातीय समुदाय के पास होगा।
ग्राम सभा को जंगल से मिलने वाली लघु वनोपज (जैसे तेंदू पत्ता, महुआ, सालबीज आदि) पर पूर्ण अधिकार मिलेगा।
इनसे होने वाली आय सीधे आदिवासियों को होगी और बिचौलियों का हस्तक्षेप कम होगा।
■ न्याय व्यवस्था में भागीदारी होगी।
छोटे-मोटे विवादों को ग्राम सभा अपनी परंपरा के अनुसार निपटा सकेगी।
इससे आदिवासी समाज को सस्ता और त्वरित न्याय मिलेगा।
■ शराब बिक्री पर नियंत्रण होगा।
गाँव की ग्राम सभा यह तय करेगी कि गाँव में शराब बिकेगी या नहीं।
इससे सामाजिक बुराइयों पर नियंत्रण होगा।
■ विकास योजनाओं में प्राथमिकता प्राप्त होगी।
ग्रामसभा तय करेगी कि गाँव में किस तरह का विकास हो।
शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी आदि के लिए योजनाएँ आदिवासी जरूरतों के अनुसार लागू होंगी।
लेकिन झारखंड सरकार द्वारा मंगलवार को मंजूर किए गए पेसा नियमों को लेकर आदिवासी बुद्धिजीवी मंच ने कड़ी आपत्ति जताई है। मंच के अनुसार ये नियम संसद द्वारा 1996 में बनाए गए पेसा अधिनियम के अनुरूप नहीं हैं और इन्हें चुनौती देने के लिए झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाएगा।
आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के राष्ट्रीय संयोजक विक्टर माल्टो ने प्रेस बयान में कहा कि राज्य सरकार ने एक बार फिर पंचायत राज की उसी व्यवस्था को लागू करने की कोशिश की है, जिसे संसद के 1996 के अधिनियम ने अनुसूचित क्षेत्रों के लिए अलग ढंग से परिभाषित किया था। उनके अनुसार, यह सीधे तौर पर संसदीय कानून की भावना के खिलाफ है।
विक्टर माल्टो ने बताया कि झारखंड बुद्धिजीवी मंच द्वारा दायर याचिका 1589/2021 में झारखंड हाईकोर्ट ने अपने आदेश के पैरा 12 में स्पष्ट कहा था कि झारखंड पंचायत राज अधिनियम 2001 को संसद के 1996 के अधिनियम के अनुरूप नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद राज्य सरकार ने नियम बनाते समय उसी तीन-स्तरीय पंचायत राज व्यवस्था को आधार बनाया।
वहीं दूसरी तरफ अधिसूचना जारी होने के बाद पंचायती राज विभाग के सचिव मनोज कुमार ने बताया कि यह कानून राज्य के अनुसूचित जिलों में लागू होगी। लेकिन अनुसूचित जिलों के नगर निकाय क्षेत्र में यह लागू नहीं होगा, बल्कि सिर्फ पंचायतों में लागू होगा।
इससे अनुसूचित जिलों में स्वशासन, भूमि, खनिज और जल प्रबंधन अब ग्राम सभा के हाथ में चला जाएगा। ऐसे में ग्राम सभाएं पहले से कहीं ज्यादा सशक्त होंगी और विकास योजनाओं में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी। उन्होंने बताया कि यह नियमावली पेसा अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप ही बनाई गई है।
उल्लेखनीय है कि झारखंड देश के उन 10 राज्यों में शामिल था, जहां पेसा अधिनियम लागू करने के लिए अब तक नियमावली को मंजूरी नहीं मिली थी। आदिवासी संगठन इस मुद्दे को लगातार उठा रहा था। वहीं हाईकोर्ट का भी सरकार पर दबाव था।
बता दें कि 23 दिसंबर को ही अधिसूचना जारी होने के पहले अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस राजेश शंकर की कोर्ट ने सरकार से कानून लागू करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी।
कोर्ट में मौजूद पंचायती राज विभाग के सचिव ने बताया कि नियमावली के ड्राफ्ट को मंगलवार को होने वाली कैबिनेट की बैठक में रखा जाएगा। इसलिए कुछ समय दें। कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार करते हुए सुनवाई के लिए 13 जनवरी 2026 की तिथि निर्धारित की। यह अवमानना याचिका आदिवासी बुद्धिजीवी मंच ने दायर की है।
पेसा नियमावली के अनुसार ग्राम सभा का गठन होगा और प्रत्येक माह कम से कम एक बैठक होगी। ग्राम सभा के दसवें हिस्से या आधे सदस्यों की लिखित मांग पर ग्राम प्रधान को सात दिनों के भीतर बैठक बुलानी होगी। बैठक के कोरम के लिए ग्राम सभा के कुल सदस्यों के एक-तिहाई उपस्थिति अनिवार्य होगी। झारखंड पंचायती राज अधिनियम-2001 के प्रावधान पहले से ही पेसा के अनुरूप हैं। इसलिए पंचायत चुनाव पर इसका असर नहीं पड़ेगा।
कैबिनेट की बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि पेसा कानून को राज्य में प्रभावी तरीके से लागू किया जाएगा। पेसा कानून की नियमावली को व्यापक विमर्श और विभिन्न विभागों के साथ गहन मंथन के बाद अंतिम रूप दिया गया है। यह नियमावली अब राज्य की जनता को समर्पित की जा रही है। जमीनी स्तर पर इसका बेहतर क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए सभी पहलुओं का विशेष ध्यान रखा जाएगा।
जिन जिलों में पेसा कानून लागू होगा उनमें रांची, लोहरदगा, गुमला, सिमडेगा, लातेहार, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिम सिंहभूम, सरायकेला खरसावां, साहेबगंज, दुमका, पाकुड़, जामताड़ा शामिल है। इसके साथ ही पलामू जिले के सतबरवा ब्लॉक के रबदा और बकोरिया पंचायत, गोड्डा जिले के सुंदरपहाड़ी और बोरिजोर ब्लॉक में यह कानून लागू होगा।